कुछ कौशल ऐसे होते हैं, जिनका अनुसरण भी करने के लिए असाधारण मेधा की आवश्यकता होती है। भारतेंदु काल के ‘प्रेमघन’ आदि ने भी कितने ही चुटकुले लिखे, लेकिन वे भारतेंदु के चुटकिलों के उद्देश्य और उनकी मारक शक्ति को पहचान नहीं पाये और इसीलिए उनके द्वारा रचित चुटकुले चुटकुले ही रहे, चुटकिले नहीं बन सके। ‘प्रेमघन’ जी ने अनेक लघु-आकारीय नाट्य प्रहसन भी रचे और उनमें उन्हें काफी सफलता भी मिली है। एकांकी और नाट्य साहित्य पर काम करने वालों को उनमें बहुत-कुछ मिल सकता है। तो हिन्दी समाज को भारतेंदु ने अलग ही ढंग से चेताने और समकालीन लेखकों को भी स्वयं सरीखा संस्कार देने का प्रयास किया था; लेकिन उनके बाद 1947-48 ई. में परसाई के आने तक वह सरस्वती लुप्त ही रही; और परसाई के काल में भी कथन की उस भंगिमा, साहस और धार को कोई अन्य अपनी लेखनी में नहीं उतार पाया।
हिन्दी समाज के सांस्कृतिक और राजनीतिक उन्नयन में सक्रिय योगदान के लिए उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध की समूची साहित्यिक जाति का यह देश हमेशा ही ॠणी रहेगा। वैचारिक मेधा और अद्भुत रचना-चेतना के बूते इस दौर की पीढ़ी ने स्वाधीनता आंदोलन को ऐसी आग पकड़ाई जिसका अनुमान अंग्रेज लम्बे समय तक लगा ही न सके।
भाषा और शैली के निर्माण में भी इस काल का बड़ा योगदान है। यह काल युगीन राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत करने का काल रहा। लघुकथा के विकास की अनुकूल भूमि इस काल में तैयार होती दिखाई देती है, लेकिन जिस उर्वरा-शक्ति की आवश्यकता उसे थी, आगामी वर्षों में अनेक अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक कारणों से वह अन्य विधाओं में विभाजित हो गयी और लघुकथा को एक बार पुन: शांत हो बैठ जाना पड़ा।
सन् 1900 ई. से सन् 1970 ई. तक
जनवरी 1900 ई. में हिन्दी साहित्य की ऐतिहासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। बाबू श्यामसुन्दर दास के बाद 1903 ई. में महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864-1938 ई.) इसके सम्पादक हुए और 1920 ई तक रहे। लगभग 80 वर्षों तक इस पत्रिका का प्रकाशन निरन्तर होता रहा। चालीस वर्ष के अंतराल के बाद सन् 2020 ई. से इसका प्रकाशन पुन: प्रारम्भ हुआ है।
छोटे आकार में हिन्दी की पहली कहानी ‘सरस्वती’ के 1916 ई. अंक में छपी, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की ‘झलमला’ मिलती है। सन् 1978 ई. में गाजियाबाद से जगदीश बत्रा के संपादन में प्रकाशित ‘सर्वोदय विश्ववाणी’ के एक अंक में बलराम अग्रवाल द्वारा इसे हिन्दी की पहली लघुकथा घोषित किया गया था। तदुपरांत लम्बे समय तक इसे ही हिन्दी की पहली लघुकथा के रूप में प्रस्तुत भी किया जाता रहा। यहाँ तक कि ‘कथाबिंब’ के लघुकथा विशेषांक में उसके अतिथि संपादक कृष्ण कमलेश ने काफी काट-छाँटकर इसे पुन: पहली लघुकथा के रूप में प्रस्तुत किया था। बख्शी जी ने ‘झलमला’ नाम से ही अपना कहानी संग्रह भी प्रकाशित कराया। सन् 1900 ई. के बाद 1935 ई. तक अनेक कहानीकारों का नाम कथा-साहित्य में अंकित है; इनमें से केवल सुदर्शन का ही लघुकथा संग्रह ‘झरोखे’ (1947 ई.) प्रकाश में आया, किसी अन्य का नहीं।
किसी खड़ीबोली कथा-रचना के लिए ‘लघु-कथा’ शब्द का प्रयोग पहली बार ‘हंस’ के अक्टूबर 1938 ई. अंक में देखने को मिलता है। उसके बाद विष्णु प्रभाकर, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, जगदीश चन्द्र मिश्र प्रभाकर, हरिशंकर परसाई, राधाकृष्ण, भवभूति मिश्र, जानकीवल्लभ शास्त्री आदि अनेक कथाकारों ने लघुकथा-लेखन को अपनाया। सन् 1964 ई. से यह अनेक पत्र-पत्रिकाओं में बहुतायत में स्थान पाने लगी। सन् 1964-65 ई. के बाद पूरन मुद्गल, सुरेन्द्र मंथन, सतीश दुबे तथा 1970 ई. के बाद नयी पीढ़ी के अनेक कथाकार इस विधा से आ जुड़े। व्यावसायिक कथा पत्रिका ‘सारिका’ के माध्यम से कथाकार-सम्पादक कमलेश्वर ने इस विधा को बहु-प्रसारित किया, यह निर्विवाद है। सन् 1970-2000 ई. के मध्य की लघुकथा पीढ़ी में रमेश बतरा, बलराम, भगीरथ, बलराम अग्रवाल, जगदीश कश्यप, अशोक भाटिया, सिमर सदोष, कमलेश भारतीय, पृथ्वीराज अरोड़ा, शकुन्तला किरण, सतीशराज पुष्करणा, सतीश राठी, सुकेश साहनी, चित्रा मुद्गल आदि का नाम प्रमुख रूप से लिया जा सकता है।
प्रबुद्ध कथा-चिंतकों की बेचैनी अर्थात् लघुकथा का पुनर्प्रस्फुरण काल साहित्यकार उपेन्द्रनाथ अश्क कहते हैं—‘चन्द्रकान्ता संतति’ तथा इसी प्रकार की कौतूहल प्रधान कहानियाँ हर उम्र में नहीं पढ़ी जाती । जीवन में एक समय आता है, जब सब-कुछ सुनहला दिखायी देता है। कोई गम नहीं, दुख नहीं, उत्तरदायित्व का बोझ नहीं,
तब ऐसी चीजें पढ़ने मे मन लगता है। पर ज्यों ही हम, जीवन की यथार्थताओं के संघर्ष में आते है; स्वप्न जब हमारे स्वप्न नहीं रहते; तभी हम ऐसी कहानियों से ऊब उठते हैं। तब हम कोई ऐसी चीज चाहते हैं, जो हमारे सामने जीवन की यथार्थता को खोलकर रख दे; हमारे सुख-दुखों का दिग्दर्शन कराये; हमारी विपत्तियों में हमें सान्त्वना दे, हमारी कठिनाइयों मे हमारा पथ प्रदर्शन करे और जीवन को, मानव को समझने में हमारी सहायता करे।
साहित्य के इतिहास मे भी जिस समय वे कौतूहलपूर्ण, मनोरंजन मात्र का या धर्म का पहलू लिये हुए, कहानियाँ लिखी गयीं, तब जीवन संघर्ष अपेक्षाकृत कम जटिल था; जीविका का प्रश्न भी सम्भवत: आज जैसा विकट न था; लोगों के पास समय भी काफ़ी था। तब लोग बैठे धर्म ज्ञान की चर्चा कर सकते थे, कौतूहलपूर्ण कहानियाँ पढ़और सुन सकते थे। पर आज, जब जीवन संघर्ष ने सपने देखने वाले युवक को एकदम प्रौढ़ बना दिया है और रोजी-रोटी की चिन्ता ने उसके पास समय नही छोड़ा है, तब यह आवश्यकथा कि पुरानी कौतूहलपूर्ण लम्बी-लम्बी कहानियों का स्थान छोटी भावपूर्ण, जीवन से मेल खाने वाली कहानियाँ लेतीं। अब तक हम कहानी को उसके व्यापक अर्थ में लेते रहे हैं, जिसमें साधारण छोटी घटना से लेकर ‘चन्द्रकान्ता संतति’ तक भी कहानी है, पर यहीं से ‘छोटी कहानी’ नाम की एक नयी चीज आती है, जो अपनी पृथक् कला रखने के साथ ही आज की आवश्यकताओं को पूरा करती है ।’
वह आगे कहते हैं—‘हमें यह मानने में संकोच न होना चाहिए कि छोटी-छोटी कहानियाँ लिखने की यह कला हमने यूरोप से ली है। कम-से-कम इसका आज का विकसित रूप तो पश्चिम ही का है। यह माना कि हमारे यहाँ प्राचीन विषय कुछ और हैं, शैली कुछ और है। कथा-साहित्य में विकास हुआ और उसके विषय में चाहे उतना बड़ा परिवर्तन न हुआ हो, पर शैली तो बिलकुल ही बदल गयी । ‘अलिफ़-लैला’ उस समय का आदर्श था, उसमें बहुरूपता थी, वैचित्र्य था, कौतूहल था, रोमांस था, पर उसमें जीवन की समस्याएँ न थीं, मनोविज्ञान के रहस्य न थे, अनुभूतियों की इतनी प्रचुरता नथी, जीवन अपने सत्य रूप में इतना स्पष्ट न था।’
समय के अनुसार लघुकथा के कथ्य, शिल्प, शैली सभी में बदलाव आया है, आना ही चाहिए था। कल जो लघुकथा लिखी जाती थी, प्रकाशन आरम्भ होने के बाद लगभग एक दशक तक, कम स्पेस की रचना के रूप में ‘हंस’ में जो गद्य-गीत छपते थे, वैसे आज नहीं लिखे जाते। यह भी सत्य है कि हम लघुकथा की जो परिभाषा कल दे रहे थे, उसमें परिवर्तन हुआ है। इसी तथ्य के मद्देनजर आज की लघुकथाओं की जो परिभाषा आज दे रहे हैं, वह कल के साहित्य-समाज को ग्राह्य होगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता। शुरू-शुरू में किसी घटना का ठीक-ठाक ढंग से वर्णन करने को ही ‘कहानी’ कह दिया जाता था। लम्बे समय तक घटनाओं का झंझावात ही कहानियों का मुख्य अंग रहा है और बहुत-से लेखकों की नजर में अब भी है; लेकिन यह सत्य है कि कहानी में आमूल-चूल बदलाव आया है।
अगर हम 1950 से 1980 के बीच कुछेक गम्भीर कथा-आलोचकों की कहानी संबंधी चिंताएँ पढ़ें तो कहानी को लेकर अधिकतर बातें उनके मानस में घुमड़ रहे उन कारणों को प्रकट कर रही हैं जिनके कारण वे अपने समय की कहानी के कलेवर से बेचैन रहे हैं। प्रेमचंद का यह कहना कि ‘गल्प का आधार अब घटना नहीं, भीतरी या बाहरी द्वन्द्वों की अभिव्यक्ति है। उसमें घटनाएँ आ भी सकती हैं और नहीं भी आ सकतीं।’ अपने समय का अत्यंत महत्वपूर्ण वक्तव्य है जिस पर कहानी से हटकर लघुकथा की दृष्टि से ध्यान दिया जाना चाहिए था, लेकिन नहीं दिया गया।
इसी क्रम में कथाकार इलाचन्द्र जोशी का यह वक्तव्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि—‘वर्तमान युग की ‘छोटी कहानी’ एक प्रकार की गद्य-कविता है, जो वास्तविक जीवन के आधार पर खड़ी होती है। जीवन का चक्र माना परिस्थितियों के संघर्ष से उल्टा-सीधा चलता रहता है। इस सुवृहत् चक्र की किसी विशेष परिस्थिति की स्वाभाविक गति के प्रदर्शित करने में ही कहानी की विशेषता है।’
जोशी जी कवि भी हैं। वे कहानी की भाषा को भी काव्यात्मक प्रवाह के रूप में देखते हैं। उनकी यह बात लघुकथा की भाषा की ओर संकेत कर रही है। अश्क जी लिखते हैं—कहानी की धारा को देखकर यह कहा जा सकता है कि आधुनिक छोटी कहानी एक ऐसी रचना है जिसका आधार किसी मनोवैज्ञानिक सत्य या मानव जीवन अथवा समाज की किसी समस्या पर रखा गया हो; और जो बिना इधर-उधर भटके सीधी अपने ध्येय पर पहुँच जाय; और यदि उसमें कोई घटना वर्णित है तो उसका चित्रण इकहरा और रसपूर्ण हो।’
प्रकारान्तर से क्या वह लघुकथा के ही गुण को व्यक्त नहीं कर रहे थे? अवश्य; लेकिन उनके दृष्टि-पथ में आज की लघुकथा नहीं, लघु-कथा थी यानी शॉर्ट-स्टोरी का शब्दानुवाद। इस प्रकार, पूर्ववर्ती कहानी-चिंतक लघुकथा के आने की आहट को सुन तो रहे थे, सही-सही समझ नहीं पा रहे थे; और स्वीकार तो ‘कहानी’ (न कि कहानीपन) के पूर्वाग्रह से ग्रसित पुरातन मानसिकता के अनेक पैरोकार आज भी नहीं ही कर पा रहे हैं। जबकि इन्हीं के बीच डॉ॰ गोपाल राय सरीखे प्रबुद्ध आलोचक ने चार खण्डों में प्रकाशित अपने ‘कहानी का इतिहास’ ग्रन्थ में ‘लघुकथा’ को कथा-साहित्य की स्वतन्त्र विधा स्वीकार किया है।
सन्दर्भ :
1- जगन्नाथप्रसाद शर्मा, हिंदी गद्यशैली का विकास, नागरी प्रचारिणी सभा,काशी, प्र.सं. संवत् 1987; परिवर्द्धित सं. सं. 2006
2- डॉ॰ प्रदीप जैन, सोजे वतन-जब्ती की सच्चाई, पराग बुक्स, साहिबाबाद, गाजियाबाद-201005, 2021
3- राकेश पाण्डे, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबंधित साहित्य में गाँधी, डायमंड बुक्स, नई दिल्ली, 2019
4- उपेन्द्र नाथ अश्क; हिन्दी कहानी : एक अंतरंग परिचय; प्रकाशक : नीलाभ प्रकाशन, 5,
खुसरोबाग रोड, इलाहाबाद-1, प्रथम संस्करण : 1967
5- डॉ॰ लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय; आधुनिक हिन्दी साहित्य की भूमिका (1757-1857ई); संस्करण 1952
6- डॉ॰ बलराम अग्रवाल; लघुकथा:अतीत के पन्नों से; सन्दर्भ : ‘लघुकथा वृत्त’, अक्टूबर 2018
7- हेमन्त शर्मा (सम्पादक), भारतेन्दु समग्र, पिशाचमोचिनी, वाराणसी, 1989 संस्करण
8- रामचन्द्र शुक्ल; हिन्दी साहित्य का इतिहास
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