रविवार, 24 सितंबर 2023

लघुकथा और आज का समय / बलराम अग्रवाल

एक समय था जब उपन्यास साहित्य की लोकप्रिय विधा थी और वे उपन्यास थे—देवकीनन्दन खत्री जी के। उसके बाद आया कहानी का समय। उस समय के अधिष्ठाता मुख्यत: हम प्रेमचंद को मान सकते हैं। और अब लघुकथा का भी समय है। …सिर्फ लघुकथा का नहीं है, लेकिन लघुकथा कथा-साहित्य के बीच इस समय में अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज करती है।

जिसे हम उपन्यास का समय कहते हैं, वह ऐसा समय था, जब समूचा कैनवस लेखक के सामने लगभग खाली पड़ा था। धार्मिक कथाओं से परिसम्पन्न महाकाव्य आदि की कथाओं-उपकथाओं से ऊब चुके पाठक और श्रोता दोनों को उनसे कुछ अलग चाहिए था, जो तत्कालीन उपन्यासकारों ने विभिन्न रूपों में दिया। पहले खत्री जी आदि ने, बाद में प्रेमचंद, प्रसाद, इलाचन्द्र जोशी, जैनेन्द जी आदि ने। लगभग यही बात कहानी के सम्बन्ध में भी कही जाती है। कहानी ने तो अपने ऊबे हुए पाठक को नयी कहानी, समांतर कहानी, सचेतन कहानी, अ-कहानी आदि से बहलाने की भी कोशिशें कीं। लेकिन कहानी से ऊबे पाठक को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल वस्तुत: लघुकथाकार हुए।  लघुकथा ने भी गत 50 वर्षों में अपने क्राफ्ट में अनेक सार्थक परिवर्तन, परिवर्द्धन किये हैं। आज की लघुकथा वही नहीं है जिसे स्वाधीनता से पहले विष्णु प्रभाकर जी, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर जी, आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र जी आदि लिख रहे थे; आज की लघुकथा वह भी नहीं है जिसे स्वाधीनता के बाद और 1975 तक भी अनेक कथाकार लिख रहे थे और जो ‘सारिका’ में छप रही थी। आज की लघुकथा शब्दश:  वह भी नहीं है जिसे आठवें-नवें दशक के लघुकथाकार लिख चुके हैं। वह, भले ही वहीं कहीं से प्रस्फुटित होती है, लेकिन एकदम नवीन अन्तर्वस्तु, भाषा, शिल्प और शैली, संकेत और व्यंजना की रचना है। आठवें-नौवें-दसवें दशक से लिखते आ रहे कुछ लघुकथाकार नवीन अन्तर्वस्तु प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं। नयी पीढ़ी उनसे सीख भी रही है, प्रेरणा भी पा रही है और ताजगी प्रदान करने में सहायक भी सिद्ध हो रही है।

सन् 1970 से अब तक अधिक नहीं तो 50,000 लघुकथाएँ तो लिखी ही जा चुकी होंगी । कथ्य की प्रकृति और प्रवृत्ति की दृष्टि से अध्ययन हेतु इन सब लघुकथाओं के दो समूह बनाए जा सकते हैं । एक समूह सन् 1970 से 2000 तक की लघुकथाओं का और दूसरा सन् 2000 से 2023 के अन्त तक अथवा आगे जिस सन् में भी यह कार्य हो, उसके अन्त तक की लघुकथाओं का बनाकर उनके कथ्यों का तुलनात्मक अध्ययन करें, तभी हमें पता चलेगा कि हम आगे बढ़े हैं या जहाँ के तहाँ खड़े हैं। लघुकथाकार के रूप में हम अपना मात्र प्रचार ही कर रहे हैं या हमारी लघुकथाओं में शाश्वत भी कुछ है। जो लघुकथाएँ कुछेक आत्ममुग्धों द्वारा कुछेक आत्ममुग्धों के लिए आत्ममुग्ध-सी आकलित हों, उन पर समय नष्ट करने का समय समाप्त हो चुका है। आज हमें ऐसी लघुकथाएँ चाहिए जो अपनी गतिमानता सिद्ध करती हों। समय बेशक बहुत तेजी से भाग रहा है। उतनी ही तेजी से लघुकथाएँ भी सामने आ रही हैं। कुछ लघुकथाकार लिखने की जल्दी में हैं। कुछ लघुकथाकारों के सामने दुनिया तेजी से खुल रही है, वे किंचित ठहरकर तेजी से खुल रही इस दुनिया का जायजा लेना चाहते हैं, लिखने की जल्दी में नहीं हैं। लघुकथा को पाठक  भी दो तरह का मिल रहा है। एक वो, जिसके पास समझने की समझ नहीं है, उसे सिर्फ रंजन चाहिए या फिर हल्की-फुल्की भावुकता; दूसरा वह, जिसके पास समझने के लिए समय नहीं है; जल्दी-जल्दी पढ़कर वह जल्दी ही भूल भी जाने लगा है। ऐसा लगता है कि बहुत-से लघुकथाकार बस इन दोनों के लिए ही लिख रहे हैं। उनके कथ्य चयन में, भाषा में, शिल्प में सिंथेटिसिटी होती है, संवेदनात्मक संस्पर्श से उनकी लघुकथाएँ निस्पृह रहती हैं। झटपट तैयार की गयी सामग्री जल्दी में रहने वाले पाठकों के लिए ही हो सकती है। सामयिक भाषा में कहें तो वैसी लघुकथाएँ ‘चीनी उत्पाद’ है—गैर-टिकाऊ, गैर-भरोसेमंद और गैर-जिम्मेदार।

टिकाऊ लघुकथाकार की क्या पहचान है? पहली तो यह कि वह विगत से आगे का कथ्य प्रस्तुत कर रहा होता है; और दूसरा यह कि अलग-अलग तकनीकों और शैलियों में एक समान कथ्य को वह दोहराता नहीं है। कथ्य का दोहराव करने वाला कथाकार स्वयं तो  लेखन से हट जाने की ईमानदारी दिखा नहीं सकता, आलोचक को ही आगे आकर साहस के साथ इस कार्य को सम्पन्न करना चाहिए। समकालीन जीवन की नवीन समस्याओं को साहस के साथ कह पाने में अक्षम लघुकथाकार को लादे क्यों रखा जाए? वह यदि विषय नये नहीं चुन पा रहा है तो प्रश्न तो नये खड़े कर ही सकता है; और अगर नये प्रश्न भी खड़े कर पाने की योग्यता उसमें नहीं है तो ऐसे दिवालिया व्यक्ति को कथाकार क्यों माना जाए, विधा उसे क्यों झेले?                                                      (रचना तिथि 29-5-2023)

गुरुवार, 14 सितंबर 2023

लघुकथा : आनेवाला कल / बलराम अग्रवाल

 

इक्कीसवीं सदी में लघुकथा के लिए नई-नई दिशाएँ खुली हैं। इस तीसरे दशक में लघुकथाकारों का एक निश्चित लक्ष्य होना चाहिएस्वस्थ  व्यक्ति, स्वस्थ मन, स्वस्थ समाज और स्वस्थ राष्ट्र। सुनने में यह किसी राजनीतिज्ञ के एजेंडा की तरह लगता है, है नहीं। इसका पूरा संबंध साहित्य और साहित्यकार से है; उस व्यक्ति से है जो अपने समाज, राष्ट्र और समूची मानव-जाति से प्रेम करता है। बावजूद इसके कि कथाकार कल्पनाओं के जाल बुनता है, वस्तुत: व्यक्ति ही है।  व्यक्ति है तो समाजगत कुंठा, घुटन, रोमांस आदि में भी सामान्य नागरिक की तरह, कम या अधिक, उसकी आसक्ति रहेगी ही। ये सब कम या ज्यादा रह सकती हैं, लेकिन इन सबका उसके जीवन से बिल्कुल लोप ही हो जाएगा, यह नहीं कहा जा सकता। डॉ. कमल किशोर गोयनका द्वारा कहा ही जा चुका है कि लघुकथा जीवन की आलोचना है, वह जीवन को आगे रखकर चलती है।

लघुकथाकार को अपनी लघुकथाओं द्वारा मानव जीवन को सुखी बनाने के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के प्रयास करने चाहिए। विषम परिस्थितियों को तोड़ने वाली कथाएँ प्रस्तुत करनी चाहिए। सामाजिक और राजनीतिक जीवन में झूठ और फरेब का पर्दाफाश करते रहना चाहिए। कुल मिलाकर यह कि उसे लघुकथा के रूप में मानव जीवन से हताशाओं और निराशाओं को दूर करने के ‘ताबीज’ बनाते रहना चाहिए। अगर ध्यान से देखें तो लघुकथा आदिकाल से ही मनुष्य के लिए ‘ताबीज’ का काम करती आयी है। अन्तर मुख्यत: यह है कि पूर्वकालीन लघुकथाएँ सीधी-सरल उपदेश की अथवा बोध की भाषा में प्रस्तुत होती थीं जबकि आज की लघुकथाएँ अपेक्षाकृत अधिक तीक्ष्ण, संकेतात्मक, व्यंजनात्मक और कलात्मक स्पर्श का परिचय दे रही हैं। मैं यह नहीं कहता कि किसी भी पूर्ववर्ती लघुकथा ने ऐसा नहीं किया, अवश्य किया है; लेकिन इक्कीसवीं सदी के इस तीसरे दशक तक आते-आते लघुकथा ने बदलते मूल्यों को पहचानने और प्रकट करने में काफी दक्षता का प्रदर्शन किया है। लघुकथाकार यदि यह देख रहा है कि जीवन को भौतिक दृष्टि से सुखी बनाने में मनुष्य का विश्वास बढ़ा है तो आध्यात्मिक तुष्टि की ओर जाने से भी उसके कदम रुके नहीं हैं, इस सत्य पर भी उसकी नजर है। लघुकथाकार आज के मनुष्य को उसकी पूर्णता में देख रहा है, न कि आधा-अधूरा। वह उसके मानसिक और आत्मिक, हर पहलू पर नजर रख रहा है।

नई सदी के लघुकथाकारों ने जीवन की बदली हुई परिस्थितियों से मोर्चा लेने के लिए त्वरित गति से पैंतरा बदला हो, ऐसा नहीं है। उन्होंने धैर्य के साथ समय को देखते-परखते ऐसा किया है। पिटे-पिटाये विषय, घिसे-घिसाये मुहावरे और नकली-सी लगती कथन-भंगिमाएँ यद्यपि कुछ लोग अभी भी दोहरा रहे हैं तथापि समेकित रूप से देखें तो उन सब को अधिकतर ने लगभग छोड़ ही दिया है। लगातार नये कथ्य, नये मुहावरे और नयी कथन-भंगिमाएँ सामने आ रही हैं।

आज का कथाकार, वह युवा हो या प्रौढ़, नित नयी समस्याओं से लोहा लेते हुए पूरी शक्ति से जूझ रहा है। यहाँ हमें कथा-लेखन के संदर्भ में ‘समस्या’ के और ‘लोहा लेने’ के स्वरूप को समझना होगा। अगर हमने विचारधारा-विशेष से स्वयं को बाँध लिया है तो वैचारिक स्वतंत्रता से हम दूर हट जाते हैं। किसी भी साहित्यकार का वैचारिक स्वतंत्रता से दूर हट जाना ही साहित्य क्षेत्र में ‘समस्या’ समझा जाना चाहिए क्योंकि यह क्षेत्र सत्य, साहस और न्याय का क्षेत्र है, आँखों पर पट्टी बाँधकर किसी एक तरफ चलते चले जाने का नहीं। रचनाकार के नाते यह उसके लिए स्वाभाविक भी नहीं है। वह यदि कला की उत्कृष्टता की ओर सचेत है, तो जीवन-सत्य को गहराई से देखने-परखने, जीवन के प्रति अपनी सत्यनिष्ठा को व्यक्त करने की ओर भी लगातार प्रयत्नशील रहना उसका दायित्व है।

लिखने की लत रखने वाले लघुकथा-लेखकों को छोड़कर अथवा लघुकथा-लेखन से वीतराग हुए लेखकों को छोड़कर अन्य कोई जागरूक और सचेत लेखक जीवन संग्राम से अलग नहीं रह सकता। जेनुइन लेखक को अपने और अपने चारों ओर के समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करना पड़ता है । लेखक सिर्फ लेखक नहीं है, वह जागरूक सामाजिक व्यक्ति भी है। व्यक्ति होने के नाते वह अकेला नहीं है।  समाज से, राष्ट्र से और अंततोगत्वा विश्व से उसका घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है। अपने समाज और राष्ट्र में जो कुछ घटित होता है उससे वह निस्पृह नहीं रह सकता। हिन्दी में शायद ही कोई ऐसा लघुकथाकार हो, जो अपनी कथा में 'भारतीयपनबरतने में संकोच का अनुभव करता हो। विशेषकर आज, जब भारतीय जीवन की नींव को मजबूत बनाना प्रत्येक नागरिक का पुनीत कर्तव्य है। बेशक, कुछ लोग देश और संस्कृति की स्वतन्त्र चेतना और साहित्य-रचना के बीच किसी प्रकार का कोई जुड़ाव नहीं मानते। वे आवश्यकता से अधिक वैश्विक हो चुके हैं और यह मानने लगे हैं कि एक ही समाज और राष्ट्र से लेखक का कुछ लेना-देना नहीं, वह तो लिखता है समूची मानव जाति के लिए। यही विचार विधा को छोड़कर दूसरी, तीसरी, चौथी विधा में जा कूदने को भी प्रेरित करता है। कुछ लोग असंतुलित विचार वाले भी हैं। वे मानसिक उलझन में पड़कर इधर-उधर भटक रहे हैं। साहित्य की जिस भूमि पर दोहा, साखी, चौपाई, कुण्डली और गजल सगर्व खड़ी हैं वहाँ लघुकथा को ‘छोटी’ विधा आँकने-मानने वालों  की बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है। पूर्व में, लघुकथा-साहित्य के अनेक प्रतिभाशाली लेखक महत्वाकांक्षा की वेदी पर अपनी कला की बलि चढ़ा चुके हैं; लेकिन यकीनन, आने वाला समय लघुकथा से पलायन का न होकर, पलायन कर गये कथाकारों के लौट आने का होगा। कुछ हद तक गत दशक में ऐसा होता हम देख भी चुके हैं।                                          

                                      रचनाकाल 5 सितंबर, 2021 या उससे पहले कभी।

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