रविवार, 20 नवंबर 2016

हिन्दी लघुकथा : परम्परा और विकास-6 / बलराम अग्रवाल

छठी किस्त

दिनांक 14-6-2016 से आगे………
आवरण : के॰ रवीन्द्र
साहित्य युग का प्रतिनिधि होता है। युग की मानसिकता से प्रभावित होकर उसी को प्रतिबिम्बित करता है। अतः प्राचीन लघुकथाएँ भी तत्कालीन मानसिकता को उजागर करती हैं जिनमें हिन्दी लघुकथा के तत्त्व खोजना व्यर्थ है; क्योंकि वे कथ्य, शिल्प, उद्देश्य, प्रभाव की दृष्टि से हिन्दी लघुकथाओं से भिन्न हैं। कथ्य की दृष्टि से प्राचीन लघुकथाओं का कथ्य (समकालीन) हिन्दी लघुकथा के समान पैना, सूक्ष्म, स्वतन्त्र और सशक्त नहीं है; न ही शिल्प और कसाव में समानता है। वैदिक लघुकथाओं का उद्देश्य किसी सूत्र की व्याख्या या कथा-उपकथा की सहायता, किसी कथानक का विकास अथवा किसी तथ्य का निरूपण आदि ही अधिक रहा है; जबकि आधुनिक हिन्दी लघुकथा का उद्देश्य जनसामान्य के हथियार रूप में ‘गलत’ व्यवस्था पर चोट करना है। प्राचीन कथाएँ ऐतिहासिक ज्ञान, आदर्श की प्रेरणा, नीति-बोध व जीवन के व्यावहारिक पक्ष की शिक्षा अथवा मनोरंजन प्रदान करती हैं; जबकि आधुनिक हिन्दी लघुकथाएँ कोई गम्भीर चिन्तन-बिन्दु सौंपती हैं; जीवन में जो ‘गलत’ हो रहा है उसकी ओर संकेत करती हैं।
       अपवादों को छोड़कर दोनों में कथ्य, शिल्प, उद्देश्य एवं प्रभाव के स्तर पर पर्याप्त अन्तर है। इसलिए लघुकथा के वर्तमान परिदृश्य में आदिकालीन कथाओं की उनके ऐतिहासिक महत्व से इतर भूमिका को निष्क्रिय माना जा सकता है।’डॉ॰ शकुन्तला किरण

सुप्त काल (सन् 1000 से 1875 तक) की लघुकथाएँ
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में हिन्दी साहित्य के 900 वर्षों के इतिहास को चार कालों में निम्नानुरूप विभक्त करके प्रस्तुत किया है
    1. आदिकाल (वीरगाथाकाल, संवत् 1050-1375 यानी सन् 993-1318 ई.)
    2. पूर्व मध्यकाल(भक्तिकाल, संवत्1375-1700 यानी सन् 1318-1643 ई.)
    3. उत्तर मध्यकाल(रीतिकाल, संवत्1700-1900 यानी सन् 1643-1843 ई.)
    4. आधुनिक काल(गद्यकाल, संवत् 1900-1984 यानी सन् 1843-1927 ई.)
            यह काल विभाजन विक्रम संवत् में है। ईसवी सन् में यह विभाजन निम्न प्रकार है
    1. आदिकाल (वीरगाथाकाल, सन् 993-1318 ई.)
    2. पूर्व मध्यकाल(भक्तिकाल, सन् 1318-1643 ई.)
    3. उत्तर मध्यकाल(रीतिकाल, सन् 1643-1843 ई.)
    4. आधुनिक काल(गद्यकाल, सन् 1843-1927 ई.)
            सुविधा के लिए इसे हम क्रमशः निम्नवत् मानकर आगे बढ़ सकते हैं
    1. आदिकाल (सन् 1000-1325 ई.)
    2. पूर्व मध्यकाल (सन् 1325-1650 ई.)
    3. उत्तर मध्यकाल (सन् 1650-1850 ई.)
    4. आधुनिक काल (गद्यकाल, सन् 1850 से अद्यतन)
लघुकथा लेखन की दृष्टि से देखें तो सन् 1000 से सन् 1875 तक के काल को हम ‘लघुकथा का सुप्तकाल’ मान सकते हैं। स्वयं शुक्ल जी ने लिखा है—‘संवत् 1860 (सन् 1803 ई.) के लगभग हिन्दी गद्य का प्रवर्तन तो हुआ पर उसके साहित्य की अखण्ड परम्परा उस समय से नहीं चली। इधर-उधर दो-चार पुस्तकें अनगढ़ भाषा में लिखी गई हों तो लिखी गई हों पर साहित्य के योग्य स्वच्छ सुव्यवस्थित भाषा में लिखी कोई पुस्तक संवत् 1915 (सन् 1858 ई.) के पूर्व की नहीं मिलती।...
संवत् 1860 और 1915 के बीच का काल गद्य-रचना की दृष्टि से प्रायः शून्य ही मिलता है। संवत् 1914 (सन् 1857 ई.) के बलवे के पीछे ही हिन्दी गद्य साहित्य की परम्परा अच्छी तरह चली।...
       पं. जुगुलकिशोर ने, जो कानपुर के रहनेवाले थे, संवत् 1883 (सन् 1826 ई.) में ‘उदंत मार्तंड’ नाम का एक संवाद पत्र निकाला जिसे हिन्दी का पहला समाचार पत्र समझना चाहिए।...
       यह पत्र एक ही वर्ष चलकर सहायता के अभाव में बंद हो गया। इसमें खड़ी बोली का मध्यदेशीय भाषा के नाम से उल्लेख किया गया है।’
      आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘उदन्त मार्तण्ड’ में प्रकाशित निम्न रचना को यद्यपि भाषा का स्वरूप दिखाने के उद्देश्य से उद्धृत किया है तथापि यह उस काल के शिक्षित वर्ग की एक प्रवृत्ति-विशेष को भी हमारे सामने रखती है—                        एक यशी वकील वकालत का काम करते करते बुङ्ढा होकर अपने दामाद को यह काम सौंप के आप सुचित हुआ। दामाद कई दिन काम करके एक दिन आया ओ प्रसन्न होकर बोला, हे महाराज! आपने जो फलाने का पुराना वो संगीन मोकद्दमा हमें सौंपा था सो आज फैसला हुआ।
यह सुनकर वकील पछता करके बोला, ‘‘तुमने सत्यानाश किया। उस मोकद्दमे से हमारे बाप बड़े थे तिस पीछे हमारे बाप मरती समय हमें हाथ उठाकर के दे गए ओ हमने भी उसको बना रखा ओ अब तक भलीभाँति अपना दिन कटा ओ वही मोकद्दमा तुमको सौंपकर समझा था कि तुम भी अपने बेटे पोते परोतों तक पलोगे पर तुम थोड़े से दिनों में उसे खो बैठे।
हिन्दी साहित्य का इतिहास’ के परिशिष्ट में शुक्ल जी ने लिखा हैपं. वंशीधर ने, जो आगरा नार्मल स्कूल के मुदर्रिस थे, ‘पुष्पवाटिका’ नाम से गुलिस्ताँ के एक अंग का अनुवाद, संवत् 1909 (सन् 1852) में तथा बिहारीलाल ने गुलिस्ताँ के आठवें अध्याय का हिन्दी अनुवाद संवत् 1919 (सन् 1862) में किया। डाॅ. बैलंटाइन के परामर्श के अनुसार इसी सन् में पं. बद्रीलाल ने ‘हितोपदेश’ का अनुवाद किया जिसमें बहुत-सी कथाएँ छाँट दी गई थीं।
लेकिन इसे उस काल के लेखन की धारा मानकर आगे बढ़ने का कोई अन्य सूत्र हमें सन् 1875 से 1880 के बीच कभी प्रकाशित भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ‘परिहासिनी’ से पहले नहीं मिलता है। इसीलिए सन् 1875 तक के काल को हम ‘लघुकथा का सुप्त काल’ मान सकते हैं।

संधि काल (सन् 1875 से 1970 तक) की लघुकथाएँ
कुछ विद्वानों ने इस काल को ‘लघुकथा का नवजागरण काल’ भी माना है जो प्रथमदृष्ट्या उचित-सा प्रतीत होता है; लेकिन जब तक यह स्पष्ट न हो कि नवजागरण किस दृष्टि से? स्वाधीनता प्राप्ति हेतु जनता में चेतना उत्पन्न करने के लिए, गद्य की या कथा में कथ्य की चेतना उत्पन्न करने के लिए; या किसी अन्य उद्देश्य से? तब तक इसे नवजागरण काल कैसे माना जा सकता है! इसे लघुकथा का संधि काल मानने के पीछे दृष्टि यह है कि इस काल में हम लघुकथा को पहले तो पुराने कथ्यों को नयी भाव भंगिमा में प्रस्तुत होते देखते है, तत्पश्चात् उनसे पूरी तरह मुक्त होकर आधुनिक जनजीवन के कथ्यों और तेवरों को अपना लेती पाते हैं। सन् 1876 में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की पुस्तक ‘परिहासिनी’ प्रकाशित हुई। ‘भारतेन्दु ने ‘परिहासिनी’ को ‘कथा-कहानी’ की पुस्तक न कहकर ‘हँसी, दिल्लगी, पंच, चीज की बातें और चुटकिले’ का संग्रह कहा है; और निःसन्देह यह ‘पहली लघुकथा पुस्तक’ है भी नहीं। परन्तु क्या यह सम्भव नहीं है कि अंग्रेज हुक्मरानों और उनके पिट्ठुओं को धोखा देने के लिए ऐसा उन्होंने जानबूझकर किया हो? इसके प्रथम उपशीर्ष ‘चीज की बातें’ में ‘चीज’ क्या है?यह विचारणीय है। दूसरे, ‘पंच’ क्या है?यह भी विचारणीय है। ‘चीज’ यानी ‘वस्तु’ अर्थात् वह, जिसे उपयोग हेतु ग्रहण किया जा सके। ‘चीज की बातें’ अपने आप में एक अनोखा शब्द-प्रयोग है। रचना के, वह भी कथात्मक रचना के सन्दर्भ में ‘वस्तु’ का क्या महत्व है, इसे स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं है। मुक्के के एक ही वार में दीवार फोड़ देने के लिए अंग्रेजी में ‘पंच’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसीलिए मुक्केबाजी का यह तकनीकी शब्द है। साहित्य में इसका निहित-अर्थ व्यक्ति को तिलमिलाकर रख देने वाला प्रहारपूर्ण वक्र वाक्य-प्रयोग है। निश्चय ही यह ‘आइरनी’ से भिन्न प्रकृति रखता है। यही कारण है कि ‘परिहासिनी’ में ‘चीज की बातें’ उपशीर्ष के अन्तर्गत संकलित गद्य रचनाएँ मात्र चुटकुला नहीं हैं। वे ‘चीज’ और ‘पंच’ दोनों प्रकार की रचनाएँ हैं। ‘मुँहतोड़ जवाब’ व ‘लाला साहब का रामचेरा’ हाजिर-जवाबी (Wit) का तथा ‘अद्भुत संवाद’ प्रहारपूर्ण वक्र-वाक्य (Punch) का अनुपम उदाहरण है। परन्तु ‘अंगहीन धनी’ एक असाधारण गद्य-कथा है। वस्तुतः ‘अद्भुत संवाद’ और ‘अंगहीन धनी’ये दोनों ही रचनाएँ भारतेन्दु की प्रतिभा और देश-काल सापेक्ष जीवन-दृष्टि को गहराई के साथ प्रस्तुत करती हैं। इनमें ‘अंगहीन धनी’ में परिस्थितियों को गंभीरता के साथ और ‘अद्भुत संवाद’ में मसखरेपन के साथ पाठकों के समक्ष रखा गया है। गहन-गंभीर प्रकृति के कारण ‘अंगहीन धनी’ का प्रभाव स्थाई बना रहता है, जबकि मसखरेपन के कारण वही बात ‘अद्भुत संवाद’ मात्र बनकर रह जाती है, भुला दी जाती है। तथापि सन्देश दोनों रचनाओं में लगभग एक ही है। पाठकों के चिंतन-मनन-विश्लेषण हेतु यहाँ प्रस्तुत हैं दोनों रचनाएँ :

                            ।। अंगहीन धनी ।।                                                     एक धनिक के घर उसके बहुत-से प्रतिष्ठित मित्र बैठे थे। नौकर बुलाने को घंटी बजी। मोहना भीतर दौड़ा, पर हँसता हुआ लौटा।
   और नौकरों ने पूछाक्यों बे, हँसता क्यों है?
   तो उसने जवाब दियाभाई, सोलह हट्टे-कट्टे जवान थे। उन सभों से एक बत्ती न बुझे। जब हम गए, तब बुझे।

                             ।। अद्भुत संवाद ।।
              “, जरा हमारा घोड़ा तो पकड़े रहो।
              “यह कूदेगा तो नहीं?
              “कूदेगा! भला कूदेगा क्यों? लो सँभालो।
              “यह काटता है?
              “नहीं काटेगा, लगाम पकड़े रहो।
              “क्या इसे दो आदमी पकड़ते हैं, तब सम्हलता है?
              “नहीं।
              “फिर हमें क्यों तकलीफ देते हैं? आप तो हई हैं।
यहाँ इस भ्रम का कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र इनके लेखक नहीं हैं और ‘इनके लेखक नई शोध होने तक अज्ञात हैं’ निवारण आवश्यक है। शोध एक तथ्यपरक विधा है। आधे-अधूरे तथ्यों की प्रस्तुति और पूर्वाग्रहग्रस्तता इसे भ्रष्ट करते हैं।
पहली बात तो यह कि ‘भारतेन्दु समग्र’ में पृष्ठ 1066 पर ‘परिहासिनी’ को प्रस्तुत करने के क्रम में इसके सम्पादक हेमन्त शर्मा ने अपनी ओर से एक टिप्पणी लिखी है—‘अपने मित्रों के लिए ‘हँसी’,  ‘दिल्लगी’, ‘चीज की बातें’ और ‘चुटकुले’ भारतेन्दु ने लिखे थे, बाद में जिसका संग्रह ‘परिहासिनी’ उन्होंने स्वयं प्रकाशित कराया था। इसका रचना काल 1875 से सन् 1880 के बीच है।’
दूसरी, उक्त पुस्तक (परिहासिनी) पर टिप्पणी—‘निज मित्रगण ठाकुर कविराज श्यामल दास जी, राजा गिरि प्रसाद सिंह, बाबू बदरी नारायण चौधरी, बाबू बालेश्वर प्रसाद और बाबू दुर्गा प्रसाद के चित्त विनोद के अर्थ हरिश्चन्द्र ने संग्रहीत किया।’
ऊपर हेमन्त शर्मा ने लिखा है—‘भारतेन्दु ने लिखे’ और नीचे मुद्रक की ओर से अथवा स्वयं भारतेन्दु जी की ओर से घोषणा है—‘हरिश्चन्द्र ने संग्रहीत किया।’ तो क्या आप यह कहना चाहते हैं कि भारतेन्दु ‘संग्रह’ और ‘संकलन’ के बीच अन्तर को नहीं जानते थे; या फिर यह कि भारतेन्दु ने दूसरों के लिखे चुटकुले यहाँ-वहाँ से संकलित कर जानबूझकर अपने नाम से प्रकाशित करा लिये! अगर आप ऐसा मानते हैं तो निःसन्देह, भारतेन्दु को जानते ही नहीं हैं। वह कितनी हँसोड़ तबियत के व्यक्ति थे और उनमें कितना साहसपूर्ण ‘विट’ भरा था, उसके अनेक उदाहरण हेमन्त शर्मा ने भी ‘भारतेन्दु समग्र’ में दिये हैं।
तीसरी और अन्तिम बातप्रचलित कथाएँ जब किसी समर्थ कथाकार द्वारा विशिष्ट उद्देश्य से विशिष्ट शिल्प और शैली में रच दी जाती हैं तो उनकी जन-स्वीकृति उसी के अनुरूप बनती है। उदाहरण के लिए, तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ के प्रारम्भ में ही स्वीकार कियानाना पुराण निगमागम सम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।...यानी विभिन्न पुराणों में, शास्त्रों में, वाल्मीकि रामायण में तथा कुछ अन्य स्थानों से भी यह सामग्री मैंने जुटाई है।
पूर्वकालीन लघुकथाओं के विस्तृत अध्ययन से यह तो सिद्ध होता है कि ‘समकालीन लघुकथा’ का स्वरूप ‘लघुकथा’ चिह्नित पूर्वकालीन कथाओं से सर्वथा भिन्न है तथापि पूर्वकालीन कथाओं की भूमिका को निष्क्रिय अथवा निष्फल नहीं माना जा सकता। अप्रैल 1990 में कमलेश भट्ट ‘कमल’ से लघुकथा के मुद्दे पर बातचीत करते हुए डाॅ. कमल किशोर गोयनका ने कहा—‘समय के बदलने से साहित्य बदलता है और उसकी अभिव्यक्ति का स्वरूप भी। इसीलिए प्राचीन कथाओं और आज की लघुकथाओं में अन्तर होना स्वाभाविक है और यह अन्तर भविष्य में भी आने वाला है। क्या आप ये मानेंगे कि इक्कीसवीं शताब्दी की लघुकथा आज की लघुकथा के समान ही होगी?’ पूर्वकाल की लघुकथाओं के बाद की लघुकथाओं के बारे में डाॅ. शकुन्तला किरण का मानना है कि—‘सन् 1900 में ‘सरस्वती’ के प्रकाशन से हिन्दी-जगत को एक नई दिशा मिली। सन् 1900 से 1930 तक ‘चाँद’, ‘मतवाला’, ‘मौजी’, ‘साप्ताहिक जागरण’, ‘आज’, ‘भूत’, ‘बंगवासी’, ‘श्री वेंकटेश्वर समाचार’, ‘भारत-मित्र’, ‘प्रताप’ इत्यादि पत्रों एवं ‘माधुरी’, ‘प्रभा’, ‘सत्यभामा’, ‘हंस’, ‘इन्दु’ आदि पत्रिकाओं की धूम थी।
इन पत्र-पत्रिकाओं ने लघुकथा को कोई महत्त्व नहीं दिया। इन पत्रकारों के सामने दो बड़े उद्देश्य थेपहला, देश की आजादी तथा दूसरा, हिन्दी साहित्य की विधाओं को समृद्ध करने की प्रतिस्पर्धा।’
आगामी अंक में जारी………

सोमवार, 14 नवंबर 2016

हिन्दी लघुकथा : परम्परा और विकास-5 / बलराम अग्रवाल



पाँचवीं किस्त
दिनांक 06-11-2016 से आगे…
आवरण : के॰ रवीन्द्र
संस्कृत साहित्य में सुदूर पूर्वकाल से ही बोधगम्य कथाओं के माध्यम से कठिन विषयों के उपदेश की परम्परा देखने को मिलती है। कथाओं के माध्यम से उपदेश की परम्परा उपनिषदों व ब्राह्मण ग्रन्थों में भी पायी जाती है। इस हेतु पशु-पक्षियों आदि मानवेतर कथा-पात्रों  का आश्रय भी लिया गया है।  बोधगम्य कथाओं के माध्यम से गंभीर विषयों का प्रतिपादन तथा नीतिशास्त्र के दुरूह तत्त्वों को सर्वसाधारण करने के उदाहरण छान्दोग्योपनिषद, वृहदारण्यकोपनिषद तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में भरे पड़े हैं, जिनके निदर्शन रामायण तथा महाभारत में भी मिलते हैं।
     सन् 1000 से पहले की समूची लघ्वाकारीय कथाओं में नैतिकता, बोध, उपदेश, शिक्षा ही देखने को मिलती है। सन् 1000 के बाद आगामी कुछ वर्षाें तक पालि और प्राकृत भाषाओं की बहुत-सी रचनाओं का संस्कृत व अन्य भाषाओं में अनुवाद कराने के प्रमाण सामने आते हैं; तथापि लघुकथा लेखन होते रहने का कोई प्रमाण सामने नहीं आता।
     भारतीय चिन्तन की तीन प्रमुख परम्पराएँ हैंवैदिक, जैन और बौद्ध।  एक अध्ययन के अनुसारजैन धर्म का उदय वैदिक काल में ही हो गया था। इनके धर्मगुरुओं को तीर्थंकर कहा गया है। ऋषभदेव जी पहले तीर्थंकर थे। इनका उल्लेख ऋग्वेद में भी है। पार्श्वनाथ 23वें तीर्थंकर थे। इन्होंने वैदिक कर्मकांड और देववाद का विरोध किया था। सम्भवतः इसीलिए इनके अनुयायियों को निर्ग्रन्थ कहा जाता है। महावीर 24वें तीर्थंकर थे। लेकिन जैन कथाओं का काल विद्वानों ने ई.पू. 500-450 वर्ष के आसपास माना है।
     जैन लघुकथाएँ’ आम तौर पर, उनके 24 तीर्थंकरों के त्याग तपस्या और जीव-मात्र के प्रति प्रेम की कथाएँ मानी जाती हैं; लेकिन इनमें व्यापक जीवन अनुभव समोए हुए हैं। इनमें डाकू, व्यापारी, राजा आदि का वर्णन भी है। ‘जैन लघुकथाएँ’ ‘ब्राह्मण-साहित्य’ व ‘आख्यानों’ में आए चमत्कार आदि का खण्डन करती हैं, लेकिन ये लघुकथाएँ जैन दर्शन का पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। ‘देश-वैकालिक टीका’ में लगभग 70 प्राकृत कथाएँ आई हैं। इस ग्रन्थ के टीकाकार मुनिचन्द्र हैं। ‘वृत्ति टिप्पण’ में हरिभद्र सूरि कृत प्राकृत लघुकथाओं में सौन्दर्य वर्णन है।
     पुरातन धर्मगुरुओं ने इस मनोविज्ञान को जान लिया था कि विशुद्ध धार्मिक सिद्धांतों का उपदेश लोगों को रुचिकर नहीं लगेगा। इसलिए वे किसी मनोरंजक वार्ता, आख्यान या दृष्टांत के माध्यम से उसे प्रभावशाली और रोचक बनाकर प्रस्तुत करने लगे। जैन विद्वानों ने इस युक्ति का भरपूर उपयोग किया। यही कारण है कि जैनों के लगभग प्रत्येक धार्मिक ग्रन्थ में कोई न कोई कथा अवश्य मिलेगीदान की, पूजा की, भक्ति की, परोपकार की, सत्य की, अहिंसा या सांसारिक विषय-भोगों में तृष्णा कम करने की।  ‘णायाधम्मकहाओ’ (ज्ञातृधर्मकथा) को जैन कथा-साहित्य का सबसे पहला ग्रन्थ कहा जाता है जिसमें 19 अध्ययनों में ज्ञातृपुत्र महावीर की धर्मकथाओं का संग्रह है। इसमें साढ़े तीन करोड़ कथाएँ और उतनी ही उपथाएँ  होने का उल्लेख मिलता है। यह संख्या अगर अत्युक्ति हो, तो भी यह तो पता लगता ही है कि इस ग्रन्थ में महावीर की कही हुई बहुत-सी प्राचीन कथाएँ विद्यमान थीं, जिनमें से बहुत-सी आज उपलब्ध नहीं हैं। फिर भी, ‘वृद्धसंप्रदाय’, ‘पूर्वप्रबंध’, ‘संप्रदायगम्य’, ‘अनुश्रुतिगम्य’ आदि रूप से अनेक कथाएँ पूर्व परम्परा से चली आ रही हैं। संघदासगणि वाचक ने अपनी रचना ‘वसुदेवहिंडी’ को गुरुपरम्परागत ही स्वीकार किया है।  जैन कथासाहित्य दो धाराओं में मिलता हैआगमगत्य कथासाहित्य और आगमबाह्य कथासाहित्य। आगम ग्रन्थों की कथावस्तु का बिना किसी साहित्यिक सौष्ठव के, एक-जैसी संक्षिप्त शैली में वर्णन किया गया है। आल्सफोर्ड ने इसे ‘तार की शैली’ (टेलीग्राफ स्टाइल) कहा है। कभी-कभी तो बिना टीका के इन कथाओं को समझ पाना कठिन ही हो जाता है। अनेक यूरोपीय विद्वानों द्वारा इसीलिए इन्हें ‘शुष्क और नीरस’ की संज्ञा भी दी है। आगमगत्य या आगमबाह्य कथाग्रन्थों में नगर, राजा, राजकन्या, गणिका आदि नायिकाओं श्रृंगारप्रधान वर्णन मिलते हैं। इनमें ‘वसुदेवहिंडी’ का नाम अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस ग्रन्थ के मध्य खंड के रचयिता धर्मसेन हैं। ‘बृहत्कथाश्लोकसंग्रह’ के रचयिता बुद्धस्वामी हैं।  
     जैनधर्म में कथाओं के दो प्रकार बताए गये हैं
     1. चरित (जिसमें महान पुरुषों के यथार्थ चरितों का वर्णन हो) और,
     2. कल्पित (जिसमें कल्पना-प्रधान कथाएँ हों)।
     स्त्री और पुरुष के भेद से दोनों के दो-दो भेद हैं। धर्म, अर्थ और काम सम्बन्धी कार्यों से सम्बद्ध दृष्ट, श्रुत और अनुश्रुत वस्तु का कथन चरित-कथा है। इसके विपरीत, कुशल पुरुषों द्वारा जिसका पूर्वकाल में उपदेश किया गया हो, उसकी अपनी बुद्धि से योजना कर कथन करना कल्पित-कथा है। चरित और कल्पित आख्यान अद्भुत, शृंगार और हास्यरस-प्रधान होते हैं। ‘दशवैकालिक निर्युक्ति’ (निर्युक्तिगाथा, हरिभद्रीयवृत्ति, पृष्ठ 106) में अर्थ, काम, धर्म और मिश्रित कथाओं से कथा के चार भेद बताए हैं। इसमें स्त्री, भक्त, राज, चोर, जनपद, नट, नर्तक, जल्ल (रस्सी पर खेल दिखाने वाले बाजीगर) और मुष्टिक (मल्ल) विकथाओं का उल्लेख है।
     यहाँ विकथा क्या है?   
     जैन आचार्यों ने कथाओं के तीन भेद बताए  हैं
     1. सत्कथा,    2. कथा और 3. विकथा।
     जैन मतानुसारजिसे तप और संयम के धारक सद्भावपूर्वक कहते हैं, संसार के समस्त जीवों का हित करने वाली वह कथा ‘सत्कथा’ है। रूप-सौंदर्य, अवस्था, वेशभूषा, दाक्षिण्य, कलाओं की शिक्षा तथा देखे हुए, सुने हुए और अनुभव किए हुए का परिचय प्रकट करने के कर्म को ‘कथा’ कहा गया है। इसी क्रम में हरिभद्रसूरि का कहना है कि जिसमें काम उपादान रूप में हो तथा बीच-बीच में दूती व्यापार, रमणभाव, अनंगलेख, ललितकला और अनुरागपुलकित आदि वर्णन किया गया हो, उसे ‘कामकथा’ अथवा ‘विकथा’ कहते हैं। (समराइच्चकहा, पृष्ठ 3) प्राचीन जैन ग्रन्थों में कितने ही प्रेमाख्यान मिलते हैं जिनसे पता चलता है कि जैन ग्रन्थकारों ने धर्म-कथाओं में शृंगारयुक्त प्रेमाख्यानों का समावेश करके उन्हें पाठकों और श्रोताओं के लिए रुचिकर बनाने की कोशिश की है। जैन साधुओं को आदेश है कि उन्हें शृंगार रस से उद्दीप्त, मोह से फूत्कृत, जाज्वल्यमान मोहोत्पादक कथा नहीं कहनी चाहिए। 'कुवलयमाला' के रचयिता उद्योतनसूरि ने अर्थकथा और कामकथा से पूर्व धर्मकथा को प्रमुखता दी है; लेकिन अपनी धर्मकथा को कामशास्त्र से सम्बद्ध बताते हुए कहा है कि पाठक इसे अर्थहीन न समझें क्योंकि धर्म की प्राप्ति में यह कारण है। कथा के इन्होंने पाँच प्रकार बताए हैंसकलकथा, खण्डकथा, उल्लापकथा, परिहासकथा और वरकथा।  कुवलयमाला 7, पृष्ठ 4 पर कहा गया हैकहीं कुतूहल से, कहीं परवचन से प्रेरित होने के कारण, कहीं संस्कृत में, कहीं अपभ्रंश में, कहीं द्रविड़ और पैशाची भाषा में रचित, कथा के सर्वगुणों से सम्पन्न, शृंगार रस से मनोहर, सुरचित अंग से युक्त, सर्व कलागम से सुगम कथा ‘संकीर्णकथा’ है। (यहाँ ‘संकीर्ण’ से तात्पर्य कथा का संस्कृत-प्राकृत में लिखे होने से भी हो सकता है)। जैन आचार्यों ने शब्दशास्त्र को महत्व न देते हुए उसी कथा को श्रेष्ठ कहा है जिससे सरलतापूर्वक स्पष्ट अर्थ का ज्ञान हो सके।
जैन ग्रन्थ ‘निशीथविशेषचूर्णी’ में आई यह लघुकथा देखिए :
                साधु : तुम आज भिक्षा के लिए नहीं गयी?
                साध्वी : आर्य! मेरा आज उपवास है।
                साधु : क्यों?
                साध्वी : मोह का इलाज कर रही हूँ। तुम्हारा क्या हाल है?
                साधु : मैं भी उसी का इलाज कर रहा हूँ। तुमने क्यों 
                      प्रव्रज्या (संन्यास-दीक्षा) ग्रहण की?
                साध्वी : "पति के मर जाने से। तुमने?
                साधु : "मैंने पत्नी के मर जाने से।”
                साधु उसे स्नेहभरी नजर से देखता है।
                साध्वी : "क्या देख रहे हो?”
               साधु : दोनों की तुलना कर रहा हूँ। हँसने, बोलने और सौंदर्य में तुम पत्नी से बिल्कुल मिलती-जुलती हो। तुम्हारा दर्शन मेरे मन में मोह पैदा करता है।
                साध्वी : मेरा भी यही हाल है।
             साधु : वह मेरी गोद में सिर रखकर मर गयी। यदि वह मेरी अनुपस्थिति में मरती तो शायद देवताओं को भी उसके मरने का विश्वास न होता। तुम वह कैसे हो सकती हो?
       लेकिन,  बौद्ध धारा ने जितना प्रचार-प्रसार और गौरव भारत से बाहर प्राप्त किया, उतना शेष दो यानी वैदिक और जैन धारा ने सम्भवतः नहीं। बौद्ध चिन्तन पुरातन मूल रूप से पालि भाषा में प्राप्त है। इसका रूप ईसापूर्व तीसरी शती में सुनिश्चित हो गया था। कोई सौ साल बाद बौद्ध धर्मग्रन्थ संस्कृत में प्रणीत हुए। 'जातकमाला' संस्कृत का ग्रन्थ है। बुद्ध से पहले अनेक सम्प्रदायों के लोग वनों, पर्वतों में रहते थे। इनमें ‘कुटीरच’, ‘परमहंस’, ‘केस’, ‘जिन’ आदि साधु-संन्यासी हैं। चूँकि जीवन के प्रति वे विरक्त थे, अतः उनकी कही हुई लघुकथाएँ भी पदार्थ के प्रति विरक्ति का भाव उत्पन्न करने वाली ही होती थीं। ब्राह्मण, जैन तथा बौद्ध साहित्य ने यहीं से लघुकथाएँ लीं और उन्हें अपने-अपने रंग में रंगकर प्रस्तुत किया। बौद्धकालीन लघुकथाओं में ‘इति बुद्धक’ में एक ओर बुद्ध के कथन हैं तो दूसरी ओर तत्कालीन समाज के चित्र हैं। इनमें राजा, भिक्षु, योद्धा आदि की लघुकथाएँ हैं।
कुछ आलोचक मानते हैं कि ‘जातक लघुकथाएँ’ बुद्ध के बाद के काल की हैं। भदन्त आनन्द कौशल्यायन के अनुसार—‘जातक कथाओं में भगवान बुद्ध के 547 जन्मों का उल्लेख है।’ इनके अतिरिक्त ‘जातक अट्टकथा’ यानीअर्थ सहित जातकका भी उल्लेख है। जातक कथाएँ आमतौर पर ‘पूर्वकाल में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त राज्य करता था’ वाक्य से आरम्भ होती हैं। ये उपदेशपरक तथा संकेतात्मक लघुकथाएँ हैं।
अधिकांश खोजियों का मानना है कि ‘उक्त संग्रहों की लघुकथाएँ उपदेशात्मक ही हैं।’ लेकिन इस उपदेश मुद्रा के कुछ निहित अर्थ भी हैं जिनका खुलासा अक्सर नहीं किया जाता। ‘जातक कथाएँ ई. पू. पाँचवीं शती के पूर्व से लेकर ईसवी की पहली या दूसरी शती तक रची गईं। कुछ विद्वानों का मानना है कि इनकी अनेक कथाएँ महाभारत और रामायण में विकसित रूप में पायी जाती हैं। इन कथाओं में से यदि बोधिसत्व का नाम हटा दिया जाय तो ये शुद्ध लौकिक कथा के रूप में रह जाती हैं।
डॉ॰ शकुन्तला किरण कहती हैंमहाभारत तथा रामायण, इन दोनों ही ग्रन्थों में अतीत की गाथाओं को जीवित रखने के प्रयास से अलग जीवन के विभिन्न अनुभवों की व्याख्या करती लघुकथाओं की भरमार है। इनमें से महाभारत में तो अगणित लघुकथाएँ परस्पर गुम्फित होते हुए भी स्वतन्त्र हैं। महाभारत और रामायणइन दोनों ही ग्रन्थों की कथाओं में आदर्शोन्मुखी प्रवृत्ति अधिक मिलती है। इस काल के व्यक्ति के लिए ऐसे उपदेश शायद आवश्यक रहे होंगे।
सरल पंचतंत्र’ की भूमिका के लेखक विष्णु प्रभाकर के अनुसार—‘पंचतंत्र की मूल कथा गुणाढ्य रचित ‘बृहत्-कथा’ नामक ग्रन्थ पर आधारित है। उक्त ग्रन्थ के कुछ प्रसंग लेकर विष्णु शर्मा ने ‘पंचतंत्र’ की रचना की। गुणाढ्य का समय ईसवी सन् प्रथम शताब्दी माना जाता है।’ हंसराज अग्रवाल के अनुसार भी—‘असली ‘पंचतंत्र’ दूसरी या तीसरी शताब्दी में रचा गया।’
हितोपदेश में ‘पंचतंत्र’ के अंश भी संगृहीत हैं। फ्रासिंस जाॅन्सन के अनुसारईसवी छठी शती में ही हितोपदेश का अनुवाद ईरान के सम्राट नौशेरखाँ की आज्ञा से फारसी में किया गया। नवीं शती में फारसी से अरबी भाषा में और बाद में हिब्रु व ग्रीक भाषा में हुआ। सामाजिक चित्रण के अन्तर्गत इसमें उपदेशात्मक प्रवृत्ति की प्रधानता है।
मूल ‘कथा-सरित्सागर’ ग्रन्थ की रचना ग्यारहवीं शताब्दी में हुई। इसके रचनाकार सोमदेव भट्ट हैं। इस ग्रन्थ में 18 लंबक (खण्ड), 124 तरंग (मुख्य कथाएँ) एवं 22000 श्लोक हैं। इसका भावानुवाद हिन्दी में विष्णु प्रभाकर ने किया है। इस ग्रन्थ में लोककथाएँ, ऐतिहासिक गाथाएँ, पौराणिक वार्ताएँ हैं तथा शिक्षा, नीति, बुद्धिमत्ता, मूर्खता, प्रेम, विरह, त्रिया-चरित्र, भाग्यचक्र आदि से सम्बन्धित रोचक एवं प्रेरक कथाएँ तथा कथाओं के अन्तर्गत उपकथाएँ हैं। इस काल की अधिकतर लघुकथाएँ अन्तर्गुम्फित हैं।
प्राचीन कथाएँ-उपकथाएँ मात्र उदाहरणों, तथ्य-निरूपणों, गूढ़-सूत्रों की व्याख्याओं, किन्हीं विचारों की पुष्टियों हेतु रची गई लगती हैं। फिर वे चाहे महाराज शिवि की कठोर परीक्षा ली जाने से सम्बन्धित हों, या हंस-हंसिनी व उल्लू का न्याय कराने वाली कथा हो। इनमें अलौकिक तत्त्वों का आधिक्य है। यहाँ जीवन को भी एक दर्शन माना गया है। व्यक्ति की आयु-सीमा 100 वर्ष निश्चित कर, सम्पूर्ण जीवन को चार आश्रमों में विभक्त कर उसके चारों आश्रमों के व्यवहारिक पक्षों के क्रिया-कलापों तथा कर्तव्यों आदि को सुनिश्चित दिशा दी गई है। देव-चर्चाओं, धार्मिक-अनुष्ठानों, कर्म-काण्डों, अन्धविश्वासों, आदर्शों आदि के महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है। वैदिक गूढ़-सूत्रों को सरल ढंग से समझाने के लिए उपनिषदों की रचना की गई जिससे जनसामान्य में समाजगत आदर्शों का ह्रास न हो और ऋषि-मुनियों तथा साधु-महात्माओं की जो भूमिका समाज में थी, उसकी तस्वीर भी धुँधली न पड़ सके। ये लघुकथाएँ पौराणिक साहित्य को ही समृद्ध करती हैं। आज की लघुकथाओं पर इनका प्रभाव नगण्य-सा है।’शकुन्तला किरण: हिन्दी लघुकथा
इस बारे में किंचित् स्पष्टीकरण जरूरी है। वीरगाथा काल की गाथाओं के बारे में ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में विजयेन्द्र स्नातक ने लिखा है—‘इस युग केे आख्यानों में लोकतत्व की प्रधानता अनेक स्तरों पर लक्षित की जा सकती है। ...कथा की शैली में रूपक अर्थात् एलेगरी का विन्यास भी ध्यातव्य है।...क्या कारण है कि ये कहानियाँ देश के सुदूरवर्ती कोनों तक समान रूप से फैल गई थीं और सर्वत्र थोड़े-बहुत फेर-बदल के साथ सभी भाषाओं के आख्यानों में पाई जाती हैं।
कथानक रूढ़ियों के सम्बन्ध में भी इन आख्यानों का विशेष महत्व है। कथानक रूढ़ि या अभिप्राय जिसे अंगेजी में मोटिफ़ कहते हैं, लोक-साहित्य के अध्ययन में अनिवार्य तत्व बन चुके हैं। ये कथानक रूढ़ियाँ विविध प्रकार की हैं। पशु, पक्षी, देव, दानव, सरीसृप, वृक्ष, शाप, वरदान, स्वप्न, संकेत या अभिज्ञान, प्राण प्रक्षेपण, सत्य क्रिया, दोहद कामना, अप्सराओं का साक्षात्कार, राजा आदि का निम्न जाति से प्रेम, मनुष्य का गगनचारी होना, मृत व्यक्ति का जीवित होना, जल की खोज में प्रिय वियोग, वन में यक्ष-गन्धार आदि से मिलन, आदि-आदि विविध प्रकार की कथानाक रूढ़ियों के सांकेतिक अर्थ और उनके प्रचलन की परम्परा का सन्धान इस सन्दर्भ में आवश्यक है।...केवल चमत्कार या विस्मय उत्पन्न करना ही इनका ध्येय नहीं है।’
आगामी अंक में जारी………