बुधवार, 29 सितंबर 2010

पं. श्रीचन्द्रधर शर्मा गुलेरी की लघुकथाएं/बलराम अग्रवाल


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(पूर्ण लेख का उत्तर-भाग-1 16 सित्म्बर, 2010 को तथा उत्तर-भाग-2, 1सितम्बर 2010 को प्रकाशित किया जा चुका है। इस बार प्रस्तुत है लेख का पूर्व-भाग। इस प्रकार यह लेख समापन को प्राप्त हुआ।बलराम अग्रवाल)

लेख प्रारम्भ करने से पहले यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि गुलेरी जी द्वारा लिखित सभी पत्रों में हस्ताक्षरित नाम श्रीचन्द्रधर शर्मा है, चन्द्रधर शर्मा नहीं। अत: स्पष्ट है कि गुलेरी जी का मूल नाम अभिव्यक्ति-लाघव का शिकार होता आया है। अब चूँकि यही नाम प्रचलित भी है इसलिए संशोधन की आवश्यकता नहीं है।
साहित्य एक अनवरत धारा है। ऐसी धारा, जो अनेक स्रोतों से फूटती है और ऐसी अनवरत कि उसका कोई स्रोत समयावधि विशेष के दौरान शान्त और विस्मृत तो हो सकता है, मृत नहीं। मृत हो जाना साहित्य की प्रकृति नहीं है। शान्त अथवा विस्मृत मान लिये गये स्रोत भी मात्र इस अर्थ में विस्मृत होते हैं कि उन्होंने अपने समय के साहित्य से बहुत भिन्न गति की रचनाएँ सर्जित की होती हैं। यह भिन्न गति इतनी धीमी हो सकती है कि अपने समय के साहित्य से काफी पीछे छूट जाए और इतनी तीव्र भी कि अपने समय के साहित्य से बहुत आगे निकल जाए। दोनों स्थितियों में यह तत्कालीन समाज को कोई दृष्टि दे पाने में अक्षम ही रहती है।
साहित्य की धारा कुछ-कुछ पृथ्वी की गति जैसी होती है, जो अपनी धुरी पर भी घूमती है और आगे भी बढ़ती है; अर्थात इसमें आलोड़न और उद्वेलन साथ-साथ चलते हैं। इसलिए कालान्तर में, पीछे छूट गई या आगे निकल आई विस्मृत मान ली गई साहित्य-धाराओं से भी जा-आ मिलती है। तात्पर्य यह कि आवश्यक नहीं कि किसी साहित्य की प्रवृत्ति को उसके रचनाकाल के दौरान ही जान और समझ लिया जाए। चेखव की रचनाओं का उचित मूल्यांकन उनकी मृत्यु के उपरांत ही हो सका। वस्तुत: लेखक जिस मन्तव्य के साथ सर्जन करता है, उस मन्तव्य को अलग रखकर उसकी रचनाओं का उचित आकलन असंभव है।
आकलन की उपेक्षा के ऐसे दौर को हिंदी लघुकथा ने भी सहा है। अव्वल तो पूर्व-कथाकारों द्वारा स्वतन्त्र कथा-प्रकार के रूप में लघुकथा-सर्जना कम ही हुई; परन्तु जितनी भी हुई, अवांछनीय बिखराव के साथ। विचाराभिव्यक्ति या कथाभिव्यक्ति के समय शाब्दिक-सघनता पर ध्यान केन्द्रित करने की स्थिति में उस काल का साहित्य संभवत: नहीं था। हिंदी साहित्योत्थान का वह शैशव जैसा ही काल था। कथा के सन्दर्भ में तो यह धारणा शब्दश: सही प्रतीत होती है। हिंदी का प्रारम्भिक कथा-साहित्य वर्णनात्मक और व्याख्यात्मक ही अधिक है। आज की दृष्टि से देखें तो उसमें विरलता भी है। वस्तुत: आकारगत लघुता उस काल में प्रचलन से परे की चीज थी। अत: वैसी कथा-रचनाओं को आकलन योग्य भी नहीं माना गया और शायद इसीलिए तत्कालीन लेखकों ने लघ्वाकारीय रचना-कर्म से स्वयं को यथासंभव दूर रखना ही बेहतर समझा। लघ्वाकारीय रचना-कर्म से दुराव की यह मानसिकता कुछेक मौकों को छोड़कर पिछ्ली सदी में सातवें दशक के उत्तरार्द्ध तक बनी रही। लघ्वाकारीय हिंदी कथा-रचनाओं के बारे में पहली टिप्पणी संभवत: प्रेमचंद के द्वारा कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर की लघु कथा-रचनाओं के बारे में सामने आई, परन्तु इससे लघुकथा-लेखन की स्थिति में कोई रचनात्मक परिवर्तन नहीं आया। मिश्र जी स्वयं तो जरूर लगे रहे, अपने समय के अन्य कथाकारों को इस ओर प्रवृत्त होने की प्रेरणा न तो दे सके और न ही बन सके। हालाँकि लगभग सभी महत्वपूर्ण कथा-लेखकों ने लघ्वाकारीय कथा-सर्जना की हैभारतेन्दु हरिश्चन्द्र, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, अयोध्या प्रसाद गोयलीय, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, सुदर्शन, माखनलाल चतुर्वेदी आदि सभी ने; परन्तु इनमें से किसी के भी इस कार्य का अलग से कभी आकलन नहीं हुआ। परिहासिनी(1875-76) में संकलित भारतेन्दु हरिचन्द्र की हास-परिहासात्मक व गंभीर लघ्वाकारीय रचनाओं पर भी हमारी दृष्टि भारतेन्दु समग्र के प्रकाशनोपरांत 1985 में ही पड़ पाई यानी मूल पुस्तक के प्रकाशन के लगभग 110 वर्ष बाद। वह भी इसलिए कि एक स्वतंत्र कथा-विधा के रूप में लघुकथा तब तक अपनी अस्मिता सिद्ध कर चुकी थी।
भारतेन्दु के उपरांत गुलेरी जी एक और महत्वपूर्ण कथाकार हैं जिनकी पर्याप्त (17 या 18) लघ्वाकारीय कथा-रचनाएँ खोज(?) ली गई हैं। गुलेरी साहित्य के खोजी डा. मनोहर लाल के अनुसारउन्होंने अपने निबन्धों, लेखों, और पत्रों में यत्र-तत्र पुराणों, धर्मग्रन्थों तथा संस्कृत-साहित्य के दृष्टान्तों के रूप में कुछ लघुकथाएं उद्धृत की हैं जिन्हें कथाकार-पत्रकार-संपादक बलराम ने वहाँ से नोंच लिया है। गुलेरी जी की लघुकथाओं के संबंन्ध में यह कथन विशेष महत्व रखता है क्योंकि कथित रूप से उनके द्वारा लिखी लघुकथाओं में से अधिकतर जैन आचार्य सोमप्रभसूरि द्वारा संवत 1241 में रचित संस्कृत-ग्रंथ कुमारपालप्रतिबोध तथा आचार्य मेरुतुंग द्वारा संवत 1361 में रचित संस्कृत-ग्रंथ प्रबंधचिन्तामणि के श्लोकों की व्याख्या हेतु संदर्भ-कथा के रूप में प्रयुक्त हुई हैं। इस आधार पर नि:संकोच कह सकते हैं कि गुलेरी जी ने स्वतन्त्रत: एक भी लघुकथा नहीं लिखी है उनके द्वारा उद्धृत की जाने तथा बलराम जैसे प्रबुद्ध लघुकथा-संपादक के उद्योग के कारण उक्त संदर्भ-कथाओं का अलग से आकलन अवश्य किया जा सकता है।
यद्यपि जिस तरह से परिहासिनी की रचनाओं को लघुकथा मानने न मानने जैसी मत-भिन्नता है, वैसी ही गुलेरी जी की लघुकथाओं के बारे में भी हो सकती है, तथापि ऐसी मत-भिन्नता का मुख्यत: एक ही कारण होता हैआलोचक का दृष्टि-संकोच। वह आज की दृष्टि से इन रचनाओं की भाषा, शैली, शिल्प, कथानक और उसके विस्तार को परखता है। जिस काल में लिखी गई रचना को उसने आकलन के लिए उठाया है, उस काल की रचनाशील प्रवृत्तियों, क्षमताओं और विवशताओं को उनकी सम्पूर्ण व्यापकता और गहनता के साथ महसूस करने के लिए अपने ज्ञान और संवेदन-तन्तुओं को उस काल से जोड़ने की क्षमता जब तक वह अपने भीतर पल्लवित नहीं करेगा, रचना का उचित एवं न्यायपूर्ण विवेचन नहीं कर पाएगा। किसी भी रचना के उचित एवं न्यायपूर्ण आकलन के लिए आलोचक का न सिर्फ रचना और उसके काल से बल्कि रचनाकार और उसकी प्रवृत्तियों से भी जुड़ाव आवश्यक है। अफ्रीकी-गुरिल्लाओं के आचरण, चरित्र, स्वभाव और प्रवृत्तियों पर शोध कर रही जर्मन जीवविज्ञानी जंगल में गुरिल्ला-समूह का पीछा करते हुए मनुष्य-जैसा व्यवहार करने की बजाय गुरिल्ला-जैसा पशुवत-व्यवहार ही करती है। मस्तिष्क से वह मनुष्य होती है और व्यवहार से पशु। गुरिल्ला-समूह में घुल-मिल जाने के लिए, निकट से उनके हर पक्ष का अध्ययन करने के लिए उसकी गुरिल्लावत चेष्टाएँ ही उसको सफल बना सकती हैं। गुरिल्लाओं के बीच भी उसे अगर मानव के रूप में अपने विकसित और सभ्य हो जाने का रौब गाँठे रखना है तो उन्हें उनके हाल पर छोड़कर उसे अपनी विकसित और सभ्य दुनिया में लौट जाना चाहिए।
गुलेरी जी की लघु कथा-रचनाओं का काल सन 1904 से 1922 तक बताया जाता है। भारतीय स्वातन्त्र्यान्दोलन के ये महत्वपूर्ण वर्ष हैं। 1915 में गांधीजी का भारत में पदार्पण हो चुका था। पूरा देश राष्ट्रप्रेम की भावना और उनके आह्वानों से इस कदर आन्दोलित था कि 1920 में उनके असहयोग-आन्दोलन से प्रेरित होकर प्रेमचन्द तक ने सरकारी-सेवा को सलाम कह दिया था, ऐसा हम पढते हैं। विश्व-परिदृश्य को लें तो प्रथम विश्वयुद्ध, रूसी-क्रान्ति और वहाँ पर ज़ारसाही का खात्मा आदि अनेक ऐतिहासिक घटनाएँ उसी काल में घटित मिलती हैं। ऐसे उद्वेलनकारी काल में गुलेरी जी ने जिन कथानकों को उठायाऊपरी तौर पर बेशक वे कालानुरूप तेवर प्रस्तुत नहीं करते, परन्तु यह बात ध्यान देने योग्य है कि गुलेरी जी का अपना व्यक्तित्व क्या है? रचना के किसी भी स्तर पर क्या वे हमें अधीर होते नजर आते है? उनकी कालजयी कृति उसने कहा था को ही लेंकिशोरावस्था के प्रेम को लहनासिंह अंत तक अपने हृदय में पाले रखता है, लेकिन शरतचन्द्र के देवदास की शैली में नहीं। बचपन की उस घटना और उस लड़की को वह जैसे भूल ही चुका था, अगर सूबेदारनी होरां खुद ही अपने-आप को उसके आगे प्रकट न कर देती और अपने पति और पुत्र की रक्षा का अनुरोध न कर बैठती। बचपन की घटना के पच्चीस साल बाद हुई यह अचानक भेंट और अनुनय उसे पुन: जज्बे के उसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती हैं जिस पर अपनी जान की परवाह न करते हुए एक दिन उसने ताँगे के नीचे आती लड़की की जान बचाई थी। पच्चीस साल पहले फूटा प्रेम का अंकुर हरहरा उठता है और शेष जीवन का वह जैसे उद्देश्य ही निश्चित कर लेता है। सूबेदार हजारासिंह से मृत्यु के निकट पहुँच चुके लहनासिंह के वे शब्दसुनिए तो, सूबेदारनी होरां को चिट्ठी लिखो तो मत्था टेकना लिख देना। और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझसे जो उन्होंने कहा था, मैंने वही कियाहमें गुलेरी जी के सरल व्यक्तित्व के दर्शन तो कराते ही हैं, उन्हें सकारात्मक दिशा का कथाकार भी सिद्ध करते हैं। युद्ध और उसके क्षेत्र की समस्त विभीषिकाओं के बीच, यहाँ तक कि मृत्यु-मुख में पड़े होने की स्थिति में भी वह प्रेम और आदर्शों की रक्षा हेतु प्राणाहुति में विश्वास करते हैं। शरतचन्द्र का देवदास भी वचन का पालन करता है। उसका तो प्राणांत भी पारो की ससुराल में ही होता है, परन्तु वह नकारात्मक दिशा का नायक है। दोनों कथाकारों की प्रवृत्तियाँ भिन्न हैं इसलिए उसने कहा था का नायक देवदास नहीं है, लहनासिंह है। उसने कहा था शाब्दिक चमत्कार, लहनासिंह के भौतिक या आदर्श प्रेम या फिर प्रेमिका के साथ वचनबद्धता के निर्वाह मात्र की कहानी नहीं है। वह एक ऐसे व्यक्तित्व का चित्रांकन है, जो अपनी धीरता और निष्ठा-परायणता में हर दृष्टि से सकारात्मक और पूर्ण है। वह न युद्ध-क्षेत्र की विभीषिका से हिलता है और न लम्बे समयोपरांत प्रेमिका से अचानक भेंट हो जाने की असीम प्रफुल्ल्ता से। वह सागर-तल-सा धीर और सहज है। यही कारण है कि गुलेरी जी घोर राजनीतिक उथल-पुथल के काल में भी सहज लेखन करते हैं। वह न उच्छृंखल और नकारात्मक प्रेम के गीत गाते हैं और न हिंसक-अहिंसक मारा-मारी के। वह सहज रहते हैं, लेकिन एक तेवर के साथ। उनका तेवर महर्षि के अर्शी तमुक का तेवर है जो 1904 में भी, जबकि साधु-संयासियों के प्रति आमजन की अंधश्रद्धा आज की तुलना में कहीं अधिक रही होगी, चरणों में गेरुआ बूट, देह में रेशमी कंबल और मुँह पर चिकनी दाढ़ीधारी महर्षि अमुकानन्द सरस्वती पर तुरन्त कटाक्ष करने से नहीं चूकता। महर्षि में अर्शी तमुक के माध्यम से महर्षि अमुकानन्द सरस्वती पर ही नहीं—‘बरक्कत में वेश्या के माध्यम से राजा भोज पर भी वह वैसा ही कटाक्ष करते हैं। बरक्कत और राजा की नीयत पात्रों के बदलाव के साथ एक ही कथानक की दो रचनाएँ प्रतीत होती हैं।
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(बलराम द्वारा संपादित लघुकथा संकलन ‘गुलेरी की लघुकथाएँ, मासिक उत्तर प्रदेश तथा त्रैमासिक ‘वर्तमान जनगाथा में प्रकाशित।)

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

पं. श्रीचन्द्रधर शर्मा गुलेरी की लघुकथाएं/बलराम अग्रवाल

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उत्तर भाग-1
(पूर्ण लेख का उत्तर-भाग-2, 1सितम्बर 2010 को प्रकाशित किया जा चुका है। इस बार प्रस्तुत हैउत्तर-भाग-१ । इसका पूर्व-भाग बाद में प्रकाशित किया जाएगा ताकि वह इसके ऊपर आ जाए।बलराम अग्रवाल)
गुलेरी जी की लघु कथा-रचनाओं में अधिकांशत: तो प्रचलित लोककथाओं और किंवदन्तियों पर ही आधारित हैं। यह कहते हुए हमें यह भी ध्यान रखना है कि इन रचनाओं पर हम इनके रचनाकाल के 100 साल से भी अधिक समय बाद अपनी टिप्पणी दे रहे हैं, अर्थात इतने वर्ष बाद जबकि कोई रचना जनमानस में रच-बस कर स्वयं किंवदन्ती बन जाती है। कई को हम बालकथा के रूप में रेखांकित कर सकते हैं तो एकाध को चुटीले हास्य के रूप में। उनकी इन रचनाओं के आधार पर हमारे सामने उनका विनोदी, संस्कारप्रिय, शालीन, कटाक्षप्रिय और मुँहफट-रसिक व्यक्तित्व उभरकर आता है। एक ऐसा व्यक्तित्व जो न स्त्रियों से चुहल(शक्कर का चूर्ण) के मौके हाथ से जाने देता है और न शिक्षक-समुदाय पर कटाक्ष(भूगोल) करने के। उनकी लघु कथा-रचनाओं में एकरूपता या स्तरीय विविधता जैसी कुछ चीज नजर आने की बजाय हमें अगर बिखराव और बचकाना प्रयास जैसा कुछ नजर आता है तो उसका एक कारण तो हम ऊपर लिख ही आए हैंआलोचक का दृष्टि-संकोच। दूसरा यह कि इन कथाओं की प्रस्तुति के काल में(अर्थात 1904 से 1922 के दौरान) आज की तरह का बारीक विभाजन साहित्य की विधाओं के बीच नहीं था; तथा तीसरा यह कि इन रचनाओं को उन्होंने अपने लेखों, टिप्पणियों और निबंधों में संदर्भ के रूप में उद्धृत किया गया है, स्वतंत्रत: नहीं लिखा। उस काल का रचनाकार स्वयं को यथाक्षमता हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि में संलग्न रखना ही पर्याप्त समझता था और वैसा ही वह करता भी था। साहित्य के वर्गीकरण का या सोद्देश्य वर्गीकृत-साहित्य की रचना का विचार-मात्र भी उस काल के लेखक के मस्तिष्क में संभवत: न आता हो। वर्गीकृत साहित्य-सृजन का विचार रहा होता तो भारतेंदु हरिश्चन्द्र (परिहासिनी:1875-76) से लेकर प्रेमचन्द के निधन(1936) तक अनगिनत लघुकथाएँ और लघुकथा-संग्रह आज हमें उपलब्ध होते।
आज हम अनावश्यक शब्दप्रयोग और शाब्दिक-लफ़्फ़ाजी से लघुकथा को बचाए रखने की बात करते हैं। न सिर्फ़ बात करते हैं, बल्कि उसे कार्यरूप में परिणत भी करते हैं। इस प्रयास में कुछ लेखक स्वयं को आधे-अधूरे वाक्य प्रस्तुत करने की हद तक स्वतंत्र मान लेते हैं, तो कुछ शब्द-प्रयोग में संकुचित होते-होते कथा के अंत:प्रभाव तक को नष्ट कर डालते हैं। अतिरिक्त शब्दों और वृत्तांत-वर्णन पर अंकुश रखते हुए अनावश्यक रूप से लम्बी हो जाने की आशंकापूर्ण कहानी को लघ्वाकारीय समापन देने की अवधारणा को परोक्षत: प्रस्तुत करने वाले गुलेरी जी संभवत: पहले कथाकार हैं। इस दिशा में कुमारी प्रियंकरी उनकी महत्वपूर्ण कथा-रचना है तथा इस विचार की पहली लघुकथा भी। इस रचना का समापन-वाक्य—‘ऐसा ही एक मिल गया और कहानी कहानियों की तरह चली उस काल की लेखकीय चेतना के हिसाब से अद्भुत ही कहा जाएगा। इस वाक्य को पढ़ते ही पाठक-मन आगे की समस्त कहानी से एकात्म होना प्रारम्भ हो जाता है। कोई भी लघुकथा, जो पुस्तक के पृष्ठ पर समाप्त होकर पाठक के मनोमस्तिष्क में प्रारम्भ हो जाए, सही अर्थों में लघुकथा है। गुलेरी जी अगर आगे की रचना भी लिख डालते तो वह एक सामान्य रचना होती, जैसी कि उस काल में और आज भी, अनेक प्रचलित हैं। परन्तु इस समापन को पाकर यह पाठक की संवेदनाओं को दूर तक झंकृत करती है। अपनी वृत्ति और कल्पनाशीलता के अनुरूप वह जिस स्तर और सीमा तक चाहे, इस कथा का विस्तार महसूस करे और आनन्दित या उदास होता रहे।
विलासी और अकर्मण्य लोग। हजरत मूसा तक के गम्भीर सिद्धांतों और धर्मोपदेशों को मुँह चिढ़ाते लोग। तेषां न विद्या न तपो न दानंऐसे लोगों के बारे में कहा गया है किते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगा:चरन्ति। बन्दर के माध्यम से गुलेरी जी का भी यही प्रतिपाद्य है—‘वे सब मनुष्य बन्दर हो गये। अब वे जगत की ओर मजे से मुँह चिढ़ाते हैं और चिढ़ाते रहेंगे।
कर्ण का क्रोध महाभारत की कथा है और साँप का वरदान एक किंवदन्ती। किंवदन्तियों का लोक-साहित्य में विशेष स्थान है। वे अनेक सूत्रों, उक्तियों और मुहावरों की वाहक होती हैं। राजा धीरजसिंह नामोच्चारण मात्र से मार्ग में अचानक मिल गया साँप मनुष्य पर आक्रमण नहीं करताइस लोकधारणा को साँप का वरदान में कथारूप दिया गया है।
एक कथाकार के रूप में गुलेरी जी एक सजग और आडंबरहीन सामाजिक का दायित्व निर्वाह करते हैं। अंध-मतावलम्बियों की तरह गैर-मतावलम्बियों पर आक्षेप न करते रहकर धर्माडम्बरों के खिलाफ़ वह कबीरपंथी रवैया अपनाते हैं। एक सौ से भी कम शब्दों की कथा-रचना पोपदेव को उन्होंने एक दृष्टांत के माध्यम से प्रस्तुत किया है। यद्यपि यह भी एक संदर्भ-कथा ही है; फिर भी, इस तरह का कथा-प्रयोग आज का लघुकथा-लेखक भी अभी तक शायद न कर पाया हो। मात्र दस पंक्तियों को तीन पैराग्राफ में विभाजित करके लिखी गई इस कथा-रचना (रचनाकाल:1904) में पहले दो पैराग्राफ में तीसरे पैराग्राफ को पुष्ट करने हेतु एक दृष्टांत प्रस्तुत किया गया है। कथा का ऐसा प्रस्तुतिकरण सिर्फ तभी संभव है जब उसका लेखक आम जीवन में भी इतना ही मुँहफट हो। पोपदेव का उल्लेखनीय पक्ष यह है कि दृष्टांत जितना स्पष्ट है, नैरेटिंग उतनी ही सांकेतिक, सारगर्भित और तीखी। गुलेरी जी के इस कौशल और…इस सादगी पे कौन न मर जाए ए खुदा, करते हैं क़त्ल हाथ में तलवार भी नहीं। पोप यानी ईसाई धर्माचार्य का दृष्टांत देकर हिंदू-धर्मावलंबी धूर्त की कलुषता को जाहिर करना उन्हें लघुकथा को गौरवशाली परम्परा प्रदान करने वाला लेखक बनाता है। लघुकथा लेखन में ऐसा कौशल आज भी वांछित है।
पाठशाला बाल-मनोविज्ञान की जैसी यथार्थ कथा है, वैसी सरल और सहज कथाएँ हिन्दी-साहित्य में बहुत नहीं हैं। बालक को उसके बचपन से काटकर एक अलग इकाई के रूप में नहीं देखा जा सकता। प्रधान अध्यापक का एकमात्र पुत्र वस्तुत: ऐसा ही बालक है, जिसे धार्मिक, वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, सामाजिक आदि सभी विषयों के प्रमुख सूत्र, प्रश्न और उनके उत्तर रटा दिये गये हैं। पिता की दृष्टि में वह घर का चिराग अपूर्व गौरवानुभूति देनेवाला है और अध्यापकों तथा दर्शकों की दृष्टि में विलक्षण बुद्धिवाला। ऐसे में, वृद्ध महाशय उसे उसकी यथार्थ-अवस्था का ज्ञान कराते हैं—“कहा कि तू जो ईनाम माँगे, वही दें। बालक के मुख पर रंग परिवर्तन होता है। हृदय में कृत्रिम और स्वाभाविक भावों की लड़ाई की झलक आँखों में दिखाई देती है। पिता और अध्यापक सोचते हैं कि पढ़ाई का वह पुतला(न कि सहज और स्वाभाविक बचपन की सरलता से परिपूर्ण बालक) कोई पुस्तक माँगेगा। और बालक है कि विस्मित है। कुछ माँगने जैसा प्रस्ताव तो उसके सामने आज तक कभी रखा ही नहीं गया था! सिवा इसके कि यह करो, वह करो; यह रटो, वह रटोकुछ और तो पिता, अभिभावक या किसी अध्यापक के मुख से उसने सुना हि नहीं। कुछ माँगने का प्रस्ताव सुनकर उसका बचपन लौट आता है और कुछ खाँसकर गला साफ कर नकली परदे के हट जाने से स्वयं विस्मित होकर बालक धीरे-से कहता है, लड्डू। लेखक का मन प्रसन्नता से खिल उठता है कि बालक से छीन लिया गया उसका बचपन लौट आया। उसकी भावनाओं को नैरेटर इस तरह व्यक्त करता है—“इतने समय तक श्वास घुट रहा था। अब मैंने सुख की साँस ली…। बालक बच गया…क्योंकि वह लड्डू की पुकार जीवित वृक्ष के हरे पत्तों का मधुर मर्मर था…। मुल्कराज आनन्द की बहुचर्चित कहानी द लोस्ट चाइल्ड भी इस लघुकथा के समक्ष संभवत: हल्की पड़े।
भूगोल और शक्कर का चूर्ण गुलेरी जी की विनोदप्रिय और शालीन प्रकृति को उजागर करती रचनाएँ हैं। जन्मतिथि के हिसाब से भूगोल लेखन के समय(1914 में) वह इकतीस वर्ष के रहे होंगे और शक्कर का चूर्ण लिखने के समय(1921 में) अड़तीस वर्ष के। इस उम्र में पहुँचकर भी ऐसे विनोदपूर्ण क्षणों को अपने हाथ से खिसकने नहीं देते। आज हम शब्दों की शालीनता और उनके सांकेतिक प्रभाव को भूलकर साहित्य में यह नहीं, वह नहीं लिखने की बहस चलाते हैं; और गुलेरी जी 1921 में भी सहज लेखन करते हैं। सच यह है कि उनके पास ओढे हुए क्षण नहीं हैं। मामूली और सामाजिक-पारिवारिक दृष्टि से असंस्कारी नजर आते विनोदपूर्ण क्षण, जो किसी कच्चे लेखक की लेखनी पाकर अश्लील या सतही प्रस्तुति के रूप में सामने आते, गुलेरी जी की लेखनी से उद्भूत होकर शक्कर का चूर्ण जैसी गुदगुदी रचना बन जाते हैं। गुलेरी जी वस्तुत: लेखक होने का छ्द्म पालकर रचना-कर्म में संलग्न नहीं होते।
शक्कर का चूर्ण के साथ स्त्री का विश्वास को पढ़ने से लगता है जैसे किसी लम्बी कहानी को लिखने की योजना बनाते-बनाते गुलेरी जी ने उसके दो बिन्दुओं को नोट्स के रूप में अलग-अलग लिख लिया हो। बहरहाल, उनके न रहने पर इन्हें अब दो अलग-अलग रचनाएँ ही कहा जाएगा। स्त्री का विश्वास वस्तुत: स्त्री(मृणालवती) द्वारा विश्वासघात की कथा न होकर भयातुर और प्रेम-प्रदर्शन में कायर स्त्री के चरित्र की कथा है। मुंज बंदी बनाया गया और उसे गली-गली भीख माँगने का कष्ट उठाना पड़ा तो मृणालवती के कायर चरित्र के कारण नहीं, उसको पाने की अपनी कामना के कारण। मृणालवती का चरित्र यहाँ पर आकाशदीप(जयशंकर प्रसाद) की मधूलिका के चरित्र से यद्यपि एकदम भिन्न प्रकृति का है। मधूलिका राष्ट्र के प्रति कर्तव्य-बोध से पूरित एक ऐसी युवती है जो राजा के सामने ही अपने प्रेमी का हाथ थाम लेने का साहस रखती है, जबकि मृणालवती न तो राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य-बोध से पूरित है—‘भागते समय मुंज ने मृणालवती से कहा कि मेरे साथ चलो…उसने कहा कि गहनों का डिब्बा ले आती हूँ।(स्त्री का विश्वास) और न ही प्रेम-प्रदर्शन में परिपक्व—‘…और अपनी अधेड़ उमर के विचार से उसके चेहरे पर म्लानता आ गयी।(शक्कर का चूर्ण)। कुल मिलाकर स्त्री का विश्वास का शीर्षक इस कथा की अन्त:भावना के अनुरूप नहीं है।
(बलराम द्वारा संपादित गुलेरी की लघुकथाएँ, मासिक उत्तर प्रदेश तथा वर्तमान जनगाथा में प्रकाशित।)

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

पं. श्रीचन्द्रधर शर्मा गुलेरी की लघुकथाएं/बलराम अग्रवाल

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(पूर्ण लेख का उत्तर-भाग-2 पहले प्रकाशित किया जा रहा है। उत्तर-भाग-१ इसका पूर्व-भाग बाद में प्रकाशित किया जाएगा ताकि वह इसके ऊपर आ जाए।बलराम अग्रवाल)
आज के युग में धन-प्राप्ति ही मनुष्य के लिए स्वर्ग-प्राप्ति जैसी महत्वपूर्ण कामना है। उसके लिए वह परहित तालाब आदि खुदवाने का पाखण्ड करता है,(छाया और फल वाले) पेड़ लगवाने का ढोंग रचता है और यज्ञबलि के नाम पर निरीह पशुओं की हत्या करता है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैंजो जस करहि सो तस फल चाखा। बकरे का स्वर्ग में यही बात गुलेरी जी कहते हैं—‘वही(बकरा मारने का यज्ञ चलानेवाला) रुद्र शर्मा पाँच बार बकरे की योनि में जन्म लेकर अपने पुत्र से मारा जा चुका है। यह छ्ठा भव(जनम) है। अर्थात जन्म, मृत्यु और कर्मफलानुसार पुनर्जन्मयह एक निरन्तर प्रक्रिया है जो चलती ही रहती है।
अपनी लघुकथाओं में गुलेरी जी ने जीवन के लगभग हर पक्ष को छुआ हैइतिहास, दर्शन, परम्परा, शासकीय कूटनीतिपरक आदेश, चाटुकारिता, धूर्तता, अकर्मण्यता, लालसा, कामना, भोग, विलासिता और मूर्खता आदि सब पर। जन्मान्तर कथा में वह व्यवसाय और उसके द्वारा धन संचय की कामनाओं तथा प्रयासों के साथ धर्म का जुड़ाव भी आवश्यक मानते हैं। भारतीय-दर्शन जीवन के चार पद, जिन्हें पुरुषार्थ कहा गया है, स्वीकार करता हैअर्थ, धर्म, काम और मोक्ष। अर्थात धर्मप्राणहीन व्यक्ति अर्थ-संचय करके भी दरिद्र है। कहिल कबाड़ी की पत्नी सिंहला उससे कहती है—‘देवाधिदेव युगादिदेव की पूजा करो, जिससे जन्मान्तर में दारिद्र्य दुख न पायें। पति धर्म-प्राण से हीन अधीर अर्थ-संचयी है। वह पत्नी को धर्म-गहली कहता है। वह वैसे ही व्यवहारवाली है भी। इसीलिए वह मानसिक सन्तोष के साथ जीती है। और जन्मान्तर में सुख-सुविधापूर्ण जीवन व्यतीत करनेवाली राजकुमारी बनती है। पति दरिद्र ही रहता है। वस्तुत: जब आवै सन्तोष-धन, सब धन धूरि समान। धन के प्रति संतोष और असंतोष की स्थिति ही जन्मान्तर(कथा) है।
कोई भी विद्या बुद्धि के सान्निध्य और उपयोग के बिना अधूरी है। विद्या से दु:ख में पशु-पक्षियों की भाषा की जानकार बहू का यही कष्ट है। वह विद्या की जानकार तो है, बुद्धिमती नहीं। श्रगाल के कहने पर आधी रात को नदी में बहते मुर्दे के गहने ले आने का लोभ-संवरण वह नहीं कर पाती और श्वसुर द्वारा देख लिए जाने पर कुलटा(अ-सती) सिद्ध होकर परित्यक्त होने की स्थिति तक जा पहुँचती है—‘वह(श्वसुर) उसे पीहर पहुँचाने ले चला। अपनी बुद्धिहीनता और निर्णय को कार्यरूप देने के लिए सही समय का चुनाव न कर पाने की अक्षमता के परिणामस्वरूप ही अगली बार वह विद्या से प्राप्त जानकारी का लाभ प्राप्त करने की बजाय हताश ही अधिक होती है।
सवाल यह पैदा होता है कि पाठशाला के स्तर की लघुकथा रचने वाले गुलेरी जी ने साधारण कथा-किस्सा लगने जैसी न्याय रथ और न्याय घंटा क्यों लिखीं? शायद इसलिए कि हर युग, हर काल में ये कथाएँ ज्यों की त्यों घटित होती हैं। शिकार को ठिठोली की तरह इस्तेमाल करनेवाली नूरजहाँ द्वारा तीर चलाकर धोबी की हत्या कर देना और अपने न्याय(?) की कहानियाँ लिखानेवाले शाहजहाँ द्वारा न्याय-प्राप्ति की गुहार लगानेवाली धोबिन से यह कहना कि उसने तेरे पति की हत्या की, तू उसके पति की कर दे, धूर्ततापूर्ण न्याय है। ऐसे ही धूर्ततापूर्ण न्याय की कथा है—‘न्याय रथ। ऐसे धूर्त निर्णयों के आगे आमजन की स्थिति निरीह गाय से कम बेबस नहीं है। न्याय घंटा को समझने के लिए उसमें गहरे पैठने की आवश्यकता है। अर्थ-गांभीर्य और उसकी व्याख्या के स्तर पर यह उतनी उथली रचना नहीं है जितनी कि प्रतीत होती है। कौए की प्रकृति है कि वह सोए हुए या जुगाली करते हुए अपेक्षाकृत बड़े शरीरवाले गाय-भैंस आदि पशुओं के शरीर पर बैठकर उन पर रेंगते छोटे-मोटे कीड़ों को खा लिया करता है या फिर उनके कान के आसपास बैठकर उनकी गूग(कान के भीतर की मैल) ही कुरेदता और खाता रहता है। उसके इस कार्य से पशुओं को वैसा ही आनन्द प्राप्त होता है जैसा कि मालिश करानेवाले या गूगिया से कान कुरेदवाने वाले मनुष्य को प्राप्त होता है। अर्थात इस कार्य-व्यवहार में कौए और पशु दोनों के अपने-अपने स्वार्थ ही निहित होते हैं। अपनी इस वृत्ति के अनुरूप अपनी चोंच के द्वारा कौआ सोए हुए सिंहों के दाँतों के बीच फँसे माँस के छोटे-छोटे कतरे भी खा लिया करता है। आम धारणा के अनुसार कौआ चतुर और धूर्त प्रकृति का प्रतीक पक्षी है। वह इतना अधिक चतुर होता है कि अन्य पक्षियों की तरह कभी भी अपने भोजन या उसके स्रोत पर तुरन्त जाकर नहीं बैठता, पहले उसके आसपास बैठकर स्थिति की अनुकूलता-प्रतिकूलता के प्रति सन्तुष्ट हो लेता है। यही हुआ। अपनी इस चेष्टा में कौआ पत्थर के सिंहों के पास बँधी घंटी पर बैठ गया। घंटी बज गई और राय अनंगपाल के कान खड़े हो गये कि चलो, कोई तो न्याय माँगने आया। राय को अपनी न्यायप्रियता का ढिंढोरा पीटने का मौका हाथ लग गया। सलाहकार से पूछा। चाटुकार सलाहकारों ने बताया कि कौआ न्याय माँग रहा है कि पत्थर के इन सिंहों के रहते अपने भोजन के लिए वह किस प्रकार उनके दाँतों के बीच फँसे माँस के कतरे चुन पायेगा? राय ने आज्ञा दी कि कई भेड़-बकरे मारे जाएँ, जिससे कौए को दिन का भोजन मिल जाए। वाह! बिहारी ने लिखा हैबाज, पराए पानि पर तू पंछिहिं न मार। अपने न्यायप्रिय होने की डींग हाँकने की खातिर, चाटुकारों और सत्ता के गलियारों में माँस के कतरे तलाशनेवालों की तुष्टि के लिए राजा क्या कुछ नहीं करता। इतिहास के पन्नों में अपना नाम टाँक देने की उसकी आकांक्षा के सामने सामान्यजन की स्थिति ऐसे भेड़-बकरे से बेहतर नहीं होती, जिसे जब जिसके लिए चाहे मारा-काटा जा सकता है। इस कथा में राय अनंगपाल शासन का और उसके सलाहकार चाटुकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा कौआ कोउ नृप होय हमें का हानी वृत्तिवाले सत्ता के गलियारों में चकराते रहकर ही जीवनयापन करनेवाले सत्ता के दलालों का। न्याय घंटा बाँधकर शासन सो गया है, सत्ता का दलाल न्याय की पुकार करता है। पुकार भी ऐसी कि हे राजा, तेरे ये अकर्मण्य (पत्थर के) सिंह शिकार नहीं कर रहे हैं, इसलिए मैं भूखा मर रहा हूँ। सत्ता के गलियारों का यह अटल सत्य है। एक अगर शिकार करना छोड़ दे तो दूसरा भूखों मरने लगता है। इसलिए वहाँ रह रहे व्यक्ति को अपनी नहीं तो दूसरों की भूख का ख्याल रखकर शिकार करना ही होता है। और अगर वह पत्थर हो गया हो, वैसा कर पाने की स्थिति में न रह गया हो तो! ऐसी स्थिति में न्याय की माँग करना हर भूखे प्राणी का अधिकार बनता है! भूख के मारे ऐसे लोग जब जैसे न्याय की माँग करना चाहें, कर सकते हैं, क्योंकि उनकी भूख भेड़ों-बकरों की भूख से भिन्न(?) भूख है और आमजन की तुलना में न्याय घंटा के निकट वे ही हैं। चाटुकार सलाह देते हैं और शासन आज्ञा देता है कि जाओ, भेड़-बकरे(की तरह आमजन को) काट डालो। हर युग, हर काल में न्याय घंटा की कथा ज्यों की त्यों दोहराई जाती है।
कुल मिलाकर यह कि गुलेरी जी जीवन के हर पक्ष को हर सम्भव कोण से देखते-परखते हैं। वह धर्माचरण के द्वारा परलोक-सुख की कल्पना न करके इहलोक के सुख-दुख की बात करते हैं। इसके लिए कथा भले ही वह जन्मान्तर की लिखें। वह न हजरत मूसा को मुँह चिढाने वालों से सहानुभुति रखते हैं, न पोपलीला और चूहों के पैरों में घुँघरू बाँधकर देव-देव चिल्लाने वाले धूर्तों से। वह न यज्ञबलि के पक्षधर हैं और न ही बुद्धिहीन विद्या के। मामूली लगने वाले क्षणों में विनोदप्रियता और तत्काल स्पष्टवादिता उनका स्वाभाविक गुण है। यह गुण उनकी इन लगभग सभी रचनाओं में स्पष्टरूप से अंकित है और उनके व्यक्तित्व के इस गुण को उनसे अलग रखकर उनकी रचनाओं का सही मूल्यांकन संभव नहीं है।
(बलराम द्वारा संपादित गुलेरी की लघुकथाएँ, मासिक उत्तर प्रदेश तथा वर्तमान जनगाथा में प्रकाशित।)

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

समकालीन लघुकथा और बुजुर्गों की दुनिया/बलराम अग्रवाल

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भाग-4
-->(अन्तिम किश्त)
बुजुर्गों के प्रति दायित्व-बोध शारीरिक स्तर पर ही नहीं, भावनात्मक स्तर पर भी अति-आवश्यक हैइस सत्य को हमारे सामने सतीश दुबे की लघुकथा बर्थ-डे गिफ्ट की पाँच वर्षीय पोती प्रस्तुत करती है जिसे कल दो टॉफियाँ दिलाई गई थीं। उसे याद था कि कल दादाजी का बर्थ-डे है, इसलिए उसने एक टॉफी जतन से अपने स्टडी टेबल के ड्राअर में छुपाकर रखदी थी। स्वयं दादाजी के जीवन में तो आपाधापी इतनी बढ़ गई है कि स्वाभाविक रूप से अपना जन्मदिन याद रख पाना उनके लिए असम्भव-सा हो गया है—‘उन्होंने हिसाब लगाया, आज उनकी उम्र के सत्तावन साल पूरे हो गए हैं। ऐसे लोगों को यह विश्वास दिलाए रखना कि आने वाली पीढ़ी उनके श्रम और संवेदनाओं का कम आदर नहीं करती हैनितान्त आवश्यक है। परिपूर्णा त्रिवेदी की लघुकथा पिताजी का लेटर बॉक्स के पिताजी बेटे की इतनी सूचनाभर से स्वयं को स्वस्थ महसूस करने लगते हैं कि वह जल्दी ही उनसे मिलने को आने वाला है। कुमार नरेन्द्र की लघुकथा अमृतपर्व के पिताजी अपने उस पुत्र से, जो उनकी सम्पत्ति पा जाने की आशा में लम्बे समय से उनके मरने का इन्तजार कर रहा है, सहानुभूति का हल्का-सा स्पर्श पाते ही यह निवेदन कर बैठते हैं—“इधर आ…मेरी छाती से लग जा। स्पष्ट है कि अक्षम हो चुके शरीर के लिए इससे बड़ी कोई नियामत नहीं है। ऊषा दीप्ति की औलाद तथा योगेन्द्र नाथ शुक्ल की दीया भी सकारात्मक पक्ष की लघुकथाएँ हैं।
चूल्हा-चौका, बरतन-कपड़े करते-करते कमर कमान-सी हो गई है, मगर इस उमर में आराम से एक कप चाय भी नसीब नहीं। जवानी बच्चों को जनने, उनके हगने-मूतने को साफ करते बीत गई। हारी-बीमारी में उनके पैताने बैठी रही। न दिन देखा न रात। खटती रही कि ये मेरे अपने हैं; आज इनका ध्यान रख रही हूँ तो कल ये मेरा ध्यान रखेंगे। भगीरथ परिहार की लघुकथा तीर्थ यात्रा के इस संवाद में सन्तानोत्पत्ति और उसके लालन-पालन के पीछे छिपी भारतीय उपमहाद्वीप के समस्त माता-पिताओं की हार्दिक इच्छाएँ, उनका जीवन-दर्शन व्यक्त है। श्रीमद्भगवद्गीता हालाँकि कर्मण्येवाऽधिकारस्ते मा फलेषु कदाचिन: का उपदेश देती है, लेकिन…दिल है कि मानता नहीं। इस उपमहाद्वीप के बूढ़ों और बुजुर्गों के मनस्ताप का एक बहुत बड़ा कारण अपने प्रति सन्तान के दायित्व का निर्धारण उसके पैदा होने से पहले ही कर लेना है। पृथ्वीराज अरोड़ा की लघुकथा कथा नहीं के वृद्ध माता-पिता इसीलिए संतापग्रस्त हैं कि उनका पुत्र अपेक्षाओं के अनुरूप उनकी देखभाल क्यों नहीं करता है? स्वयं उनके पुत्र की आर्थिक, शारीरिक और मानसिक स्थिति कैसी हैइस यथार्थ से वे नहीं टकराना चाहते।
अनुशासन के नाम पर परिवार में अथवा समाज में कम उम्र के बच्चों पर हिटलरशाही थोपने वाले बड़ी उम्र के लोग आम तौर पर दमित बच्चों के द्वारा ही उपेक्षित कर दिए जाते हैं। एन उन्नी की लघुकथा शेर के मिश्राजी और उनके बच्चे इस तथ्य को पुष्ट करते हैं। दूसरी ओर ऐसे भी बुजुर्ग हैं जो बच्चों के साथ मिलकर अपने बचपन में लौट जाते हैं और उसका भरपूर आनन्द उठाते हैं। मनोज सेवलकर की लघुकथा बचपन और सुकेश साहनी की लघुकथा विजेता के दादाजी ऐसे ही बुजुर्ग हैं। कहा भी गया है कि बुढ़ापा दूसरा बचपन है। यों भी, स्वयं से छोटों के प्रति अच्छा व्यवहार करने की लोकनीति का हर व्यक्ति को अनुकरण करना चाहिए, क्योंकि छोटे ही होंगे जो बड़े होकर अपनों से बड़ों के बारे लिखेंगे। लेकिन यह तो निश्चित है कि आने वाली हर पीढ़ी का मनुष्य पिछली पीढ़ी के मनुष्य की तुलना में अधिक तर्कशील और व्यावहारिक बुद्धिचातुर्य वाला होता है यानी कि चाइल्ड इज़ फादर ऑव मैन। भूत में भी यह होता आया है, भविष्य में भी यही होगा। यह एक अलग बात है कि भविष्य के तर्कशील और व्यावहारिक बुद्धिचातुर्य से युक्त बच्चे कितने प्रतिशत विशुद्ध भौतिकवादी विचारधारा वाले बनेंगे और कितने प्रतिशत मानवतावादी। बहरहाल, वे तर्कशील अवश्य होंगे। अशोक भाटिया की लघुकथा अंतिम कथा के बच्चे इस तथ्य की पुष्टि करते हैं।
दैवी आपदाओं पर किसी का जोर नहीं चल सकता। वे कब व्यक्ति के मानस को झकझोर कर रख देंगी, कब उसकी रीढ़ को मरोड़ देंगीकहा नहीं जा सकता। प्रभु त्रिवेदी की लघुकथा तीन विंध्याचल के बाबूजी दैवी आपदाओं के मारे ऐसे ही पात्र हैं जिनकी मानसिक समस्याओं का समाधान बेटे द्वारा दिया गया यह आश्वासन भी नहीं कर पाता है कि—“मैं बड़ा भाई हूँ। मेरी भी जवाबदारियाँ हैं। आप अनमने मत रहा करो। अन्तत: मृत्यु ही उनके मनस्ताप को समाप्त कर पाती है।
वृद्ध लोगों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया उनको सम्मान देने से कम हैसियत नहीं रखता है। यह हर युवा और सक्षम व्यक्ति का पारिवारिक ही नहीं सामाजिक दायित्व भी है। श्यामसुन्दर दीप्ति की लघुकथा बूढ़ा रिक्शेवाला का वह बूढ़े रिक्शेवाले को यह सम्मान कॉलेज के लिए अपने घर से पन्द्रह मिनट पहले निकलकर प्रदान करता है तो श्याम सुन्दर अग्रवाल की लघुकथा बेटी का हिस्सा की विधवा बेटी भाइयों द्वारा बोझ समझ लिए गए माता-पिता को उनके पास से अपने साथ लेजाकर।
इस प्रकार समकालीन लघुकथा में वृद्धों और बुजुर्गोंदोनों की पीड़ाओं, व्यथाओं, निरीहताओं और आवश्यकताओं का ही नहीं उनकी जीवन्तताओं, जुझारुताओं और जीवन व समाज के प्रति उनकी सकारात्मक सोचों का भी सफल चित्रण हुआ है। लघुकथाकारों ने उनके जीवन ही नहीं जीवन-दर्शन को भी अपनी रचनाशीलता का विषय बनाया है। वृद्ध हो चुकी पीढ़ी को उन्होंने नई पीढ़ी, विशेषकर बेटे-बहू द्वारा आहत दिखाकर पाठकीय सहानुभूति बटोरने का प्रपंच ही नहीं रचा है, बल्कि वृद्धों के प्रति तीसरी पीढ़ी तक में दायित्व-बोध को दर्शाती सकारात्मक यथार्थ की लघुकथाएँ भी समाज को दी हैं।
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नई धारा(वृद्ध विमर्श विशेषांक, अप्रैल-मई 2010/पृष्ठ 65-66

शनिवार, 3 जुलाई 2010

समकालीन लघुकथा और बुजुर्गों की दुनिया/बलराम अग्रवाल

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भाग-
माज का यह एक बना-बनाया दृष्टिकोण प्रतीत होता है, जिससे कथाकार भी अछूते नहीं रह पाए हैं; लेकिन बूढ़े माँ-बाप के प्रति समूची नई पीढ़ी दायित्वहीन नहीं है और न ही लघुकथाकार वृद्धों व युवाओं से जुड़ी अन्यान्य संवेदनाओं को चित्रित करने से चूके हैं। कृष्ण मनु की लघुकथा धारणा के विसेसर बाबू समाज में व्याप्त इस दुराग्रह को यों व्यक्त करते हैं—“गलत धारणा पालकर पता नहीं क्यों बहू-बेटे के प्रति दुराग्रह से पीड़ित रहते हैं लोग। नियति सप्रे की निरुत्तर, सीमा पांडे सुशी की कीमत, शील कौशिक की सामंजस्य, नन्दलाल भारती की नसीब आदि लघुकथाओं को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। श्याम सुन्दर अग्रवाल की माँ का कमरा तथा सत्यवीर मानव की दर्द-बोध भी इस प्रचलित धारणा को तोड़ती बेहद सशक्त लघुकथाएँ है। ऐसी लघुकथाएँ नयी पीढ़ी से मिलने वाली सहानुभूति और सहायता की ओर से हताश हो चुकी वृद्ध पीढ़ी(उड़ान, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु तथा अज्ञात गमनकसाईघाट, बलराम अग्रवाल तथा स्वाभिमान प्रताप सिंह सोढ़ी) को आशा की किरण दिखाती हैं, मृतप्राय: उनके सपनों को साँसें प्रदान करती हैं।
सतिपाल खुल्लर की बदला हुआ स्वर, निरंजन बोहा की रिश्तों के अर्थ और हरनाम शर्मा की अब नाहीं बुजुर्गों द्वारा दबंग तरीके से अपना अधिकार पाने को प्रतिष्ठित करती हैं, लेकिन यह तरीका दो ही स्थितियों में सम्भव हैपहली यह कि व्यक्ति शारीरिक व आर्थिक रूप से सक्षम हो तथा दूसरी यह कि बेटे-बहू के आचरण में थोड़ी-बहुत सांस्कारिकता, समाज के प्रति जवाबदेही की सेंस बाकी बची हो। शारीरिक, आर्थिक और मानसिकसभी ओर से आहत वृद्धजन अपनी संतान तक के विरुद्ध आक्रामक कार्यवाही का कदम भी उठा सकते हैं; लेकिन माँ आखिर माँ ही होती है, बहुत जल्द द्रवित हो जाती है। संतान उसकी दृष्टि में अबोध ही रहती है, माँ उसको कष्ट में नहीं देख सकती(मातृत्व, नरेन्द्र नाथ लाहा)।
अनुभव क्या हैं? अपनी गलतियों का पुलिन्दा। गलतियाँ करने के जोखिम से दूर भागते रहने वाला व्यक्ति अनुभव-प्राप्ति से भी दूर ही रह जाता है। चेखव के नाटक तीन बहनेंका एक पात्र कहता है—“कितना अच्छा होता कि ये जो जिंदगी हमने जी है, वो एक रफ ड्राफ्ट होती, उसे एक बार संशोधित करने का मौका हमें मिलता।.वाकई व्यक्ति को अगर दोबारा जवान उम्र में लौटने की सुविधा मिल जाए और उसके बाद वह दोबारा ही बुढ़ापे में भी कदम रख सकने का वर प्रकृति से पा सके तो जीवन की बहुत-सी गलतियों को सुधारने की कोशिश कर सकता है। हालाँकि कुछ मामलों में यह भी हो सकता है कि दूसरी पारी में वह चूक गई गलतियों को नए सिरे से करने की पहल करे।
कुछ लोगों के लिए यथार्थ यह है कि बुढ़ापा बुरे वक्त की देन है; और उस समय, जब बच्चों की पढ़ाई के लिए पिताजी से खाली कराया गया कमरा(कमरा, सुभाष नीरव) उनकी उपेक्षा कर किराए पर उठा दिया जाय, अथवा बरामदे के बराबरवाली अँधेरी कोठरी से भी बिस्तर हटाकर उन्हें दो-तीन दिन के लिए पडोसी के यहाँ सोने को कह दिया जाए(तंग होती जगह, कृष्ण मनु), तब तो यह बात पूरी तरह सिद्ध ही हो जाती है। सुरेश शर्मा की बन्द दरवाजे तथा पारस दासोत की एक मूवी का द एण्ड अपने मनोरंजन में डूबे युवा परिवारजनों की वृद्धों के प्रति उपेक्षा की चरम-स्थिति का वर्णन करती हैं।
व्यक्ति पहले जवान होता है, फिर प्रौढ़, फिर बूढ़ा और अन्त में अनुकरणीय बन जाता है। लेकिन अनुकरणीय बन जाना उतना आसान नहीं है। उम्र कुछ लोगों को पका देती है और कुछ को थका देती है; कुछ को उम्र सुगन्धि दे जाती है तो कुछ उसे पाकर सड़-गल जाते हैं। इसलिए बहुत कम लोग होते हैं जिन्हें बुजुर्ग कहा जा सकता है तथापि सम्मान हमें बूढ़ों का भी करना ही चाहिए। क्यों करना चाहिए? इसके उत्तर-स्वरूप रामनिवास मानव की बाप का दर्द, सुकेश साहनी की संस्कार, रमेश चन्द्र की बड़े बूढ़े, राजेन्द्र वामन काटदरे की इन्वेस्टमेंट को पढ़ा जा सकता है।
शारीरिक रूप से थक चुके अथवा कारण-विशेषवश अक्षम चल रहे लोगों को सहानुभूति और सहायता प्रदान करना स्वस्थ लोगों का दायित्व हैयह बात सभी स्वस्थ लोगों के मानसिक-संस्कार में पैठी होनी चाहिए। श्यामसुन्दर व्यास की लघुकथा संस्कार में बहू का पाँव भारी होने के कारण बाहर से पानी ढोने के दायित्व को बूढ़ी अम्मा निभाती है तो अम्मा के बुढ़ापे को देखते हुए उसकी मदद करने के दायित्व को मनकू निभाता है। इसी दायित्व को सतीश दुबे की लघुकथा बंदगी का दमड़ीलाल पूर्णत: अशक्त बूढ़े बाबा के प्रति, सुभाष नीरव की लघुकथा सहयात्री का पुरुष बूढ़ी माताजी के प्रति और पूजा-फंड का शिक्षक धीर माता-पिता के प्रति निभाता है। वर्तमान समाज को इस दायित्व-बोध की महती आवश्यकता है जिसकी ओर ये लघुकथाएँ बड़ा सटीक और सुखद संकेत करती हैं। अन्तत: तो सभी के शरीर को एक न एक दिन अशक्त हो ही जाना है। यह एक प्राकृतिक क्रिया है जो हमेशा ही विज्ञान के समक्ष चुनौतीपूर्ण ढंग से उपस्थित रहेगी क्योंकि इसका समाधान सेवा है, तर्क नहीं।
नई धारा(वृद्ध विमर्श विशेषांक, अप्रैल-मई 2010/पृष्ठ 64-65

शनिवार, 19 जून 2010

समकालीन लघुकथा और बुजुर्गों की दुनिया/बलराम अग्रवाल

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भाग-२
ई और शहरी पीढ़ी को घर-परिवार और गाँव से जोड़े रखने का यह दायित्व गले की चैन देकर ही पूरा होता हो ऐसा नहीं है। हर बुजुर्ग इसे अपनी आर्थिक क्षमता तथा बौद्धिक-स्तर के अनुरूप पूरा करता है। रामेश्वर काम्बोज हिमांशु की लघुकथा ऊँचाई के पिताजी बेटे-बहू की समस्त शंकाओं के पार जाकर उन्हें अचम्भित ही नहीं उस समय लज्जित भी कर देते हैं जब खाना खा चुकने के बाद वे बेटे के हाथ में सौ-सौ के दस नोट पकड़ाकर कहते हैं कि उन्हें रात की गाड़ी से वापस लौट जाना है। कमल चोपड़ा की लघुकथा संतान की ग्रामीण माँ तो मात्र दो स्वेटर ही भेजकर दायित्वहीन बहू को अपना बना लेती है। सवाल यह पैदा होता है कि वे बुजुर्ग जो स्वेटर भी दे सकने की स्थिति में नहीं रह गए हैं, बिखरते जा रहे परिवार को कैसे बचाएँ? इसका एक समाधान सुभाष नीरव की लघुकथा तिड़के घड़े प्रस्तुत करती है जिसमें बहू-बेटे के रोज-रोज के तानों-उलाहनों से परेशान बाऊजी सोते समय अम्माजी को यों समझाते हैं—“तुम दिल पर क्यों लगाती हो। कहने दिया करो जो कहते हैं। हम तो अब तिड़के घड़े का पानी ठहरे। फेंकने दो कंकर-पत्थर। जो दिन कट जायँ, अच्छा है। माँ-बाप अगर चुप रहने की आवश्यकता पर स्वयं अमल नहीं करेंगे तो स्पष्ट है कि विचार और व्यवहार दोनों स्तरों पर निर्लज्ज हो चुके बेटे-बहू के द्वारा उन्हें यह आवश्यकता समझाई भी जा सकती है(मौन, राजेन्द्र नागर निरन्तर)। भारतीय परिवारों में अपनी वर्तमान स्थिति का आकलन वृद्ध किस रूप में प्रस्तुत करते हैं, मीरा जैन की हम और हमारे पूर्वज उसे मात्र एक वाक्य में समेट देने में सक्षम है—“उस वक्त परिवार में हमारे पूर्वजों की स्थिति नाथ की-सी होती थी, हमारी स्थिति अनाथ जैसी है।
बढ़ी-उम्र के लोगों में परिवार को जोड़े रखने की कवायद से अलग, आने वाली पीढ़ी को शारीरिक, सामाजिक व सांस्कारिक प्रत्येक प्रकार की सुरक्षापरक चेतना देने सम्बन्धी प्रयासों के रूप में भी देखने को मिलती है। कुँवर प्रेमिल की लघुकथा मंगलसूत्र तथा मणि खेड़ेकर की लघुकथा हार में जीत की सास पात्राएँ दायित्व-निर्वाह के इस मुकाम से भली-भाँति परिचित हैं। और सबसे बड़ी बात तो संतोष सुपेकर की लघुकथा लक्ष्मण रेखा में व्यक्त हुई है—“घर के बुजुर्ग का जूता भी बाहर पड़ा हो तो मुसीबत आने से हिचकती है। मुसीबतों से बचे रहने के लिए ही नहीं बल्कि दैनिक जीवन में विलासिताओं का उपभोग करने हेतु भी कुछेक युवा घर के बुजुर्ग माता-पिता के नाम का उपयोग करने से नहीं चूकते हैं। उनके प्रति अपने दायित्व-निर्वाह से वे कितने ही दूर रहें, उनके होने से लिए जा सकने वाले सांसारिक लाभ से वे कभी दूर नहीं रहते। रामयतन यादव की लघुकथा चिट्ठी तथा रामकुमार आत्रेय की लघुकथा पिताजी सीरियस हैं तथा सुरेश शर्मा की लघुकथा पितृ प्रेम के वृद्ध पात्र युवाओं की ऐसी ही स्वार्थपरकता से आहत हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि जैसे-जैसे आदमी की उम्र बढ़ती है, खुद से लड़ने की उसकी ताकत में गिरावट आने लगती है। अगर कोई शारीरिक रोग उसको नहीं है तो ताकत में आने वाली इस गिरावट का पता अक्सर उसे नहीं लगता; उम्र क्योंकि एकाएक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे आदमी पर हावी होती है। उम्र पर हावी होने के लिए आवश्यक है कि आदमी जीवन को जिए और उम्र को भूल जाए; लेकिन यह भूलना भी उसकी प्रकृति पर निर्भर करता है। हर आदमी उम्र को नहीं भूल सकता। सच तो यह भी है कि भारतीय समाज में उम्र को पकड़कर बैठ जाने वाले लोगों की संख्या ही अधिक है, भूल सकने वालों की नगण्य। यों भी, भूलने को अपने चरित्र में सभी विकसित नहीं कर पाते। न भूल पाने वाले व्यक्तियों को देर-सबेर मन:ताप अवश्य ही घेर लेता हैयह याद रखना चाहिए। हरभजन खेमकरनी की लघुकथा कबाड़वाला कमरा के बुजुर्ग पात्र परिवार में अपनी भावी तथा मनोज सेवलकर की लघुकथा कचरा का बुजुर्ग अपनी वर्तमान स्थिति को समझते हुए वैसा ही आचरण भी करते हैं और जीने का एक सार्थक ढंग तलाश करने का प्रयत्न करते हैं।
आम कहावत है कि सिर्फ बुढ़ापा ही वह चीज है जो बिना प्रयास ही मनुष्य की झोली में आ पड़ती है। और एक बार आ पड़ने के बाद? कहा जाता है किजाके न आए वो जवानी देखी, आके न जाए वो बुढ़ापा देखा। बुढ़ापा जब आ जाता है और व्यक्ति को असहाय और निरीह स्थिति में पहुँचा देता है, तब वह अपने गत जीवन पर दृष्टि डालता है और अपनी अनेक गलतियों का अहसास करता है। वे गलतियाँ यद्यपि अलग-अलग स्तर की हो सकती हैं तथापि उनमें से एक बड़ी भयंकर वह भी नजर आती है जिसका खुलासा सूर्यकांत नागर की लघुकथा रोशनी की गंगा चाची करती हैं—‘अम्मा, तुमने बड़ी भूल की। जो कुछ था, सब बेटों पर लुटा दिया। उनको रास्ते लगाया। उनकी गृहस्थी जमाई, पर तुम्हें क्या मिला? आज अंधी होकर बैठी हो। अंधा होने से बचाने की दृष्टि से ही संतोष सुपेकर की लघुकथा एक बेटा का फ्रांसिस दो सप्ताह बाद रिटायर होने को तैयार अपने सहकर्मी देवीसिंह को सलाह देता है कि वह अपने तीन बेटों को नहीं बल्कि मिले हुए फण्ड को ही अपना एकमात्र बेटा समझे और उसे सम्हालकर रखे। साबिर हुसैन की श्रवण कुमार, अंजना अनिल की दर्द, जसबीर ढंड की छमाहियाँ, डॉ बलदेव सिंह खहिरा की जिम्मेवारी, दर्शन जोगा की निर्मूल, हरजीत कौर कंग की कलयुगी श्रवण, बलराम अग्रवाल की कसाईघाट और झिलंगा, गफूर स्नेही की और जीवित रहती माँ, सुरेन्द्र कुमार अंशुल की जरूरत, शील कौशिक की हिसाब-किताब, कालीचरण प्रेमी की विकल्प, श्याम सुन्दर अग्रवाल की पुण्यकर्म, प्रताप सिंह सोढ़ी की तस्वीर बदल गई, जलनस्वाभिमान, योगेन्द्रनाथ शुक्ल की ईर्ष्या आदि अनगिनत लघुकथाएँ परिवार में बूढ़े माता-पिता के प्रति बेटे-बहू के दायित्वहीन व्यवहार को केन्द्र में रखकर लिखी गई हैं। यद्यपि इन सभी लघुकथाओं की भाषा, शैली और शिल्पसभी एक-दूसरे से भिन्न हैं तथापि केन्द्रीय कथ्य एक ही है।
नई धारा(वृद्ध विमर्श विशेषांक, अप्रैल-मई 2010/पृष्ठ 63-64