शनिवार, 6 जनवरी 2018

अविस्मरणीय लघुकथाएँ / रूपसिंह चन्देल

5 सितम्बर 2017 को डॉ॰ रूपसिंह चन्देल ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा था—
बलराम अग्रवाल हिन्दी लघुकथा साहित्य के लिए समर्पित शीर्षस्थ लघुकथाकार हैं। उन्होंने अनेक अच्छी कहानियाँ भी लिखी हैं। मैंने 2014 में अपने द्वारा सम्पादित ’कथाबिंब’ के कहानी विशेषांक में उनकी कहानी प्रकाशित की थी और उनके दो कहानी संग्रह भी हैं। लेकिन इस लेखक की विनम्रता और विशेषता यह है कि वह अपने को लघुकथाकार ही मानते हैं। 2015 के विश्वपुस्तक मेला में मेरे द्वारा उनके नवीनतम लघुकथा संग्रह ’पीली पंखों वाली तितलियां’ का लोकार्पण संग्रह के प्रकाशक राही प्रकाशन के स्टॉल में हुआ था। यह पुस्तक लंबे समय से समीक्षा के लिए मुझे उकसा रही है, लेकिन तमाम कारणों से लिख नहीं पाया। आज संकल्प के साथ इसे सामने रख लिया कि जल्दी ही समीक्षा लिखना है।
बलराम अग्रवाल को लोकार्पण के समय बधाई दी ही थी अब पुनः बधाई.
और अब प्रस्तुत है डॉ॰ रूपसिंह चन्देल द्वारा लिखित ‘पीले पंखोंवाली तितलियाँ’ की समीक्षा…                  

बलराम अग्रवाल बहु-आयामी प्रतिभा के धनी साहित्यकार हैं.  कहानी,लघुकथा साहित्य, बाल साहित्य, यात्रा संस्मरण  के साथ उन्होंने अनेक विदेशी रचनाओं के अनुवाद किए हैं. लघुकथा साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किए हैं. एक विशेष बात यह कि उन्हें इस विधा से इतना प्रेम है कि अपनी पी-एच. डी. के लिए उन्होंने लघुकथा साहित्य का ही चुनाव किया.  वह एक प्रयोगधर्मी लघुकथाकार हैं और उनकी एक विशेषता यह भी है कि वह अहिर्निश हिन्दी लघुकथा के विकास के लिए चिन्तित रहते हैं. कहानी की दुनिया में कई महत्वपूर्ण कहानियां देने वाले व्यक्ति का एक खास विधा के प्रति लगाव यह स्पष्ट करता है कि वह उस विधा को कितनी गहनता के साथ जीता है. आज जब लघुकथा के नाम पर बहुत कुछ कबाड़ प्रकट हो रहा है उस कठिन दौर में बलराम अग्रवाल के लघुकथा संग्रह ’पीले पंखों वाली तितलियां’ का प्रकाशन एक सुखद अनुभूति देता है. संग्रह में छियानबें लघुकथाएँ हैं.
बलराम अग्रवाल की लघुकथाओं में विषय वैविध्य है. समाज की विद्रूपताओं, कुरीतियों, शोषण, दमन, आतंक आदि विभिन्न विषयों के साथ व्यवस्था,राजनीति आदि पर उन्होंने सार्थक लेखन किया है. ’कुंडली’ दहेज समस्या को बहुत ही खूबसूरती से अभिव्यक्त करती है. ‘ब्रह्म-सरोवर के कीड़े’ ब्राह्मणवाद पर करारी चोट प्रस्तुत करती है. ‘सुन्दरता’
डॉ॰ रूपसिंह चन्देल
सौन्दर्यबोध को परिभाषित करती एक उल्लेखनीय लघुकथा है. ‘आखिरी उसूल’ बलात्कार पीड़िता की पीड़ा और पुलिस की निष्क्रियता को उघाड़ती है. पीड़िता की शिकायत का संज्ञान न लेते हुए थानेदार  धमकाने वाले अंदाज में लड़की का कंधा दबाते हुए  कहता है, “जो हो चुका, उस पर खाक डालो—हर काम, हर धंधे का पहला और आखिरी सिर्फ एक ही उसूल है—लड़ो किसी से नहीं.” थानेदार उस लड़की को बिकाऊ सिद्ध करने पर तुला है तो कोठा चलाने वाली उसकी संरक्षक ‘मौसी’ भी उसे चुप रहने की सलाह देती है. ‘सियाही’ एक मार्मिक कथा है, जहाँ अखबार में लपेटकर  रोटी न देने का अनुरोध करता बेटा माँ से कहता है कि अखबार की सियाही से वह परेशान नहीं; बल्कि उसकी ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता. जाता है—लूट,खसोट, बलात्कार, हत्या जैसे समाचारों की ओर. यह लघुकथा समाज और व्यवस्था पर तो सटीक प्रहार है ही, आजकल के समाचार-पत्रों की दायित्वहीन भूमिका पर भी टिप्पणी प्रस्तुत करती है.
बलराम अग्रवाल समाज की तमाम समस्याओं को लेकर ही अपनी चिन्ता व्यक्त नहीं करते, वह संबन्धों को भी शब्द देते हैं. मां-बेटे के प्रेम को केन्द्र में रखकर लिखी गई एक उल्लेखनीय रचना है ’तुम्हारी आंखों में बेइंतहा कशिश है’.  ’आदमी और शहर’ किस्सागोई शिल्प में एक अद्भुत लघुकथा है. एक गांव के पाँच शिक्षित बेरोजगार मित्रों को माध्यम बनाकर बुनी गयी यह लघुकथा गांव और शहर के जीवन पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है. जंगल के रास्ते शहर जाते मित्र जंगल में शेर की दहाड़ सुन भयभीत हो गए और बिछड़ गए. जब मिले तो उनमें एक सब इंस्पेक्टर का उक्त कथन उल्लेखनीय है—“आज तक मैं समझता रहा कि उस दिन डरकर भाग गए मेरे सभी दोस्त जिन्दा होंगे. वे मुझे ढूँढ़ रहे होंगे…… काश, वे समझ पाते कि भूख के दिनों में आदमी की पहली जरूरत चौकन्ना रहना और धीरज से काम लेना है, जानवर बन जाना नहीं.”  गंभीर व्यंग्य छुपाए यह लघुकथा गाँव के आदमी के शहर पहुँचकर जानवर बन जाने की प्रच्छन्न कथा है.
“गरीब-घरों में बर्तन माँजे नहीं जाते मेरे बच्चो, खनकाए जाते हैं, पड़ोसियों को यह जताने के लिए कि घर के सब लोग खा-पी चुके, अब बरतन मँज रहे हैं.” बलराम अग्रवाल की एक और अंदर तक हिला देने वाली लघुकथा है ‘मन की मथनी’. इस एक लघुकथा से ही स्पष्ट है कि गाँव और गरीबी की पीड़ा को उन्होंने किस हद तक देखा-परखा है और वे किस हद तक अभी भी उनके मानस में जिंदा हैं।
लेखक की रचनाओं में उत्कृष्ट भाव-प्रवणता मिलती है. ‘मां नहीं जानती फ्रायड’ इसका उदाहरण है. ‘दहशतगर्द’ आज के समय की वास्तविकता व्यक्त करती है. “ईश्वर का भी मान-अपमान होता है! यह तो पहली ही बार सुन रही हूं मैं.” ‘मान-अपमान’ की बुजुर्ग महिला का यह कथन अलग-अलग सम्प्रदायों और समुदायों में बँटे धार्मिकों के लिए भी विचारणीय है.  लेखक के पास खूबसूरत भाषा है. ‘गरीब का गाल’ से एक उदाहरण देखिए – “मोमबत्ती को जलाने के लिए कोई जैसे अंधेरे कमरे में माचिस की डिब्बी को टटोलता है, वैसे ही गत रात पढ़े शब्दों को वह  अपने जेहन में टटोलने लगा.”
‘बिना नाल का घोड़ा’ बलराम अग्रवाल की कालजयी रचना है और हिन्दी की उत्कृष्टतम लघुकथाओं में एक. बलराम अग्रवाल की अनेक रचनाओं में सरकारी तंत्र के साथ नव-पूँजीवादी वर्ग को विषयवस्तु बनाया गया है. ‘सरकारी अमला’  में एक पात्र, जिसपर सरकारी कार्य में बाधा पहुँचाने और कर्मचारी पर हमला करने का आरोप है, मजिस्ट्रेट के समक्ष कहता है—“मैं भला राजनीति क्यों करूँगा…. राजनीति में तो सड़क से संसद तक सब चोर हैं.”  तो ‘पराकाष्ठा’ लघुकथा नव-धनाड्यों के अमानवीय हो चुके चेहरों को बेनकाब करती है, जहाँ किसी सोसाइटी की आर डब्ल्यू ए वहाँ के निवासियों से इस अधिकार को छीन लेती है कि वे अपने फ्लैट्स में गमले नहीं सजा सकते. सजाना ही है तो कृत्रिम फूल,पौधे या लताएं सजाएं. हम प्रायः सुनते हैं कि  कई सोसाइटी में कुत्ते-बिल्ली पालने पर प्रतिबन्ध होता है—निश्चित ही समाज की इन विसंगतियों पर पाठकों का ध्यान खींच इस नवीन दुनिया के अमानवीय चेहरे को बेनकाब करने का स्तुत्य कार्य लेखक ने किया है. उसके पास न केवल दृष्टि है बल्कि अपनी बात को कहने का साहस और कला भी है।
बलराम अग्रवाल की लघुकथाएँ  जिस सामाजिक यथार्थ को चित्रित करती हैं वह इतना क्रूर है और इतना परिचित कि हमें प्रतीत होता है कि रचनाओं में अभिव्यक्त विषयवस्तु हमारे निकट, बिल्कुल आसपास ही  है. यह सच भी है और यही किसी भी कथाकार की सफलता भी है.  ‘आदमी का बच्चा’ में एक खदान मजदूर अपने नवजात बच्चे के विषय में जानने के लिए पंडित जी के पास जाता है. जेब में रुपए पहुँचते ही पंडित जी पंचांग विचारने का नाटक करते हैं. इस नाटक का लेखक ने जो वास्तवित विवरण प्रस्तुत किया वह अद्भुत है. पंडित जी की घोषणा से मजदूर आशंकित होता है और अंततः पंडित की ऊंची भविष्य वाणी से परेशान वह कह उठता है, “सुभ-सुभ बोलो पंडित जी! किसी कुत्ते का नहीं, इस आदमी का बच्चा है वो---“ और वह आदमी एक खदान मजदूर है. उसका बच्चा बड़े ओहदे का स्वामी कैसे हो सकता है. इस लघुकथा का व्यंग्य इतना धारदार है वह पाठक को विचलित कर देता है.  यह रचना हमें कटु यथार्थ से परिचित करवाती है और पंडितों के छद्म को भी उजागर करती है. संग्रह में कई ऎसी रचनाएँ हैं जहाँ लेखक मनोरंजक चुटकी लेता प्रतीत होता है लेकिन उस चुटकी में कितनी विद्रूपता व्याप्त है, यह रचना को पढ़ने के बाद ही स्पष्ट होता है. ‘तिरंगे का पांचवां रंग’ में यह प्रतिभाषित है. ‘बीती सदी के चोंचले’ में लेखक धर्मान्धता पर एक इमाम के माधयम से महत्वपूर्ण संदेश देता है.
‘हाय’ पुलिस तंत्र की कर्तव्यहीनता को उजागर करती है.  बाल मनोविज्ञान पर भी लेखक की गहरी पकड़ है. शायद यही कारण है कि उन्होंने  बाल-एकांकी और नाटक लिखे हैं. बाल साहित्य एक कठिन विधा है, लघुकथा साहित्य से भी अधिक कठिन. ‘पीली पंखोंवाली तितलियाँ’  बाल-मनोविज्ञान की एक उल्लेखनीय लघुकथा है. बलराम अग्रवाल के स्वभाव की विनोदप्रियता से मैं परिचित हूँ: लेकिन यह बात अचम्भित करती है कि उनकी अनेक लघुकथाओं में व्यंग्य इस विनोदप्रियता के माध्यम से ही दर्ज हुआ है। ‘गे नहीं थे वे’ और ’गे भी थे वे’ में इसका सफल प्रयोग दिखाई देता है.  ‘हवाएं बोलती हैं’ एक  प्रयोगात्मक लघुकथा है. कश्मीर समस्या केन्द्र में है जिसमें लेखक ने भिन्न दृष्टिकोण से ग्यारह रचनाएँ प्रस्तुत की हैं. एक शीर्षक के अंतर्गत अलग-अलग रचनाएं, जो स्वतंत्र लघुकथाएं भी हैं और एक लघुकथा का हिस्सा भी. ऎसा अभिनव प्रयोग शायद हिन्दी लघुकथा में पहली बार हुआ है.
संग्रह की अन्य लघुकथाएँ उतनी ही मारक और महत्वपूर्ण हैं जितनी वे, जिनकी मैंने ऊपर चर्चा की. बलराम अग्रवाल की भाषा सहज है और शिल्प आकर्षक.  संग्रह की लघुकथाएँ यह सिद्ध करती हैं कि लघुकथा कथा साहित्य की एक ऎसी विधा है जो कम शब्दों में एक बड़ा संदेश दे सकने में सक्षम है. एक सफल लेखक की उल्लेखनीय रचनाएँ—जिन्हें पढ़कर ही समझा जा सकता है.
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लघुकथा संग्रह : ‘पीली पंखों वाली तितलियाँ’ कथाकार : बलराम अग्रवाल प्रकाशक : राही प्रकाशन, एल-45, गली नं.5, करतार नगर, दिल्ली-110053 संस्करण : 2014,  मूल्य : रु.300/-, पृष्ठ संख्या : 152

समीक्षक :  डॉ॰ रूपसिंह चन्देल, फ्लैट नं.७०५,टॉवर-८, विपुल गार्डेन्स, धारूहेड़ा, हरियाणा-123106 / मो. 8059948233

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

डॉ॰ अनिल शूर ‘आजाद’ एवं श्रीमती इंदु वर्मा का डॉ॰ बलराम अग्रवाल से पत्र-साक्षात्कार

        हमारा काम ईमानदारी से लेखन करना है—बलराम अग्रवाल 
डॉ॰ अनिल शूर ‘आजाद’
श्रीमती इंदु वर्मा
डॉ॰ अनिल शूर आज़ाद और श्रीमती इंदु वर्मा की ओर से  संयुक्त रूप से मोबाइल मैसेंजर पर दिनांक 24-12-2017 को  निम्न सवाल भेजे गए थे। प्रस्तुत हैं उक्त सभी सवाल मेरे द्वारा उन्हें भेजे गये  जवाबों के साथ               — बलराम अग्रवाल

    01-   आपने लिखना कैसे और कब आरम्भ किया था?
मेरे साथ हुआ यह कि लिखना मैंने शुरू नहीं किया, बल्कि लिखना कक्षा सात में एकाएक शुरू हो गया। कबीर, रहीम के दोहों जैसा कुछ। उन्हें मैं रद्द कागज की पट्टियों पर लिखता और पिताजी के डर से फाड़कर फेंक देता क्योंकि कोर्स की किताबों के अलावा कुछ भी पढ़ना-लिखना वाहियात काम माना जाता था।
     02-   आपने किन-किन विधाओं में लिखा है तथा कृपया अपनी प्रमुख पुस्तकों की जानकारी भी दीजिए।
लिखना तो कविता से शुरू किया था। फिर लेख, समीक्षा, लघुकथा, कहानी, आलोचना, अनुवाद, संपादन… सबसे जुड़ाव रहा। कहानी और लघुकथा के संदर्भ में—1॰ सरसों के फूल (1994, लघुकथा संग्रह) 2॰ ज़ुबैदा (2004, लघुकथा संग्रह)  3॰ चन्ना चरनदास (2004, कहानी-लघुकथा संग्रह)  4॰ पीले पंखोंवाली तितलियाँ (2014, लघुकथा संग्रह)  5॰ खुले पंजोंवाली चील (2016, कहानी संग्रह) 6॰ हिन्दी लघुकथा का मनोविज्ञान (आलोचना पुस्तक)।
     03-   मौलिक लेखन के अतिरिक्त क्या आपने सम्पादन-कार्य भी किया है? कृपया इसपर भी संक्षेप में ही सही, कुछ बताइए।
1972 में ‘मिनीयुग’ के प्रकाशन की शुरुआत से ही उससे जुड़ गया था और 1989 तक जुड़ा रहा। 1976 में बुलन्दशहर से ‘दैनिक बरन दूत’ समाचार पत्र की शुरुआत हुई तो उसके संपादन से जुड़ गया। 1993 से 1996 तक त्रैमासिक ‘वर्तमान जनगाथा’ का संपादन/प्रकाशन किया। 2014 में ‘शोध समालोचन’ नाम की पत्रिका के संपादन से जुड़ा। 1997 से आज तक हिन्दी साहित्य कला परिषद, पोर्ट ब्लेअर की अर्द्धवार्षिक हिन्दी पत्रिका ‘द्वीप लहरी’ को संपादन सहयोग दे रहा हूँ। उसके लिए 2 लघुकथा विशेषांक, 2 बाल साहित्य अंक, 1857 की 150वीं वर्षगांठ पर 2007 में विशेषांक का अतिथि संपादन का दायित्व निर्वाह किया। इस पत्रिका के कुछेक अंक लघुकथा-बहुल, बाल साहित्य बहुल और कहानी बहुल भी संपादित किए। प्रेमचंद, प्रसाद, शरदचन्द्र, रवीन्द्रनाथ टैगोर, बालशौरि रेड्डी की कहानियों के दो दर्जन के करीब सकलनों का संपादन किया। ‘साहित्य अमृत’ के जनवरी 2017 में प्रकाशित लघुकथा विशेषांक के लिए सामग्री उपलब्ध कराईं। ‘पड़ाव और पड़ताल खण्ड-2’ (लघुकथा रचना व आलोचना पुस्तक)  ‘समकालीन लघुकथा और प्रेमचंद’ (आलोचना पुस्तक) का संपादन।   
     04-   लम्बे समय से आप साहित्य-साधना में जुटे हैं।आपके लेखन को कई सम्मान/पुरस्कार आदि मिले होंगे। कृपया इस बाबत भी कुछ प्रकाश डालें।
सम्मान-पुरस्कार मिले हैं, लेकिन उन सबका कभी लेखा नहीं रखा।
    05-   जहां तक हमारी जानकारी है 'लघुकथा विधा' के प्रति भी आपका गहन रुझान रहा है। कृपया इस बाबत आपके लेखन-सम्पादन एवं अन्य गतिविधियों/उपलब्धियों को भी तनिक शेयर करें।
लघुकथा के प्रति रुझान दिनों-दिन बढ़ रहा है। अतिथि संपादक के रूप में नाम न दिया जाने के बारे में स्पष्ट जान लेने के बावजूद ‘साहित्य अमृत’ के लघुकथा विशेषांक, जनवरी 2017 के लिए सामग्री जुटाकर देना इस रुझान का ही परिणाम था। अनेक बार अनेक तरह की आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ता है, लेकिन हम हतोत्साहित नहीं होते हैं। इस बारे में इस बात पर विश्वास करते है कि ‘आलोचना काम करने वालों की ही हुआ करती है। निठल्लों पर कोई क्या तंज कसेगा और क्यों?’ लेखन से मिली सबसे बड़ी उपलब्धि तो यह है कि इसकी बदौलत दोस्त बहुत अच्छे-अच्छे मिले हैं।
     06-   आधुनिक हिंदी-लघुकथा का आरम्भ आप कब से मानते हैं.. छठा, सातवां या आठवां दशक से अथवा कोई अन्य?
‘आधुनिक हिन्दी लघुकथा’ का आरम्भ-बिंदु सभी एकमत से 1971 को मानते हैं, हम भी। इसमें समझने और स्वीकार करने की बात यह है कि विधाएँ यथावत् शुरू होने से कुछ समय पहले ही अपने आगमन की आहट देना शुरू कर देती हैं और उनके परिपक्व होने की प्रक्रिया भी बाद के अनेक वर्षों तक जारी रहती है। आधुनिक लघुकथा के साथ भी वैसा ही है।
    07-   लघुकथा के आकार को लेकर बहस की स्थिति सदैव रही है, लघुवादी-लघुकथा जैसे आंदोलन तक चले हैं। आप आदर्श लघुकथा की शब्दसीमा क्या मानते हैं?
आधिकारिक रुप से ‘कहानी’ की शब्द-सीमा आज तक तय नहीं हुई। न इस ओर, न उस ओर। यानी ‘कहानी’ में कम से कम कितने शब्द हों; या अधिक से अधिक कितने, ताकि वह ‘उपन्यास’ से अलग नजर आए; यह तय करने की जरूरत किसी ने महसूस नहीं की। दरअसल, जरूरत कभी समझी ही नहीं गयी। आठवें दशक में लघुकथा आंदोलन की शुरुआत से पहले ‘लघुकथा’ की भी शब्द-सीमा की बात कभी चली हो, मुझे ज्ञान नहीं है। मेरा सोचना है कि कथ्य की संवेदनात्मक घनीभूतता और अपनाया गया शिल्प उसका आकार जो भी तय कर दें, वहाँ तक रचना को जाने देना चाहिए। इस प्रक्रिया में वस्तुत: वह स्वयं ही यथेष्ट आकार ग्रहण कर लेती है। मैं स्वयं इसी नियम को अपनाता हूँ। ‘लघुवादी-लघुकथा’ आंदोलन के बारे में आज पहली बार सुन रहा हूँ। अनेक मित्र मेरी कुछ रचनाओं को ‘लघुकथा’ मानने में संकोच करते हैं। किया करें। मैं अपने आपको ‘लघु’ के प्रति उतना समर्पित महसूस नहीं करता, जितना ‘कथा’ को उसकी पूर्णता में प्रस्तुत करने की ओर सचेत रहता हूँ… संवेदना को उसकी पूर्ण तीक्ष्णता में प्रस्तुत करने के प्रति  अपने आप को अधिक जिम्मेदार महसूस करता हूँ।
     08-   कृपया स्प्ष्ट करें कि बोधकथा/संस्मरण/कहानी/व्यंग्य आदि से लघुकथा किस तरह भिन्न है?
पूर्वकालीन लघुकथा बोधकथा या उपदेश कथा से अधिक भिन्न नहीं है। यहाँ तक कि वह चुटकुले और कतिपय हास-परिहास से भी बहुत भिन्न नजर नहीं आती है। भिन्न होती तो आज की लघुकथा को हम ‘आधुनिक’ या ‘समकालीन’ लघुकथा न कह रहे होते। संस्मरण मूलत: कथापरक विधा नहीं है। कहानी और लघुकथा में संवेदना की समानता हो सकती है और कई बार उनका आकार ही समान हो सकता है। फिर अन्तर क्या है? यहाँ अन्तर है—भाषा और शिल्प का। जहाँ आकार की समानता न हो वहाँ हम देखते हैं कि कहानी का विस्तार फलक बाहरी यानी स्थूलत; भी विस्तृत होता है; जबकि लघुकथा का विस्तार भीतरी यानी सूक्ष्म होता है। एक रचना के रूप में व्यंग्य तथा एक अवयव के रूप में लघुकथा में प्रयुक्त व्यंग्य के बीच वही अन्तर है जो थैलीभर नमक और खाने की किसी वस्तु में स्वादानुसार प्रयुक्त नमक के बीच होता है। हरिशंकर परसाई व्यंग्य को कथन में तीक्ष्णता लाने वाला एक अवयव ही मानते थे; लेकिन प्रोन्नत होकर व्यंग्य ने आज ‘थैलीभर’ होने का रूप धारण कर लिया है। व्यंग्य नामक अवयव से युक्त होकर लघुकथा की प्रभावशीलता में नि:संदेह गुणात्मक परिवर्तन देखने को मिलता है।
     09-   लघुकथा में 'कालदोष' क्या बला है?
‘कालदोष’ को आपने सवाल में ही ‘बला’ कहकर कुछ लघुकथा-मनीषियों की स्थिति को और इससे जुड़े अपनी धारणा को भी स्पष्ट कर दिया है; अब मैं क्या कहूँ?
10- आत्मकथात्मक शैली की रचना अर्थात जिसमें लेखक स्वयं भी 'एक पात्र' होता है… किस सीमा तक स्वीकार्य हैं।
यह कहना गलत है कि आत्मकथात्मक शैली में लेखक स्वयं भी एक पात्र होता है। कथा में ‘मैं’ पात्र से तात्पर्य लेखक स्वयं कतई नहीं है। जहाँ तक लेखक के स्वयं पात्र होने की बात है, पात्र का कोई नाम रखने के बावजूद वह स्वयं पात्र की तरह व्यवहार कर सकता है जो कि शैल्पिक कमजोरी ही अधिक मानी जाएगी। सुदृढ़ शिल्प वाली लघुकथा में ‘मैं’ पात्र पाठक में अपनत्व का भाव जगाकर अधिक जुड़ाव का अहसास दिलाने वाला महसूस हो सकता है।
11- विशेषतया लघुकथा के विधागत विकास में 'सोशल मीडिया' की भूमिका पर आप क्या कहना चाहेंगे?
किसी भी विकास में या ह्रास में ‘सोशल मीडिया’ स्वयं कोई भूमिका नहीं निभाता। वह तो कठपुतली है। विकास या ह्रास उन हाथों और मस्तिष्कों की नीयत और क्षमता पर निर्भर करता है जो सोशल मीडिया पर किसी भी विधा को चला रहे हैं। लघुकथा पर भी यही बात लागू होती है। सोशल मीडिया पर इसको विकसित  और परिष्कृत करने वाले तथा इसका बंटाढार करने वाले, दोनों स्तर के हाथ और मस्तिष्क कार्यरत हैं और वे सब के सब लघुकथा के (और अपने भी) विकास का उद्देश्य लेकर ही कार्यरत हैं।
12- देखने में आता है कि जुम्मा-जुम्मा चार दिन की हुई इस विधा में खेमेबाजी की खींचतान, अपना/अपनों का महिमामंडन करने तथा अन्यों की निंदा/उपेक्षा करने जैसी हरकतें फिर बढ़ने लगी हैं। इसका विधा पर क्या असर पड़ता है/पड़ सकता है?
जिस ‘आधुनिक लघुकथा’ की शुरुआत हम अब से 47-48 साल पहले हुई मान रहे हों, उसे ‘जुम्मा-जुम्मा चार दिन की विधा’ मानना मेरे लिए संभव नहीं है। परस्पर खींचतान हो तो विकास नि:संदेह अवरुद्ध होता है; लेकिन समर्पित लेखक हर अवरोध के बावजूद जुटे हुए हैं, जुटे रहेंगे।
13- आपको क्या लगता है कहानी, उपन्यास, नाटक या एकांकी की तरह कभी 'लघुकथा' भी अपना सम्मानित स्थान बनाने में सफल हो पाएगी? हां तो..कब तक?
रचना विधाओं का क्रम नाटक, उपन्यास, कहानी, एकांकी बनता है। इनमें नाटक, उपन्यास और कहानी हमें पैतृक संपत्ति की तरह मिले हैं। ‘एकांकी’ को तब के रचनाकारों ने पनपाया और उसकी स्थापना के लिए परंपरावादी नाट्य-आलोचकों से कड़ा संघर्ष किया। ‘लघुकथा’ का आकार हमें पैतृक संपत्ति के रूप में मिला है, बाकी सब इस काल के कथाकारों ने श्रमपूर्वक निर्मित और परिवर्द्धित किया है। इस नवनिर्मित और परिवर्द्धित नए भवन की वास्तुगत स्वीकृति में वे सब बाधाएँ आनी स्वाभाविक हैं जो किसी समय उपन्यास के समक्ष आने पर कहानी के और नाटक के समक्ष आने पर एकांकी के सामने आ खड़ी हुई थीं। हमारा काम ईमानदारी से लेखन करना है। किसी भी विधा की सर्व-स्वीकृति का रास्ता स्तरीय लेखन से होकर गुजरता है, मात्र महत्वाकांक्षी होने से नहीं।
14- लेखन सम्बन्धी आपकी भावी योजनाओं की भी कुछ जानकारी दीजिए।
कार्यरूप में परिणत होने से पहले हर योजना वायवीय है, दिवास्वप्न है। इसलिए घोषित रूप से कोई भावी योजना नहीं।
15- एक आखिरी सवाल - आपके लेखन के संदर्भ में आपके परिवार के सदस्यों का क्या रुख रहता है..सहयोगी, तटस्थ अथवा विरोधी का? ओर हां.. लेखकों की नई पीढ़ी के लिए आप क्या सन्देश देना चाहते हैं?
जब तक परिणाम से न जुड़ जाएँ, कलाएँ वाहियात रोग कहलाती हैं। दादाजी की ओर का परिवार सांस्कृतिक रुचियों वाला अनपढ़ और गरीब परिवार था; और नानाजी की ओर का परिवार आर्थिक रूप से सम्पन्न, साक्षर लेकिन असाहित्यिक। ‘लेखन’ से जुड़ना किसी के विज़न में नहीं था; और तो और, विवाह के बाद ससुराल भी कैरियर ओरिएन्टिड मिला। हाँ, पत्नी सुयोग्य मिली। उन्होंने पढ़ने-लिखने में कभी कोई बाधा उत्पन्न नहीं की; और अब तो वह मेरे लेखन की ताकत ही बन गयी हैं। हर कदम पर साथ। एक बेटी है, दो बेटे। एक दामाद हैं और दो बहुएँ। लेखन से किसी का भी दूर-दूर तक नाता नहीं; लेकिन सब के सब लेखन को एन्ज्वाय खूब करते हैं। लेखन में बाधा उत्पन्न न करना, लेखक और उसके आगन्तुक मित्रों को नाक-भौं सिकोड़े बिना आदर-मिश्रित मुस्कान के साथ समय पर चाय-खाना देते रहना भी परिवार के सदस्यों का लेखन में सहयोग कहलाता है। वह सहयोग मिलता रहा है। लेखकों की नई पीढ़ी के लिए मेरा एक ही संदेश है—अपनी रुचियाँ और प्राथमिकताएँ निश्चित करें। तत्संबंधी विषय की पुस्तकों का जितना अधिक हो सके अध्ययन करें, तब लिखें।                        संपर्क :  डॉ॰ बलराम अग्रवाल, एम-70, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032                   मोबाइल : 8826499115       

बुधवार, 29 नवंबर 2017

बलराम अग्रवाल से सीमा जैन की बातचीत

स्थायित्व के लिए  ‘तप’ जरूरी है—बलराम अग्रवाल

[ एक लेखक का जन्म कब होता है? ठीक-ठीक बताना पाना मुश्किल है। कभी पढ़ते-पढ़ते, कभी कुछ देखते-देखते ही कलम कब हाथ में आ जाती है पता ही नही चलता। बलराम जी ने कलम के साथ एक लंबा सफर तय किया है। उनका बालमन पढ़ने का बेहद शौकीन था। बचपन की एक घटना का उल्लेख उन्होंने अपने लघुकथा संग्रह ‘जुबैदा’ की भूमिका में किया है जो उन्हें संवेदना, धैर्य, लगन सिखा गई थी। उन्होंने लिखा है कि उनके घर के पास एक पोखर था जहाँ मरे हुए भैस आदि जानवरों को डाला जाता था। उनकी खाल निकालने कारीगर आते थे। वो कैसे बड़े धैर्य से, खून की एक बूंद भी गिराए बगैर व खाल को नुक़सान पहुंचाए बगैर अपने कार्य को करते थे! यह देखकर वे रोमांचित हो उठते थे; लेकिन उनका मन उस व्यक्ति की विवशता पर रो पड़ता था जो वस्तुत चमड़ा-मजदूर ही होता था, चमड़ा-व्यापारी नहीं। कल जो आँसू किसी की विवशता, किसी के दर्द पर गिरे थे वो आज शब्द बन गए हैं। लेखन उनकी आत्मा की प्यास है।  आज के दौर में एक सफल लेखक की साहित्यिक यात्रा को समझना बहुत ज़रूरी है। जब अधिकतर लोग सफलता के लिए भाग रहे हैं, बलराम जी के लेखन में हम एक गहराई, एक धैर्य पाते हैं।
पिछले दिनों (9 सितम्बर, 2017 को) उनके अध्ययन और लेखन से जुड़े कुछ मुद्दों पर मैंने उनसे सवाल किये और उन्होंने सहज अन्दाज में उन सबके जवाब दिये।
तो आइये, जानते हैं बलराम जी के शब्दों में उनकी दिल से कलम तक की यात्रा का वर्णन—सीमा जैन ]

सीमा जैन
सीमा जैन : आपकी पहली दोस्ती क़िताबों से हुई या कलम से?
पहली दोस्ती नि:सन्देह किताबों से ही हुई।
सीमा जैन : किन किताबों से?
 बलराम अग्रवाल

पिताजी हम भाई-बहनों में नैतिक और आध्यात्मिक व्यवहार को रोंपना चाहते थे। इसलिए गीताप्रेस गोरखपुर की गुरु और माता-पिता के भक्त बालक, वीर बालक, सचित्र कृष्णलीला, सचित्र रामलीला जैसी किताबें वो हमारे लिए लाते थे। कोर्स के अलावा सिर्फ यही  किताबें थीं जिन्हें हम खुल्लमखुल्ला पढ़ सकते थे।  इनके अलावा अच्छी-बुरी हर किताब हमें छिपकर पढ़नी पढ़ती थी। पकड़े जाने पर पिटाई होना लाजिमी था। बाबा को स्वांग और आल्हा आदि देखने-सुनने का शौक था।  उनके खजाने में किस्सा हातिमताई, किस्सा सरवर नीर, किस्सा बिल्व मंगल, किस्सा तोता मैना, आल्हा ऊदल, तेनालीराम, अकबर बीरबल, सिन्दबाज जहाजी जैसी लोक गाथाओं की सैकड़ों पुस्तकें थीं। उनके देहावसान (1966-67) के बाद उस गट्ठर से चुराकर मैंने एक-एक किताब पढ़ी। बड़े चाचा (उन्हें हम सभी भाई-बहन ‘बाबूजी’ कहा करते थे) उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग में ट्यूबवेल ऑपरेटर थे। अपनी किताबों से भरा एक छोटा सन्दूक एक बार वे घर पर छोड़ गये क्योंकि बार-बार स्थानान्तरण के कारण किताबों का रख-रखाव ठीक से नहीं हो पाता होगा। उस बे-ताला खजाने में बृहद हस्त सामुद्रिक शास्त्र, बृहद इन्द्रजाल, बृहद कोकशास्त्र मुझे पढ़ने को मिले। यह भी 1967-68 के दौर की बातें हैं। छोटे चाचा जी की रुचि साहित्यिक पुस्तकों और पत्रिकाओं में थी। धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, चन्दामामा, पांचजन्य, राष्ट्रधर्म जैसी पत्रिकाएँ उनके माध्यम से पढ़ने को मिलती रहती थीं; लेकिन पढ़ना उन्हें भी छिपकर ही होता था। माताजी के सन्दूक में ‘दमनक करटक’ नाम की एक किताब बहुत सहेजकर रखी होती थी। मोटे अक्षरों में छपी वह एक सचित्र किताब थी जो बड़े मामा जी ने उन्हें भेंट की थी। उसे पढ़ने का समय वह शायद ही कभी निकाल पायी हों। समझदार हो जाने पर माता जी उसे मुझे सौंप दिया। इस तरह पंचतन्त्र की कुछ कहानियाँ बचपन में ही पढ़ने को मिल गयी थीं; हालाँकि तब पता नहीं था कि वे पंचतन्त्र की कहानियाँ थीं। मुहल्ले में एक युवा मित्र थे—बनारसी दास जी। एक मकान की बाहरी कोठरी में किराए पर रहते थे। विवाहित थे और बाल-बच्चेदार भी। हम तब किशोर ही थे। एक बार उन्हें 15-20 दिन के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा। चोरी आदि से बचने और देखभाल करते रहने की दृष्टि से अपने कमरे की चाबी मुहल्ले में ही मेरे मित्र किशन की माता जी को सौंप गये थे। उनसे चाबी ले हमने दोपहर का समय बनारसी दास जी के कमरे पर बिताना शुरू करने का फैसला किया। वहाँ पहले दिन ही ‘कारूं का खजाना’ हमें मिला—चन्द्रकांता, चन्द्रकांता सन्तति  के सभी और भूतनाथ के कुछ खण्ड। लोगों ने जिन किताबों को पढ़ने के लिए हिन्दी सीखी, वे लगभग सब की सब हमारे सामने रखी थीं। हम दोनों उन सारी किताबों को चाट गये। ये वो दिन थे, जब सब-कुछ पढ़ लेने का समय हमारे पास था। अब हम चुनिंदा चीजों को खरीदकर घर तो ले आते हैं लेकिन उन्हें बामुश्किल ही पढ़ पाते हैं।
सीमा जैन : यानी आपकी कलम से दोस्ती बाद में हुई?
बेशक किताबों ने ही कलम से दोस्ती का रास्ता खोला, उसे साफ किया।
सीमा जैन : किस उम्र से लेखन शुरू किया?
लिखना शुरू करने की भी एक प्रक्रिया रही, सीधे लिखना शुरू नहीं हुआ। 1965 में भारत-पाक युद्ध के समय मैं सातवीं कक्षा का विद्यार्थी था। युद्ध के उपरान्त विद्यालय में कविता-कहानी आदि पठन-पाठन, मौखिक वाचन की प्रतियोगिता आयोजित की गयी थी। उसमें मैंने ‘पांचजन्य’ में छपी एक कविता को पढ़ने का निश्चय किया। घर पर किसी को बताने का सवाल ही नहीं था, रोक दिया जाता। कक्षा पाँच में एक अन्तरविद्यालय नाटक प्रतियोगिता में भाग लेने के बाद वह मेरा पहला सार्वजनिक प्रदर्शन था। मुझे अच्छी तरह याद है कि कविता-पाठ के समय मेरा पूरा बदन काँप रहा था। शायद आगे प्रोत्साहित करने की दृष्टि से मुझे ‘सांत्वना पुरस्कार’ प्रदान किया गया। मेरे जीवन का वह पहला सम्मान पत्र था जो अब मेरे पास नहीं है। परिवार में उस सब पर गर्व करने और उसे बचाए रखने की परम्परा नहीं थी। मुझे याद है कि उसी उम्र में मैंने कबीर के दोहे या मीरा के पद जैसा कुछ लिखना शुरू किया था, लेकिन पिताजी के डर से, लिखे हुए उन कागजों को मैं फाड़कर फेंक देता था। प्रामाणिक रूप से बताऊँ तो पहली प्रकाशित रचना महात्मा गाँधी के जन्म शताब्दि वर्ष 1969 में लिखी गयी थी जो विद्यालय की ही पत्रिका में छपी। उसमें मेरी अन्य रचनाएँ भी छपीं और वहीं से लेखन की निरन्तरता भी बनी।
सीमा जैन : क्या परिवार सहयोग देता तो लेखन की ऊँचाइयाँ कुछ और हो सकती थी?
लेखन को ऊँचाई ‘सहयोग’ की बजाय ‘दिशा’ देने से मिलती है। यह ‘दिशा’ निरन्तर अध्ययन के द्वारा हमें स्वयं प्राप्त करनी पड़ी।
सीमा जैन : आप किस-किस विधा में लिखते हैं?
लेखन की विधा वह कहलाती है जिसमें व्यक्ति कायिक ही नहीं मानसिक रूप से भी ‘निरन्तर’ बना रहता हो। इस आधार पर लेखन की मेरी मुख्य विधा ‘लघुकथा’ ही ठहरती है। इसके अलावा कविता, कहानी, बालकथाएँ, बाल एकांकी/नाटक, आलोचनात्मक लेख, अनुवाद, समीक्षा, संपादन समय-समय पर प्रकट होते ही रहते हैं।
सीमा जैन : अब तक आपकी प्रकाशित पुस्तकें? आपकी प्रिय पुस्तक? आपकी लिखी व पढ़ी गई दोनों?
इस प्रश्न के कुछ हिस्से का उत्तर तो आपके द्वारा वांछित परिचय में मिल जाएगा। अन्तिम हिस्से के उत्तर स्वरूप अनेक पुस्तकें हैं जो मुझे प्रिय रही हैं—जैनेन्द्र का त्यागपत्र, मोहन राकेश की सभी कहानियाँ और नाटक, मुक्तिबोध की डायरी, डॉ॰ रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि, प्रसाद की कथा-भाषा और महादेवी वर्मा और राहुल सांकृत्यायन का गद्य आदि के अलावा भी बहुत-सी बातें हैं जो मुझे पसन्द हैं।
सीमा जैन : क्या दुःख हमें माँजता है? 
‘रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय’—दु:ख अगर लम्बे समय तक टिक जाए तो व्यक्ति को माँजने की बजाय भाँजना शुरू कर देता है; तथापि दु:ख के दिन व्यक्ति को सांसारिक अनुभव तो देते ही हैं और उस दौर से सकुशल बाहर आ निकला व्यक्ति ही यह कहने की स्थिति में होता है कि ‘दु:ख हमें माँजता है’। दु:ख के दिनों को दूसरों के आगे बयां करने का सुख किसी भी अन्य सुख की तुलना में बड़ा, रोचक और रोमांचक होता है, यह मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ। 
सीमा जैन : आलोचनाओं को आप किस नज़र से देखते हैं?
साहित्यिक रचनाओं के सन्दर्भ में, सबसे पहले तो आलोचना करने वाले व्यक्ति के बौद्धिक स्तर पर नजर डालना जरूरी है। यदि वह साहित्य मर्मज्ञ नहीं है, हमसे निम्न बौद्धिक स्तर का है, तो मेरा मानना है कि उसके द्वारा की गयी प्रशंसा भी बेमानी यानी निरर्थक है। इसके विपरीत, उच्च बौद्धिक स्तर के व्यक्ति द्वारा की गयी कटु टिप्पणी पर भी ध्यान देना मैं श्रेयस्कर समझता हूँ। उदाहरण के लिए बता दूँ—‘चन्ना चरनदास’ की समीक्षा करते हुए वरिष्ठ कथाकार विजय जी ने मुझसे कहा—‘बलराम, तुम्हारी कहानियों का अन्त लघुकथा की तरह हो जाता है। इस बात पर ध्यान दो।’ डॉ॰ विश्वनाथ त्रिपाठी ने उन कहानियों की सपाटता की ओर इंगित किया। मैंने दोनों ही अग्रज विद्वानों की बात का ध्यान परवर्ती कथाओं में रखना शुरू किया। कितना सफल रहा, यह तो शेष आलोचक बताएँगे या फिर, आने वाला समय।
सीमा जैन : लघुकथा के क्षेत्र में आपका योगदान साहित्य, आने वाली पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक है। आज आप लघुकथा को जिस स्थान पर पाते हैं उससे संतुष्ट हैं?
जिस दिन सन्तुष्ट हो जाएँगे, लिखना खुद ब खुद छूट जाएगा। बहरहाल, यह संतोष तो है ही कि लघुकथा की नयी पीढ़ी के अनेक हस्ताक्षर हमारे सपनों जैसा यानी भेदभाव और कुरीतियों से विहीन समाज की कल्पना करता सार्थक लघुकथा साहित्य रच रहे हैं।
सीमा जैन : लघुकथा को उसके दृढ़ नियमों के साथ संचार माध्यम तक पहुँचाना ज़रूरी है क्या?
समकालीन लघुकथा,  गद्य कथा-साहित्य की विधा है—इस तथ्य को तो लगभग सभी लेखक और आलोचक स्वीकार करते हैं। इसलिए उन सभी अनुशासनों पर, जिनके चलते लघुकथा कथा-साहित्य की अन्य विधाओं से अलग कही या स्वीकार की जानी चाहिए, ध्यान देना हमारा दायित्व बनता है। ‘दायित्व’ स्व-नियोजन की क्रिया है, एक बोध है, जिसे व्यक्ति अनुशासनों के माध्यम से अपने आप में पनपाता है। अनुशासन को आप कानून बनाकर किसी पर लाद नहीं सकते। इसीलिए साहित्य में ‘दृढ़ता’ की बजाय ‘रसमयता’ और ‘लयात्मकता’ को प्रश्रय दिया जाना चाहिए।
सीमा जैन : आपने तो फ़िल्म के लिए भी संवाद लिखे हैं। वो सपना जो अभी पूरा नही हो सका!
फिल्म (‘कोख’1994; लेखक व निर्देशक: आर एस विकल; गीतकार : कुँअर बेचैन; संगीतकार : रविन्द्र जैन) में संवाद लिखना मेरा सपना नहीं था। मित्रतावश सहयोग था।
सीमा जैन : लेखन घर में अगली पीढ़ी तक जा पाया है क्या? यदि नहीं, तो कारण क्या रहे?
मेरे अनुसार, सकारात्मक चिन्ताओं से जुड़े मानसिक व्यसन को ‘लेखन’ कहा जाना चाहिए। अगली पीढ़ी तक प्राय: व्यवसाय ही तुरन्त जाते हैं; आर्थिक लाभों से दूर रखने वाले मानसिक-व्यसनों को कौन अपनाना चाहेगा।
सीमा जैन : सफलता के मंत्र क्या रहे? आप अपने इस सफ़र से संतुष्ट हैं ?
आप यदि मुझे सफल समझती हैं तो इसका एक ही मंत्र रहा—निरन्तर अध्ययन और लेखन। मैं इस दृष्टि से तो संतुष्ट हूँ कि जो कुछ भी लिखा, सकारात्मक और जनहित के स्तर का लिखा; लेकिन इस बिंदु पर असंतुष्ट हूँ कि अपनी शक्ति से बहुत कम लिख सका, आलसी बना रहा।
सीमा जैन : आज की रफ़्तार से सफलता व नाम के लिए भागती पीढ़ी अपना ब्रेंड नेम स्थापित किये बगैर सिर्फ़ रचनाओं के दम पर ख़ुद को सम्हाल पाएगी? आपके सपने..?
सफलता, नाम, धन, ऐश्वर्य आदि आँखें मूँदकर पीछे भागने से हासिल नहीं होते। हो भी जाएँ तो तात्कालिक होते हैं, स्थाई नहीं। स्थायित्व के लिए ‘तप’ जरूरी है। लेखक होने के नाते, मुझे जो कुछ भी हासिल होगा, जाहिर है कि रचनाओं के दम पर ही हासिल होगा। मेरा सपना है कि मैं अपने समय को उसकी पूरी गहराई में समझने लायक बुद्धि का विकास कर सकूँ और वैसी कथा-रचनाएँ समाज को देता रहूँ।

सीमा जैन : हम भारतीयों के अंदर देश के प्रति जिम्मेदारी जगाने की बात करें तो, हमारी प्राथमिक जरूरत क्या है? उसे हम लेखक पूरा कर सकते हैं क्या?
देश के प्रति जिम्मेदारी का पहला कदम अपने घर से शुरू होता है और उस कदम का नाम है— अनुशासन। जो व्यक्ति अपने घर में अनुशासित नहीं है, वह पास-पड़ोस में; जो पास-पड़ोस के प्रति अनुशासित नहीं है, वह समाज में; जो शेष समाज के प्रति अनुशासित नहीं है, वह देश में अनुशासित नहीं रह सकता। जो अनुशासित नहीं है, वह देश क्या, किसी के भी प्रति जिम्मेदार नहीं हो सकता। अनुशासन हममें दायित्व-बोध जगाता है।

सीमा जैन : कद, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि के बाद आपके अंदर का लेखक पहले से ज़्यादा दृढ़ हुआ या लचीला?
कद, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि जैसा मैं कुछ भी महसूस नहीं करता। जितना सामान्य मैं पहले था, उतना ही आज भी हूँ।

सीमा जैन : साहित्यिक सम्मेलन में पर्यावरण के प्रति जागरूकता की बात यदि अनिवार्य कर दी जाए तो...?
केवल साहित्यिक सम्मेलन में ही क्यों, सभी सम्मेलनों में क्यों नहीं? आज, ‘पर्यावरण के प्रति जागरूकता’ को मानव संस्कृति से जोड़ने की आवश्यकता है। बहुत-से पारम्परिक रीति-रिवाज पर्यावरण के लिए खतरा बन चुके हैं, धार्मिक आस्था के नाम पर नैसर्गिक संसाधनों का दोहन ही नहीं किया जा रहा, उन्हें भ्रष्ट और अशुद्ध भी किया जा रहा है। ऐसे रीति-रिवाजों में से कुछ को त्यागने और कुछ का स्वरूप बदल डालने की तुरन्त जरूरत है।

सीमा जैन : ईश्वर और धर्म को आप कैसे परिभाषित करेंगें?
ईश्वर मनुष्य की निर्मिति है। मनुष्य है तो ईश्वर है, मनुष्य नहीं तो ईश्वर भी नहीं। जिसे अधिकांश लोग ‘धर्म’ कहते या मानते हैं, वह विशुद्ध कर्मकाण्ड है और इसीलिए स्वार्थपरक व्यवसाय है। गोस्वामी तुलसीदास रचित ‘रामचरितमानस’ में वर्णित कथा की व्याख्या कर-करके देश-विदेश के करोड़ों कथावाचक  घी-शक्कर का आनन्द ले रहे हैं। वीतराग के प्रणेता महावीर के करोड़ों अनुयायी कई-कई सौ एकड़ जमीन पर पंच-सितारा आश्रम बनाए   बैठे हैं। तुलसीदास जी ने लिखा है—कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ, दंभिन्ह निज मति कल्प करि प्रगट किए बहु पंथ। इस चौपाई के जानकार रामकथा वाचकों के भी अपने-अपने आश्रम हैं, ‘नमो नारायण’, ‘हरि ओम’, ‘जय विराट’, ‘जय जिनेन्द्र’, ‘जय श्रीकृष्ण’, ‘राधे-राधे’ आदि अपने-अपने स्लोगन हैं। मेरा मानना है कि जैसे ईश्वर का सम्बन्ध ‘मनुष्य’ से है, वैसे ही ‘धर्म’ का सम्बन्ध ‘मनुष्यता’ से है। 
                                                                                                                                'कथाबिंब' (अक्तूबर-दिसंबर 2017) 
सम्पर्क : सीमा जैन,  82,विजय नगर (माधव नगर) 201,संगम अपार्टमेंट ग्वालियर(म.प्र.) 474002 / मोबाइल : 8817711033
          बलराम अग्रवाल, एम-70, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032 / मोबाइल : 8826499115