बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

लघुकथा : परम्परा और विकास-2 / बलराम अग्रवाल



पहला अध्याय

 
दूसरी किस्त (दिनांक 3-10-2016 से आगे)
आवरण:के. रवीन्द्र
लघुकथा की इस यात्रा में अचानक हम सातवें दशक के उत्तरार्द्ध से नौवें दशक के अन्त तक एक लेखकीय बाढ़ आई पाते हैं और इसी के साथ आरम्भ होता हैलघुकथा लेखन में चुनौतियों का एक सिलसिला। आठवें दशक के उत्तरार्द्ध तक आते-आते जो लोग अन्य विधाओं के साथ-साथ इस विधा को भी पकड़े हुए सक्रिय थे, उनकी परम्परा को आगे बढ़ाने में तत्कालीन नयी पीढ़ी के कुछ लोगों के द्वारा महत्त्वपूर्ण योगदान किया गया।
कथा साहित्य की अन्य विधाओं के आकार की तुलना में लघुकथाएँ छोटी होने के कारण अधिक रुचिकर हो रही हैं। इस मशीनी सभ्यता में, लोगों के पास वक्त के लाले पड़ रहे हैं, आदमी खुद नट-बोल्ट होकर घिस रहा हैकहाँ किसको फुर्सत है कि मोटे-मोटे आख्यान पढ़े। आदमी का पूरा परिवेश चाहने लगा है ‘समरी’ स्वरूप कुछ पढ़ना, छना हुआ सत्व। जाहिर है लघुकथाएँ साहित्य की इतर विधाओं की तुलना में अधिक धारदारी से काम कर सकती हैं, बशर्ते कथानक प्रभावी हो और अन्दर तक टीप जाए। शैली भी अपने प्रवाह में हो जो एक झटके से अपनी सार्थकता रेखांकित कर जाए।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डा. जे. पी. श्रीवास्तव ने अपने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में हिन्दी गद्य की अन्य नवीन विधाओं के तहत संभवतः सर्वप्रथम लघुकथाओं पर मुख्तसर चर्चा की है।
लघुकथा की लोकप्रियता के अनेक कारणों में एक यह भी है कि ‘आज के इस मशीनी युग में जब कि हर वस्तु तीव्रगति से भाग रही है सभी लोग पेट और समय के इशारे पर नृत्य कर रहे हैं, लघुकथा ही वह विधा है जो उनकी व्यस्तताओं के बीच भी दो मिनट समय चुरा ही लेती है।...यह वह विधा है जो वक्त छीनकर पाठक पैदा करती है क्योंकि शीघ्र पढ़ी जाने और झटका देने का गुण तो इसमें है ही है, जो उन्हें विवश करता है।’
हिन्दी में लघुकथा की आमद का आकलन जगदीश कश्यप ने यों किया है—‘खलील जिब्रान की लघुकथात्मक पुस्तक ‘दि मैडमैन’ जब ‘पागल’ शीर्षक से हिन्दी में अनुवाद होकर आई तो स्व. सुदर्शन जो प्रसिद्ध कहानीकार थे, ने उसी आधार पर ‘झरोखे’ संग्रह निकाला जो खलील जिब्रान की रचनाओं से शत-प्रतिशत प्रभावित था। ऐसी रचनाओं से प्रभावित होकर उपेन्द्रनाथ अश्क ने तीसरे दशक में ऐसी गद्य रचनाएँ लिखीं जो आज लघुकथा के नाम से पुकारी जाती हैं और ये रचनाएँ आज की पीढ़ी के लिये बिल्कुल ताजी हैं। इसी परिपाटी को कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने ‘आकाश के तारे: धरती के फूल’, आनन्द मोहन अवस्थी ने ‘बन्धनों की रक्षा’ नामक लघुकथा संग्रह में आगे बढ़ाया।’
मैं समझता हूँ कि ‘लघुकथा’ कही जाने वाली उपेन्द्रनाथ अश्क की रचनाएँ नयी पीढ़ी के लिए कभी भी ताजी नहीं रहीं। हिन्दी के लघुकथा-पाठक पर उन्होंने कभी भी उल्लेखनीय प्रभाव नहीं डाला।
कुछ लोग लघुकथा के लिए व्यंग्य को अनिवार्य मानते हैं और उसके बिना उस रचना को लघुकथा नहीं मानते।...दरअसल यह व्यंग्य की स्थिति ‘सारिका’ द्वारा प्रकाशित अनेक लघुकथा विशेषांक (लघुकथा बहुल खण्डों को) छोटे-छोटे अन्तराल में प्रकाशित करते रहने के कारण आई। उस समय देश की राजनीति अस्थिरता के दौर में प्रवेश कर चुकी थी। राजनीति के मापदंड छितरा रहे थे। आर्थिक और राजनैतिक संकट के बादल गहरा रहे थे। आम जनता में आक्रोश और बेचैनी फैली हुई थी। इन्हीं विसंगतियों को लघुकथा के माध्यम से ‘सारिका’ सम्पादक ने कुछेक पैरोडीकारों के माध्यम से प्रस्तुत करते थे। ज्यादातर रचनाएँ ऐसी छापी जाती थीं जिनमें तीखा व्यंग्य होता था। नतीजा यह हुआ कि अनेक लोगों ने समझा, लघुकथा में व्यंग्य का होना अति आवश्यक है।
अमर गोस्वामी के अनुसार—‘लघुकथा आज के युग की महती आवश्यकता हो सकती है। जब जीवन ज्यादा व्यस्त-विकट, कर्मसंकुल, नाना प्रकार के घात-प्रतिघातों से आहत-प्रत्याहत, नाना प्रकार के प्रहारों से क्षत-विक्षत, क्लांत-विपन्न होता जा रहा है। नाना प्रकार की दौड़-धूप, भागम-भाग, आपाधापी, कशमकश व जद्दोजहद से जीर्ण-शीर्ण, उद्विग्न-खिन्न होता जा रहा है तब हम लघुकथाओं के माध्यम से उस जीवन-मरू को नखलिस्तान प्रदान कर सकते हैं, जीवन के नैराश्य निशीथ में आशा के दीप व आस्था के सन्दीप जला सकते हैं। भ्रम-भ्रान्ति के घनघोर जंगल में चाँदनी खिला सकते हैं, दिशाहीनता के आकाश में ध्रुवतारा दिखा सकते हैं, जीवन के श्मशान में संजीवनी ला सकते हैं, लघुकथाओं के माध्यम से तंत्रों-मंत्रों-यंत्रों की रचना कर जीवन को भूत-प्रेत-पिशाचों से यानी संपूर्ण प्रेतबाधा से मुक्ति दिला सकते हैं। लघुकथाओं के माध्यम से कीटाणुनाशकों का निर्माण कर जीवन को कीटाणुओं से मुक्ति दिला सकते हैं, लड़खड़ाते जीवन को लघुकथा का टाॅनिक पिला उसे सरपट दौड़ा सकते हैं।’
लघुकथा के उन्मेष के पीछे भागम-भाग की जिंदगी को कारण मानने वालों के समक्ष यह तर्क हमेशा ही अपना सिर उठाए खड़ा रहेगा कि ‘क्या वास्तव में आज पाठकों के पास समय की इतनी कमी है कि बड़ी रचनाओं के लिए गुंजाइश नहीं रखी गयी है? अगर ऐसा होता तो आज जो विपुल आकार के ग्रन्थ निकल रहे हैं, कई खंडों के उपन्यास प्रकाशित हो रहे हैं, उनका प्रकाशन ठप हो गया होता।’
लेकिन यह एक सचाई है कि ‘राजनीतिक, सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक सभी क्षेत्रों की जटिलताओं के चक्रव्यूह में व्यक्ति फँसता चला गया, किन्तु उसकी जिजीविषा उसे इन संघर्षों से जूझ सकने का बल एवं साहस देती रही और जीवन ‘जैसा भी है’ उसे जीने के लिए उसका मोह उसे बाध्य करता रहा, क्योंकि साहित्य के रूप, जीवन को समझने के भिन्न-भिन्न माध्यम हैं। अज्ञेय के अनुसार, ‘जीवन से जो मिलता है, उसको दूसरों तक पहुँचाना साहित्यिक कर्म है। जो दूसरे तक पहुँचता नहीं, सिर्फ अपने को अभिव्यक्त करता है, मैं उसको साहित्य नहीं मानता। दूसरा नहीं है, तो साहित्य नहीं है। साहित्य में दूसरों तक पहुँचने की तड़पन होती चाहिए।’
अतः जीवन-यात्रा में हुए विविध अनुभवों के अन्तर्गत बाह्य एवं आन्तरिक संघर्षों के क्षणों को वाणी देने के लिए अभिव्यक्तिकरण की दिशा में अपने भटकाव के मध्य एक रास्ता पा लेने की छटपटाहट ने नई पीढ़ी को उपन्यासों-कहानियों की भीड़ से निकालकर खुले मैदान में ला खड़ा किया, जहाँ वह घुटन से मुक्त हो खुली साँस ले सके, यथार्थ के आलोक में सही दिशा ज्ञात कर उस ओर नया चरण रख सके; और इस यात्रा में उसे सर्वप्रथम आवश्यकता हुईअभिव्यक्ति के किसी ऐसे माध्यम की, जो उसके खण्ड-खण्ड जीवन की जटिलताओं एवं संघर्षों के बीच गुजरती सूक्ष्मतर संवेददनाओं को व्यक्त करने में समर्थ हो सके, जो हर गलत व्यवस्था पर प्रहार करने एवं नए सार्थक-मूल्यों के लिए भूमि तैयार कर सकने में उसका सहायक हो सके तथा सामाजिक परिवर्तन हेतु क्रान्तिकारी भूमिका निभाने में सक्षम हो। इसके लिए नई भावभूमि, भिन्न शिल्प की खोज अपेक्षित थी।’ इसी खोज का परिणाम रहीपरम्परा से प्राप्त लघुकथा की काया, जिसमें प्रवेश कर समकालीन कथाकार ने उसे ‘आज’ से जोड़ दिया।’
मेरी प्रिय कहानियाँ’ की भूमिका-स्वरूप ‘प्रतिवेदन’ में अज्ञेय जी द्वारा मार्च 1975 में लिखित ये पंक्तियाँ देखें—‘‘बिना कहानी की सम्यक परिभाषा के कहा जा सकता है कि कहानी एक क्षण का चित्रा प्रस्तुत करती है। क्षण का अर्थ आप चाहे एक छोटा कालखण्ड लगा लें, चाहे एक अल्पकालिक स्थिति, एक घटना, डायलाग, एक मनोदशा, एक दृष्टि, एक (बाह्य या आभ्यन्तर) झाँकी, संत्रास, तनाव, प्रतिक्रिया, प्रक्रिया...इसी प्रकार चित्रा का अर्थ आप वर्णन, निरूपण, संकेतन, सम्पुंजन, रेखांकित, अभिव्यंजन, रंजन, प्रतीकन, द्योतन, आलोकन, जो चाहें लगा लेंया इनके जो भी जोड़-मेल। बल्कि और भी महीन-मुंशी तबीयत के हों तो ‘प्रस्तुत करना’ को लेकर भी काफी छानबीन कर सकते हैं। इस सबके लिए न अटक कर कहूँ कि कहानी क्षण का चित्रा है और क्षण क्या है, इसी की हमारी पहचान निरन्तर गड़बड़ा रही है या संदिग्ध होती जा रही है।’’ और इसी के साथ नयी कहानी के उन्नायकों में से एक, कथाकार-आलोचक-संपादक राजेन्द्र यादव की यह टिप्पणी भी पढ़ें—‘सड़े आदर्शों और विघटित मूल्यों की दुर्गंधि से भागने की छटपटाहट बौद्धिक मुक्ति का प्रारंभ थी। वैयक्तिकता की खोज और प्रामाणिक अनुभूतियों का चित्राण, आरोपित लक्ष्यों, नकली परिवेश और हवाईपने से ऊबा हुआ कथाकार अपने और अपने परिवेश के प्रति ईमानदार रहना चाहता है इसलिए उसने अनदेखे अतीत और अनभोगे भविष्य से नाता तोड़कर अपने को ‘यहाँ और इसी क्षण’ पर केन्द्रित कर दिया, उसका अपना ‘यही क्षण’, जो उसका कथ्य है, तथ्य है और उसका अपना जीवन-मूल्य है।’ इन दोनों में ही वक्तव्यों में कहानी के परम्परागत कथ्य, रूप-स्वरूप, प्रस्तुति और परिभाषा में बदलाव के स्पष्ट संकेत हैं; और इस तरह के संकेत उस काल के लगभग हर कहानी-विचारक के वक्तव्य में देखने को मिलते हैं। यह अनायास नहीं था कि जिस काल में अज्ञेय, राजेन्द्र यादव और उनकी समूची कथा-पीढ़ी ‘यहाँ और इसी क्षण’ पर केन्द्रित ‘एक क्षण के चित्रा’ को कहानी कह रही थी, नई पीढ़ी के कतिपय कथाकार उसी ‘एक क्षण के चित्रा’ को निहायत ईमानदारी, श्रम और कथात्मक बुद्धिमत्ता के साथ लघुकथा के रूप में प्रस्तुत करने का कौशल दिखा रहे थे। कहानी के कभी इस तो कभी उस आन्दोलन में दशकों तक पलटिया मारकर थक चुकी तत्कालीन कथा-पीढ़ी उसके परम्परागत स्वरूप के बारे में अपनी आभ्यन्तर अस्वीकृति को वक्तव्यों से आगे यदा-कदा ही कथात्मक अभिव्यक्ति दे पा रही थी (‘अपने पार’ और ‘हनीमून’राजेन्द्र यादव) और टाप-आर्डर आलोचकों की अस्वीकृति व उदासीनता से आहत हो उस दिशा में सार्थकतः आगे नहीं बढ़ पा रही थी। (सन्दर्भतः देखें—‘वस्तुतः नई कहानी के बाद समकालीन कहानी को गंभीरता से समझने में आलोचना ने अधिक दिलचस्पी नहीं ली। विजय मोहन सिंह भी कुछ ही आगे बढ़ पाए।’ वीरेन्द्र मोहन, समकालीन कहानीः परम्परा और परिवर्तन)
समकालीन भारतीय साहित्य’ के दिसम्बर 2013 विशेषांक में सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी का एक साक्षात्कार प्रकाशित हुआ है। उसमें एक स्थान पर वह कहते हैं...कहानी के केन्द्र में कोई एक बात ही होनी चाहिए। ...कथानक में बिखराव से कहानी की कला भी नष्ट होती है। अज्ञेय और राजेन्द्र यादव के बाद डॉ. त्रिपाठी तीसरे व्यक्ति हैं जिन्होंने ‘कहानी के केन्द्र में कोई एक बात’ होने की बात कही है।  हमारा मानना है कि डॉ. त्रिपाठी का यह आकलन बहुत लेट, कहानी की सूरत बिगड़ जाना शुरू होने के 45-50 साल बाद आया है। कहानी की दुर्दशा को देखकर सही समय पर यह आकलन सबसे पहले अज्ञेय ने दिया था, जो कि ऊपर उद्धृत है। ‘हिन्दी चेतना’ के कथा-आलोचना विशेषांक, अक्टूबर-दिसम्बर 2014 में लगभग इसी बात को असगर वजाहत ने यों कहा है—”...इधर हिन्दी में कहानी किस्म के उपन्यास आने लगे हैं। लगता है, बेचारी कहानी को पीट-पीटकर उपन्यास बना दिया गया है।...“  असगर साहब ने यह बात उपन्यास के सन्दर्भ में कही है; जब कि एकदम यही बात सातवें-आठवें दशक में छप रही कहानी पर भी लगभग ज्यों की त्यों लागू होती थी। साफ नजर आता था कि  केवल लम्बाई बढ़ाने की नीयत से छोटी-सी एक बात को कला के नाम पर जबरन खींच-तानकर कहानी बनाने का करिश्मा किया गया है। कथा-प्रस्तुति के साथ इस जबरन खींच-तान के विरोध का नाम ही ‘समकालीन लघुकथा’ है।
लघुकथा से जुड़े कथाकारों ने ऐसी प्रत्येक अस्वीकृति और उदासीनता का सामना बेहद धैर्यशीलता के साथ रचनात्मकता से जुड़े रहकर किया और विधा को सँवारने, सर्वमान्य-सम्मान्य बनाने व पूर्व पीढ़ी को इस धारा से जोड़े रखने में सफल रहे। इस सन्दर्भ में विशेष उल्लेखनीय यह भी है कि लघुकथा को उच्च-स्तर पर प्रसारित करने का श्रेय, हिन्दी कहानी के कथ्यों को प्रेमचंदपरक कथ्यों से आगे सरकाने की साहसपूर्ण, सक्रिय और सकारात्मक पहल करने वाले कथाकारों में से एककमलेश्वर को जाता है। कहानी के जड़-फार्म को तोड़ने की आवश्यकता का आभास कराने की पहल करते हुए ‘सारिका’ के कई अंकों को उन्होंने लघुकथा-बहुल अंक के रूप में प्रकाशित किया। यह एकदम अलग बात है कि कुछेक रचनाओं को छोड़कर अधिकांशतः उनकी वह पहल व्यंग्यपरकता के नाम पर छिछली चुटकुलेबाजी में ही उलझी रही। निःसन्देह यह भी लघुकथा से गम्भीरतापूर्वक जुड़े तत्कालीन कथाकारों का ही बूता था कि हास्यास्पद लघुकथाएँ लिखकर ‘सारिका’ में छपने के मोह में वे नहीं फँसे और गम्भीर लेखन से नहीं डिगे।
राजेन्द्र यादव लघुकथा को कहानी का ‘बीज’ बताते हैं। अब, ‘बीज’ को अगर स्थूल अर्थ में ग्रहण करें तो इसे नासमझी ही माना जाएगा; क्योंकि उन जैसे पके और पघे विचारक के किसी भी शब्द या वाक्य को स्थूल अर्थ में ग्रहण नहीं किया जाना चाहिए। हम यों भी तो सोच सकते हैं कि यह सिर्फ कहानी का नहीं, बल्कि समूची कथा-विधा का ‘बीज’ है और इसको सिद्ध किए बिना कथा के परमतत्व की प्राप्ति असंभव है। दरअसल हर कथा-रचना के अन्तर में कम से कम एक लघुकथा विद्युत-तरंग की तरह विद्यमान है और पैंसठोत्तर-काल की तो अनगिनत कहानियाँ ऐसी हैं जो अन्यान्य प्रसंगों के सहारे विस्तार पाई हुई लघुकथा ही प्रतीत होती हैं। इस दृष्टि से देखें तो लघुकथा को कहानी का बीज क्या, समूचे कथा-साहित्य का ‘बीज’, सीधे-सीधे उसकी शक्ति कहना भी न्यायसंगत है। 
                                       शेष आगामी अंक में जारी…

1 टिप्पणी:

Kanta Roy ने कहा…

//आदमी खुद नट-बोल्ट होकर घिस रहा है—कहाँ किसको फुर्सत है कि मोटे-मोटे आख्यान पढ़े।//----- वर्तमान समय पर आदमी को खूब परिभाषित किया है आपने।

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लघुकथा से गम्भीरतापूर्वक जुड़े तत्कालीन कथाकारों का ही बूता था कि हास्यास्पद लघुकथाएँ लिखकर ‘सारिका’ में छपने के मोह में वे नहीं फँसे और गम्भीर लेखन से नहीं डिगे।//------- प्रयास को चिंतन के लिये विवश कर सही दिशा दिखाता है यह आलेख भी आपका। मुझे और चीजों को जानना और समझना है आपकी इस श्रृंखला के माध्यम से।
मैं भी पाठक बन कर प्रतिक्षारत रहूँगी आगामी अंक के लिये। सादर।