शनिवार, 14 जनवरी 2017

समकालीन लघुकथा : विभिन्न आयाम-3 / बलराम अग्रवाल




तीसरी किस्त दिनांक 07-01-2017 से आगे…


समकालीन लघुकथा समकालीन व्यक्ति की नियति, सोच-व्यवहार, आशा-निराशा, आह्लाद-रोदन की निकट की साझेदार स्वीकार कर चुकी है। वह निकटतम हमदर्द ऐसे पड़ोसी की तरह है जो दूसरों की धड़कनों, साँसों,  आहों में ही नहीं,   प्रत्येक हारी-बीमारी,   खैर-खुशी में पूर्णतः सहभोक्ता है।
       बिना नाटकीय रचना-विधान के युगीन यथार्थ की छद्मता,   द्वैधता और अंतर्विरोधपूर्ण स्थिति के विविध पक्षों,   रंगों,   रंगतों को उघाड़ सकना सम्भव नहीं। युगीन यथार्थ के बहुरूपीपन के मुखों को खोलने-उतारने के लिए नाटकीय संरचना ही कारगर सिद्ध हो सकती है। इस यथार्थ को कई पक्षों और प्रकारोंमिथकीय,   फंतासी,  उलटबाँसीनुमा रूप में या विद्रूपीकृत करके छेड़ने-कुरेदने,   उधेड़ने,   उलट-पलट करके देखने से ही जाना जा सकता है,   क्योंकि यह आधुनिक यथार्थ ठस्स और ठोस नहीं,  बल्कि गतिशील एवं सतत परिवर्तनीय है। उसे पकड़ने की विधि उसके अनुरूप लोचदार होनी चाहिए। लोच पात्रों,   स्थितियों,   सम्बन्धों,   संवादों के आपसी टकराव या नाटकीय रचाव से लायी जा सकती है,   जिससे स्थितियों के पीछे की स्थितियों,   चेहरों के पीछे छिपे असली चेहरों और आशयों को नग्न रूप से सामने लाया जा सके।
        राजनीति के दबाव की यातना-यात्रा सामान्य से विशेष की ओर बढ़ती है। आज के नेता बिकने और बिकते रहने को ही अपनी राजनीतिक हैसियत और महत्त्व मानने लगे हैं। ऐसे सतहीपन के कारण ही तथा मजदूर वर्ग की अपरिपक्व समझ या सीधेपन के कारण उपयुक्त हड़तालें भी असफल होती रही हैं या करवा दी जाती  हैं। इस समय कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने-आप को पूँजी से दूर होने या रहने का दावा नहीं कर सकती है। मजदूरों के प्रमुख नेताओं को प्रलोभनों या डरों के द्वारा खरीद लिया जाता है। यही राजनीति का,   सत्ता का,   पूँजीवादी व्यवस्था का विकृत रूप है। इन स्थितियों के सटीक चित्रण की दृष्टि से बलराम अग्रवाल की लघुकथा ‘तीसरा पासा’ को उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत किया जा सकता है जिसमें दिखाया गया है कि पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष के बिकाऊ चरित्र के कारण चुनाव-टिकट जुझारू तपनेश बाल्मीकि के बजाय पूँजीपति शरण बाबू को दिए जाने की संस्तुति की जाती है।
              ‘भारतीय परिवेश में समाजवाद की तरह विद्रोह को भी चालू सिक्के की तरह चला-चलाकर अवमूल्यित कर दिया गया है। कायर ही विद्रोही होने का एलान करते हैं। समाज के एक-एक वर्ग में,   राजनीति के एक-एक घटक में,   विद्रोह का अभी भी बोलबाला है,   जहाँ शाब्दिक विद्रोह सम्मानित होने की गांरटी प्रदान करता है। ऐसे विद्रोह सड़क किनारे ही मिलेंगे।’  बलराम अग्रवाल की लघुकथा ‘युद्धखोर मुर्दे’ में ऐसे शाब्दिक और वाचिक विद्रोहियों का चित्राण बखूबी हुआ है।
       सन् 1994 से राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक संघ अध्यक्ष मंडल के सदस्य तथा 1996 तक महासचिव रहे नरेश सक्सेना ने कहा थाबुर्जुआ जीवन-यात्रा के प्रति रंगीन मोह आक्रोश और विद्रोह को नपुंसक बना देता है। उन्हीं के शब्दों में—‘आठवें दशक का लेखक अब तक का ओढ़ा हुआ अभिजातत्व उतारकर फेंक रहा है। वह सही आदमी,   मेहनतकश आदमी,   ज्यादा से ज्यादा आदमियों की लड़ाई में उन्हीं की तरह शामिल हो रहा है और अपने आक्रोश-विद्रोह को यथार्थ रूप दे रहा है।’
        आज स्थिति यह है कि समकालीन लघुकथा में कोई वाद-विशेष,   सैद्धांतिक मत-मतांतर अथवा मठाधीशी-वृत्ति देखने को नहीं मिलती है। समकालीन समस्याएँ और चुनौतियाँ ही समकालीन लघुकथा के विषय हैं। यद्यपि दलित पात्रों,   जनवादी तेवरों,  देह से जुड़े कथानकों,   स्त्राी-पुरुष सम्बन्धों,   राजनीतिक,   पारिवारिक,   शैक्षिक,  मनोवैज्ञानिक,   महानगरीय जीवन के विविध पक्षों आदि अनेक महत्वपूर्ण एवं विचारणीय विषयों को केन्द्र में रखकर लघुकथा-संकलन संपादित किए गए हैं तथापि कहानी की तरह लघुकथा ने अपनी रचनाशीलता को दलित-विमर्श अथवा स्त्री-विमर्श जैसे कुछेक मुद्दों तक ही सीमित भी नहीं रखा है बल्कि यह अपने समय के समस्त सरोकारों को साथ लेकर चल रही है। फिर भी,   विषय-केन्द्रित लघुकथा-संकलनों की उपादेयता को नकारा नहीं जा सकता है। रामकुमार घोटड़ द्वारा सम्पादित ‘दलित जीवन की लघुकथाएँ’,   रूप देवगुण द्वारा सम्पादित ‘भावुक मन की लघुकथाएँ’,   सुकेश साहनी व रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ द्वारा सम्पादित ‘बाल-मनोवैज्ञानिक लघुकथाएँ’,   अशोक जैन द्वारा सम्पादित ‘पारिवारिक जीवन की लघुकथाएँ’,   पारस दासोत द्वारा सम्पादित ‘मेरी किन्नर केन्द्रित लघुकथाएँ’ तथा ‘मेरी स्त्री मनोविज्ञान की लघुकथाएँ’ आदि ऐसे ही उल्लेखनीय प्रयास हैं।
         इतिहास गवाह है कि आठवें-नौवें दशक में पूँजीवादी अर्थ-व्यवस्था का संकट गहरा हुआ और जन-असंतोष तथा जन-आंदोलन भी तेज हुए। फलतः अनेक मोहक और उलझाऊ नारे अर्थहीन हो गए। आर्थिक,   सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर लगातार द्वंद्व गहरा हुआ। फलतः अतीत की व्यवस्था में एक बदलाव परिलक्षित हुआ और एक छद्म संस्कृति भी विकसित हुई।
                  1971 में मानव-चरण चन्द्रमा के धरातल को नाप चुके थे। प्रगतिशील लेखन अपने चरम पर था। आम आदमी की आकांक्षाएँ हताशाजनक परिस्थितियों के बावजूद भी नए शिखरों की ओर गतिशील थीं। माना जाना चाहिए कि हिन्दी लघुकथा आन्दोलन ने अपने जन्म से ही प्रगतिशील तेवरों को अपने भीतर पाया है। वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि उसका स्वभाव है। इन्हीं सब कारणों के चलते अति आवश्यक है कि लघुकथा के आधारभूत गुणों का अध्ययन हम वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में करें। अपने समय से जुड़ने,   जुड़े रहने और उसे कथात्मक अभिव्यक्ति देते रहने के अपने दायित्व को समकालीन लघुकथाकार और लघुकथा-चिंतक किस त्वरण के साथ महसूस करते हैं,  इसे दर्शाने के लिए मधुदीप का यह वक्तव्य उल्लेखनीय है कि—‘सामाजिक परिवर्तन एवं साहित्यिक-सांस्कृतिक चेतना के विकास में लघुकथा एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। आज जबकि कहानी और उपन्यास अपने शिल्प,   शैली और भाषा की दुरूहता के कारण आम पाठक से कटते जा रहे हैं, वहाँ इस खाई को पाटने के लिए लघुकथा महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।’ और कृष्णानन्द कृष्ण का यह कि—‘आज आदमी जिस व्यवस्था में जी रहा है,   उस व्यवस्था ने कई स्तरों पर आदमी को खंडित किया है। और वह खंड-खंड जीने केा अभिशप्त हुआ है। इन्हीं खंडित और जटिल क्षणों को तेजाबी तेवर के साथ प्रस्तुत करती हैं आज की लघुकथाएँ। आज की लघुकथाएँ प्राचीन काल की लघुकथाओं की तरह न सिर्फ उपदेशात्मक और बोधात्मक कथाएँ हैं,   बल्कि आज के जीवन के तमाम पक्षों को व्यापक परिदृश्य पर नये तेवर और पैनेपन के साथ अभिव्यक्त करने में सक्रिय है।’
          अमरीकी आलोचक मोना लिसा सफई ने इसकी प्रशंसा इन शब्दों में की है—‘यह विधा पाठक को बाँधे रखती है और साहित्य-जगत को उद्वेलित करती है क्योंकि इन कथाओं में विविधता है और ये मानवीय सरोकारों के अत्यन्त निकट हैं। प्रत्येक रचना को पढ़ने के लिए कुछ ही मिनट का समय चाहिए। इसकी लोकप्रियता और इंटरनेट के माध्यम से बनी इसकी पहुँच ने इसे न केवल व्यापक पाठक-वर्ग बल्कि नये,   प्रबुद्ध लेखक भी प्रदान किए हैं।’
                  ‘लघुकथा’ को न केवल नयी पीढ़ी के कथाकारों की कलम की धार मिली है,   बल्कि पूर्व पीढ़ी के कथाकारों ने भी इसे समकालीन कथा-विधा के परिप्रेक्ष्य में ही अपनाया है। ‘अक्षर की आरसी’ नामक अपनी साहित्य-वार्षिकी (1995-96) में प्रकाशित रचनाओं को ‘इंडिया टुडे’ ने ‘समय के सत्य को उद्घाटित करता समकालीन लेखन’ माना है। इसमें रेखांकन योग्य बात यह तो है ही कि इसमें ‘प्रतिकार’,   आत्महत्या’,  मुक्ति’,   पकड़ से बाहर एक क्षण’ तथा ‘माँ की कमर’ शीर्षक से पाँच लघुकथाओं को भी स्थान दिया गया है,   यह भी है कि इन लघुकथाओं के लेखक वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र यादव हैं। इन रचनाओं के माध्यम से प्रकारान्तर से ‘समकालीन लघुकथा’ को ‘जुगनू यानी रोशनी के बीज’  कहा गया है।

समकालीन लघुकथा: विस्तृत फलक
विषय की एकता एवं प्रभावान्विति (यूनिटी आफ इम्प्रेशन) लघुकथा की ऐसी विशेषता है जिसे अक्सर उसकी कमजोरी बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। कहा जाता है कि ‘लघुकथा में आसपास के परिवेश का चित्रण नहीं हो सकता’ या ‘लघुकथा में चरित्र के व्यापक चित्राण की गुंजाइश नहीं होती है’ या ‘लघुकथा में मनोभावों का विस्तृत चित्रण असम्भव है’ आदि-आदि। लघुकथा के परिप्रेक्ष्य में,   ये या इस तरह के सभी वक्तव्य गलत हैं। वास्तविकता यह है कि लघुकथा में ‘यूनिटी आफ इम्प्रेशन’ को बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि बहुत-सी अवांछनीय चेष्टाएँ इस रचना-विधा में न की जायँ। उदाहरण के लिए,   आसपास के परिवेश के चित्रण को लें; आलंकारिक योजना की प्रस्तुति के माध्यम से कहानी के आकार को यथासंभव प्रभावी बनाने की दृष्टि से आचार्यों ने इसका प्रतिपादन किया होगा। परन्तु इस शास्त्रीय गुर का प्रयोग अनेक कहानीकार रचना को बोझिल बना डालने की हद तक करके उसकी हत्या कर डालते हैं।  ‘यूनिटी आफ इम्प्रेशन’ की बदौलत लघुकथा में परिवेश का आभास भर ही पाठक को उसके समूचेपन में उतार देता है। यही बात लघुकथा में पात्रों के  व्यापक चरित्र-चित्रण तथा मनोभावों के विस्तृत चित्रण के संदर्भ में भी न्यायसंगत है।
शेष आगामी अंक में…

शनिवार, 7 जनवरी 2017

समकालीन लघुकथा : विभिन्न आयाम-2 / बलराम अग्रवाल


दूसरी किस्त दिनांक 01-01-2017 से आगे…

आवरण : के॰ रवीन्द्र
प्रेमशंकर का मत है कि ‘समकालीनता को लेकर बहस हो सकती है,   पर एक समय-विशेष की धड़कन रचना में प्रक्षेपित होती है,   और इस दृष्टि से हर युग की अपनी एक ऐसी समकालीनता होती है,   जिसे हम सार्थक रचनाओं में तलाशते हैं।’ इसका अर्थ यह हुआ कि रचना की सार्थकता उसकी ‘समकालीनता’ में है। निष्कर्षतः वीरेन्द्र मोहन के शब्दों में कहा जा सकता है—‘समकालीनता एक समय-सापेक्ष गतिशील प्रक्रिया है।’
समकालीनता और लघुकथा
तत्वतः भिन्न होते हुए भी ‘आधुनिक’,   समसामयिक’ और ‘समकालीन’ शब्दों का प्रयोग साहित्यिक क्षेत्रों में एक ही तात्पर्यसमकालीन से किया जाता है। जहाँ तक लघुकथा का प्रश्न है,   इस विधा की समकालीनता के परिप्रेक्ष्य में जगदीश कश्यप का प्रस्तुत कथन अत्यधिक महत्व रखता है— ‘सर्वप्रथम बलराम अग्रवाल ने ही आधुनिक लघुकथा की अवधारणा पर बहस की।’ पृष्ठभूमि: लघुकथा अंक,   7-21 नवम्बर 1981
यद्यपि अपने इस सन्दर्भित लेख में प्रकारान्तर से जगदीश कश्यप ‘आधुनिक लघुकथा’ की मूल प्रकृति एवं उसके रूप,   आकार पर बात करते हुए काफी भटक गए हैं और उन्होंने ‘कहानी’ के लघु-कलेवर वाली कथा-रचना को ‘आधुनिक लघुकथा’ मानने की गलती कर डाली है,   तथापि इससे यह तो पता चलता ही है कि ‘लघुकथा’ में ‘आधुनिक’ पर चर्चा किस बिंदु से प्रारम्भ हुई।
रामकृष्ण विकलेश कहते हैं— ‘समकालीन लघुकथा की विशेषता यह है कि वह उपदेश देने की अपेक्षा जीवन की सच्चाईयों से सीधा साक्षात्कार कराती है। वह किसी समस्या का समाधान प्रस्तुत करने की बजाय बिच्छू के डंक की तरह कटु यथार्थ का अनुभव कराती है।’
समकालीन’ शब्द विशेषण है और ‘समकालीनता’ भावबोधक संज्ञा। ‘समकालीन’ को साहित्य की सभी विधाओं के साथ प्रयुक्त किया गया है,   जैसे समकालीन उपन्यास,  समकालीन कहानी,  समकालीन निबन्ध आदि। ‘समकालिकता’ के भावबोध के आविर्भाव के पीछे कुछ प्रमुख बिन्दु रहे हैं। यह धीरे-धीरे ही विकसित हुआ है। यह प्रमुख बिन्दु उस कालविशेष की देन थे; जिनमें धर्म,   संस्कृति,   अर्थ,   तन्त्र का विकृत रूप या आर्थिक संतुलन,   भ्रष्ट-व्यवस्था,   सत्ता की असफलता और असामाजिक तत्त्व आदि कुछ ऐसे तीखे अनुभव थे,   जिसने समकालीन-बोध को जन्म दिया।
अतः समकालीनता एक बोध है। इसी तरह हिन्दी लघुकथा का ‘समकालीन हिंदी लघुकथा’ के रूप में उन्नयन का काल सन् 1951 के आसपास से परिलक्षित होने लगता है; लेकिन सतत विकास की धारा बनने में उसको सन् 1971 तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। ऐसा मानने के एक नहीं अनेक राजनीतिक व सामयिक कारण हैं।
'सारिका' पिछले कुछ वर्षों से विशिष्ट वैचारिक दिशा और दृष्टि की लघुकथाएँ प्रकाशित करती रही है। उन मौलिक लघुकथाओं ने अपने पूरे आवेग और आवेश के साथ आज के समाज और आज की जिन्दगी में व्याप्त छल को उघाड़ा है। कुछ लघुकथाएँ चाहे पंचतन्त्र के आधार पर रही हों,   चाहे पौराणिक,   फन्तासी,   बेताल कथा,   परी कथा या किस्सा तोता-मैना के आधार पर; लेकिन उनका भी प्रस्तुतीकरण और संदर्भ शुद्ध रूप से आधुनिक ही रहा है। इस बार उन्हीं आधुनिक संदर्भों के क्रम की मौलिक लघुकथाओं का एक विशिष्ट खण्ड यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। ये लघुकथाएँ आज की समस्याओं,   मान्यताओं,   राजनीतिक और सामाजिक विसंगतियों आदि पर तीखे व्यंग्य प्रहारों के साथ ही नयी वैचारिकता और नयी मानसिकता की ओर इंगित करती हैं। साथ ही पाठकों और कथा-मनीषियों के सामने कुछ प्रश्नचिह्न भी खड़े करती हैंक्या देशव्यापी विषाद से आज का जन-सामान्य निजात पा सकेगा? क्या इन विसंगतियों की कोई सीमा है? सामाजिक न्याय की आड़ में व्यवस्थागत अत्याचारों की यह त्रासदी आदमी को कहाँ पहुँचाएगी? ये लघुकथाएँ इससे ज्यादा भी कुछ और कहती हैं। सारिका : जुलाई 1973
सारिका’ के इस अंक की लघुकथाओं के बारे में पाठकीय प्रतिक्रियाओं से भी इस कथा-विधा के समकालीन सरोकारों की पुष्टि होती है क्योंकि प्रकाशित लघुकथाओं को लगभग सभी पाठकों ने अपने समय की चिन्ताओं से जुड़ा आकलित किया है। उदाहरणार्थ— (अ) ‘अधिकांश कथाओं में राजनीतिक छल-छंद,   सामाजिक विसंगतियों एवं शासन-तन्त्र की विफलता के विरुद्ध तीव्र आक्रोश व्यक्त किया गया है। इन रचनाओं ने वर्तमान समाज का एक्स-रे करके उसका कंकाल हमारे सामने खड़ा कर दिया है। लगता है सम्पूर्ण जन-मानस वर्तमान व्यवस्था से एकदम क्षुब्ध हो उठा है। कथाओं में निहित व्यंग्य-बाण विद्रूपताओं पर गंभीर चोट करते हैं। ऐसी यथार्थवादी रचनाओं की सम्प्रति बड़ी जरूरत है।’ (आ) वास्तव में आज का राजनीतिक वातावरण एक ऐसा चिकना घड़ा बन गया है,   जिसमें व्यंग्य,   संवेदना और तिरस्कार का जल फिसलकर अनजानी भूमि में खो जाता है। लघुकथाओं से भरा यह अंक आज के भ्रष्टाचारी नेताओं के लिए चाँटे ही नहीं मुक्कों की मार देता है। (इ) लघुकथा का अपना अलग ही महत्व है और विशेषकर आज की विशेष परिस्थितियों में। लघुकथा के नाम पर चुटकुले नहीं लिखे जा सकते। लघुकथा की अपनी परिधि,   अपना प्रभाव है।
इस अंक में प्रस्तुत लघुकथाओं ने खोखले समाजवाद,   चुनाव के समय के भ्रष्टाचार और अनैतिक आचरण,   मंत्रियों के झूठे वायदों,   उनकी कुर्सी के मोह,   वर्तमान शासन व्यवस्था पर व्यंग्य किये हैं। इन लघुकथाओं में वह सभी कुछ मिल गया जो लम्बी कहानियों में मिलता। इन कथाओं ने सत्ता की खोखली व कोरी नीतियों का बड़ी दृढ़ता के साथ भण्डाफोड़ किया है,   तथा साथ ही जनता को इस बात के लिए सावधान किया है कि अब वह जल्दी ही किसी नेता के खोखले नारों में आकर जल्दबाजी में कोई निर्णय न ले; क्योंकि इसका उसको अच्छी तरह से फल मिल गया है। ‘गरीबी हटाओ’ का नारा देकर सर्वहारा जनसमुदाय को थ्री-नाॅट-थ्री के कारतूसों की आग से ठगने वाले सत्ता प्रतिष्ठान के द्वारा पैदा किए गए राष्ट्रीय संकट को विभिन्न संदर्भों में परिपक्वता के साथ ये लघुकथाएँ उभारती हैं।... ये लघुकथाएँ पाठकों के अन्तर्मन के झटके के साथ कथात्मक रिद्म से अभिभूत करती हैं।  लघुकथा क्योंकि अपने समय के बोध को साथ लेकर चलना शुरू हुई अतः उसे ‘समकालीन’ विशेषण प्रदान करना हर प्रकार से तर्क संगत प्रतीत होता है।
समकालीनता में यथार्थ-बोध प्रमुख रहता है,   यही यथार्थ-बोध लघुकथा में ‘कथ्य’ बनकर उभरता है,   कथा और कथाकार दोनों गौण रह जाते हैं। समकालीनता वस्तुतः एक ऐसी मानसिकता है जो नये जीवन-संदर्भों को उनके नये आयामों में जीवंत रूप से प्रस्तुत करती है। ये जीवन-संदर्भ जीवन को अर्थवत्ता प्रदान करते हैं। एक नई दृष्टि,  नई राह और नई धारणाएँ मिलती और बनती हैं,   जो जीवन का मार्ग-दर्शन करने में सक्षम होती हैं। लघुकथा छोटे आकार की वह कथा-केन्द्रित गद्य-विधा है, जिसमें समझ और अनुभव की सम्भवतः सर्वाधिक संश्लिष्ट अभिव्यक्ति सम्भव है। संभवतः इसी गुण के कारण कहा गया है कि लघुकथा एक प्रयोगधर्मी विधा ही है। और शायद प्रयोगधर्मिता ही वह कारक है जिसके चलते ‘लघुकथा में सामयिक सार्थकता ‘वस्तु’ के दवाबों से निर्मित होती है। ‘वस्तु’ का स्वभाव ही इस सार्थकता का निर्माता है। यदि सायास किसी सार्थकता का आयात किया जाता है तो लघुकथा एक कृत्रिम, अस्वाभाविक, बनावट भर रह जाती है। कथाकारों से ऐसी अपेक्षा रखना सर्जनात्मकता का अवमूल्यन होगा।’ रचनाकार वार्षिकी,   1990 
लघुकथा वस्तुतः सामयिक विसंगतियों पर एक सार्थक टिप्पणी है जो संवेदना और विचार दोनों ही स्तर पर पाठक को स्पर्श करती है।
विषय की दृष्टि से लघुकथा में एक बहुत बड़ी दुनिया विद्यमान है जो न हिन्दी उपन्यास के पास है,   न हिन्दी कहानी के पास है। यह दुनिया इतनी बड़ी है और इतनी व्यापक है कि कई बार लघुकथा की दृष्टि की प्रशंसा करनी पड़ती है कि उसने मानव-जीवन की इतनी सच्ची पकड़ की है। कमल किशोर गोयनका: लघुकथा का समय समकालीन लघुकथा सामाजिक,   राजनीतिक दबावों,   टकरावों,   मूल्यविहीनता और विसंगतियों से गुजरती है,   इसलिए उसका रवैया और मुख्य सरोकार वैचारिक हो गया है। ‘समकालीन स्थितियों-संबंधों-दशाओं को उजागर करने के बर्तावों में अधिकांशतः प्रतीक कथाओं-कथनों-संकेतों के व्यवहार में अभिव्यक्त करने के रुझान मिलते हैं।’
जीवन के साथ उसकी तादात्म्यता एवं एकात्मता इस हद तक बढ़ गई है कि अब साहित्य की ‘शाश्वतता’ की मिथ पीछे छूट गई है और समसामयिक स्थितियों का प्रामाणिक दस्तावेज बनना व्यक्ति को अधिक प्रेय हो उठा है। स्वातन्त्रयोत्तर काल में,  हम कह सकते हैं कि सातवें दशक की समाप्ति और आठवें दशक के शुरू होते-होते भारतीय जन-मानस अपेक्षाकृत अधिक परिपक्व हो आया, क्योंकि समय की मार ने उसकी भावुकता, ढुलमुलपन और निष्क्रियता को कुचलकर रख दिया। दिशाहीनता सर्वात्मनिषेध,   आत्मदया की स्थितियों से उबरकर सही दिशा की ओर बढ़ने,   मानवीय पक्षधरता,   स्थितियों के प्रति विवेकसम्मत रवैया,   स्थितियों का विश्लेषण करने में वैचारिक मानसिकता और सक्रियता के आयाम उसके सामने खुले। ऐसे उद्वेलनकारी काल में घटना के पीछे के कारणों,   नीतियों के पीछे के आशयों,   आश्वासनों के पीछे छिपे धोखों और चालबाजियों का विवेक जाग्रत करने का कार्य ‘समकालीन लघुकथा’ ने अपने जिम्मे लिया।
समकालीन लघुकथा में ‘कोरी भावुकता’ और ‘आदर्शवादिता’ के स्थान पर ‘प्रासंगिकता’ और खुरदुरे यथार्थ की धारणाएँ सामने आयीं। वर्तमान संदर्भों,   दबावों,   तकाज़ों को वरीयता देती आठवें दशक की लघुकथा इन्हीं बाह्य तत्वों की गुणात्मक परिणति के फलस्वरूप एक विशिष्ट चेतना के रूप में उभर आयी है। इस चेतना को अर्जित कर वह अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब रही है। वर्तमान अनुभव,   भाषा और संस्कार का अतिक्रमण कर वह जिन चेतनागत मूल्यों को विकसित कर पायी है,   उन्हीं के आधार पर समकालीन लघुकथा-लेखक पूर्व लघुकथा-लेखकों से पृथक अपनी विशिष्ट पहचान बना सकने में कामयाब हो सके।
समकालीनता (समसामयिकता) के संदर्भ में आज के इतिहास पर दृष्टि डालने वाले से यह छुपा नहीं कि स्वातंत्र्योत्तर युगीन भ्रष्ट एवं निहित स्वार्थों से प्रेरित राजनीति इन सामाजिक मानवीय संबंधों में भी दरारें डाल देती है,   उन्हें आक्रांत कर कुरूप बनाती एवं तोड़ती है।’
                                                                                                                   शेष आगामी अंक में…