गुरुवार, 14 सितंबर 2023

लघुकथा : आनेवाला कल / बलराम अग्रवाल

 

इक्कीसवीं सदी में लघुकथा के लिए नई-नई दिशाएँ खुली हैं। इस तीसरे दशक में लघुकथाकारों का एक निश्चित लक्ष्य होना चाहिएस्वस्थ  व्यक्ति, स्वस्थ मन, स्वस्थ समाज और स्वस्थ राष्ट्र। सुनने में यह किसी राजनीतिज्ञ के एजेंडा की तरह लगता है, है नहीं। इसका पूरा संबंध साहित्य और साहित्यकार से है; उस व्यक्ति से है जो अपने समाज, राष्ट्र और समूची मानव-जाति से प्रेम करता है। बावजूद इसके कि कथाकार कल्पनाओं के जाल बुनता है, वस्तुत: व्यक्ति ही है।  व्यक्ति है तो समाजगत कुंठा, घुटन, रोमांस आदि में भी सामान्य नागरिक की तरह, कम या अधिक, उसकी आसक्ति रहेगी ही। ये सब कम या ज्यादा रह सकती हैं, लेकिन इन सबका उसके जीवन से बिल्कुल लोप ही हो जाएगा, यह नहीं कहा जा सकता। डॉ. कमल किशोर गोयनका द्वारा कहा ही जा चुका है कि लघुकथा जीवन की आलोचना है, वह जीवन को आगे रखकर चलती है।

लघुकथाकार को अपनी लघुकथाओं द्वारा मानव जीवन को सुखी बनाने के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के प्रयास करने चाहिए। विषम परिस्थितियों को तोड़ने वाली कथाएँ प्रस्तुत करनी चाहिए। सामाजिक और राजनीतिक जीवन में झूठ और फरेब का पर्दाफाश करते रहना चाहिए। कुल मिलाकर यह कि उसे लघुकथा के रूप में मानव जीवन से हताशाओं और निराशाओं को दूर करने के ‘ताबीज’ बनाते रहना चाहिए। अगर ध्यान से देखें तो लघुकथा आदिकाल से ही मनुष्य के लिए ‘ताबीज’ का काम करती आयी है। अन्तर मुख्यत: यह है कि पूर्वकालीन लघुकथाएँ सीधी-सरल उपदेश की अथवा बोध की भाषा में प्रस्तुत होती थीं जबकि आज की लघुकथाएँ अपेक्षाकृत अधिक तीक्ष्ण, संकेतात्मक, व्यंजनात्मक और कलात्मक स्पर्श का परिचय दे रही हैं। मैं यह नहीं कहता कि किसी भी पूर्ववर्ती लघुकथा ने ऐसा नहीं किया, अवश्य किया है; लेकिन इक्कीसवीं सदी के इस तीसरे दशक तक आते-आते लघुकथा ने बदलते मूल्यों को पहचानने और प्रकट करने में काफी दक्षता का प्रदर्शन किया है। लघुकथाकार यदि यह देख रहा है कि जीवन को भौतिक दृष्टि से सुखी बनाने में मनुष्य का विश्वास बढ़ा है तो आध्यात्मिक तुष्टि की ओर जाने से भी उसके कदम रुके नहीं हैं, इस सत्य पर भी उसकी नजर है। लघुकथाकार आज के मनुष्य को उसकी पूर्णता में देख रहा है, न कि आधा-अधूरा। वह उसके मानसिक और आत्मिक, हर पहलू पर नजर रख रहा है।

नई सदी के लघुकथाकारों ने जीवन की बदली हुई परिस्थितियों से मोर्चा लेने के लिए त्वरित गति से पैंतरा बदला हो, ऐसा नहीं है। उन्होंने धैर्य के साथ समय को देखते-परखते ऐसा किया है। पिटे-पिटाये विषय, घिसे-घिसाये मुहावरे और नकली-सी लगती कथन-भंगिमाएँ यद्यपि कुछ लोग अभी भी दोहरा रहे हैं तथापि समेकित रूप से देखें तो उन सब को अधिकतर ने लगभग छोड़ ही दिया है। लगातार नये कथ्य, नये मुहावरे और नयी कथन-भंगिमाएँ सामने आ रही हैं।

आज का कथाकार, वह युवा हो या प्रौढ़, नित नयी समस्याओं से लोहा लेते हुए पूरी शक्ति से जूझ रहा है। यहाँ हमें कथा-लेखन के संदर्भ में ‘समस्या’ के और ‘लोहा लेने’ के स्वरूप को समझना होगा। अगर हमने विचारधारा-विशेष से स्वयं को बाँध लिया है तो वैचारिक स्वतंत्रता से हम दूर हट जाते हैं। किसी भी साहित्यकार का वैचारिक स्वतंत्रता से दूर हट जाना ही साहित्य क्षेत्र में ‘समस्या’ समझा जाना चाहिए क्योंकि यह क्षेत्र सत्य, साहस और न्याय का क्षेत्र है, आँखों पर पट्टी बाँधकर किसी एक तरफ चलते चले जाने का नहीं। रचनाकार के नाते यह उसके लिए स्वाभाविक भी नहीं है। वह यदि कला की उत्कृष्टता की ओर सचेत है, तो जीवन-सत्य को गहराई से देखने-परखने, जीवन के प्रति अपनी सत्यनिष्ठा को व्यक्त करने की ओर भी लगातार प्रयत्नशील रहना उसका दायित्व है।

लिखने की लत रखने वाले लघुकथा-लेखकों को छोड़कर अथवा लघुकथा-लेखन से वीतराग हुए लेखकों को छोड़कर अन्य कोई जागरूक और सचेत लेखक जीवन संग्राम से अलग नहीं रह सकता। जेनुइन लेखक को अपने और अपने चारों ओर के समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करना पड़ता है । लेखक सिर्फ लेखक नहीं है, वह जागरूक सामाजिक व्यक्ति भी है। व्यक्ति होने के नाते वह अकेला नहीं है।  समाज से, राष्ट्र से और अंततोगत्वा विश्व से उसका घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है। अपने समाज और राष्ट्र में जो कुछ घटित होता है उससे वह निस्पृह नहीं रह सकता। हिन्दी में शायद ही कोई ऐसा लघुकथाकार हो, जो अपनी कथा में 'भारतीयपनबरतने में संकोच का अनुभव करता हो। विशेषकर आज, जब भारतीय जीवन की नींव को मजबूत बनाना प्रत्येक नागरिक का पुनीत कर्तव्य है। बेशक, कुछ लोग देश और संस्कृति की स्वतन्त्र चेतना और साहित्य-रचना के बीच किसी प्रकार का कोई जुड़ाव नहीं मानते। वे आवश्यकता से अधिक वैश्विक हो चुके हैं और यह मानने लगे हैं कि एक ही समाज और राष्ट्र से लेखक का कुछ लेना-देना नहीं, वह तो लिखता है समूची मानव जाति के लिए। यही विचार विधा को छोड़कर दूसरी, तीसरी, चौथी विधा में जा कूदने को भी प्रेरित करता है। कुछ लोग असंतुलित विचार वाले भी हैं। वे मानसिक उलझन में पड़कर इधर-उधर भटक रहे हैं। साहित्य की जिस भूमि पर दोहा, साखी, चौपाई, कुण्डली और गजल सगर्व खड़ी हैं वहाँ लघुकथा को ‘छोटी’ विधा आँकने-मानने वालों  की बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है। पूर्व में, लघुकथा-साहित्य के अनेक प्रतिभाशाली लेखक महत्वाकांक्षा की वेदी पर अपनी कला की बलि चढ़ा चुके हैं; लेकिन यकीनन, आने वाला समय लघुकथा से पलायन का न होकर, पलायन कर गये कथाकारों के लौट आने का होगा। कुछ हद तक गत दशक में ऐसा होता हम देख भी चुके हैं।                                          

                                      रचनाकाल 5 सितंबर, 2021 या उससे पहले कभी।

संपर्क  8826499115

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

सारगर्भित और सार्थक आलेख