चौथी किस्त
दिनांक 19-10-2016 से आगे
‘सन् 1975-77 के मध्य देश में लगी आपात्कालीन स्थिति में, कुछ
तानाशाही नीतियों के अन्तर्गत चल रहे सरकारी दमन चक्र के नीचे, अनेक निर्दोष व असहाय व्यक्तियों को भी अकारण पिसना पड़ा। प्रकाशन व
प्रसारण आदि सभी क्षेत्रों में आन्तरिक सुरक्षा कानून के अन्तर्गत लगाए गए सरकारी
प्रतिबन्धों ने अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर रोक लगा दी। फलस्वरूप, होते जा रहे शोषण के विरुद्ध कुछ कह न पाने की विवशता एवं छटपटाहट से,
व्यक्ति का मूक आक्रोश उसके अन्दर-ही-अन्दर सुलगता-बुझता रहा।’ शकुन्तला
किरणःहिन्दी लघुकथा
यह सुलगाव तत्कालीन साहित्य की निःसन्देह
प्रत्येक विधा में अभिव्यक्त हुआ। हताशाजनक स्थितियों के चलते युवा कवि गोरख पाण्डे और उन जैसे पता नहीं कितने प्रखर चिन्तकों ने अपनी जीवन-लीला को स्वयं समाप्त कर
लिया। ‘यह खूनी पंजा किसका है’ शीर्षक अपनी कविता में गोरख पाण्डे ने लिखा—
सत्तर में कसा कलकत्ते पर
कुछ जवां उमंगों के नाते
कस गया मुल्क की गरदन पर
पचहत्तर तक आते-आते
आसाम की गीली मिट्टी में
यह आग लगाता आया है
पंजाब के चप्पे-चप्पे पर
अब इसका फौजी साया है...
इस सम्बन्ध में बाबा नागार्जुन की
बहुचर्चित नुक्कड़-कविता ‘इन्दिराजी क्या हुआ आपको...’ तथा पाश, हंसराज रहबर आदि अन्य
कवियों की अनगिनत कविताओं, चित्रकारों-कार्टूनिस्टों द्वारा
बनाए गए चित्रों-कार्टूनों और अन्य विचारकों द्वारा रचित विपुल सामग्री को अध्ययन
के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है। स्वयं लघुकथाकारों ने भी उक्त काल की त्रासद
स्थितियों का वर्णन अपनी रचनाओं में करने का दायित्व निर्वाह किया है। बलराम की
‘ऐसे...’ मृगजल (लघुकथा संग्रह) शीर्षक
लघुकथा का यह अंश देखिए—‘दीदी (इन्दिरा गांधी) थीं तो वे
लूटती थीं और फिर इमरजेंसी लगाकर उन्होंने मुल्क को मुर्गा बना दिया। दादा
(मोरारजी देसाई) आये तो दो-ढाई बरस तक उन्होंने लूटा और उसके बाद फिर दीदी ने लूटा
और मरीं तो बेटे को गद्दी पर बिठा गईं लूटने के लिए।...’ दो लघुकथाओं का एक युग्म भी यहाँ यह दर्शाने के
लिए प्रस्तुत है कि उस काल में व्यक्ति किसी मोर्चे पर पराजित कैसे होता था। इनका
प्रकाशन ‘काफिला-1’ (1978, सम्पादक: बलराम) में हुआ था। पहली
लघुकथा ‘कुएँ का पानी’ के लेखक हैं—कथाकार संजीव और दूसरी
लघुकथा ‘सख्ती’ के फूलचन्द मानव।
।। एक।।
कोलियरी अंचल का प्राइमरी स्कूल। स्कूल
कैम्पस में कुएँ के बावजूद बच्चे पास के पोखरे में जमा खदान से निकला हुआ पानी पी
रहे थे; जबकि कुएँ की मरम्मत और सफाई आदि के लिए प्रतिवर्ष तीन सौ रुपए सैंक्सन
हुआ करते थे। चपरासी को लेकर नये आये हैडमास्टर साहब कुआँ देखने गये। तफशीश की तो
पता चला कि नीचे ‘सैंड-पैकिंग’ का क्षेत्र आ जाने के कारण कुएँ में पानी कभी आया
ही नहीं। उन्होंने कुएँ को पाट देने की आज्ञा दी। चपरासी ने प्रतिवाद किया, ‘‘फिरआप लोग पानी कैसे
पियेंगे?’’
‘‘मगर पानी है कहाँ?’’
वे झुँझलाये।
चपरासी ने अर्ज किया, ‘‘जरा गहराई तक झाँककर
देखिए, पानी है कि नहीं। तीन सौ रुपयों में से 100 रुपए बाकी स्टाफ में बाँट दीजिए, बाकी दो सौ आपके
हुए कि नहीं ? पीते रहिए पहले के हैडमास्टरों की तरह पानी और
हमें दिया कीजिए दो-एक चुल्लू!’’
‘‘ठीक कहते हो, पानी है तो...!’’ हैड मास्टर साहब ने कुएँ को गहराई तक झाँक लिया था।
।। दो।।
अधिकारी ने भ्रष्ट कर्मचारी को ठीक से काम
करने का आदेश दिया।
दूसरी बार शिकायत पर, गरीब मातहत की जवाब-तलबी
की गयी।
और तीसरी बार, लिखित चेतावनी कर्मचारी
को सर्व हुई।
अब भला कर्मचारी चुप कैसे बैठता! उसने जोर
लगाया। जोर लगवाया। और अपने अधिकारी का तबादला करवा दिया।
बरसात का पानी फिर वैसा ही था।
तत्कालीन कथा-पीढ़ी का एकजुट होकर लघुकथा-लेखन
की ओर उन्मुख हो जाने का एक विशेष कारण वैसा सोचना भी अवश्य ही रहा है जिसे 1974 में प्रकाशित लघुकथा
संकलन ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ में भगीरथ ने यों व्यक्त किया है—‘जब एक अनुभव की अभिव्यक्ति कम शब्दों में हो सकती है तो उसका अनावश्यक
विस्तार पाठक पर बोझ ही नहीं बनता बल्कि रचना पाठक पर ‘होल्ड’ भी छोड़ देती है। इस
तरह एक निरर्थक साहित्य की उपज (अर्थात् उत्पत्ति) होती है। अतीत में ऐसा हुआ है
और आज भी हो रहा है। अतः लघुकथाएँ निरर्थक उहापोह से दूर सार्थकता के निकट जाने का
प्रयास करती हैं।’
लघुकथाओं की सार्थकता को आँकते हुए डाॅ.
धीरेन्द्र वर्मा ने हिन्दी साहित्य कोश में भी इसका समावेश किया है। उन्होंने लिखा
है कि—‘जीवन की उत्तरोत्तर
द्रुतगामिता और संघर्ष के फलस्वरूप उसकी अभिव्यक्ति की संक्षिप्तता ने आज
कहानी-क्षेत्र में लघुकथाओं को अत्यधिक प्रगति दी है।’
आकार और शब्द-संख्या के निर्धारण का
प्रश्न भी लघुकथा के विषय में अक्सर ही उठता रहा है। लघुकथा को सामान्यतः छपने
वाली पुस्तक के कितने पृष्ठों तक का फैलाव चाहिए? या फिर उसकी शब्द-संख्या कितनी तक निर्धारित रहनी
चाहिए? ये ऐसे प्रश्न हैं जो अनावश्यक प्रतीत होकर भी आवश्यक
हैं। बर्टेंड रसेल की एक कहानी ‘कन्वर्सेसन’ का विस्तार लगभग 4 बड़े पृष्ठों तक है जबकि इसकी शब्द-संख्या मात्र 800 है! अतः लघुकथा को पृष्ठीय विस्तार और शब्द-संख्या दोनों स्तरों पर
मर्यादित व अनुशासित रहने की आवश्यकता है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि
निर्धारित मापदण्डों से तनिक भी इधर-उधर की रचना को खारिज कर दिया जायगा। नहीं,
दोनों ओर कुछ न कुछ अवकाश भी रखना ही होगा। इस सम्बन्ध में डाॅ.
गोपाल राय (इन्द्रप्रस्थ भारती, जुलाई-अगस्त 2008) का मत है कि ‘लघुकथा, कहानी, लम्बी
कहानी, उपन्यासिका, लघु उपन्यास और
उपन्यास के बीच दूरी इतनी रखी जा सकती है, जिसके बीच ये
विधाएँ, आवश्यक होने पर, आवाजाही कर
सकें। आकार की दृष्टि से लघुकथा को कहानी के क्षेत्र में, कहानी
को लघुकथा और लम्बी कहानी के क्षेत्र में और लम्बी कहानी को कहानी के क्षेत्र
में प्रवेश करने की थोड़ी-बहुत छूट होनी चाहिए। यह लघुकथा, कहानी
और लम्बी कहानी जैसे पदों के प्रयोग में अराजकता दूर करने का एक कामचलाऊ नुस्खा हो
सकता है।’
यद्यपि ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ में
सम्पादकीय के तौर पर प्रकाशित अपने अग्रलेख में भगीरथ (उक्त संकलन के दूसरे संपादक
श्रीयुत रमेश जैन इसके बाद क्योंकि न तो लघुकथा-लेखन में और न ही तत्सम्बन्धी
संपादन-कार्य में अपनी निरन्तरता बनाए रख सके इसलिए यह मानकर चला गया है कि यह लेख
भगीरथ द्वारा लिखित है—बलराम अग्रवाल) ने सन् 1974 में ही स्पष्ट कर दिया
था कि—‘कोई भी व्यक्ति आकार के प्रश्न को मुख्य नहीं मान
सकता, न उसे मुख्य बनाया जा सकता है।’ फिर भी, प्रारम्भ से ही आकार का प्रश्न भी लघुकथा के लिए विवादास्पद रहा है।
यद्यपि आकार का प्रश्न कोई महत्त्व नहीं रखता, और न मात्र
आकार की लघुता के आधार पर ही लघुकथा को महत्त्व मिला, क्योंकि
मात्र आकार का ही छोटा या बड़ा होना किसी भी विधा के लिए मूल्य स्थापित नहीं कर
सकता। लेखन वही मूल्यवान व महत्त्वपूर्ण माना जाता रहा है जो अपने युगीन जनजीवन की
परतें उघाड़, पाठकों को उसके नग्न यथार्थ से परिचित करवा सके;
जो शोषक और शोषित—दोनों के मध्य पुल बन,
उन्हें उनके उत्थान व पतन पर लगे प्रश्नचिह्नों से अवगत करा,
‘सही’ करने के प्रति उनमें चेतना जागृत कर सके; जो हर ‘गलत’ के विरुद्ध संघर्ष कर सकने वाली जुझारू भूमिका निभा सके तथा
जो सामान्यजन के दुःख-दर्दों को वहन कर उन्हें यथावत् पाठकों तक सम्प्रेषित कर
उन्हें कुछ सोचने पर बाध्य कर सके। चूँकि लघुकथा में इन क्षमताओं का अभाव नहीं है,
इसीलिए वह मूल्यवान बनी है, मात्र आकार की
लघुता के कारण ही नहीं। फिर भी, आकारीय लघुता इसकी एक
विशेषता मानी गई है। सुकेश साहनी भी स्वीकारते हैं कि—‘लघुकथा
में लेखक को आकारगत लघुता की अनिवार्यता के साथ अपनी बात पाठकों के सम्मुख रखनी
होती है।’ इसीलिए कुछ विद्वान शब्दों में किसी निश्चित संख्या के आधार पर, इसके आकार की सीमा रेखा का निर्धारण करते हैं। उनमें से किसी एक के अनुसार
इसकी शब्द-सीमा एक हजार तक की, किसी दूसरे के अनुसार पन्द्रह
सौ तक की एवं किसी तीसरे के अनुसार चार-पाँच पृष्ठों तक की भी हो सकती है। यथा,
महावीर प्रसाद जैन के अनुसार—‘लघुकथा की
शब्द-सीमा पच्चीस से लेकर एक हजार शब्दों तक की हो सकती है...’ ‘प्रतिनिधि लघुकथाएँ’ के
संपादकद्वय डाॅ. सतीश दुबे एवं सूर्यकान्त नागर के मत में—‘1500 शब्दों में जीवन के एक अंश का अहसास कराने वाली यह अभिव्यक्ति लघुकथा
है।’
डाॅ. शकुन्तला किरण का कहना है कि मेरे एक
पत्र के उत्तर में, 5 जून 1978 को उपेन्द्रनाथ अश्क लिखते हैं—‘लघुकथा की सीमा, एक से चार-पाँच पृष्ठों तक की होती
है। जहाँ मैंने बीस-पच्चीस पंक्तियों की लघुकथाएँ लिखी हैं, वहाँ
तीन से पाँच पृष्ठों तक की लघुकथाएँ भी लिखी हैं।’ स्पष्ट है कि आकार निर्धारित
करने की उहापोह हिन्दी लघुकथा ने प्रारम्भ से ही झेली है। ‘लघुकथा’ नाम धारण करने
से पूर्व इसके सामने आकार निर्धारण कोई समस्या नहीं थी; और
इसीलिए यह सवाल भी उससे पहले कभी पैदा नहीं हुआ।
इंटरनेट पर ‘विकिपीडिया, द फ्री एन्साइक्लोपीडिया’
‘फ्लेश फिक्शन’ की शब्द-संख्या के बारे में यह जानकारी देता है—‘जैसाकि संपादकों ने आमुख में लिखा है, ‘फ्लेश
फिक्शन’ की उनकी परिभाषा थी, वह कथा जो डाइजेस्ट साइज की
साहित्यिक पत्रिका के आमने-सामने के दो पेजों में आ जाए अथवा लगभग 750 शब्दों की हो।’
डाॅ. गोपाल राय के अनुसार—‘लघुकथा के जो उदाहरण अब
तक उपलब्ध हैं, उनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि उनका आकार
प्रायः 150 शब्दों से 300 शब्दों के
बीच होता है। कदाचित 500 शब्दों तक भी उसकी सीमा जा सकती
है।’
अनिल जनविजय भी यही मत प्रस्तुत करते हैं
कि ‘...लघुकथा के सम्बन्ध में मान्यता है कि लघुकथा का आकार 300 शब्दों से अधिक या एक
फुल-स्केप पृष्ठ से अधिक न हो।’
श्याम सुन्दर अग्रवाल का कथन है कि
‘समकालीन लघुकथा से जुड़े अधिकांश लेखक-समीक्षक लघुकथा को शब्द-सीमा के बंधन में
नहीं बाँधते तो भी, समकालीन लघुकथा छह-सात सौ शब्दों से आगे कम ही जाती है।’
इस सम्बन्ध में डाॅ. कमल किशोर गोयनका का
यह मत भी ध्यातव्य है—‘लघुकथा ऐसा छंद नहीं है कि जिसे शब्दों में संयमित और नियमित किया जा सके,
पर वैसा छंद अवश्य है जिसकी लघुतम और महत्तम सीमाएँ सोची जा सकती
हैं। वैसे इस विषय में मैं कोई सिद्धांत बनाने के पक्ष में नहीं हूँ, क्योंकि सिद्धांत से रचना नहीं होती।’ तथा पूरन मुद्गल का कहना है कि—‘इसकी सीमा पुस्तकाकार डेढ़-दो पृष्ठ तक हो सकती है। इससे अधिक होने पर वह
लघुकथा न होकर ‘छोटी कहानी’ या ‘कहानी’ की श्रेणी में आ जाएगी।’
विक्रम सोनी का कहना है—‘...यहाँ प्रश्न
शब्द-संख्या का नहीं है, मगर तुलनात्मक दृष्टि से लघुकथा को
पाँच सौ शब्दों के आसपास होना चाहिए। 1971 से 1987 तक की प्रकाशित, संकलित, संग्रहित
लघुकथाएँ (अपवाद को छोड़कर) तीन सौ से पाँच सौ शब्दों से अधिक की नहीं मिलती।’
लगभग ऐसा ही मत स्वयं द्वारा प्रेषित एक
लेख में कमल चोपड़ा ने व्यक्त किया है—‘लघुकथा के आकार को शब्दों या पृष्ठों की संख्या
निर्धारित करना लघुता के सृजनात्मक पक्ष पर अंकुश लगाना है। अधिकांश लघुकथाएँ
प्लस-माइनस 500 शब्दों तक ही पाई गई हैं। लेकिन शब्द-संख्या
निश्चित या निर्धारित नहीं की जा सकती। कम-ज्यादा की छूट तो होनी ही चाहिए,
होती भी है।’
‘फ्लैश फिक्शन’ के विचारकों
में एक पामेलिन कास्तो का अपने एक लेख 'फ्लैशेज़ ऑन द मेरिडियन' में
शब्द-संख्या के बारे में कहना है—‘...ऐसी रचनाओं में
शब्द-संख्या का निर्धारण विशेष सहायक नहीं होगा। वह इसलिए कि संपादक, आलोचक और लेखक भी इसकी आकारगत लघुता (अथवा दीर्घता) के मसले पर अलग-अलग मत
रख सकते हैं। सामान्यतः, ‘फ्लैश फिक्शन’ की गति 100 शब्दों से शुरू होकर 1000 शब्दों तक, यहाँ तक कि 1500 शब्दों तक (इससे कम-ज्यादा भी) जा
सकती है। ‘फ्लैश फिक्शन’ निःसन्देह, शब्द-संख्या जैसे छोटे
मसले से बहुत आगे की रचना है।’
आदि काल (वेद काल से सन् 1875 तक) की लघुकथाएँ
इस प्रसंग को यहीं पर विश्राम देकर आइए, एक बार पुनः वेदकाल में
भ्रमण से ही अपनी खोज यात्रा का श्रीगणेश करते हैं। डाॅ. शकुन्तला किरण के अनुसार—‘ऋग्वेद में पितृ-पूजा से सम्बन्धित कथा-सूत्र या कथात्मक चिह्न मिलते
हैं। ऋग्वेद के ‘छोटे बीज’ (संवाद सूत्र) ‘संहिता’ से आरम्भ होकर उपनिषदों और
पुराणों में से होते हुए आख्यान-काव्यों तक पहुँच गए जिनमें कल्पना का पुट भी है।
अथर्ववेद में ऋग्वेद की अपेक्षा कथात्मक चिह्न अधिक मिलते हैं। इन कथाओं में
अलौकिकता, आध्यात्मिकता और सृष्टि-रहस्यमूलक व्याख्या है।
वेदों में इन कथा-सूत्रों को लघुकथा में बाँधने वाले ‘ब्राह्मण’ तथा ‘आरण्यक’
साहित्य हैं।’
शेष आगामी अंक में…
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ज्ञानवर्धक आलेख...
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