रविवार, 3 जुलाई 2022

यह पत्र अमूल्य मेडल है

[अनेक मित्रों के अनेक पत्र आते हैं; लेकिन निश्छल अभिव्यक्ति वाले विरले ही होते हैं। जीवन में ऐसे पत्र किसी मेडल से कम नहीं होते। यह पत्र भी मेरे सीने पर किसी अमूल्य मेडल से कम नहीं। इस सौभाग्य के लिए 'आभार' बहुत छोटा शब्द है और गैर-जरूरी भी। हाँ, इतना अवश्य कहूँगा कि जोधपुर ने मुझे अपेक्षा से अधिक ही दिया। प्रस्तुत है मूल पत्र और उसकी प्रतिलिपि भी।]

प्रेम प्रकाश व्यास 

श्री कैलाश कुंज, 17- ई- 716, चौपासनी हाऊसिंग बोर्ड, नंदनवन, जोधपुर-342008 राजस्थान 

मोबाइल : 8696477006


आदरणीय बलराम जी अग्रवाल साहब,

सादर अभिवादन

जयनारायण विश्वविद्यालय के बृहस्पति सभागार में, परम सम्माननीय माधव जी नागदा के पुरुस्कार समारोह में, आपके लेखकीय संसार से परिचय हुआ। आपका सम्बोधन वस्तुत: मेरे जैसे श्रोता के लिए तो एक कक्षा में बैठकर, भाषा प्रवक्ता के शिक्षा प्राप्त करने जैसा था। आपने जिस प्रकार भाषा, कहानी लघुकथा व अन्य विधाओं पर गवेषणात्मक वक्तव्य दिया, वह मेरे लिए प्रथम अभूतपूर्व अनु‌भव था। विगत कई वर्षों से कहानी लेखन के पश्चात् वर्ष 2014 में प्रथम कहानी संग्रह प्रकाशित किया था। उसकी एक प्रति आपको प्रेषित कर रहा हूँ, इस आशा के साथ कि आप अपने व्यस्ततम कार्यक्रम के से, यदा-कदा कुछ समय निकालकर इसे पढ़कर, दो पंक्तियाँ इस लेखक को भी प्रेषित करेंगे। (यहाँ यह भी उल्लेख करना चाहूँगा कि, आपके पास तो प्रतिदिन न जाने कितने लोकद्रों की कितनी पुस्तकें डाक से इसी अपेक्षा में आती होगी, यह मैं जनता हूँ !) 

मेरे अल्प लेखकीय जीवन में, मुझे स्मृति में नहीं आता, जब मैने कभी ऐसा विश्लेणात्मक व्याख्यान, हिन्दी कहानी को लेकर सुना हो, जैसा उस अवसर पर आपसे सुना।

आपसे संवाद की आकांक्षा के साथ।

विनीत

(हस्ताक्षर)

प्रेमप्रकाश व्यास

संलग्न : कहानी संग्रह 'अंकित व अन्य कहानियाँ


पुनश्च : अगस्त 2022 में दूसरा कहानी संग्रह 'जुगलबंदी' प्रकाशित हो रहा है। उसे भी आपको प्रेषित करने की आज्ञा चाहूँगा।


कथाकार  प्रेम प्रकाश व्यास, जोधपुर 

जन्म 1955 जोधपुर, विश्वविद्यालय से ही एम. एससी., वनस्पतिशास्त्र, बी. एड. एम. एड., एम. बी. ए. कर शिक्षा विभाग में नौकरी की। पूरा कार्यकाल बाड़मेर में ही व्यतीत किया और जिला शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्त।

लेखन का प्रारंभ पत्रकारिता से। उस समय के समाचार-पत्रों जलते दीप, तरुण राजस्थान व जनगण में लगातार विज्ञान विषयक कॉलम निरंतर दस वर्षों तक लिखते लिखते कविता लेखन प्रारंभ। कविता-संग्रह 'तितलियाँ' का प्रकाशन भी बाड़मेर में । साथ-साथ कहानियाँ भी लिखी।

प्रारंभिक दौर की कहानियाँ छपीं, पर वे अपरिपक्व-सी थी। कालांतर में हंस, कथाक्रम, सम्बोधन, मधुमती, इतवारी पत्रिका में कहानियाँ छपी।

लेखन मानसिक परितृप्ति के लिए अनिवार्य-सा लगता है, इसलिए लेखन जारी ही रहता है। 'हंस' को भेजी इसी संग्रह की लम्बी कहानी 'अंकित' को राजेन्द्र यादव जी ने लौटाते समय, हाथ से लिखा छोटा-सा पत्र साथ में भेजा था, "कहानी बहुत अच्छी है, पर इसे सम्पादित कर छोटी कर दें तो छप सकती है।" प्रयास किया पर न कर सका। सो छपी नहीं। पर एक सबक लिया, जो कुछ लिखा है, उसे बदलना नहीं, भले ही न छपे।

संप्रति : चौपासनी शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में प्राचार्य।

पता : श्री कैलाश कुंज 17-ई-76, चौपासनी हाउसिंग बोर्ड, जोधपुर। 

मोबाइल: 86964-77006

मेरी स्मृति में लघुकथा कार्यशाला : जया आर्य 

मध्यप्रदेश हिंदी लेखिका संघ द्वारा अयोजित 

लघुकथा पर कार्यशाला- दिनांक 23.7. 2017 


मुख्य अतिथि : आदरणीय श्री बलराम अग्रवाल

अध्यक्षता : आदरणीया श्रीमती अनिता सक्सेना

संयोजिका : लघुकथा विशेषज्ञ श्रीमती कांता रॉय।

आदरणीय, मैं जया आर्य तमिल भाषी हूँ। ब्रॉडकास्टर, ट्रेनर और सोशल वर्कर हूं। मध्यप्रदेश की सबसे सीनियर विविध भारती की ख्याति प्राप्त उद्घोषिका रही। अपने समर्पण के कारण शांतिनिकेतन महिला कल्याण समिति की अध्यक्ष होते हुए महिलाओं, बच्चों और नशे से पीड़ित युवकों के शिक्षण-प्रशिक्षण और पुनर्वास का कार्य किया। प्रदेश के जेलों में और शासन द्वारा संचालित सम्पूर्ण साक्षरता अभियान में राष्ट्रभाषा परीक्षायें संचालित कीं। प्रत्येक परीक्षा में उतीर्ण होने पर कैदियों को सज़ा में दो महीने की छूट मिलती है।

तीन बार प्रदेश के राज्यपाल द्वारा सम्मानित। एक बार त्रिपुरा के राज्यपाल द्वारा सम्मानित। सुनामी पीड़ितों के लिए कार्य करने पर मुख्य सचिव द्वारा सम्मानित। रोटरी में प्रेजिडेंट और सेक्रेट्री बन झुग्गियों में काम कर बेड प्रेसीडेन्ट और बेड सेक्रेटरी एवार्ड लिया।

सेवानिवृत्त होकर दो वर्ष तक इंडस्ट्री में एच आर हेड का कार्य किया। इसके लिए मुम्बई पॉलिटेक्निक से एच आर, हेल्थ एनवायरनमेंट एंड सेफ्टी, आई एस ओ 2001-2008 में सॉफ्ट स्किल्स में डिप्लोमा कोर्स किया। अमेरिकन इंस्टीट्यूट टेसोल से ट्रेनर्स ट्रेनिंग कर अब बैंक और कॉलेज में ट्रेनिंग देती हूँ।

मेरी विदेश यात्राएँ

1.अंतर्राष्टीय प्रौढ़ शिक्षा संघ द्वारा आयरलैंड में आयोजित कॉन्फ्रेंस--1992 में।

2.वाशिंगटन में अंतरराष्ट्रीय संस्था सेड़पा द्वारा कोच की ट्रेनिंग--1996 में।

3. अंतरराष्ट्रीय रोटरी फाउंडेशन द्वारा आयोजित कांफ्रेंस बैंकॉक--2008 में।

4. सातवाँ अंतरराष्ट्रीय विश्व हिंदी साहित्य सम्मेलन यूरोप हंगरी--2017 में (साहित्य गौरव सम्मान से सम्मानित)।

५. यू एस--व्यक्तिगत यात्रा 8 बार।

बड़े सम्मान के साथ मैं आदरणीय बलराम अग्रवाल जी का कार्यशाला का वृत्तांत प्रस्तुत करती हूँ।

आदरणीय कांता जी के संपर्क में आकर लेखन कार्य आरंभ किया। फेसबुक पर कथा लिखना समझ से परे था, पर परिंदों के बीच पहुंची। विषय मिले। स्पष्ट मार्गदर्शन मिला। इस प्रकार मैं कह सकती हूं कि एक अनाड़ी को इन्होंने कथाकार बना दिया। प्रोत्साहन अनिता सक्सेना जी और उषा जैसवाल जी ने भी दिया, पर लघुकथा की बारीकियों पर बार-बार चोट कर, प्रहार किया। मैं तो लेखन कार्य टाइपिंग और फेसबुक के माध्यम से जानती ही नहीं थी। अब गर्व के साथ बताना चाहूंगी कि लघुकथा की विधा को जैसे कांता जी ने सुझाया, वही सब आदरणीय बलराम अग्रवाल जी ने  विस्तार से कहा।

23 जुलाई, 2017 को प्रतीक्षा थी माननीय श्री बलराम अग्रवाल जी की। बाबत ही सहज व्यक्ति के समान आपने सभागृह में प्रवेश लिया। हमने बुज़ुर्ग व्यक्ति की कल्पना की थी।

आपने किसी औपचारिकता की अपेक्षा नहीं की। आपका स्वागत पुस्तक और स्वागत भाषण से हुआ। फिर आपका वक्तव्य।

उन्होंने कहा--लिखते समय हम विद्वान न हो जाएँ। तुलसीदास जी ने अवधी में लिखा जो आमजन की भाषा है। गांधी जी आमजन के नेता थे। स्वामी विवेकानंद ने आम जनता के लिए आंदोलन किया। स्व-विवेक से लिखें।लेखन नीरस न हो, रसपूर्ण हो, शुष्कता न हो, कथानक और कथ्य में अंतर समझना चाहिए। लघुकथा कहानी का संकुचन नहीं है, चुटकुले से भी लघुकथा आरम्भ हो सकता है। शुरुआत में सभी दूसरों के समान बनना चाहते हैं। जैसे लता मंगेशकर जी ने नूरजहाँ के समान गाया, मुकेश ने के. एल. सहगल के समान गाया। बाद में उनकी कला निखरी और पारंगत हुए। अपनी स्वयं की शैली विकसित की।

हमारा शब्द भंडार विकसित होना चाहिए। इसके लिए अध्ययन करना चाहिए। संवाद बोलचाल के हों। रचना में स्वतः प्रौढ़ता आती जाएगी। साहित्यिक कार्यो में लगने के लिए धन भी खर्च करना पड़ता है। पुस्तकें खरीदिए। स्तरीय संस्थाओं से जुड़िए।

लघुकथा दृश्यात्मक हो। लिखा हुआ दृश्य की तरह दिखाई देनी चाहिए। व्यंग्यात्मक हो और कलात्मक हो। उसे एक बार लिखकर दूसरी बार, तीसरी बार लिखें, स्वयं पढ़ें। निखार आएगा।प्रौढ़ता अपने आप में एक वरदान है।

उन्होंने कहा श्याम सुंदर व्यास और कृष्ण कमलेश की लघुकथाएं पढ़ें।

कालखंड दोष से मुक्त हों। कथानक विस्तार न हो, पर पाठक को सोचने को बाध्य कर दे।

जो कुछ कहना हो पात्रों से कहलवाएँ, स्वयं उपस्थित न हों। पाठक की समझ पर विश्वास करें।

समर्पित लेखन दिशा प्रदान करता है।

बाद में प्रश्नोत्तरी हुई। स्वच्छन्द वातावरण में हम जैसे नव-लेखकों के शंकाओं का समाधान हुआ।

आभार के साथ सत्र का समापन हुआ। 

कांता जी जो हज़ारों परिंदों को मार्गदर्शन देती हैं, खमोशी से सुनती रही और मार्गदर्शन देती रही।

आभार उपाध्यक्ष श्रीमती राधारानी चौहान ने प्रस्तुत किया।

धन्यवाद।

जया आर्य

D4 शालीमार गार्डन,  

कोलार रोड, भोपाल-462042 म प्र
aryajaya@yahoo.com
Mobile -9826066904

मंगलवार, 31 मई 2022

लघुकथा : सृजन और चुनौतियाँ/बलराम अग्रवाल

  (दिनांक 29-5-2022 को जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के कुलपति कार्यालय परिसर स्थित वृहस्पति सभागार में कथाकार माधव नागदा को उनके लघुकथा  संचयन 'माटी की महक' के लिए अखिल राजस्थान स्तरीय आचार्य लक्ष्मीकांत जोशी साहित्य सम्मान के अवसर पर 'लघुकथा : सृजन और चुनौतियाँ' विषय पर दिया गया व्याख्यान।)

सृजन मनुष्य के जिंदा रहने का एक तरीका, एक औजार है।

भले ही पात्रों के माध्यम से अथवा जगह-जगह पर नैरेटर मे माध्यम से, कहानी और उपन्यास में वस्तुत: जितना चाहता है, लेखक बोलता है; जबकि लघुकथा में लेखक का मौन और उसका द्वंद्व बोलता है। ब्यौरों की भरमार अनजाने ही कथ्य को गौण और कथानक को मुख्य बना देती है जिससे लघुकथा की लगभग हत्या हो जाती है।

सृजन का मूल संबंध विचार से है। विचार


में सरोकार भी शामिल है। जैसे ऊर्जा—धनात्मक और ॠणात्मक—दो प्रकार की होती है वैसे ही विचार भी सकारात्मक और नकारात्मक होता है। सकारात्मक विचार सदैव सृजन की ओर, निर्माण की ओर गतिशील रहता है; और नकारात्मक विचार ध्वंस की ओर; लेकिन आवश्यक नहीं कि प्रत्येक ध्वंस को नकारात्मक विचार से ही जोड़ा जाए। कभी-कभी, कभी-कभी क्या अक्सर, निर्माण को भी ध्वंस की राह से गुजरना होता है। इसी बिंदु पर सरोकार अपनी सार्थकता प्रकट करते हैं; प्रकट भी और सिद्ध भी। सृजन के लिए आवश्यक है कि वैचारिकता के पूर्व-निर्मित ढाँचे से, उनके खंडहरों से मुक्ति पा ली जाए। माना कि बहुत-से खंडहरों का अपना महत्व होता है, अपना गौरवशाली इतिहास होता है; लेकिन  पुरातात्विक महत्व के कुछ ही खंडहर होते हैं, सब नहीं।


प्रत्येक सृजन के या तो पुरातन या फिर तात्कालिक संदर्भ होते हैं। सृजन क्योंकि विचार का अनुगमन करता है इसलिए अन्तर-आनुशासनिक संदर्भ में इन दोनों के बीच एक द्वंद्व का स्थापित होना आवश्यक है। समकालीन लघुकथा के संदर्भ में सृजन और विचार के द्वंद्व से विकसित ‘एप्रोच’ नयी रचनाशीलता को जन्म दे रही है।

मनुष्य अपने परिवेश की अनदेखी करके


साहित्य सृजन करे, यह सम्भव नहीं है। रचनाकार जिस परिवेश में रहता है और उस समूचे परिवेश की प्रेरक अथवा नीरस जिन परिस्थितियों से वह प्रभावित होता है, वे उसमें एक नया परिवेश निर्मित करती हैं और वहीं से उसके सृजन की शुरुआत होती है। सृजन और लघुकथा का संबंध ऊपरी या बाहरी नहीं है, आन्तरिक… आभ्यान्तरिक है।

प्रेमचंद हंस, अप्रैल 1932, पृष्ठ 40 ने कहा है—‘जब कोई लहर देश में उठती है तो साहित्यकार के लिए अविचलित रहना संभव नहीं होता है।’

गोपियों ने ऊधो से कहा था—ऊधो, मन न भये दस-बीस। एक हुतो, सो गयो स्याम संग।… लेकिन रचनाकार के पास एक नहीं दो मन होते हैं—एक चिंतक-मन और दूसरा सर्जक-मन। सर्जक-मन पर युग और परिवेश विभिन्न प्रकार से दबाव बनाते हैं। जो लेखक युग और परिवेश के दबावों से अछूता रहता है, वह निश्चित रूप से कृत्रिम लेखन कर रहा होता है, स्वाभाविक और स्वतन्त्र लेखन नहीं।

दृष्टि की आधुनिकता का अर्थ दृष्टि से परंपरा को विलीन कर देना नहीं है। चिंतक-मन और सर्जक-मन दोनों को तैयार करने में परंपरा की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी आधुनिकता की।

शास्त्रीयता एक अलग तरह का रूढ़-सा


शब्द हो गया है; जबकि शास्त्र अपने आप में एक व्यापक संदर्भ का आभास कराता है। वस्तुत: जीवन-उपयोगी अनेक विचारों के व्यवस्थित तथा युगानुकूल उपयोगी रूप को शास्त्र कहना चाहिए। जो शास्त्रीय व्यवस्था युग के अनुकूल उपयोगी नहीं रह पाती है, कुछेक व्यवसायियों को छोड़कर, सामान्य और प्रबुद्ध सभी जन उसको त्याग देते हैं। इसके अतिरिक्त विचारधारा किसी एक विचार अथवा सिद्धांत की ही स्थापना पर जोर देती है। यह दरअसल वह अफीम है जिसे अफीम छुड़ाने के लिए चटाया जाता है।

लघुकथा जब तक किसी एक विचार से बँधी नहीं है, तभी तक स्वतंत्र है। जैसे ही वह दक्षिण अथवा वाम में बँटेगी, स्वतंत्र नहीं रह पायेगी। कहानी और कविता के साथ ऐसा होते हम देख चुके हैं।

लघुकथा के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह स्वयं से संवाद नहीं कर पा रही। आज 50 वर्ष बाद भी संवाद के लिए वह सामने वाले का मुँह ताक रही है। जो लघुकथाएँ आत्मालोचन से गुजरकर मंच पर आई हैं, वे सर्वथा नयी लघुकथा के रूप में हमारे सामने उपस्थित हो रही हैं। विवादों से बचने की प्रवृत्ति किसी भी विधा के लिए बहुत बड़ी चुनौती हुआ करती है और स्वयं से संवाद किए बिना, आभ्यांतरिक बातचीत के रास्ते से गुजरे बिना इस चुनौती पर पार नहीं पाया जा सकता।

प्रत्येक यथार्थ के दो पक्ष हैं—बाह्य और आंतरिक। भले ही अक्सर कोई एक पक्ष महत्वपूर्ण हो जाता है; तथापि लघुकथा में ये दोनों पक्ष रहते अवश्य हैं। ये या तो संवाद की स्थिति में प्रकट होते हैं या द्वंद्व की स्थिति में। बेहतर यह है कि बाह्य और आंतरिक यथार्थ द्वंद्व की स्थिति में प्रकट हों।

अर्थतंत्र का बढ़ता प्रभाव और उपभोक्तावादी संस्कृति का विस्तार सर्जक के सामने हमेशा ही चुनौतियाँ प्रस्तुत करते रहे हैं। उपभोक्तावादी संस्कृति यानी नित नया संकट, नित नयी समस्या, नित नया आक्रोश, नित नया विस्फोट। अर्थतंत्र का बढ़ता प्रभाव यानी ईमानदार सर्जक का नयी स्थितियों से टकराव,  पैरों के नीचे नयी जमीन तलाशने की चुनौती। ऐसे में शब्द के अवमूल्यन को रोकना, नयी भाषा तैयार करना, नये मूल्य अर्जित करना ही सृजन को सार्थक सिद्ध कर सकता है। वैश्विक अर्थतंत्र के प्रभाव में आकर अर्थ का राष्ट्रीय चरित्र भी तेजी से बदलता है। उसके बदलने से बहुत-से मूल्य भी प्रभावित होते हैं। इसलिए  लघुकथाकार को यह मानकर चलना चाहिए कि सृजनकाल के प्रत्येक दूसरे दशक के अंत में विचार और भाषा के स्तर पर उसे नवीन हो जाना है।  

आलोचना यदि शास्त्र की ही पैरवी करती दिखाई दे, उसके सिद्धांतो को रूढ़ि की तरह बरते तो मेरा मत है कि वैसी शास्त्रीय आलोचना की पुनर्व्याख्या होनी चाहिए। इसका तात्पर्य शास्त्र को अलविदा कह देना नहीं है, बल्कि यह है कि उसे नये संदर्भों में समझने का साहस संजोया जाये। जीवन-मूल्यों की भी पुनरीक्षा समय-समय पर होते रहना आवश्यक है। साहित्य और उसका आलोचना-शास्त्र आँखें बंद करके पूजी जाने वाली धार्मिक पुस्तक नहीं है। दोनों को खुली आखों से देखते-परखते-बदलते रहना होता है। कोई भी ईमानदार रचनाकार शास्त्र के रूढ़ नियमों में बँधकर सृजन नहीं करता; शास्त्र को ही नवीन सृजन-संदर्भ में रचना को देखने-परखने को बाध्य होना होता है।

 लेखक को अपने युग की चुनौतियों का सामना विचार, अभिव्यक्ति और कर्मशीलता—इन तीन स्तरों पर करना होता है। इनमें से तीसरे, कर्मशीलता से सभी लेखकों का वास्ता भले ही न पड़ता हो, विचार और अभिव्यक्ति के योग को ईमानदारी से साधना चाहिए। विवेक और कहने का साहस व्यक्ति के जीवन में हमेशा ही विजयी भूमिका निभाते हैं, लेखक में तो इनका होना हर हाल में जरूरी है। औरतों और बच्चों को आगे करके सेना और पुलिस पर जो हमले कराये गये, उसके समर्थन या विरोध में कितनी लघुकथाएँ सामने आईं? नागरिकता संशोधन कानून (सी ए ए) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (एन आर सी) के विरोध में 100 दिनों तक शाहीन बाग में चलने वाले धरने के समर्थन या विऑरोध में कितने लघुकथाकारों ने कलम चलाई? उन्होंने तटस्थ बने रहने में ही भलाई समझी! रिंद के रिंद रहे, हाथ से जन्नत न गई!! दिनकर जी ने तो साफ चेताया है—जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध। समय को उसकी पारदर्शिता में प्रकट करना लघुकथाकार से सामने बहुत बड़ी चुनौती है। उससे कन्नी काटना लेखन की दुनिया में नि:संदेह अपराध कहा जाना चाहिए। ‘हमें इन सब राजनीतिक मामलों से क्या लेना यार!’ ऐसी छद्म दार्शनिकता सिखाकर बड़ी चालाकी से हमें हारना सिखा दिया गया है। आभ्यांतरिक अथवा परस्पर संवाद सिर्फ वही लोग कर सकते हैं जो विषय-विशेष के विशेषज्ञ हों। अपने समय की घटनाओं, प्रति-घटनाओं के प्रति लेखक का उदासीन बने रहना समाज-विरोधी तत्वों को मजबूत होने का अवसर प्रदान करना है। सर्जन का यथार्थ यह है कि वह स्थितियों के यथार्थ को समझकर शाहीन बाग जैसी समस्याओं का सामना करता है। उनसे सीधे-सीधे टकराता है। ‘उनसे’ से तात्पर्य है—उन जैसे उन सभी मामलों से जो मानवाधिकार के खोल में आसुरी खेल खेल रहे होते हैं या फिर वे जो असुर-जैसे डील-डौल के होते हुए भी मानवीय गुणों से भरपूर होते हैं लेकिन नजरअंदाज किए जा रहे हैं। असुर को असुर और मानव को मानव चित्रित करना ही लेखकीय विवेक है जो ‘सृजन’  को जन्म देता है।

विघटनकारी समसामयिक प्रवृत्तियों को पहचानना, उनके विरुद्ध संघर्ष में उतरने का साहस करना और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के खिलाफ विद्रोही हो उठना—ये ऐसी चुनौतियाँ हैं जिन्हें हर लघुकथाकार को स्वीकार करना चाहिए।  वस्तुत: विद्रोह और संघर्षशीलता एक प्रवृत्ति हैं जिनका लेखक में होना आवश्यक है। तटस्थता कोई मूल्य नहीं है; विद्रोह और संघर्षशीलता मूल्य हैं। अपने समय की संघर्षशीलता, परिवार, समाज, राष्ट्र और राजनीति से जुड़ी लघुकथाएँ बहुतायत में नजर आनी चाहिएँ। ऊपर से साधारण दिखने वाली अभिव्यक्तियाँ भीतर तक कचोटने और तिलमिला देने वाली सिद्ध होनी चाहिए। इस चुनौती को स्वीकार करेंगे तो लघुकथा पुन: एक नयी करवट लेगी।

लेखक सीमा पर जाकर लड़ नहीं सकता लेकिन अपनी सीमाओं और संकोचों से उसे अवश्य लड़ना चाहिए। गलत के नकार और उसके खिलाफ विद्रोह की प्रवृत्ति उसमें बनी रहनी चाहिए। यह प्रवृत्ति ही उसे भाषा के उस मोर्चे पर ले जाती है जहाँ मूल्यों की रक्षा के लिए अनगिनत लड़ाके डटे हुए हैं। इसी मोर्चे पर उसकी पहचान प्रचलित और चालू ढंग के प्रतीकों, बिम्बों और मुहावरों से होती है और इसी मोर्चे पर वह लड़ने के नये हथियार भी ईजाद करता है। यही वह मोर्चा है जहाँ रथी रावण पर विरथ रघुवीर विजय पाते हैं। यही वह मोर्चा है, जहाँ लड़ाकों की जीत ही जीत है। यही वह मोर्चा है जहाँ सृजन की नयी नींव रखी जाती है।

आज की भौतिकवादी व्यवस्था में तरक्की और संघर्ष के अर्थ बहुत सिकुड़-से गये हैं। इस संकुचन से बाहर निकलने को लेखक लगातार हाथ-पैर मार रहा है; लेकिन परिस्थितियाँ इतनी अधिक विकट हैं कि उबरने और धँसने का उसका अनुपात अक्सर बिगड़ा हुआ मिलता है।

नरेन्द्र मोहन की एक कविता है—हँसते-हँसते। देखिए :

सन्नाटा तानाशाही की जान है

और हँसी सन्नाटे के सीने में धँसता हुआ तीर।

हँसते-हँसते जान ले लोगे क्या!

संवेदनात्मक तनाव की मनोदशा को विचार और बिंब से संतुलित रखने के कौशल से युक्त बलराम अग्रवाल की लघुकथा ‘चश्मदीद’ देखिए—

“कत्ल के समय तुम कहाँ थे?”

“वहीं था।”

“वहीं! मतलब कत्ल की जगह?”

“जी।”

“तुमने क्या देखा?”

“वह छुरा लेकर आया और फच्च-से मेरे सीने में भोंक दिया!”

“फिर?”

“उसकी इस हरकत पर मुझे हँसी आ गयी और अगले ही पल…!”

“डरो मत। क्या हुआ अगले ही पल खुलकर बताओ।”

“हुजूर, अगले ही पल वह जमीन पर गिर पड़ा। कुछ देर तड़पा और ठंडा पड़ गया! सच कहता हूँ हुजूर, मैं तो सिर्फ हँसा था।”

उदाहरण के लिए अपनी ही लघुकथा उठाने ले लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। इस लघुकथा में ब्यौरों की भरमार नहीं हैं, विचार और बिंब हैं, संवेदनात्मक तनाव है। विचार और बिंब को, रूपक, संकेत और अन्योक्ति को समकालीन लघुकथा की रीढ़ कहा जा सकता है। ब्यौरों के विस्तार से लघुकथा का कला-पक्ष आहत होता है और सामान्य रचनाओं की भीड़-भाड़ में उसके खो जाने का खतरा बढ़ जाता है। साधारणीकृत विचार, संतुलित प्रतीक और बिंब तथा अनुशासित ब्यौरों के प्रयोग से कथाकार एक बेहतर लघुकथा रच सकता है।

एम-70, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032

मोबाइल : 8826499115

शुक्रवार, 18 मार्च 2022

बचपन की होली / बलराम अग्रवाल

बेतरतीब पन्ने-16


होली का आगमन वसंत पंचमी के दिन से मान लिया जाता था। उस दिन कुल्हाड़ी और बाँक (लकड़ियाँ फाड़ने का घरेलू औजार) लेकर हम लोग जंगल की ओर निकलते थे। बाबा राजराजेश्वर महादेव मन्दिर की सीढ़ियों के आगे वाली खुली जगह पर उन्हें ला रखते थे। बुजुर्गों की ओर से यद्यपि निर्देश यह होता था कि सिर्फ सूखे दरख्त लाए जाएँ, हरी डाल कोई न काटी जाए; बावजूद इसके हमें हरी डालें काटकर लानी पड़ती थीं। कारण यह कि सूखे पेड़ों पर या तो हमसे पहले ही पहुँच चुके दल या हमसे मजबूत दल काबिज हो चुके होते थे। भारी-भरकम हरे तनों की हैसियत हमारे सामने पराजित योद्धा जैसी होती थी और उन्हें हम ऐसे लाते थे जैसे विजयी होकर पराजितों को टाँग से पकड़कर घसीटते हुए ला रहे हों। 
 
सुबह के गये हम लोग दोपहर बाद तक लौट पाते थे। हरे तनों को लाकर परम्परा से चली आ रही, होलिका जलने वाली नियत जगह पर रख दिया जाता था। उसके बाद अपने-अपने घरों की ओर रुख। घर पर फिर यह गत होती थी कि ‘होलिका’ लाने-सजाने का सारा उत्साह समाप्त हो जाता था। 
 
और शाम को, अपने-अपने दफ्तरों, दुकानों, विद्यालयों से मुक्त पिता-लोग होलिका में सूखे तनों की बजाय जब हरे तनों को रखा देखते थे, तब किसी को भी साफ-साफ यह पता नहीं चलता था कि उन्हें लाने में किस-किस ने पसीना बहाया था। हालाँकि अनुमान तो सभी होता था; लेकिन साफ-साफ पता नहीं चल पाता था। पता चल पाता तो खून के आँसू रुलाना तय था। 
 
और उसी दिन से शुरू होता था—बच्चों द्वारा ‘होली का चंदा इकट्ठा करना’। इसके लिए मछली पकड़ने वाले कांटे की मदद ली जाती थी। 
 
चौक बाजार में पुराने कांग्रेस कार्यालय के पास थी—मुसद्दी लाला की दुकान। मांझा, हुचका, पतंग आदि के तो शहर में वह जैसे थोक-विक्रेता ही थे। मछली पकड़ने का कांटा भी उन्हीं की दुकान पर मिलता था। उस कांटे को थागे में बाँधकर एक लड़का किसी ऊँचे मकान की छत पर बैठता था। गली के आरपार गुजर रही बिजली के तारों की लाइन के ऊपर से उस काँटे को नीचे लट दिया जाता था। दो-तीन लड़के उस कांटे को पकड़कर नीचे, किसी चबूतरे पर या किसी मकान के दरवाजे की आड़ में छिपते थे।
 
उन दिनों अधिकतर लोग गांधी टोपी पहनकर चलते थे। छिपे हुए लड़कों को इंतजार रहता था, किसी टोपीधारी के गली से गुजरने का। जैसे ही कोई नजर आता, सब के सब चौकन्ने हो जाते। उस व्यक्ति के अपनी रेंज में आते ही कांटे वाला लड़का पीछे से उसकी टोपी में कांटा रख देता था और जाकर छिप जाता था। उसके छिपते ही धागा ऊपर को खींचना शुरू। इसके साथ ही उस सज्जन पुरुष की टोपी हवा में झूल जाती थी। उसका हकबका जाना तय था। फिर नीचे, गली में इधर-उधर छिपे लड़के बाहर निकलते थे—“ताऊ (या बाबा, चाचा)! बुरा न मानो होली है!”
 
वह हैरान-परेशान-क्रोधित।
 
“होली का चंदा ताऊ!” लड़के दूरी बरतते हुए हाथ पसारते। 
 
समझदार, खुश-मिजाज और बाल-बच्चों वाले, पर्व का आनंद लेने वाले लोग इसे उन विशेष दिनों की सामान्य घटना मानकर जेब से निकाल, एक पैसा चंदा पकड़ा देते थे। कुछ इसे ‘टोपी उछलने’ के अर्थ में ग्रहण कर बहुत क्रोधित हो, गाली-गलौज करते थे। गाली-गलौज करने वालों में कुछ चंदा देकर टोपी छुड़ा ले जाते थे और कुछ टोपी की चिंता छोड़, गाली-गलौज देते हुए आगे बढ़ जाते थे।ऐसे लोगों को हममें से कोई एक बहुत-आगे पहुँच जाने पर उसकी टोपी पकड़ा आता था; और डरा हुआ वह बेचारा टोपी को अपने सिर की बजाय जेब के हवाले करके आगे का रास्ता नापता था।
 
इसी शैतानी में एक खेल और होता था। आलू को दो हिस्सों में काट, उन कटे हुए हिस्सों पर फूल आदि उकेरकर ठप्पा बनाना और स्टैम्प-पैड जैसी किसी सतह पर उस ठप्पे के फूल को रंगकर लोगों की पीठ पर छापकर भाग जाना। मजे की बात यह थी कि आलू के ठप्पे बनाने में पिताजी भी हमारी मदद कर दिया करते थे। 
 
यही कारण था कि लोग उन दिनों होली के पर्व से कुछ दिन पूर्व ही कामचलाऊ ऐसे कपड़े पहनकर घर से निकलना शुरू कर देते थे, ठप्पा आदि लग जाने के कारण जिनके खराब होने की चिंता में अधिक सूखना-सोचना न पड़े। रंग वाली होली से हफ्तों पहले ही बच्चे घर की छतों पर चढ़कर राहगीरों पर रंग फेकना शुरू कर देते थे। यहाँ भी टोपी ऊपर खींचने जैसा ही माहौल बनता था। कई ऐसे लोग, जो किसी काम से कहीं जा रहे होते, रंग पड़ने पर खासे नाराज होते थे। 
 
राहगीर और बच्चों के आभिभावकों के बीच परस्पर झगड़े भी हो जाया करते थे। जैसे-जैसे लोगों को यह अहसास हुआ कि किसी काम से निकले राहगीर पर रंग डालकर उसके कपड़े खराब कर डालना सभ्य समाज की निशानी नहीं है, उन्होंने बच्चों को रोकना शुरू कर दिया। समय के साथ-साथ टोपी पहनने के चलन में कमी आयी तो मुसद्दी लाला की दुकान पर मछली पकड़ने के कांटे की बिक्री भी बंद हुई। 
 
जैसे-जैसे हम सभ्य हुए, वैसे-वैसे आलू को काटकर कशीदा बनाने की कला का भी खात्मा होता गया।
 
17-3-2022 / 16:00 (चित्र साभार)

गुरुवार, 17 मार्च 2022

पिताजी के आगे टोटका भी हुआ फेल…/बलराम अग्रवाल

बेतरतीब पन्ने-15
 

आगे, एक समस्या और थी। किसी को बिना कुछ बताए लगातार 3 घंटे तक घर से और मुहल्ले से भी गायब रहना। इसका उपाय यह किया कि… उन दिनों बहुत-से लोगों के पास इंटरवल तक ही पिक्चर देखने का समय होता था। ऐसे लोगों से 1 रुपये वाली टिकट 50 पैसे में और 70 पैसे वाली टिकट 30-35 पैसे में मिल जाया करती थी। हमने रास्ता यह अपनाया कि पिक्चर को डेढ़-डेढ़ घंटे के दो टुकड़ों में देखना शुरू किया। एक बार 35 पैसे में बेची और दूसरी बार 35 पैसे में खरीदी। लेकिन एक बार ऐसा भी हुआ कि…गोटी फँस गयी।
 
उस दिन पिताजी को किसी काम से कहीं जाना था। इसलिए सुबह ही कह दिया था—“शाम को मेरे पास आ जाना। दुकान तुझे ही ‘बढ़ानी’ है।” 
 
दीपक को ‘बुझा देना’ और दुकान को ‘बंद कर देना’ सभ्य शब्द नहीं हैं। इनके लिए ‘बढ़ा देना’ का प्रयोग चलता है। जैसे कि दिवंगत व्यक्ति के लिए ‘मर गये’ का प्रयोग असभ्य होता है। 
 
तो दुकान बढ़ाने के लिए उस दिन मुझे जाना था। लेकिन, न्यू रीगल टॉकीज में उन दिनों ‘दो बदन’ ने हल्ला बोला हुआ था। टिकट खिड़की शो शुरू होने से सिर्फ आधा घंटा पहले खुलती थी जबकि सिनेमा देखने के शौकीन एक घंटा पहले ही लाइन में आ खड़े होते थे। उस लाइन को देखकर सहज ही अंदाजा लग जाता था कि सिनेमा देखने के शौकीन लोग अनुशासन-प्रिय होते हैं। ज्यादा भीड़ होती थी तो अनुशासित करने के लिए मालिक लोग एक-दो सिपाहियों को भी चौकी से बुलवा लेते थे। वे होते थे तो अपन लाइन में लगने की जेहमत नहीं उठाते थे क्योंकि उनके रहते लाल टिकट लाल और पीली टिकट पीली ही रहनी थी, किसी भी तरह उसे ‘काला’ नहीं किया जा सकता था। 
 

फिल्म कोई भी रही हो, जबर्दस्त भीड़ बटोर रही थी। असलियत यह थी कि शुरू के 2-3 दिन सभी फिल्में जबर्दस्त भीड़ बटोरती ही थीं। नायकों में राजकपूर, राजेन्द्र कुमार, शम्मी कपूर, शशि कपूर, विश्वजीत, मनोज कुमार, धर्मेन्द्र, जॉय मुकर्जी। अशोक कुमार को कुछ फिल्मों में हालाँकि मैंने नायक के रूप में भी देखा, लेकिन हमारे समय तक वह पुरानी पीढ़ी में जा चुके थे; उस पीढ़ी पर पृथ्वीराज कपूर, सोहराब मोदी, कमल कपूर आदि काबिज थे। उन दिनों की फिल्मी कहानियों में कॉमेडियन और खलनायकों के लिए जगह अवश्य रखी जाती थी। कॉमेडियन्स में जॉनी वॉकर और महमूद प्रमुख थे। इनके अलावा तो असित सेन, जगदीप, मोहन चोटी, सुन्दर, मुकरी यहाँ तक कि ओमप्रकाश भी कॉमेडियन का रोल कर लिया करते थे। खलनायकों में प्राण, मदन पुरी, प्रेम चोपड़ा थे। फिल्मी संसार में किशोर कुमार का स्थान बहुत अलग बैठता है। वह गायक, कॉमेडियन, एक्टर, निर्माता सब-कुछ थे। 
 
मेरी जेब में 70-75 पैसे पड़े थे। सोचा—30 पैसे कमा ही लिए जाएँ। न्यूरीगल टॉकीज जा पहुँचा। ‘मामा’ यानी खाकी वर्दी वाला गायब था। मैं लाइन में जा लगा। कुछ देर बाद, जैसे ही खिड़की खोले जाने की आवाज सुनाई दी, लाइन और अनुशासन के सारे बंधन समाप्त। कूदकर जा पहुँचा आगे। छोटे कद और दुबली काया का पूरा लाभ वहीं मिलता था। धक्का-मुक्की कर एक टिकट निकाली। ललचायी नजरों से काफी देर इधर-उधर ताकता घूमता रहा। एक भी खरीदार सामने नहीं आया। झक मारकर यही सोचना पड़ा कि आधी फिल्म देख ली जाए। ‘वापसी’ बेचकर पिताजी के पास चला जाऊँगा। मरे मन से इंटरवल तक सीट पर बैठा रहा। बेशक आधी फिल्म देखी भी; लेकिन मन कहीं और था इसलिए समझ में कुछ नहीं  आया। 
 
इंटरवल हुआ। टिकट के अद्धे को दिखाता हुआ मैं बहुत देर तक बाहर घूमता रहा। लेकिन साढ़े साती थी उस दिन! ‘वापसी’ खरीदने वाला भी एक भी कम्बख्त नहीं मिला। एक बार फिर झक मारी। वापस हॉल में जा बैठा। 35 पैसे का नुकसान उठाकर पिताजी के पास चले जाना मन को गवारा न हुआ। वह लालच भारी पड़ गया। वह शायद अकेला ही ऐसा अवसर था जब अपनी पसंदीदा फिल्म देखकर भी मन खुश नहीं था। दायित्वहीनता के एहसास से सिर भारी, बदन भारी, चाल भारी…! 
 
फिल्म खत्म हुई। भीड़ ने न्यू रीगल के पिछले गेट से बाहर निकलना शुरू किया। दिमाग ने अब पिताजी की मार से बचने के उपायों के बारे में सोचना शुरू कर दिया। 
 
इत्तेफाक की बात थी कि उसी दोपहर को एक दोस्त ने एक टोटका बताया था। कहा—“बलराम, सड़क से दो खिट्टे (खिट्टा यानी कुल्हड़ आदि मिट्टी के किसी बरतन का टुकड़ा) उठाओ। उनमें से एक के ऊपर थूककर उस दूसरे वाले से थूक को ढक दो। इन दोनों को किसी पेड़ की जड़ में रखकर आगे को निकल जाओ। पीछे मुड़कर कतई मत देखो। काम हर हाल बनेगा ही बनेगा।” 
 
बचने के उपाय सोचते हुए मुझे यह टोटका याद हो आया। सड़क से दो खिट्टे उठाए। एक पर थूका और दूसरे को उस पर ढककर सड़क किनारे वाले एक नीम की जड़ में रखकर आगे, घर की ओर बढ़ गया। घूमकर पीछे देखने का तो वैसे भी कोई मतलब नहीं था। 
 
घर के अंदर दाखिल हुआ। माताजी ने पूछा—“कहाँ चला गया था?”
 
“एक दोस्त के घर गया था।” मैंने लापरवाही से उत्तर दिया।
 
“कौन-से दोस्त के घर?” यह सवाल मेरे पीछे-पीछे घर में घुस आये पिताजी ने किया था। 
 
“मुंशीपाड़े में रहता है एक।” इस बार मैं लापरवाह रवैया न अपना सका था। 
 
यह सुनना था कि पिताजी की कठोर हथेली का झन्नाटेदार एक झापड़ मेरी कनपटी पर पड़ा। 
 
“झूठ बोलता है! फिल्म देखकर नहीं आया है?” पिताजी चीखे।
 
“नहीं तो।” मैं मेमने-सा मिमियाया। सोचा—पिताजी तुक्का मारकर सच उगलवाना चाह रहे हैं।
 
‘नहीं तो’ कहते ही एक और पड़ा, फिर एक और… एक और! बहुत पिटाई हुई। चीखने की आवाज घर के आँगन से निकलकर कुएँ की जगत पर बैठकर स्वीप खेल रहे मोहल्लेदारों तक जा टकराई। मुझे पिटाई का उतना दुख नहीं था, जितना टोटके के फेल हो जाने का। पहली ही बार में फेल हो गया था कम्बख्त! कम से कम आज, एक बार तो चला होता। चलो, यह भी अच्छा ही रहा कि बानगी में ही साले की जात पहचान में आ गयी थी।
 
हुआ यों कि मेरे न पहुँचने से नाराज पिताजी को खुद ही दुकान बढ़ानी पड़ गयी। वह घर आये। मेरे बारे में पूछा कि मैं कितने बजे घर से निकला था; और अनुमान के आधार न्यू रीगल के निकास द्वार पर एक ओर को जा खड़े हुए। फिल्म समाप्ति की भीड़ के साथ मुझे वहाँ से निकलते देखा। टोटका करते देखा। रास्ते में और भी जो-कुछ किया होगा, सब देखा और शब्दश: बताते हुए हर हरकत पर एक के हिसाब से झापड़ जड़ते गये। एक हाथ से मुट्ठी मे जकड़ी कलाई को मरोड़ते और दूसरे से झापड़ जड़ते हुए डाँटते--"नजर नीचे… नजर नीचे!"
 
उस दिन पैसों का लालच छोड़कर कर्त्तव्य-निर्वाह पर ध्यान दिया होता तो टोटका न करना पड़ता, टोटका न करना पड़ता तो उसके बारे में भ्रम बना रहता, भ्रम बना रहना ही हर टोटके के अस्तित्व और उसकी सफलता का रहस्य है। टोटका फेल न होता तो पिताजी के हाथों इतना न पिटना पड़ता कि बाद में खुद उन्हें भी दुखी होना पड़ा। सन्तान की पिटाई करके कोई भी पिता (या माँ) चैन से नहीं सो पाता है, लेकिन इस सच्चाई से हर शख्स पिता (या माँ) होने के बाद ही रू-ब-रू हो पाता है, उससे पहले नहीं।
(चित्र साभार)

सिनेमा टिकटों की ब्लैक-मार्केटिंग / बलराम अग्रवाल

बेतरतीब पन्ने-14

‘दोस्ती’ का पढ़ाकू युवक पिताजी के माध्यम से कई साल तक परेशान करता रहा। उससे पहले हमारा पड़ोसी सहपाठी था, जिसकी वजह से अक्सर ही कान-खिंचाई हो जाया करती थी। 
 
उन दिनों साइकिल के रिम को लकड़ी या लोहे की एक डंडी की मदद से सड़कों पर घुमाने का खेल ही मुहल्ले से बाहर तक जाता था। अन्यथा अधिकतर खेल मुहल्ले की सीमा में ही खेले जाते थे। आपस में हम अनेक तरह के जो खेल खेला करते थे उनमें कंचे, गुल्ली-डंडा, कबड्डी, गेंद-तड़ी, सिगरेट की डिब्बियों के खाली पैकेट्स को एक गोल घेरे के बीचों-बीच रखकर दूर खींची एक रेखा पर खड़े होकर चपटे पत्थर से निशाना लगाकर उन्हें निकालना, बीड़ी-बंडलों के रैपर्स से ‘जुआ’ खेलना आदि-आदि। कंचे, गुल्ली-डंडा, गेंद, सिगरेट के पैकेट्स और बीड़ी-बंडल्स के रैपर हमारी अमूल्य संपत्ति हुआ करती थी। 
 
हम जब मगन-मन गली में खेल रहे होते थे, हमारे उस पड़ोसी सहपाठी की नजर बाजार से या मन्दिर से घर की ओर चले आ रहे हमारे पिताजी पर पता नहीं कैसे पड़ जाती थी! मैं आज भी उसकी तेज नजर का कायल हूँ और सोच नहीं पाता हूँ कि वह कैसे पिताजी के आने को भाँप जाता था। इस इंटेलिजेंस की बदौलत उसे जरूर ही ‘रॉ’ में प्रवेश मिलना चाहिए था। अपने जाने की भनक लगाए बिना वह खेल के बीच से पता नहीं कब गायब हो जाता था। घर के भीतर से बस्ता लाकर आनन-फानन में अपने चबूतरे पर ला पटकता था। सुन्दर लिखाई में लिखी अपनी तख्ती को सुखाने के बहाने दीवार पर चढ़ चुकी धूप के साये में खड़ी करता और कोई भी किताब हाथ में ले, बोल-बोलकर पढ़ना शुरू कर देता था। इतनी तेज आवाज में कि, अपने ही विचारों में मग्न पिताजी की विचार-श्रृंखला उसकी आवाज से टूट जाए। वह उसे पढ़ता देखते और घर में घुसने की बजाय मेरे इलाज के लिए आगे बढ़ आते। गली में अन्य बालकों के साथ खेल रहे मेरे कान को पकड़ते और खींचकर घर ले जाते! 
 
आगे की कहानी बताने की जरूरत नहीं है। यह किस्सा अनेक बार दोहराया जाता था लेकिन पिताजी को मैं कभी-भी यह नहीं समझा सका कि वह आपको देखकर यह ड्रामा करता है! 
 
‘दोस्ती’ के बाद फिल्में देखने का चस्का-सा लग गया। सबसे आगे वाली सीटों की टिकट उन दिनों 70 पैसे की हुआ करती थी। इन 70 पैसों के जुगाड़ के लिए 175 पेज की एक कोरी कॉपी कमीज के नीचे पाजामे में खोंसनी पड़ी थी। माताजी से कहा—“स्कूल के काम के लिए एक कॉपी लानी है।”
 
“अपने पिताजी के पास चला जा। वह दिला देंगे।” माताजी ने कहा।
 
“उतना समय नहीं है, काम करना है। अभी चाहिए।” पहली बात तो यह कि मुझे अर्जेंट कॉपी नहीं पैसे चाहिए थे! दूसरी यह कि पिताजी के पास जाने से कॉपी मिलती, पैसे नहीं। 
 
“कितने की आएगी?” माताजी ने पूछा।
 
“75 पैसे की।” मेरा मासूम जवाब।
 
माताजी ने खोज-खाजकर 75 पैसे निकाले और अपने पढ़ाकू बेटे की हथेली पर ला रखे। बेटा, सीधा सिनेमा हॉल जा पहुँचा। भीड़ बिल्कुल थी ही नहीं। ‘नेताजी सुभाषचन्द्र बोस’ जैसी रोमांसहीन रूखी फिल्म के लिए भीड़ का मतलब भी क्या था। वह तो मेरे ही मन में नेताजी के लिए अपार श्रद्धा थी। एक देशभक्त की फिल्म देखने गया था इसलिए किसी भी प्रकार का अपराध-बोध मन में होने का सवाल ही नहीं था। 
 
खिड़की पर गया। टिकट खरीदा और जा बैठा सीट पर। फिर वही, एकदम ऐसा लगा जैसे फिल्म सामने पर्दे पर नहीं, दिमाग के किसी अन्दरूनी हिस्से में चल रही है, सपने की तरह। कई फिल्में देख लेने के बाद दिमाग ने यह स्वीकारना शुरू किया कि फिल्म उसके पर्दे पर नहीं, सामने, बाहर वाले पर्दे पर चल रही होती है।
 

बहरहाल, यह चस्का जब और बढ़ा तो दूसरा रास्ता अपनाना जरूरी हो गया। माताजी से एक की बजाय दो कॉपियों के पैसे माँगने शुरू किए। पाजामें में खोंसकर कॉपी ले जाना बंद। भीड़ के छँटने का इंतजार करना बंद। फिल्म लगने के पहले-दूसरे दिन ही टिकट खिड़की पर धावा बोलना शुरू। जबर्दस्त धक्का-मुक्की के बीच 70 पैसे वाले दो टिकट निकाले। एक आदमी को दो से ज्यादा टिकट शुरू-शुरू के दिनों में देते ही नहीं थे। चार दोस्तों को देखनी होती तो दो दोस्त लाइन में लगते। 
 
दो टिकट निकाले। एक-एक रुपये में दोनों ब्लैक किए और दो रुपये लेकर घर आ गया। माताजी का डेढ़ रुपया माताजी को वापस पकड़ाया। बाकी के 50 पैसे अंटी के हवाले किए। एक-दो दिन में 20 पैसे और मिलाकर फिर जा पहुँचा। अगर अभी भी ब्लैक चल रही होती तो एक रुपये में बेचकर घर आ बैठता और भीड़ के छँटने का इंतजार करता।
(चित्र साभार)

रविवार, 13 मार्च 2022

मैं भी इन्सान हूँ, इक तुम्हारी तरह…/ बलराम अग्रवाल

 बेतरतीब पन्ने-13

‘दोस्ती’ नाम से जो फिल्म आयी थी, वह मुम्बई-दिल्ली में 1964 में रिलीज हुई थी और बुलन्दशहर पहुँची थी तीन साल बाद 1967 में

या पांच साल बाद 1969 में; ठीक-ठीक याद नहीं है। उस फिल्म को विशेषत: मुझे दिखाकर लाने की आज्ञा पिताजी ने चाचाजी को दी थी। इस बात की मुझे खुशी भी थी और आश्चर्य  भी। खुशी फिल्म देखने जाने की और आश्चर्य इस बात का कि वह आदेश निरामिष पिताजी की ओर से जारी हुआ था।


चाचाजी हमें फिल्म दिखाने ले गये। सिनेमा हॉल मेरे लिए आश्चर्य-लोक जैसा था। एक साथ बिछी इतनी सारी कुर्सियाँ पहली बार देखी थीं। एक ही जगह पर चारों ओर घूमकर पूरे हॉल पर नजर डाली। चाचाजी ने सीट पर बैठ जाने को कहा और बराबर वाली सीट पर खुद भी बैठ गये। एकाएक पूरे हॉल की सारी बत्तियाँ गुल हो गयीं। घटाटोप अंधेरा! उसी के साथ, सामने वाले सफेद पर्दे पर आकृतियाँ उभरनी शुरू हुईं। चलती-फिरती-बोलती आकृतियाँ! मुझे लगा, जैसे मैं जाग नहीं रहा, सपना देख रहा हूँ। फिल्म सामने नहीं, मेरे मानस-पटल पर चल रही थी। वह सपना हॉल से बाहर आने के बाद भी मेरे जेहन में कई दिनों तक स्थायी रहा।

फिल्म दिखाने की जो आज्ञा पिताजी ने चाचाजी को दी, उसके पीछे बाबा अल्लामेहर थे। उनके द्वारा पिताजी को सुनाई गयी उसकी वह स्टोरी थी, जिसे फिल्म देखने के अगले दिन अपनी आदत के अनुसार उन्होंने पिताजी को सुनाया था। पिताजी उससे इतना अधिक प्रभावित हुए कि फिल्में न देखने-दिखाने के अपने ख्याल को उन्होंने तिलांजलि दे दी थी। बावजूद तिलांजलि के वह स्वयं अब भी नहीं गये थे, हमें ही भेजा।

लेकिन, फिल्म देखकर आने की मेरी खुशी ज्यादा समय तक सँभल नहीं सकी। दोपहर बाद 3 से 6 वाला शो देखकर शाम 7 बजे के करीब घर में घुसे होंगे। खाना खाया और आँखों में सुखद सपने को समोए, सोने की तैयारी में ही थे कि पिताजी चिल्लाए—“क्या बजा है?”

“नौ।” ऊपर, अलमारी में टिके टाइमपीस पर नजर डालते हुए मैंने डरी-जुबान में जवाब दिया।

“अभी-अभी फिल्म देखकर आये हो, आते भी भूल गये कि वह बेचारा गली के लैम्प-पोस्ट के नीचे बैठकर रात-रातभर पढ़ा करता था! तुम्हें घर में ही लैम्प मिला हुआ है फिर भी…! नालायक कहीं का!”

‘तुझे’ की बजाय ‘तुम्हें’ कहकर वे कोई इज्जत नहीं बख्श रहे होते थे। उस ‘तुम्हें’ में दरअसल सभी भाई-बहन लपेट दिये जाते थे। उसे सुनते ही हमारी सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती थी। सब बिस्तर से उठकर अपने-अपने बस्ते की ओर दौड़ गये। मेरी समझ में आ गया कि क्यों पिताजी ने ‘दोस्ती’ दिखाने की कृपा हम पर की थी।

“नियम बना लो—रात को 10 बजे तक पढ़ना और सुबह 4 बजे उठकर बैठ जाना।” पिताजी ने पटाक्षेपपरक वाक्य कहा, “पढ़ने-लिखने के बारे में खुद कुछ नहीं सोच सकते थे, देखकर तो कुछ सीख लिया होता!”

यह अब रोजाना का किस्सा हो गया। ‘दोस्ती’ हमने देखी सिर्फ एक बार थी, लेकिन कोंचा उसने सालों-साल। फिल्म के एक गाने की लाइनें--'मैं भी इन्सान हूँ इक तुम्हारी तरह' बार जेहन में कौंध जातीं। सोचने लगा था, कि—प्रेरित करने वाली फिल्में इतनी भी अच्छी नहीं बना डालनी चाहिए कि बालकों की आजादी छीन लें, उनकी जान ही लेने लग जाएँ!

(चित्र साभार)