शुक्रवार, 18 मार्च 2022

बचपन की होली / बलराम अग्रवाल

बेतरतीब पन्ने-16


होली का आगमन वसंत पंचमी के दिन से मान लिया जाता था। उस दिन कुल्हाड़ी और बाँक (लकड़ियाँ फाड़ने का घरेलू औजार) लेकर हम लोग जंगल की ओर निकलते थे। बाबा राजराजेश्वर महादेव मन्दिर की सीढ़ियों के आगे वाली खुली जगह पर उन्हें ला रखते थे। बुजुर्गों की ओर से यद्यपि निर्देश यह होता था कि सिर्फ सूखे दरख्त लाए जाएँ, हरी डाल कोई न काटी जाए; बावजूद इसके हमें हरी डालें काटकर लानी पड़ती थीं। कारण यह कि सूखे पेड़ों पर या तो हमसे पहले ही पहुँच चुके दल या हमसे मजबूत दल काबिज हो चुके होते थे। भारी-भरकम हरे तनों की हैसियत हमारे सामने पराजित योद्धा जैसी होती थी और उन्हें हम ऐसे लाते थे जैसे विजयी होकर पराजितों को टाँग से पकड़कर घसीटते हुए ला रहे हों। 
 
सुबह के गये हम लोग दोपहर बाद तक लौट पाते थे। हरे तनों को लाकर परम्परा से चली आ रही, होलिका जलने वाली नियत जगह पर रख दिया जाता था। उसके बाद अपने-अपने घरों की ओर रुख। घर पर फिर यह गत होती थी कि ‘होलिका’ लाने-सजाने का सारा उत्साह समाप्त हो जाता था। 
 
और शाम को, अपने-अपने दफ्तरों, दुकानों, विद्यालयों से मुक्त पिता-लोग होलिका में सूखे तनों की बजाय जब हरे तनों को रखा देखते थे, तब किसी को भी साफ-साफ यह पता नहीं चलता था कि उन्हें लाने में किस-किस ने पसीना बहाया था। हालाँकि अनुमान तो सभी होता था; लेकिन साफ-साफ पता नहीं चल पाता था। पता चल पाता तो खून के आँसू रुलाना तय था। 
 
और उसी दिन से शुरू होता था—बच्चों द्वारा ‘होली का चंदा इकट्ठा करना’। इसके लिए मछली पकड़ने वाले कांटे की मदद ली जाती थी। 
 
चौक बाजार में पुराने कांग्रेस कार्यालय के पास थी—मुसद्दी लाला की दुकान। मांझा, हुचका, पतंग आदि के तो शहर में वह जैसे थोक-विक्रेता ही थे। मछली पकड़ने का कांटा भी उन्हीं की दुकान पर मिलता था। उस कांटे को थागे में बाँधकर एक लड़का किसी ऊँचे मकान की छत पर बैठता था। गली के आरपार गुजर रही बिजली के तारों की लाइन के ऊपर से उस काँटे को नीचे लट दिया जाता था। दो-तीन लड़के उस कांटे को पकड़कर नीचे, किसी चबूतरे पर या किसी मकान के दरवाजे की आड़ में छिपते थे।
 
उन दिनों अधिकतर लोग गांधी टोपी पहनकर चलते थे। छिपे हुए लड़कों को इंतजार रहता था, किसी टोपीधारी के गली से गुजरने का। जैसे ही कोई नजर आता, सब के सब चौकन्ने हो जाते। उस व्यक्ति के अपनी रेंज में आते ही कांटे वाला लड़का पीछे से उसकी टोपी में कांटा रख देता था और जाकर छिप जाता था। उसके छिपते ही धागा ऊपर को खींचना शुरू। इसके साथ ही उस सज्जन पुरुष की टोपी हवा में झूल जाती थी। उसका हकबका जाना तय था। फिर नीचे, गली में इधर-उधर छिपे लड़के बाहर निकलते थे—“ताऊ (या बाबा, चाचा)! बुरा न मानो होली है!”
 
वह हैरान-परेशान-क्रोधित।
 
“होली का चंदा ताऊ!” लड़के दूरी बरतते हुए हाथ पसारते। 
 
समझदार, खुश-मिजाज और बाल-बच्चों वाले, पर्व का आनंद लेने वाले लोग इसे उन विशेष दिनों की सामान्य घटना मानकर जेब से निकाल, एक पैसा चंदा पकड़ा देते थे। कुछ इसे ‘टोपी उछलने’ के अर्थ में ग्रहण कर बहुत क्रोधित हो, गाली-गलौज करते थे। गाली-गलौज करने वालों में कुछ चंदा देकर टोपी छुड़ा ले जाते थे और कुछ टोपी की चिंता छोड़, गाली-गलौज देते हुए आगे बढ़ जाते थे।ऐसे लोगों को हममें से कोई एक बहुत-आगे पहुँच जाने पर उसकी टोपी पकड़ा आता था; और डरा हुआ वह बेचारा टोपी को अपने सिर की बजाय जेब के हवाले करके आगे का रास्ता नापता था।
 
इसी शैतानी में एक खेल और होता था। आलू को दो हिस्सों में काट, उन कटे हुए हिस्सों पर फूल आदि उकेरकर ठप्पा बनाना और स्टैम्प-पैड जैसी किसी सतह पर उस ठप्पे के फूल को रंगकर लोगों की पीठ पर छापकर भाग जाना। मजे की बात यह थी कि आलू के ठप्पे बनाने में पिताजी भी हमारी मदद कर दिया करते थे। 
 
यही कारण था कि लोग उन दिनों होली के पर्व से कुछ दिन पूर्व ही कामचलाऊ ऐसे कपड़े पहनकर घर से निकलना शुरू कर देते थे, ठप्पा आदि लग जाने के कारण जिनके खराब होने की चिंता में अधिक सूखना-सोचना न पड़े। रंग वाली होली से हफ्तों पहले ही बच्चे घर की छतों पर चढ़कर राहगीरों पर रंग फेकना शुरू कर देते थे। यहाँ भी टोपी ऊपर खींचने जैसा ही माहौल बनता था। कई ऐसे लोग, जो किसी काम से कहीं जा रहे होते, रंग पड़ने पर खासे नाराज होते थे। 
 
राहगीर और बच्चों के आभिभावकों के बीच परस्पर झगड़े भी हो जाया करते थे। जैसे-जैसे लोगों को यह अहसास हुआ कि किसी काम से निकले राहगीर पर रंग डालकर उसके कपड़े खराब कर डालना सभ्य समाज की निशानी नहीं है, उन्होंने बच्चों को रोकना शुरू कर दिया। समय के साथ-साथ टोपी पहनने के चलन में कमी आयी तो मुसद्दी लाला की दुकान पर मछली पकड़ने के कांटे की बिक्री भी बंद हुई। 
 
जैसे-जैसे हम सभ्य हुए, वैसे-वैसे आलू को काटकर कशीदा बनाने की कला का भी खात्मा होता गया।
 
17-3-2022 / 16:00 (चित्र साभार)

गुरुवार, 17 मार्च 2022

पिताजी के आगे टोटका भी हुआ फेल…/बलराम अग्रवाल

बेतरतीब पन्ने-15
 

आगे, एक समस्या और थी। किसी को बिना कुछ बताए लगातार 3 घंटे तक घर से और मुहल्ले से भी गायब रहना। इसका उपाय यह किया कि… उन दिनों बहुत-से लोगों के पास इंटरवल तक ही पिक्चर देखने का समय होता था। ऐसे लोगों से 1 रुपये वाली टिकट 50 पैसे में और 70 पैसे वाली टिकट 30-35 पैसे में मिल जाया करती थी। हमने रास्ता यह अपनाया कि पिक्चर को डेढ़-डेढ़ घंटे के दो टुकड़ों में देखना शुरू किया। एक बार 35 पैसे में बेची और दूसरी बार 35 पैसे में खरीदी। लेकिन एक बार ऐसा भी हुआ कि…गोटी फँस गयी।
 
उस दिन पिताजी को किसी काम से कहीं जाना था। इसलिए सुबह ही कह दिया था—“शाम को मेरे पास आ जाना। दुकान तुझे ही ‘बढ़ानी’ है।” 
 
दीपक को ‘बुझा देना’ और दुकान को ‘बंद कर देना’ सभ्य शब्द नहीं हैं। इनके लिए ‘बढ़ा देना’ का प्रयोग चलता है। जैसे कि दिवंगत व्यक्ति के लिए ‘मर गये’ का प्रयोग असभ्य होता है। 
 
तो दुकान बढ़ाने के लिए उस दिन मुझे जाना था। लेकिन, न्यू रीगल टॉकीज में उन दिनों ‘दो बदन’ ने हल्ला बोला हुआ था। टिकट खिड़की शो शुरू होने से सिर्फ आधा घंटा पहले खुलती थी जबकि सिनेमा देखने के शौकीन एक घंटा पहले ही लाइन में आ खड़े होते थे। उस लाइन को देखकर सहज ही अंदाजा लग जाता था कि सिनेमा देखने के शौकीन लोग अनुशासन-प्रिय होते हैं। ज्यादा भीड़ होती थी तो अनुशासित करने के लिए मालिक लोग एक-दो सिपाहियों को भी चौकी से बुलवा लेते थे। वे होते थे तो अपन लाइन में लगने की जेहमत नहीं उठाते थे क्योंकि उनके रहते लाल टिकट लाल और पीली टिकट पीली ही रहनी थी, किसी भी तरह उसे ‘काला’ नहीं किया जा सकता था। 
 

फिल्म कोई भी रही हो, जबर्दस्त भीड़ बटोर रही थी। असलियत यह थी कि शुरू के 2-3 दिन सभी फिल्में जबर्दस्त भीड़ बटोरती ही थीं। नायकों में राजकपूर, राजेन्द्र कुमार, शम्मी कपूर, शशि कपूर, विश्वजीत, मनोज कुमार, धर्मेन्द्र, जॉय मुकर्जी। अशोक कुमार को कुछ फिल्मों में हालाँकि मैंने नायक के रूप में भी देखा, लेकिन हमारे समय तक वह पुरानी पीढ़ी में जा चुके थे; उस पीढ़ी पर पृथ्वीराज कपूर, सोहराब मोदी, कमल कपूर आदि काबिज थे। उन दिनों की फिल्मी कहानियों में कॉमेडियन और खलनायकों के लिए जगह अवश्य रखी जाती थी। कॉमेडियन्स में जॉनी वॉकर और महमूद प्रमुख थे। इनके अलावा तो असित सेन, जगदीप, मोहन चोटी, सुन्दर, मुकरी यहाँ तक कि ओमप्रकाश भी कॉमेडियन का रोल कर लिया करते थे। खलनायकों में प्राण, मदन पुरी, प्रेम चोपड़ा थे। फिल्मी संसार में किशोर कुमार का स्थान बहुत अलग बैठता है। वह गायक, कॉमेडियन, एक्टर, निर्माता सब-कुछ थे। 
 
मेरी जेब में 70-75 पैसे पड़े थे। सोचा—30 पैसे कमा ही लिए जाएँ। न्यूरीगल टॉकीज जा पहुँचा। ‘मामा’ यानी खाकी वर्दी वाला गायब था। मैं लाइन में जा लगा। कुछ देर बाद, जैसे ही खिड़की खोले जाने की आवाज सुनाई दी, लाइन और अनुशासन के सारे बंधन समाप्त। कूदकर जा पहुँचा आगे। छोटे कद और दुबली काया का पूरा लाभ वहीं मिलता था। धक्का-मुक्की कर एक टिकट निकाली। ललचायी नजरों से काफी देर इधर-उधर ताकता घूमता रहा। एक भी खरीदार सामने नहीं आया। झक मारकर यही सोचना पड़ा कि आधी फिल्म देख ली जाए। ‘वापसी’ बेचकर पिताजी के पास चला जाऊँगा। मरे मन से इंटरवल तक सीट पर बैठा रहा। बेशक आधी फिल्म देखी भी; लेकिन मन कहीं और था इसलिए समझ में कुछ नहीं  आया। 
 
इंटरवल हुआ। टिकट के अद्धे को दिखाता हुआ मैं बहुत देर तक बाहर घूमता रहा। लेकिन साढ़े साती थी उस दिन! ‘वापसी’ खरीदने वाला भी एक भी कम्बख्त नहीं मिला। एक बार फिर झक मारी। वापस हॉल में जा बैठा। 35 पैसे का नुकसान उठाकर पिताजी के पास चले जाना मन को गवारा न हुआ। वह लालच भारी पड़ गया। वह शायद अकेला ही ऐसा अवसर था जब अपनी पसंदीदा फिल्म देखकर भी मन खुश नहीं था। दायित्वहीनता के एहसास से सिर भारी, बदन भारी, चाल भारी…! 
 
फिल्म खत्म हुई। भीड़ ने न्यू रीगल के पिछले गेट से बाहर निकलना शुरू किया। दिमाग ने अब पिताजी की मार से बचने के उपायों के बारे में सोचना शुरू कर दिया। 
 
इत्तेफाक की बात थी कि उसी दोपहर को एक दोस्त ने एक टोटका बताया था। कहा—“बलराम, सड़क से दो खिट्टे (खिट्टा यानी कुल्हड़ आदि मिट्टी के किसी बरतन का टुकड़ा) उठाओ। उनमें से एक के ऊपर थूककर उस दूसरे वाले से थूक को ढक दो। इन दोनों को किसी पेड़ की जड़ में रखकर आगे को निकल जाओ। पीछे मुड़कर कतई मत देखो। काम हर हाल बनेगा ही बनेगा।” 
 
बचने के उपाय सोचते हुए मुझे यह टोटका याद हो आया। सड़क से दो खिट्टे उठाए। एक पर थूका और दूसरे को उस पर ढककर सड़क किनारे वाले एक नीम की जड़ में रखकर आगे, घर की ओर बढ़ गया। घूमकर पीछे देखने का तो वैसे भी कोई मतलब नहीं था। 
 
घर के अंदर दाखिल हुआ। माताजी ने पूछा—“कहाँ चला गया था?”
 
“एक दोस्त के घर गया था।” मैंने लापरवाही से उत्तर दिया।
 
“कौन-से दोस्त के घर?” यह सवाल मेरे पीछे-पीछे घर में घुस आये पिताजी ने किया था। 
 
“मुंशीपाड़े में रहता है एक।” इस बार मैं लापरवाह रवैया न अपना सका था। 
 
यह सुनना था कि पिताजी की कठोर हथेली का झन्नाटेदार एक झापड़ मेरी कनपटी पर पड़ा। 
 
“झूठ बोलता है! फिल्म देखकर नहीं आया है?” पिताजी चीखे।
 
“नहीं तो।” मैं मेमने-सा मिमियाया। सोचा—पिताजी तुक्का मारकर सच उगलवाना चाह रहे हैं।
 
‘नहीं तो’ कहते ही एक और पड़ा, फिर एक और… एक और! बहुत पिटाई हुई। चीखने की आवाज घर के आँगन से निकलकर कुएँ की जगत पर बैठकर स्वीप खेल रहे मोहल्लेदारों तक जा टकराई। मुझे पिटाई का उतना दुख नहीं था, जितना टोटके के फेल हो जाने का। पहली ही बार में फेल हो गया था कम्बख्त! कम से कम आज, एक बार तो चला होता। चलो, यह भी अच्छा ही रहा कि बानगी में ही साले की जात पहचान में आ गयी थी।
 
हुआ यों कि मेरे न पहुँचने से नाराज पिताजी को खुद ही दुकान बढ़ानी पड़ गयी। वह घर आये। मेरे बारे में पूछा कि मैं कितने बजे घर से निकला था; और अनुमान के आधार न्यू रीगल के निकास द्वार पर एक ओर को जा खड़े हुए। फिल्म समाप्ति की भीड़ के साथ मुझे वहाँ से निकलते देखा। टोटका करते देखा। रास्ते में और भी जो-कुछ किया होगा, सब देखा और शब्दश: बताते हुए हर हरकत पर एक के हिसाब से झापड़ जड़ते गये। एक हाथ से मुट्ठी मे जकड़ी कलाई को मरोड़ते और दूसरे से झापड़ जड़ते हुए डाँटते--"नजर नीचे… नजर नीचे!"
 
उस दिन पैसों का लालच छोड़कर कर्त्तव्य-निर्वाह पर ध्यान दिया होता तो टोटका न करना पड़ता, टोटका न करना पड़ता तो उसके बारे में भ्रम बना रहता, भ्रम बना रहना ही हर टोटके के अस्तित्व और उसकी सफलता का रहस्य है। टोटका फेल न होता तो पिताजी के हाथों इतना न पिटना पड़ता कि बाद में खुद उन्हें भी दुखी होना पड़ा। सन्तान की पिटाई करके कोई भी पिता (या माँ) चैन से नहीं सो पाता है, लेकिन इस सच्चाई से हर शख्स पिता (या माँ) होने के बाद ही रू-ब-रू हो पाता है, उससे पहले नहीं।
(चित्र साभार)

सिनेमा टिकटों की ब्लैक-मार्केटिंग / बलराम अग्रवाल

बेतरतीब पन्ने-14

‘दोस्ती’ का पढ़ाकू युवक पिताजी के माध्यम से कई साल तक परेशान करता रहा। उससे पहले हमारा पड़ोसी सहपाठी था, जिसकी वजह से अक्सर ही कान-खिंचाई हो जाया करती थी। 
 
उन दिनों साइकिल के रिम को लकड़ी या लोहे की एक डंडी की मदद से सड़कों पर घुमाने का खेल ही मुहल्ले से बाहर तक जाता था। अन्यथा अधिकतर खेल मुहल्ले की सीमा में ही खेले जाते थे। आपस में हम अनेक तरह के जो खेल खेला करते थे उनमें कंचे, गुल्ली-डंडा, कबड्डी, गेंद-तड़ी, सिगरेट की डिब्बियों के खाली पैकेट्स को एक गोल घेरे के बीचों-बीच रखकर दूर खींची एक रेखा पर खड़े होकर चपटे पत्थर से निशाना लगाकर उन्हें निकालना, बीड़ी-बंडलों के रैपर्स से ‘जुआ’ खेलना आदि-आदि। कंचे, गुल्ली-डंडा, गेंद, सिगरेट के पैकेट्स और बीड़ी-बंडल्स के रैपर हमारी अमूल्य संपत्ति हुआ करती थी। 
 
हम जब मगन-मन गली में खेल रहे होते थे, हमारे उस पड़ोसी सहपाठी की नजर बाजार से या मन्दिर से घर की ओर चले आ रहे हमारे पिताजी पर पता नहीं कैसे पड़ जाती थी! मैं आज भी उसकी तेज नजर का कायल हूँ और सोच नहीं पाता हूँ कि वह कैसे पिताजी के आने को भाँप जाता था। इस इंटेलिजेंस की बदौलत उसे जरूर ही ‘रॉ’ में प्रवेश मिलना चाहिए था। अपने जाने की भनक लगाए बिना वह खेल के बीच से पता नहीं कब गायब हो जाता था। घर के भीतर से बस्ता लाकर आनन-फानन में अपने चबूतरे पर ला पटकता था। सुन्दर लिखाई में लिखी अपनी तख्ती को सुखाने के बहाने दीवार पर चढ़ चुकी धूप के साये में खड़ी करता और कोई भी किताब हाथ में ले, बोल-बोलकर पढ़ना शुरू कर देता था। इतनी तेज आवाज में कि, अपने ही विचारों में मग्न पिताजी की विचार-श्रृंखला उसकी आवाज से टूट जाए। वह उसे पढ़ता देखते और घर में घुसने की बजाय मेरे इलाज के लिए आगे बढ़ आते। गली में अन्य बालकों के साथ खेल रहे मेरे कान को पकड़ते और खींचकर घर ले जाते! 
 
आगे की कहानी बताने की जरूरत नहीं है। यह किस्सा अनेक बार दोहराया जाता था लेकिन पिताजी को मैं कभी-भी यह नहीं समझा सका कि वह आपको देखकर यह ड्रामा करता है! 
 
‘दोस्ती’ के बाद फिल्में देखने का चस्का-सा लग गया। सबसे आगे वाली सीटों की टिकट उन दिनों 70 पैसे की हुआ करती थी। इन 70 पैसों के जुगाड़ के लिए 175 पेज की एक कोरी कॉपी कमीज के नीचे पाजामे में खोंसनी पड़ी थी। माताजी से कहा—“स्कूल के काम के लिए एक कॉपी लानी है।”
 
“अपने पिताजी के पास चला जा। वह दिला देंगे।” माताजी ने कहा।
 
“उतना समय नहीं है, काम करना है। अभी चाहिए।” पहली बात तो यह कि मुझे अर्जेंट कॉपी नहीं पैसे चाहिए थे! दूसरी यह कि पिताजी के पास जाने से कॉपी मिलती, पैसे नहीं। 
 
“कितने की आएगी?” माताजी ने पूछा।
 
“75 पैसे की।” मेरा मासूम जवाब।
 
माताजी ने खोज-खाजकर 75 पैसे निकाले और अपने पढ़ाकू बेटे की हथेली पर ला रखे। बेटा, सीधा सिनेमा हॉल जा पहुँचा। भीड़ बिल्कुल थी ही नहीं। ‘नेताजी सुभाषचन्द्र बोस’ जैसी रोमांसहीन रूखी फिल्म के लिए भीड़ का मतलब भी क्या था। वह तो मेरे ही मन में नेताजी के लिए अपार श्रद्धा थी। एक देशभक्त की फिल्म देखने गया था इसलिए किसी भी प्रकार का अपराध-बोध मन में होने का सवाल ही नहीं था। 
 
खिड़की पर गया। टिकट खरीदा और जा बैठा सीट पर। फिर वही, एकदम ऐसा लगा जैसे फिल्म सामने पर्दे पर नहीं, दिमाग के किसी अन्दरूनी हिस्से में चल रही है, सपने की तरह। कई फिल्में देख लेने के बाद दिमाग ने यह स्वीकारना शुरू किया कि फिल्म उसके पर्दे पर नहीं, सामने, बाहर वाले पर्दे पर चल रही होती है।
 

बहरहाल, यह चस्का जब और बढ़ा तो दूसरा रास्ता अपनाना जरूरी हो गया। माताजी से एक की बजाय दो कॉपियों के पैसे माँगने शुरू किए। पाजामें में खोंसकर कॉपी ले जाना बंद। भीड़ के छँटने का इंतजार करना बंद। फिल्म लगने के पहले-दूसरे दिन ही टिकट खिड़की पर धावा बोलना शुरू। जबर्दस्त धक्का-मुक्की के बीच 70 पैसे वाले दो टिकट निकाले। एक आदमी को दो से ज्यादा टिकट शुरू-शुरू के दिनों में देते ही नहीं थे। चार दोस्तों को देखनी होती तो दो दोस्त लाइन में लगते। 
 
दो टिकट निकाले। एक-एक रुपये में दोनों ब्लैक किए और दो रुपये लेकर घर आ गया। माताजी का डेढ़ रुपया माताजी को वापस पकड़ाया। बाकी के 50 पैसे अंटी के हवाले किए। एक-दो दिन में 20 पैसे और मिलाकर फिर जा पहुँचा। अगर अभी भी ब्लैक चल रही होती तो एक रुपये में बेचकर घर आ बैठता और भीड़ के छँटने का इंतजार करता।
(चित्र साभार)

रविवार, 13 मार्च 2022

मैं भी इन्सान हूँ, इक तुम्हारी तरह…/ बलराम अग्रवाल

 बेतरतीब पन्ने-13

‘दोस्ती’ नाम से जो फिल्म आयी थी, वह मुम्बई-दिल्ली में 1964 में रिलीज हुई थी और बुलन्दशहर पहुँची थी तीन साल बाद 1967 में

या पांच साल बाद 1969 में; ठीक-ठीक याद नहीं है। उस फिल्म को विशेषत: मुझे दिखाकर लाने की आज्ञा पिताजी ने चाचाजी को दी थी। इस बात की मुझे खुशी भी थी और आश्चर्य  भी। खुशी फिल्म देखने जाने की और आश्चर्य इस बात का कि वह आदेश निरामिष पिताजी की ओर से जारी हुआ था।


चाचाजी हमें फिल्म दिखाने ले गये। सिनेमा हॉल मेरे लिए आश्चर्य-लोक जैसा था। एक साथ बिछी इतनी सारी कुर्सियाँ पहली बार देखी थीं। एक ही जगह पर चारों ओर घूमकर पूरे हॉल पर नजर डाली। चाचाजी ने सीट पर बैठ जाने को कहा और बराबर वाली सीट पर खुद भी बैठ गये। एकाएक पूरे हॉल की सारी बत्तियाँ गुल हो गयीं। घटाटोप अंधेरा! उसी के साथ, सामने वाले सफेद पर्दे पर आकृतियाँ उभरनी शुरू हुईं। चलती-फिरती-बोलती आकृतियाँ! मुझे लगा, जैसे मैं जाग नहीं रहा, सपना देख रहा हूँ। फिल्म सामने नहीं, मेरे मानस-पटल पर चल रही थी। वह सपना हॉल से बाहर आने के बाद भी मेरे जेहन में कई दिनों तक स्थायी रहा।

फिल्म दिखाने की जो आज्ञा पिताजी ने चाचाजी को दी, उसके पीछे बाबा अल्लामेहर थे। उनके द्वारा पिताजी को सुनाई गयी उसकी वह स्टोरी थी, जिसे फिल्म देखने के अगले दिन अपनी आदत के अनुसार उन्होंने पिताजी को सुनाया था। पिताजी उससे इतना अधिक प्रभावित हुए कि फिल्में न देखने-दिखाने के अपने ख्याल को उन्होंने तिलांजलि दे दी थी। बावजूद तिलांजलि के वह स्वयं अब भी नहीं गये थे, हमें ही भेजा।

लेकिन, फिल्म देखकर आने की मेरी खुशी ज्यादा समय तक सँभल नहीं सकी। दोपहर बाद 3 से 6 वाला शो देखकर शाम 7 बजे के करीब घर में घुसे होंगे। खाना खाया और आँखों में सुखद सपने को समोए, सोने की तैयारी में ही थे कि पिताजी चिल्लाए—“क्या बजा है?”

“नौ।” ऊपर, अलमारी में टिके टाइमपीस पर नजर डालते हुए मैंने डरी-जुबान में जवाब दिया।

“अभी-अभी फिल्म देखकर आये हो, आते भी भूल गये कि वह बेचारा गली के लैम्प-पोस्ट के नीचे बैठकर रात-रातभर पढ़ा करता था! तुम्हें घर में ही लैम्प मिला हुआ है फिर भी…! नालायक कहीं का!”

‘तुझे’ की बजाय ‘तुम्हें’ कहकर वे कोई इज्जत नहीं बख्श रहे होते थे। उस ‘तुम्हें’ में दरअसल सभी भाई-बहन लपेट दिये जाते थे। उसे सुनते ही हमारी सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती थी। सब बिस्तर से उठकर अपने-अपने बस्ते की ओर दौड़ गये। मेरी समझ में आ गया कि क्यों पिताजी ने ‘दोस्ती’ दिखाने की कृपा हम पर की थी।

“नियम बना लो—रात को 10 बजे तक पढ़ना और सुबह 4 बजे उठकर बैठ जाना।” पिताजी ने पटाक्षेपपरक वाक्य कहा, “पढ़ने-लिखने के बारे में खुद कुछ नहीं सोच सकते थे, देखकर तो कुछ सीख लिया होता!”

यह अब रोजाना का किस्सा हो गया। ‘दोस्ती’ हमने देखी सिर्फ एक बार थी, लेकिन कोंचा उसने सालों-साल। फिल्म के एक गाने की लाइनें--'मैं भी इन्सान हूँ इक तुम्हारी तरह' बार जेहन में कौंध जातीं। सोचने लगा था, कि—प्रेरित करने वाली फिल्में इतनी भी अच्छी नहीं बना डालनी चाहिए कि बालकों की आजादी छीन लें, उनकी जान ही लेने लग जाएँ!

(चित्र साभार)

सुख है एक छांव ढलती, आती है जाती है…/बलराम अग्रवाल

बेतरतीब पन्ने-12

कौन-सी फिल्म थी, जो मैंने सिनेमा हॉल में बैठकर देखी! असलियत में तो हॉल से बाहर भी कोई फिल्म लम्बे समय तक नहीं देखी थी। 'मुगल-ए-आजम' पहली फिल्म थी जिसका मैंने नाम सुना। उन दिनों कक्षा पाँच में था। बहस होती है कि 'अनारकली' काल्पनिक पात्र है या  वास्तविक? ध्यान से देखें, उसके पोस्टर पर ऊपर ही लिखा है--"अफसाने के हकीकत बनने की कहानी"।

उन दिनों, पेन्टर्स की सहायता से, आने वाली फिल्मों के विज्ञापन शहर की विभिन्न दीवारों पर लिखवाये जाते थे, पोस्टर्स चिपकवाये जाते थे। घोड़ा-गाड़ी और रिक्शों में माइक लेकर बैठा एक आदमी फिल्म के नाम का, उसमें काम करने वाले कलाकारों का नाम बताते हुए प्रचार करता; ग्रामोफोन पर रिकार्ड चलाकर उस फिल्म के गाने बजाता। किसी-किसी फिल्म के प्रचार के लिए तो पुरुष-नर्तकियाँ भी रिक्शा-घोड़ा-गाड़ी के आगे-आगे नाचती थीं।

बुलन्दशहर में शुरू-शुरू में मात्र दो फिल्म हॉल थे—न्यू रीगल टॉकीज और जगदीश टॉकीज। आने वाली अथवा चल रही फिल्मों के प्रचार की भाषा कभी-कभी बड़ी मजेदार हो जाया करती थी—“देखिए… देखिए… देखिए… जगदीश टॉकीज में… कोहिनूर! जी हाँ, कोहिनूर! कोहिनूर!! कोहिनूर!!! दिलीप कुमार और मीनाकुमारी की शानदार-जानदार अदाकारी का शाहकार… अपार भीड़ समेट रहा है—कोहिनूर! जनता की जबर्दस्त माँग पर रोजाना पाँच शो—कोहिनूर! कोहिनूर!! कोहिनूर!!!”

पाँच शो का मतलब हम सोचते थे—रोजाना पाँच सौ लोगों की एंट्री और दरवाजे बंद! ऐसे में मुझ जैसे सीकिया को कौन घुसने देगा!

हम समझते थे, महाराजा रणजीत सिंह के मुकुट वाला कोहिनूर महारानी विक्टोरिया से ले आया गया है और आम जनता को दिखाने के लिए जगदीश टॉकीज में रखा गया है। इच्छा होती थी कि अपनी उस ऐतिहासिक धरोहर को एक बार हम भी देखकर आएँ लेकिन घर में यह इच्छा जाहिर करने से डरते थे। अकेले जाना नामुमकिन नहीं था, लेकिन जगदीश टॉकीज घर से पर्याप्त दूरी पर था।

या फिर—“लग गई, लग गई, लग गई… आपके प्यारे, आपके चहीते… न्यू रीगल टॉकीज में… आग!... आग लग गई!! आग!!!...”

यहाँ पर अभद्र भाषा में लिखना उचित नहीं है कि न्यू रीगल टॉकीज हमारे घर से कितनी दूरी पर था; बस इतना समझ लीजिए कि वह बालिश्त-भर की दूरी पर था। बालिश्त-भर मतलब—साँस रोककर भागते थे तो सीधे न्यू रीगल पर जाकर ही छोड़ते थे। यह वाक्य सिर्फ दूरी का द्योतक नहीं है, तब के हमारे स्टेमिना का भी परिचायक है। तो घोषणा सुनते ही हमने लगा दी दौड़। जा पहुँचे न्यू रीगल।

‘आग’ के बड़े-बड़े बैनर लटक रहे थे। भीतर, फ्रेम्स में फिल्म के विभिन्न दृश्यों के फोटो लगे थे। खासी चहल-पहल थी। वहाँ जाकर ही पता चला कि शहर भर में चीख-चीखकर जो आदमी बोलता है कि न्यू रीगल में ‘आग’ लग गई, उसकी असलियत क्या है, ‘बिन बादल बरसात’ वहाँ कैसे होती है, ‘चांदी की दीवार’ कैसे खड़ी होती है, ‘कोहरा’ कैसे छाता है, ‘गंगा की लहरें’ कैसे किलोल करती हैं! वह एक अलग ही दुनिया थी, लेकिन घर के वातावरण और संस्कारों की बदौलत कभी चाह पैदा नहीं हुई कि भीतर जाकर देखें, वह दुनिया दिखती है!

उन दिनों बुलन्दशहर जैसे देहात-किस्म के नगरों के सिनेमाघरों में फिल्में मुम्बई और दिल्ली आदि महानगरों में रिलीज होने के दो-तीन वर्षों के बाद तब पहुँचती थीं जब उनका पूरा रस बदबदा चुका होता था। रस बदबदा चुकने से आशय है कि जब महानगरों के सिनेमाघरों में आने वाली भीड़ की संख्या में खासी कमी हो चुकी होती थी, और छोटे शहर के दर्शक की उत्तेजना फिल्मी पत्रिकाओं में छपी गॉसिप्स को पढ़-पढ़कर पूरे तनाव की हालत में पहुँच चुकी होती थी, तब उन फिल्मों के बड़े डिस्ट्रीब्यूटर्स के बड़े ठेकेदार, बड़े ठेकेदारों के अधीनस्थ छोटे ठेकेदार और उनके कारिंदे नगरों, उपनगरों आदि की ओर रुख करते थे।

फिल्मों के रोल्स के डिब्बे, कपड़ों के बड़े-बड़े बैनर और कागज के छोटे-बड़े पोस्टरों के पैकेट्स या तो ट्रांसपोर्ट के जरिये भेज दिये जाते थे या एजेंट्स खुद अपनी कारों में भी साथ लाते थे।

खैर, वह सब तो अलग ही इतिहास है; असल इतिहास तो यह बताना है कि पहली फिल्म मैंने कौन-सी देखी थी, कैसे देखी थी और क्यों देखी थी?…

(चित्र साभार)

अपने हिस्से में… गुन:ह ही गुन:ह / बलराम अग्रवाल

बेतरतीब पन्ने-11

इन पन्नों पर एक करामात शुरू से ही शामिल रही है। वो यह कि इनमें से कुछ किस्से, जो अपने नाम से मैंने बयां
किये, जरूरी नहीं कि मेरे ही थे और बहुत-से किस्से, जिन्हें मैंने दोस्तों के बताया, जरूरी नहीं कि उनके ही रहे हों। 
 
इस रहस्य पर से पर्दा मैं क्यों उठा रहा हूँ? मजबूरी है। 
 
हुआ यों कि कयामत के दिन मेरे जैसे सीधे-सादे एक बंदे का चिट्ठा जो खोलकर पढ़ा गया, कर्मों के हिसाब से उनके लिए ‘दोजख’ का आदेश हुआ। बंदा परेशान। यह क्या हुआ? पूरी जिन्दगी तो बच्चे पैदा करने और पालने-पोसने में बिता दी, पाँचों वक्त की नमाज भी अता की। भूखों को भोजन खिलाया, प्यासों को पानी की कमी नहीं होने दी, बावजूद इसके दोजख!!! 
 
जैसे हिन्दू धर्म के अनुयायियों ने कर्मों का लेखा-जोखा रखने के लिए चित्रगुप्त को नियुक्त किया हुआ है, वैसे ही मुस्लिम धर्म में करामन और कातिबी का नाम बताया जाता है। बंदे ने कर्मों का हिसाब-किताब रखने वाले उन दोनों फरिश्तों से मुलाकात की। कहा कि देखें, नोट करने में जरूर कुछ का कुछ लिख देने की गलती आपसे हो गयी है। बोले कि—
 
मुझे घर से औ’ दफ्तर से तो फुरसत ही न मिलती थी,
गुनह फिर कब किये आखिर करामन-कातिबी मैंने?
 
दोनों देवदूतों ने उनकी दरयाफ्त सुनी और पढ़कर सुनाने की बजाय उनके कर्मों का बहीखाता ही उनके सामने कर दिया। कहा—“खुद ही देख लें।”
 
बंदे ने देखा! उस बहीखाते में उसके नाम के आगे लिखा कुछ नहीं था; अलबत्ता कागज के स्क्रीन पर स्वयं उसे ही बोलते हुए दिखाया जा रहा था। करामन और कातिबी ने कहा—“दोजख तो उसी आधार पर है जो खुद आप ही ने बयान किया था; अपनी ओर से हमने कुछ नहीं लिखा।”
 
उस मौके पर उस बंदे ने जो दलील पेश की, वह यों थी—
 
सुनाया इस कदर पुरजोर किस्सा अपनी उल्फत का,
फसाना था किसी का, अपनी बातें जोड़ दीं मैंने!
 
तात्पर्य यह कि तीर तो किसी 'और' ने चलाये थे, उन तीरों पर बंदा ‘और’ का नाम हटाकर अपना नाम जोड़ता और जिन्दगीभर वाह-वाही कमाता रहा।
 
‘बेतरतीब पन्ने’ आगे भी उस बंदे के किस्सों की तरह ही सामने आने वाले हैं। जाहिर है, कि इन पन्नों के लेखक का नाम ‘दोजख’ वाली फाइल में प्रोन्नत होता रहेगा, ऑटोमेटिकॉली। और यकीन मानिए, अपन करामन-कातिबी के सामने शिकायती खत लेकर हाजिर होने वाले बिलकुल भी नहीं हैं।
 
अफसानानिगारी का अंजाम पता है, दोजख ही मिलेगा दूसरा कुछ नहीं।
 
अफसानानिगारी के अलावा भी कई काम हैं जिनकी बदौलत दोजख के दरवाजे अपन को खुले मिलने वाले हैं। पहला काम यह कि अपन ब्रह्म-मुहूर्त में बिस्तर छोड़ने की बजाय ब्रह्म-मुहूर्त में बिस्तर जकड़ने के अभ्यासी हैं। दूसरा काम यह कि कभी भी चोरी-चकारी से पीछे नहीं हटते। आँख बची, माल यारों का। तीसरा यह कि प्याज और लहसुन से परहेज नहीं रखते। मांस-मच्छी कभी नहीं खाया लेकिन एक ही तरह की कसमें इतनी बार खायी हैं कि उन कसमों को ही लाज आने लगी होगी। 
 
अब जरा पत्नी की ओर रुख करते हैं। जब से आई हैं, वह ब्रह्म-मुहूर्त में बिस्तर छोड़कर घर के काम-काज में जुट जाने की आदी हैं। चोरी-चकारी? राम का नाम लो। प्याज-लहसुन, मांस-मच्छी? सवाल ही पैदा नहीं होता। मैं लगातार उन्हें समझाता हूँ कि ये वे गुण हैं जो परलोक में पति से दूर रहने में सहायक सिद्ध होंगे। इसलिए हे मीरा रानी! मत बनो आलसी, मत करो चोरी-चकारी, मत खाओ मांस-मच्छी; लेकिन प्याज-लहसुन तो कभी-कभार चख लिया करो। परलोक में पति के साथ बने रहने का कुछ तो जुगाड़ बनाकर चलो।
 
10-3-22/2:00(चित्र साभार)

सोमवार, 7 मार्च 2022

जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया…/ बलराम अग्रवाल

बेतरतीब पन्ने-10

गणेश से ही जुड़ा एक किस्सा यह भी। 

मामन की ओर जाने वाली सड़क पर 1970 तक बुलन्दशहर के आवासीय क्षेत्र का विस्तार भूतेश्वर मन्दिर से आगे नहीं के बराबर था। मामन रोड पर ही भूतेश्वर मन्दिर से करीब 500 मीटर आगे मिट्टी का एक ऊँचा बाँध था। यह बाँध शहर की नालियों के गन्दे पानी को काली नदी से मिलाने वाले नाले के सहारे-सहारे खड़ा किया गया था। सामान्य दिनों में नाले के पानी से शहर की किसी भी बस्ती को किसी प्रकार की हानि की गुंजाइश नहीं थी; इसका उद्देश्य बाढ़-ग्रस्त काली नदी के बैक वॉटर को नाले के रास्ते शहर में घुसने से रोकना होता था। ‘बाँध’, जिसे आम बोलचाल में हम ‘बंद’ कहते थे, से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर ‘मोहन कुटी’ थी। मोहन कुटी में एक अखाड़ा और एक कुआँ भी था; और बैठने-बतियाने के लिए चबूतरे-चबूतरियाँ भी। मोहन कुटी के बाद खेत और बाग-बगीचे शुरू हो जाते थे। 

गणेश एक शाम खेलते-खेलते बोला—“बलराम, मोहन कुटी के पास वाले खेत में एक पोखर है न!…”

“हाँ, है।” मैंने हामी भरी।

“उसमें सिंघाड़े की बेलें बोई हुई हैं।” उसने रहस्योद्घाटन के अंदाज में बताया।

“तुझे कैसे मालूम?” मैंने पूछा।

“कल फारिग होने के बाद जब मैं उसकी तरफ बढ़ा तो वहाँ बैठे एक बुड्ढे ने मुझे डाँटा—ए लड़के, टट्टी कहीं और जाकर धो, इसमें खाने की चीज बोई हुई है।… मैने पूछा—क्या? तो बुड्ढे ने कहा—सिंघाड़ा!”

इतना बताकर गणेश चुप नहीं बैठा। बोला—“मैंने सब जासूसी कर ली है। बुड्ढा सुबह से दोपहर तक पोखर की रखवाली पर बैठता है। बारह बजे के आसपास खाना खाने को घर जाता है और एक घंटे बाद लौटता है।”

“इस बीच कोई नहीं रहता है?” मैंने पूछा।

“कोई नहीं।” गणेश बोला, “भगवान कसम।… एक काम कर, कल बारह बजे चलते हैं एक-एक झोला लेकर।”

“ठीक है।” मैंने कहा, “लेकिन कल नहीं परसों।”

“परसों क्यों?”

“कल इतवार है, ” मैंने कहा, “छुट्टी का दिन। कल पूरे दिन लोगों की आवाजाही उधर रहेगी।”

“ठीक है।…” गणेश बोला, “लेकिन परसों मुझे कुछ काम है। हम उससे अगले दिन चलेंगे।”

कार्यक्रम की योजना बनाकर हम अपने-अपने घर चले गये। नियत दिन हमने कोई बहाना बनाकर अपने-अपने स्कूल की छुट्टी की। नियत समय पर अपने-अपने घर से एक-एक झोला बगल में दबाया और बारह बजे के आसपास पोखर की ओर निकल गये। हमारे मोहन कुटी पहुँचने तक, हमने दूर से देखा—बुड्ढा घर नहीं गया था। हमें इसीलिए काफी समय मोहन कुटी की एक बेंच पर लेट-बैठकर बिताना पड़ा। 

बेंचों पर हम कभी लेटते, कभी बैठते। घड़ी तो हम पर होती नहीं थी। लेकिन अनुमान लगाया कि बैठे-बैठे हमें दो तो बज ही गये होंगे।

“आज दिन क्या है?” ऊबकर मैंने गणेश से पूछा।

“आज?” गणेश कुछ सोचता-सा बोला, “सोमवार… नहीं-नहीं, मंगल है आज।”

“मंगल ही है न!”

“हाँ, पक्का।” उसने कहा।

“तो आज बुड्ढा घर नहीं जायेगा।” मैंने कहा।

“क्यों?” गणेश ने आश्चर्य से पूछा।

“आज के दिन वह व्रत रखता होगा, ” मैं बोला, “इसीलिए अब तक नहीं टला है यहाँ से।”

“ओह!” गणेश के गले से एकाएक ठण्डी आह-सी निकली।

“चलो, घर चलते हैं।” मैंने उठकर चलते हुए कहा। इन्तजार इतना लम्बा हो चुका था कि और-अधिक बैठना सम्भव नहीं था। गणेश ने प्रतिवाद नहीं किया। उठ खड़ा हुआ। बेआबरू-से होकर थके-थके कदमों से हम खरामा-खरामा उस कूचे से बाहर आ गये।

अगले दिन बुधवार था। हमने तय किया कि हम घर से स्कूल के लिए निकलेंगे। सुबह की हाजिरी दर्ज कराएँगे और पहली रेसिस में ही अपना-अपना स्कूल छोड़कर मोहन कुटी पहुँच जाएँगे। सिंघाड़ों के लिए एक-एक अतिरिक्त झोला अपने-अपने बस्तों में रखना हम नहीं भूले थे।

क्लास से और फिर स्कूल से गायब होना हमारे लिए नई बात नहीं थी। गणेश, शर्मा इण्टर कॉलेज में पढ़ता था और मैं डीएवी में। दोनों स्कूलों के बीच अच्छी-खासी दूरी के बावजूद हम तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार बारह बजे के आसपास मोहन कुटी में जा मिले। उस दिन हमें ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा। पहुँचने के 15-20 मिनट बाद ही बुड्ढा घर के लिए रवाना हो गया। हमने आव देखा न ताव, बस्ते संभालकर ताबड़-तोड़ पोखर की ओर भाग खड़े हुए। बस्तों को किनारे पर पटककर पोखर में जा कूदे और सिंघाड़ों से झोलों को भरना शुरू कर दिया। 

पहली बार सिंघाड़ों के भण्डार में घुसे थे। बहुत-कम समय में हमने अपने झोले गरदन तक भर लिए। उस आपाधापी में यह ख्याल ही नहीं रहा कि पोखर के पानी से बाहर भी निकलना है। सोचते रहे कि कुछ सिंघाड़े और तोड़ लें।

अपनी इस लापरवाही का खामियाजा हमें हाथों-हाथ भुगतना पड़ा। बुड्ढा खाना खाकर वापस लौट आया। उसे देखकर हमारी सिट्टी-पिट्टी गुम। आते ही बुड्ढे ने सबसे पहले तो किनारे पर रखे हमारे बस्ते अपने काबू में किये, फिर खासा पुचकारते हुए पोखर से बाहर आने को हमारा आह्वान किया। डरते-सहमते हम पोखर से बाहर आये। दोनों झोलों में भरे सिंघाड़ों को उसने किनारे पर रखी गहरी-सी टोकरी में उलट देने को कहा और हमें एक ओर बैठ जाने का हुक्म सुनाया। हम बैठ गये।

“अपने-अपने बाप का नाम बताओ।” बुड्ढे ने गुस्से में भरकर कहा। 

हमने रोना शुरू कर दिया। मरना मंजूर था लेकिन बाप का नाम बताना तो किसी हाल में मंजूर नहीं था। और हुआ भी यही। बुड्ढा बाप का नाम जानने की भरसक कोशिश करता रहा और हम बाप का नाम न बताने की जिद पर अड़े रहे। घंटों बीत गये। कोई भी पक्ष टस से मस नहीं हुआ, न वह न हम। रोते-रोते हमें जब काफी समय बीत गया तो पसीजकर बुड्ढे ने हमसे पूछा, “भूख लगी है?”

दहशत के मारे हालाँकि भूख-प्यास सब नदारद थी, लेकिन हमने ‘हाँ’ में गरदन हिलाई। हमारे ही द्वारा तोड़े गये सिंघाड़ों से भरी टोकरी की ओर इशारा करके उसने दयापूर्वक कहा, “खाते रहो इसी में से ले-लेकर।”

हम बेशर्मों ने टोकरी से उठाकर सिंघाड़े छीलने और खाने शुरू कर दिये। दया के वे निवाले हमें परोसकर बुड्ढे ने सोचा होगा कि हम अपने-अपने पिता का नाम उसे बता देंगे। लेकिन एक कहावत है न—जालिम आदमी पीटता कम है, घसीटता ज्यादा है। वह हमें याद थी। ईश्वर इस धृष्टता के लिए माफ करे, लेकिन सच यही है कि हमारे मन में पिता की छवि उन दिनों ‘जालिम’ की ही हुआ करती थी। बुड्ढा यदि हमें पीटता भी तो वह पिटाई हमें मंजूर थी, लेकिन घसीटे जाना बिल्कुल भी मंजूर नहीं था। आँखों ही आँखों में हमने तय किया और न तो मैंने और न महेश ने पिताजी का नाम बताया। 

शाम चार बजे के आसपास आखिर बुड्ढे का दिल पसीज गया। बोला—“आधा-आधा झोला भरकर अपने घर जाओ।… और सुनो, आगे से ऐसी गिरी हुई हरकत कभी भी, कहीं भी मत करना।”

“जी बाबा।” इस दयानतदारी पर हमने आँसू पोंछते हुए उस बुजुर्ग के पाँव छुए। दयानतदारी इसलिए कि उस समय तो हमारी जान और बस्ते बख्श दिया जाना ही बड़ी नियामत थी। बकौल साहिर लुधियानवी--जो मिल गया उसी को मुकद्दर ... मानकर खैरात में मिले मुट्ठीभर सिंघाड़ों को लेकर घर वापस पहुँचे। मुट्ठीभर इसलिए कि हमारे द्वारा तोड़े गये सिंघाड़ों की तुलना में वे कम ही थे। बेइज्जती की बात तो घर पर क्या बतानी थी, अपनी वीरता के ही किस्से सुनाए कि कैसे हम सिंघाड़े वाली पोखर के रखवाले को छकाते हुए यह सब लाये हैं। घरवालों ने भी जरूरी हिदायतें जरूर दी होंगी, जो अब याद नहीं हैं। बोध और उपदेश जैसी अच्छी बातें याद ही कब रहती हैं। याद तो सिर्फ बेइज्जतियाँ ही रहती हैं इसीलिए आज लिखी जा रही हैं। हम भाग्यवान हैं कि हमारे हिस्से में वे भरपूर आईं। उन्हीं के चलते कोई बेइज्जती हमें आज भी बेइज्जती महसूस नहीं होती है। इज्जत की जरूरत तो उनके चलते पहले भी कभी महसूस नहीं हुई।  

06-3-22/21:03

(चित्र साभार : गूगल)