रविवार, 12 मई 2024

लघुकथा में मूल्य-बोध, भाग-2 / बलराम अग्रवाल

 गतांक दिनांक 11-5-2024 से आगे…

4 कड़ियों में समाप्य लम्बे लेख की दूसरी कड़ी

वैचारिक प्रक्रिया के स्तर पर मनुष्य को प्राय: हीन संदर्भों से गुजरना पड़ता है। इस प्रक्रिया में किसी सदर्भ को वह नकारता है, किसी को स्वीकारता है और किन्हीं संदर्भों में वह मौलिक अस्तित्व की ओर बढ़ता है। मनुष्य कभी स्थापित मूल्यो के प्रति संशय से गुजरता है तो भी उनकी निरर्थकता के स्तर से; कभी-कभी वह नये मूल्यों की आवश्यकता और वैचारिक अवमूल्यन के स्तरों से भी गुजरता है। इन आधारों पर मानव मूल्यों को निम्न वर्गों में रखा जा सकता है—

1. धर्म आदि की प्रधानता वाले सामाजिक मूल्य। इनमें जीवन-चक्र धार्मिक ग्रंथों या संहिताओं से आबद्ध था।

2. अनेक मानव मूल्यों का विकास अब अवरुद्ध हो गया है। ये मानव-मूल्य पूरी तरह विकसित अथवा स्थायित्व प्राप्त हैं। इनमें एक ओर प्राचीन मूल्यो के प्रति मोह प्रकट होता है और दूसरी ओर सहअस्तित्व के प्रति सजगता। तात्पर्य यह कि अतीत के प्रति मोहग्रस्तता, आस्था तथा नवीन के प्रति संशय के संघात से इन मूल्यो का जन्म होता है। कथा साहित्य में लघुकथा का उन्नयन इसी का परिणाम है ।

३. विकासशील अथवा नये मानव-मूल्य इस तीसरे वर्ग में आते हैं। वैज्ञानिक क्रान्ति तथा तकनीकी उपकरणों के निर्माण से जो सह-अस्तित्व, विश्व-बन्धुत्व आदि मूल्य सामने आते हैं, वे विकासशील मूल्य हैं। इनमें निरन्तर विकास हो रहा है। हिन्दी की समकालीन लघुकथा इन्हीं मूल्यों से प्रभावित है ।

इसके अलावा कई तरह की अन्तरंग अभौतिक प्रवृत्तियों से सम्बद्ध रहने के कारण कुछ मूल्य आत्मनिष्ठ अथवा भावात्मक हो जाते हैं। इनके अलावा आर्थिक व सामाजिक परिवर्तनों से सम्बन्ध रहने के कारण कुछ मूल्य वस्तुनिष्ठ हो जाते हैं । इस अर्थ में, हम कह सकते हैं कि समूचा मूल्य-जगत आत्मनिष्ठता और वस्तुनिष्ठता का सम्मिश्रण है। मूल्यों का विकास अक्सर ऊर्ध्व और निम्न दिशाओं में होता है। ऊर्ध्व से निम्न दिशाओं की ओर होने वाले मूल्य-विकास को पुरातनता की ओर लौटना कहते हैं ।

मानव-मूल्य कुल कितने हैं और कौन-कौन से हैं? इस जिज्ञासा का जवाब प्रस्तुत करने में विचारकों ने बहुत माथपच्ची की है। भारतीय विचारकों ने सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् तथा पाश्चात्य विचारकों ने समानता, स्वच्छंदता और भ्रातृत्व आदि मूल्यों को प्रस्तुत किया जो प्रकारान्तर से सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् का ही सरलीकृत रूप हैं। इसी क्रम में नये विचारों के जन्म के साथ-साथ स्वतन्त्रता और स्वाभिमान जैसे मूल्यों का भी उदय हुआ। मानव-जीवन में इन मूल्यो की नये सिरे से स्वीकृति हुई । ध्यातव्य है कि एक व्यक्ति के स्वाभिमान की सार्थकता अन्य व्यक्तियों के स्वाभिमान की सामाजिक स्वीकृति में निहित है ।

प्रजातन्त्र और साम्यवाद का संघर्ष भी इन मूल्यो की स्वीकृति-अस्वीकृति तथा सम्मान और अपमान पर ही आधारित है । सच यह है कि अमानवीय आधारों को लेकर कोई भी वाद पनप नहीं सकता है । यों भी, किसी वाद की स्थापना कभी अमानवीय उद्देश्य से नहीं होती है। वस्तुत: किसी वर्ग-विशेष की मानवीयता जब दूसरे वर्ग-विशेष की मानवीयता से मेल नहीं खाती है, संघर्ष तभी उत्पन्न होता है।

पूँजीवादी व्यवस्था में समाज के एक बड़े वर्ग का शोषण होता है, इस बात को नकारा नहीं जा सकता । पूँजीपति वर्ग अपने हित-साधन के लिए मजदूरों और किसानों का शोषण करता है। इस तरह, आर्थिक रूप से सम्पन्न एक मानव द्वारा आर्थिक रूप से विपन्न दूसरे मानव का शोषण होता है जोकि अनैतिक भी है और अमानवीय भी है। दोनो व्यवस्थाओं में से एक में श्रम का अभाव है तो दूसरी में पूँजी का। फिर भी, व्यक्ति या राष्ट्र को इन दोनो में से किसी एक का ही चुनाव करना होता है। हमें मानव मूल्यों की स्थापना और रक्षा के लिए पूँजी और श्रम दोनों को मिलाकर एक आदर्श-व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करना होगा। वही अधिक बेहतर सिद्ध हो सकता है ।

सवाल है कि—क्या मानवीयता के भीतर अमानवीयता को भी समाहित किया जा सकता है? उत्तर है—नहीं। क्योंकि मानवीयता एक सत्य है और अमानवीयता एक दम्भ। किसी भी सत्य में अमानवीयता के छोटे-से-छोटे अंश को भी समाहित करने सेमूल्यकी प्रकृति और पवित्रता दूषित होती है।

शेष आगामी अंक में…

(मेधा बुक्स, दिल्ली-32 से प्रकाशित पुस्तक 'लघुकथा का साहित्य दर्शन' में संकलित)

शनिवार, 11 मई 2024

लघुकथा में मूल्य-बोध भाग-1/बलराम अग्रवाल

4 कड़ियों में समाप्य लम्बे लेख की पहली कड़ी
 
जिन आलोचकों ने अभी तक लघुकथा को समझने की कोशिश नहीं की है, इसे मिसइंटरप्रेट करने में सबसे अधिक हाथ उन स्वनाम धन्य आलोचकों 
का रहा है। दूसरा महत्वपूर्ण हाथ, प्रतिष्ठा प्राप्त कुछ लघुकथाकारों का भी रहा है। उन्होंने लघुकथा में शब्द संख्या का बखेड़ा खड़ा किया। स्थानीय संस्करण वाले कुछेक अखबारों को सामान्य पाठक वर्ग के लिए चुटकुलेनुमा अथवा भावुकता की चाशनी में लिपटे कथात्मक फिलर चाहिए होते हैं। ऐसे ही फिलर कुछेक पत्रिकाओं की भी विवशता बन जाते हैं। लेकिन कुछ पत्रिकाएँ हैं जो चुटकुलों अथवा भावना-प्रधान कथाओं की तुलना में कुछ बेहतर चयन को प्रस्तुत करती हैं और लघुकथा की विधापरक यात्रा को किंचित सुगम बना पाती हैं तथापि ऐसी पत्रिकाओं की संख्या इन दिनों लगभग नगण्य है। महत्वपूर्ण समझे जाने वाले आलोचकों का मिसइंटरप्रिटेशन ही वह कारण रहा कि लघुकथा के महत्वपूर्ण मुद्दों को साफ करने के लिए लघुकथाकारों को स्वयं सामने आना पड़ा। ऐसे ही दबावों के चलते, पूर्व में नयी कविता और नयी कहानी के रचनाकारों को अपनी विधा की पैरवी के लिए आलोचना के क्षेत्र में उतरना पड़ा था। इसलिए आलोचना के इतिहास में यह पहला अवसर नहीं है, जब लघुकथा को समझने की शक्ति प्रदान करने के लिए लघुकथाकार को सृजक के साथ-साथ आलोचक और व्याख्याकार बनना पड़ा। लघुकथा की ताकत की सही पहचान कराने के लिए यदि भगीरथ, अशोक भाटिया, कमल चोपड़ा, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, सत्यवीर ‘मानव’, सुकेश साहनी, रामकुमार घोटड़ आदि रचनाकार ऐसा न करते तो बहुत सम्भव था कि लघुकथा की सही ताकत भी पहचान में न आती।

लघुकथा बहुआयामी है, यह तो सभी स्वीकार करते हैं और यह कहना आसान भी है। फिर मुश्किल क्या है? मुश्किल है उसके सभी आयामों पर खुली चर्चा करना। ऐसा क्यों? इसलिए कि आज तक लघुकथा के एक-एक रचनाकार को लेकर बात करना अभी शेप है। ‘पड़ाव और पड़ताल’ के माध्यम से मधुदीप ने एक शुरुआत की थी। उनके बाद भगीरथ और अशोक भाटिया ने लघुकथाकार केन्द्रित पुस्तकों की रचना की। ऐसे एक-दो छिटपुट कार्य और लेखकों ने किए, लेकिन वे ऊँट के मुँह में जीरा ही साबित हुए हैं। लघुकथा की प्रथम पंक्ति की एक परम्परा स्थापित हो चुकी है और इस परम्परा-बोध के लिए स्वतन्त्र आलोचकों का आगे आना नितान्त आवश्यक है। अनेक सक्षम लघुकथाकारों के सृजन का मूल्यांकन होना अभी शेष है। ‘अभी समय नहीं आया है’ कहकर लघुकथा और इसके सर्जकों की प्रथम पंक्ति के मूल्यांकन को टालना अब किसी भी दृष्टि से श्रेयस्कर नहीं कहा जा सकता।

लघुकथा में मूल्यबोध क्या है? इसका विस्तृत विश्लेपण अभी तक नहीं हुआ है। सम्पूर्ण मूल्य-प्रेक्षण एक जोखिम भरा काम है। फिर भी, कभी न कभी, किसी न किसी के द्वारा तो यह किया ही जाना है। लघुकथा में मूल्य की बात को मैंने अपने ढंग से सोचा और कहा है। बहुत सम्भव है कि कुछ मित्रों को यह पसन्द न आये लेकिन उस ना-पसन्दगी का कारण उन मित्रों को जरूर खोजना होगा । हुआ यों कि अब से कुछ वर्ष पहले, अपने एक लेख में एक लेखिका की किसी लघुकथा को मैंने निम्नतर आँका था। उसे पढ़कर हमारे एक मित्र जो उन महिला लेखिका की सहानुभूति लूटना चाहते होंगे, बोले—‘आपने इनकी लघुकथा की कटु आलोचना लिखी है क्योंकि अवश्य ही इन्होंने अपनी पत्रिका में आपकी किसी रचना को स्थान नहीं दिया होगा।’ उनका यह आकलन अत्यन्त निम्न स्तर का था। इसलिए नहीं कि उन्होंने इसे मेरे सन्दर्भ में कहा बल्कि इसलिए कि उन्होंने उक्त रचना को देखे-पढ़े बिना मेरे आकलन पर टिप्पणी करने की धृष्टता की। आलोचना कटु है या मृदु है, इसका आकलन रचना को पढ़े बिना कैसे किया जा सकता है?

लघुकथा के सदर्भ में बदलते हुए मूल्यों और प्रतिमानों की चर्चा उनके वांछित सन्दर्भों तक नहीं हुई है। वस्तुत: अपने कलागत संदर्भों में मूल्य जिस जागरूकता को उत्तेजित करते हैं, परिवर्तित मूल्यों की चेतना उस जागरूकता के परिणामस्वरूप रचनात्मक आधारों पर प्रतिष्ठित होती है ।

समकालीन लघुकथा की ‘रचनाभूमि’ प्रचलित और स्थापित मूल्यों के अस्वीकार और निषेध की ओर अग्रसर मानी जा सकती है। इस समग्र मूल्य-प्रसंग में 'मूल्यों' के पारिभाषिक स्रोत का परीक्षण अनिवार्य हो जाता है।

'मूल्य' क्या है? इस प्रश्न के साथ हम सहज ही नीतिशास्त्र की सीमाओं में प्रविष्ट हो जाते हैं। 'मूल्य' शब्द अर्थशास्त्र से आया है और वहाँ इसका प्रयोग (1) किसी वस्तु की मानवीय आवश्यकता अथवा इच्छा-पूति की क्षमता और (2) अन्य वस्तुओं से विनिमय से प्राप्त किसी वस्तु के माप के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, आधुनिक समय में वस्तु के मूल्य के रूप में मुद्रा को माना और सम्बोधित किया जाता है।

क्योंकि 'मूल्य' की स्थिति मनुष्य में है, किसी वस्तु में नहीं इसलिए 'मूल्य' की कल्पना मनुष्य को उसके पूर्ण अस्तित्व में स्वीकार करके ही संभव है । मूल्यों का निर्धारण अथवा संचालन मनुष्य ही करता है और मूल्य भी मनुष्य की आवश्यकता के अनुरूप ही बनते या बिगड़ते है। 'मूल्य' का तात्विक विश्लेषण करने के क्रम में विद्वानों द्वारा स्पष्ट कहा गया है कि आन्तरिक मूल्य मानव की इच्छा, आकांक्षा या परितोष पर आश्रित रहता है न कि वस्तु-आश्रित। इस सम्बन्ध में द्रष्टव्य है कि—'मूल्य-मान को वस्तु में नहीं, बल्कि वस्तु से उद्भुत इच्छाओं और इच्छाओं की पूर्ति के रुप में देखना होगा ।’

हमें याद रखना चाहिए कि ‘कोई भी वस्तु अपने-आप में मूल्यवान नहीं होती, बल्कि उस वस्तु से मिलने वाला सुख या आनन्द ही अपने-आप में एक मूल्य होता है। 'मूल्य' कोई मूर्त्त वस्तु नहीं, बल्कि एक अवधारणा, एक अनुभव है।

कोई भी वस्तु मूल्यवान तो हो सकती है, लेकिन वह अपने आप में मूल्य नहीं हो सकती । मूल्य अमूर्त्त है। व्यक्ति उसे भोगता है और अनुभव के स्तर पर उसे जीता है । यह अनुभव इन्द्रिय-गम्य न होकर कल्पना के स्तर का अनुभव होता है। यह अनुभव ही किसी वस्तु को मूल्यवान बनाता है। 'मूल्य' का अस्तित्व वस्तु पर नहीं, व्यक्ति की इच्छा पर आधारित होता है। हर मान्यता की अस्वीकृति के बाद मनुष्य के पास अपने अनुभव को स्वीकार करने के सिवा कोई अन्य चारा नहीं होता । मूल्य-बोध से सम्बद्ध किसी भी सवाल पर विचार करते हुए हमें इस तथ्य को दृष्टिगत रखना होगा कि—'मानव-अस्तित्व की व्याख्या के अतिरिक्त मूल्यों का कोई सदर्भ नहीं है।’

साहित्य के सन्दर्भ में अक्सर ही नैतिक मूल्य, सामाजिक मूल्य या सौदर्य-मूल्य जैसे शब्द सुनने को मिलते हैं। वास्तविकता यह है कि मनुष्य के बिना इन मूल्यों की कल्पना नहीं की जा सकती है।

मूल्य नैतिक हों, सामाजिक हों, सौंदर्यगत हों या दार्शनिक, उनका सीधा और गहन सम्बन्ध सम्वेदनात्मक व्यक्तित्व से ही होता है। इसलिए  सभी 'मूल्य', 'मानव-मूल्य' ही होते हैं। इसे हम यों भी कह सकते हैं कि, मानव-मूल्य अनिवार्यत: मानव-अस्तित्व से ही सम्बद्ध हैं। मानव जीवन में प्रयुक्त विभिन्न संस्कारों, घटना-प्रवाहों, सामाजिक दायित्वों के वैचारिक ग्रहण के अलावा किसी भी मानव मूल्य का कोई मतलब नहीं है।

शेष आगामी अंक में

(मेधा बुक्स, दिल्ली-32 से प्रकाशित पुस्तक 'लघुकथा का साहित्य दर्शन' में संकलित)

शनिवार, 20 अप्रैल 2024

लघुकथा : बाहरी-भीतरी दबावों में सामंजस्य / बलराम अग्रवाल

 

कथा साहित्य में रूपहीनता या कहें कि एबस्ट्रैशन बहुत आवश्यक है। लेखन में यह कब आता है? तब, जब नामों और शब्दों के पीछे से उनको व्यंजित करने वाली वास्तविकताएँ हट जाती हैं। इस तथ्य को समझना जरा मुश्किल अवश्य है, असम्भव नहीं है। इस बात को हम यों भी समझ सकते हैं कि किसी शब्द के जो अर्थ कल थे, वे आज नहीं रहते। बदल जाते हैं, आधे-अधूरे भी, पूरी तरह भी। भाषा की समृद्धता बिम्बों और प्रतीकों से होती है। वे ही हमारी सांस्कृतिक धरोहर बनते हैं। कथाकार के लिए सबसे अधिक सार्थक और सहायक संकेत किस्म के शब्द, प्रतीक या सांस्कृतिक बिम्ब होते हैं। सांस्कृतिक बिम्ब से आशय है कि उसे यदि व्यक्तिगत प्रतीक चित्रों का अथवा व्यक्तिगत बिम्बों का स्वयं आविष्कार करना पड़े तो वे शायद उतने प्रभावशाली सिद्ध न हों। यह भी सम्भव है कि जो बात वह कहना चाहता है, वह पीछे छूट जाए और वह व्यक्तिगत प्रतीकों और बिम्बों में ही उलझकर रह जाए। शब्दों को संस्कार या पुराने अर्थों के नये संदर्भ और प्रतीक देने का काम रचना-प्रक्रिया के दौरान बड़े ही स्वाभाविक ढंग से स्वमेव ही होता रहता है। रूपकों आदि में यह आसानी से सम्पन्न होता है। लघुकथाएँ रूपक, प्रतीक, फैंटेसी जिस भी रूप में लिखी जाएँ, आवश्यक है कि उनमें आज की सच्चाई दिखाई दे। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि आज की सच्चाई कविता के बाद जितने प्रभावी ढंग से लघुकथा में सम्भव है, उतने प्रभावी ढंग से कथा की किसी अन्य विधा में सम्भव नहीं है। राजा, रानी, राजकुमार, राजमहल  और जमींदार अब बीते जमाने के पात्र हो गये हैं। बावजूद इसके, भूले-बिसरे ही सही, आठवें-नौवें दशक तक तो ये लघुकथाओं में नजर आते ही रहे हैं। कथाकार ने इन्हें यदि स्थूल रूप में प्रयुक्त किया है तो नि:सन्देह यह उसकी कमी कहलायेगी; लेकिन यदि पाठक ने उस रूपक को नहीं समझा और नहीं ग्रहण किया है तो वह कथ्य की तह तक पहुँचने में असमर्थ ही रहेगा। नहीं भूलना चाहिए कि पात्रों के कुछ व्यंजनार्थ भी हो सकते हैं, होते हैं। वर्तमान युग ने एक असाधारण कुंजी कथाकार को सौंपी है। वह कुंजी है कथ्य-प्रस्तुति के लिए कथा में साधारण पात्रों का चुनाव करना। यदि बारीकी से देखें तो आज की लघुकथाओं में बहुत-सी बोधकथा, नीतिकथा, दृष्टांतकथा, उपदेशकथा के निकट जा ठहरती हैं। अनेक लघुकथाएँ कविता के, अनेक व्यंग्य के तो अनेक कहानी के निकट जा ठहरती हैं; और तो और, नये शिल्प में अनेक लघुकथाएँ ललित निबन्ध के भी निकट जा ठहरती हैं। कारण कुछ और नहीं, मात्र यह है कि आज सभी विधाएँ बहुत नजदीक आ गयी हैं। यों भी कह सकते हैं कि विधाएँ परस्पर घुलमिल गयी हैं, गड्डम-गड्ड हो गयी हैं। यही कारण है कि अनेक लघुकथाएँ आकार का तो अनेक लघुकथाएँ कथा-प्रकृति का अतिक्रमण कर जाती हैं।

क्या यह कमी लघुकथाकार की है? नहीं। रचना यदि अतिक्रमण कर भी रही है तो यह कथाकार की सामर्थ्य पर प्रश्न-चिह्न नहीं है। कथाकार को रचना की प्रेषणीयता, प्रभावशीलता, पूर्णता-सम्पूर्णता की ओर ही बढ़ रहा होता है। ऐसे में रचना कब कविता की गली से गुजर जाएगी, कब व्यंग्य की, कब निबन्ध या किसी अन्य विधा की गली से गुजरने लगेगी, वह गहरी मानसिक ऊहापोह में स्वयं को फँसा पाता है। फँसा क्या, असहाय ही पाता है। उसके सामने स्वयं की छवि का नहीं, रचना की पूर्णता का प्रश्न खड़ा होता है और उस मानसिक संघर्ष में रचनाकार की सचेतता नहीं, रचना की पूर्णता ही जीतती है। इस संक्रमण से गत लगभग एक दशक से लघुकथाएँ लगातार गुजर रही हैं। लघुकथा की निम्नतम सीमा कोई नहीं है; लेकिन अधिकतम सीमा है, इस बात को सभी मानते हैं। सभी मानते हैं, बावजूद इसके वह अधिकतम सीमा क्या है, इस बारे में मतभेद है। कोई अधिकतम सीमा 300 शब्द बताते हैं, कोई 500 शब्द, कोई 750 शब्द तो किसी-किसी ने 1100 शब्दों की कथा-रचना को भी लघुकथा माना है। मेरी दृष्टि में लघुकथा की आदर्श सीमा पुस्तकाकार आमने-सामने के दो पृष्ठ है तथापि किन्ही परिस्थितियों के कारण, जिनमें से कुछ का उल्लेख ऊपर किया जा चुका है, वह तीसरे पृष्ठ पर भी जाती है तो रचना की प्रकृति को सामने रखकर आकलन करना होगा न कि उसके आकार को सामने रखकर। फिर भी यह तो मानना पड़ेगा कि ऐसी स्थिति में भी लघुकथा की शब्द संख्या 750-800 शब्दों से अधिक न हो और वह तीसरे पृष्ठ के अन्त से पहले ही समापन को प्राप्त हो जाए। यह तीसरा पृष्ठ नि:सन्देह कुछेक लघुकथाएँ ले रही हैं और लघुकथा के पारम्परिक आकार को चुनौती दे रही हैं।

प्रत्येक व्यक्ति का एक संवेदन-वृत्त उसके परिवेश, प्रकृति और अध्ययन के अनुरूप बन जाता है। फिर जो कुछ उस संवेदन-वृत्त की परिधि में आता है, उसके लिए वही उसका यथार्थ होता है। उसके अलावा जो भी कुछ है वह उसके लिए मात्र एक सूचनात्मक यथार्थ है। यहाँ यह भी सत्य है कि एक व्यक्ति का यथार्थ दूसरे व्यक्ति के लिए सूचनात्मक यथार्थ हो सकता है यानी सभी सत्य सभी के संवेदन-वृत्त की सीमा में नहीं आ पाते हैं। परिवेश, प्रकृति और अध्ययन के अनुरूप व्यक्ति कुछेक दुराग्रहों का भी शिकार हो ही जाता है। इन दुराग्रहों का पता व्यक्ति को विवेकशील हुए बिना नहीं चल पाता; लेकिन इस यथार्थ को कलात्मक रूप से सम्प्रेषणीय बनाने के लिए जरूरी है कि हम उसे अपने से हट या उठकर देख सकें, उसे माध्यम की तरह इस्तेमाल कर सकें। कलाकार अपने किशोर काल में 'अपने यथार्थ' से असम्पृक्त नहीं हो पाता, वह या तो उसमें रस लेता है या उसे जस्टिफाई करता है, और ज़िन्दगीभर कला के नाम पर आत्मकथा के टुकडे देता रहता है।

जो लघुकथाएँ पृष्ठ सीमा और शब्द सीमा दोनों का अतिक्रमण कर रही हैं, वे विधा के अनुशासन को नहीं, रचनात्मकता के आग्रह को मान रही हैं, ऐसा मानना चाहिए। बावजूद इसके कि विधा की अस्मिता का समुचित सम्मान किया जाना चाहिए, किसी भी रचनाकार के लिए वस्तुत: रचनात्मकता के आग्रह का सम्मान ही श्रेयस्कर है। ऐसी रचनाओं में अतिक्रमण जैसी अहितकर बातों पर विचार न करके विचार यह करना चाहिए कि इसे लिखते समय कथाकार किन तात्कालिक दबावों से गुजरा है। हमें यह भी देखना चाहिए कि ऐसी रचनाओं को पढ़ते समय क्या हमें भी लेखक जैसे दबावों से गुजरने का अनुभव हुआ? ऐसी रचनाओं को पढ़कर पाठक/आलोचक का यह भी देखना आवश्यक है कि इन्हें लेखक ने अपने पलायन का माध्यम तो नहीं बनाया है?या फिर इन्हें लिखने के लिए उसने अपने पारम्परिक परिवेश को, उसकी जड़ता को तोड़ा है, उसे भेदा है तथा उसे गहराई और सार्थकता से समझने के लिए इन कथाओं को लिखा है। प्रत्येक रचना में लेखक का परिवेश होता है और स्वयं लेखक भी उसमें साँस ले रहा होता है। कथा की भाषा, उसके प्रतीक, बिम्ब और सांकेतिकता—ये सब कथाकार की पहचान हुआ करती हैं।

मनुष्य के जीवन में कुछ सच्चाइयाँ भीतरी होती हैं और कुछ बाहरी। वह हमेशा न भीतरी सच्चाइयों के साथ रह सकता है न बाहरी सच्चाइयों के साथ। लेकिन वास्तविकता यह है कि ये दोनों सच्चाइयाँ एक-दूसरे से अलग न होकर परस्पर उलझी हुई हैं। भीतरी सच्चाई बाहरी को और बाहरी सच्चाई भीतरी को बनाती और बिगाड़ती है, प्रभावित करती है, दिशा देती है। मनुष्य को ये अपने अनुसार ढालती भी हैं और स्वयं मनुष्य के अनुसार ढलती भी हैं। एक सच्चाई दूसरी सच्चाई पर परदा डालने का, उसे दबाने, ढकने का भी काम करती है। इसके अलावा हमारी कुछ जिदें, कुछ आग्रह भी आड़े आते हैं। हम अपने पल, अपने परिवेश, अपनी अनुभूति तक सीमित रहने, उनके प्रति वफादार रहने के दुराग्रही हो जाते हैं। अपनी इन जिदों और वफादारियों के चलते हम कुछेक जरूरी घटनाओं से कट जाते हैं। कट जाने की इस घटना से जिदों और वफादारियों को छोड़े बिना किसी का भी परिचित होना सम्भव नहीं है।  

किसी भी कथाकार का यथार्थ क्या है? जो कुछ भी उसके संवेदन-वृत्त में आ जाता है, वही उसका यथार्थ है। इसके अलावा जो भी कुछ है, वह सूचनात्मक यथार्थ है। अपने यथार्थ को कलात्मक रूप से सम्प्रेषणीय बनाने के लिए उस यथार्थ को स्वयं से दूर हटकर या थोड़ा ऊपर उठकर देखना आवश्यक है। माध्यम की तरह उसका प्रयोग करना आना आवश्यक है। हर कथा किसी न किसी बिन्दु पर कथाकार की आत्मकथा हो सकती है क्योंकि रचना में वह अपना परिवेश ही जीता है। लेकिन वह आत्मकथा उस धरातल से, जिस पर वह जीता है, किंचित भिन्न धरातल की होती है।

कथाकार को सोचना यह है कि उसके जिंदगी के वास्तविक तनाव कौन-से हैं और किन प्रवृत्तियों से उसे संघर्ष करना पड़ रहा है। अगर वह इस प्रक्रिया से गुजरता है तो विश्वास करिए, उसकी हर कथा आत्मकथा होगी, भले ही उसका शिल्प आत्मकथा का न होकर कथा का होगा। वस्तुत: कलात्मक लेखन यही है। यही है जब लेखक बाहरी यथार्थ को अपने भीतर से गुजरने का अवसर देता है, कथा के रूप में उसे बदलते, बनते-बिगड़ते, आकार लेते देखता है। भोगे हुए यथार्थ के तात्पर्य को भी समझने की आवश्यकता है। भोगना सिर्फ सदेह नहीं होता है, पीड़ाओं और सुखों को अपनी संवेदना की गहराई में महसूस कर सकने की सामर्थ्य का विकास जिन्होंने स्वयं में किया है, उनके लिए कोई पीड़ा, कोई दुख, कोई सुख पराया नहीं है। अभिव्यक्त होने की कला इस महसूस करने वाले आदमी में ही विकसित होती है, आवश्यक रूप से सदेह भोगने वाले में नहीं। सच्चा कथाकार वही है जिसने दूसरों की पीड़ा को कह सकने की क्षमता का विकास स्वयं में किया है। इस विकास से विरत लोग रीति, भक्ति के गीत ही गा सकते हैं, अन्य कुछ नहीं। अपने यथार्थ को अन्य-अन्य यथार्थ से जोड़ सकने की क्षमता का विकास ही व्यक्ति को बड़ा कलाकार अथवा कथाकार बनाता है।

बाहरी यथार्थ को देखते हुए कई बार हम छद्म चरित्रों से भी टकराते हैं। इन छद्म चरित्रों को कथाकार का मन या कहें कि विवेक स्वीकार नहीं करता है। इस अस्वीकार से व्यंग्य की उत्पत्ति होती है। जब सब-कुछ बकवास लगता हो, तब उसे बकवास कहने की कला का विकास भी एक विकास ही है। ओछे और उथले चरित्र को, उसके द्वारा उत्पन्न परिस्थितियों को व्यंजित करने की कला का विकास भी एक साधना ही है। यहाँ भी जरूरी यही है कि लेखक चरित्र के भीतर के साथ तादात्म्य स्थापित करे, उसके थुलथुल शरीर, ऐंगी-बेंगी चाल आदि पर ही शब्दों को बरबाद न करता रहे। व्यंग्य में भी रोष की अभिव्यक्ति आवश्यक है, विशेष अनुशासन के साथ। इस अर्थ में व्यंग्य की उपमा माला के उस धागे से से की जा सकती है जो मोतियों या फूलों के भीतर अनदेखे रूप में विद्यमान रहता है। लघुकथा में ऐसे प्रयोग लगातार होते रहने चाहिए। यह एक ऐसी विधा है जिसमें प्रयोग की असीम सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। यों भी किसी भी विधा को कभी भी प्रयोगों से अपच तभी होती है, जब उसके रचनाकार कुछ व्यक्तिगत धारणाओं की प्रस्तुति पर उतर आते हैं।

आलोचना पुस्तक 'लघुकथा का साहित्य दर्शन'  (मार्च 2024) में प्रकाशित