शुक्रवार, 1 मार्च 2024

आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र की लघुकथाएँ, भाग-3 / बलराम अग्रवाल

‘कवि-हृदय कथाकार आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र’ शीर्षक से डॉ॰ ॠचा शर्मा द्वारा सम्पादित ‘आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र रचनावली, भाग-1 (लघुकथाएँ-बोधकथाएँ / प्रथम संस्करण 2024) में भूमिका स्वरूप संकलित आलेख की तीसरी किस्त…

दिनांक 26-02-2024 को प्रकाशित दूसरी किस्त से आगे……

युग की ज्वलन्त समस्याओं का आग्रह था कि साहित्य, कविता, कला नव-संस्कृति की प्राण-प्रतिष्ठा में अपना जीवन्त सहयोग दें। पूँजीवादी प्रतिस्पर्द्धा में संसार की सम्पत्ति एक छोटे से वर्ग के अधिकार में है और पूँजीवादी शोषण धनी और निर्धन के बीच में खाई बना रहा है। समाज में सर्वहारी और सर्वहारा में भीषण संघर्ष है। व्याधिग्रस्त, संघर्ष-ध्वस्त खंडित-पीड़ित मानवता की ओर अब कवि/कथाकार ने दृष्टिपात किया। चिरकाल से कविता/कथा का प्रेय-श्रेय वर्ग-विशेष और व्यक्ति-विशेष रहा। अब उसने सामान्य मानवता का वरण किया। अब कविता/कथा ने अपना आराध्य सर्वहारा को बनाया।

मैं कवि/कथाकार और कविता/कथा का उल्लेख कर रहा हूँ क्योंकि ये कथाएँ अपनी प्रकृति में अपने समय के काव्य के ही अधिक निकट ठहरती हैं।

लघुकथा संग्रह ‘खाली-भरे हाथ’ (प्र. सं.1958) में 72 लघुकथाएँ संग्रहीत हैं। ‘खाली-भरे हाथ’ शीर्षक से पूर्व संग्रह ‘पंचतत्व’ के ‘बोध-कथाएँ’ खंड की अन्तिम कथा भी है। इससे यह अनुमान अनायास ही सामने आ खड़ा होता है कि इस संग्रह की लघुकथाओं पर बोध-कथाओं की छाया हो सकती है। इस संग्रह की ‘बोध कथाएँ’ शीर्षक से लिखित भूमिका में डॉ. रामकुमार वर्मा ने लिखा है— ‘संस्कृत साहित्य में ‘हितोपदेशऔर पंचतन्त्रकी कथाओं में लघुकथाओं का रूप स्पष्ट हो सका है। इन कथाओं में प्रधान रूप से कथात्मक तत्व कम और जीवन के लिये बोध तत्व ही प्रधान है। जीवन के शाश्वत तथ्यों से सम्बन्धित प्रश्नों का मनोरंजनपूर्ण हल है, जो साधारण रूप से ग्राह्य है। इन सब कथाओं के बोध-तत्व व्यवहारिक हैं; किन्तु आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र की रचनाओं में उनसे कहीं अधिक बोधगम्य अभिव्यक्तियाँ और सरलतापूर्वक ग्राह्य सत्य की अभिव्यक्ति हैं। उनकी लघुकथाएँ युग के मानव के विभिन्न पार्श्वों को लेकर चली हैं। वर्तमान की अभिव्यक्ति में ही वे संस्कृत साहित्य की लघुकथाओं से विशिष्ट कोटि की हैं। उनमें युग-मानव का सत्य साकार हो उठा है।’ मात्र 41 शब्दों में लिखित इसकी ‘आत्म-लक्ष्य’ शीर्षक रचना से यह कथन सिद्ध भी होता है। देखिए—

एक व्याथ ने अपने तीक्ष्ण शर से विद्ध तड़फड़ाते हुए हरिण के पास जाकर उल्लास से कहा—अहा! देखा मेरा अचूक निशाना?

तड़फते हुए हरिण ने अपने प्राण छोड़ते हुए भग्न स्वर में कहा—बन्धु! एक बार अपने लगाकर तो देख!

क्योंकि ये बोध-कथाएँ हैं, इसलिए इनमें से बहुत-सी कथाओं के पात्र मूर्त-अमूर्त मानवेतर भी हैं। इन कथाओं के सन्दर्भ में ‘बोध’ से तात्पर्य निरा बोध नहीं है; बल्कि विद्रोह के स्वर भी इनमें छिपे पड़े हैं। देखिए, मात्र 65 शब्दों में कही गयी ‘जीने का मन्त्र’ शीर्षक यह कथा—

खट्-खट् करती खड़ाऊँ से एक दिन उसके स्वामी पंडित ने पूछा—भद्रे! क्या बात है, कि पैरों के नीचे इतना दबे रहने पर भी आज तक तुम्हारा स्वर मन्द नहीं हुआ?

खड़ाऊँ ने पैरों के नीचे दबे-दबे ही उत्तर दिया—मैं तो जीना चाहती हूँ, पण्डित! संसार में, जो किसी से दबकर अपना स्वर मन्द कर देते हैं, वे जीते नहीं, मर जाते हैं!                                                      

इस बोध-कथा को पढ़कर एकाएक अपनी ही एक कविता याद हो आयी। उसका एक अंश यों है—

जूता,

जो चरमराता है,

मर्द का पाँव काट खाता है।

ये उसका

अपना तौर है यारो,

ये बगावत का दौर है यारो!

शंकराचार्य ने कहा था—‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ अर्थात् मात्र ब्रह्म ही सत्य है, सम्पूर्ण जगत् मिथ्या है। सवाल यह पैदा होता है कि सत्य ब्रह्म ने मिथ्या जगत् की रचना क्यों की अथवा सत्य ब्रह्म से मिथ्या जगत् कैसे उपजा? दूसरे, क्या सत्य से असत्य यानी मिथ्या उत्पन्न हो सकता है? आचार्य मिश्र ने इस प्रकरण को आधार बनाकर मात्र 37 शब्दों की दर्शन आधारित एक बोध-कथा ‘परम-सत्य’ की रचना की है—

एक ब्रह्मज्ञानी ने जगत् से कहा—तू मिथ्या है। केवल एक ब्रह्म ही तो सत्य है।

जगत् ने उत्तर दिया—अज्ञानी। यदि मैं मिध्या होता, तो तेरा और तेरे ब्रह्मज्ञान का आज अस्तित्व ही कहाँ होता?

नारी की चाह’ आचार्य मिश्र की मनोविश्लेषण आधारित बोधकथा है—

एक रानी ने एक दिन अपनी मुँहलगी दासी को उदास मन देख पूछा—दासी! तुम देखती हो, मैं तुम्हें हृदय से प्यार करती हूँ; और तुम्हारी सुख-सुविधा का अपने से भी अधिक ध्यान रखती हूँ। फिर न जाने तुम्हारे मन में कौन-सा दुःख छुपा है?

दासी ने डरते-डरते उत्तर दिया—बस, यही तो, रानी नहीं हूँ।

‘मौन-सत्य’ मातृ-हृदय दर्शन की बोध-कथा है—

एक माँ ने अपने उत्पाती बालक के उत्पातों से दुःखी होकर झुंझलाहट से भर, एक दिन अपने बालक से कहा—दुष्ट! तू न होता तो अच्छा था, मैं तो तुझसे दुःखी हो गई।

बालक ने तत्काल अपने दोनों हाथों में माँ का कण्ठ भरकर कहा—अम्मा! सच कहना, मैं न होता, तो तू सचमुच सुखी होती?'

उत्तर से माँ अवाक् थी। 

स्त्री-हृदय दर्शन की बोध-कथा है ‘प्रसन्नता के आधार’—

एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा—गुरुदेव! बालक क्या पाकर प्रसन्न रहता है?

गुरु ने कहा—किसी का दुलार।

और,शिष्य ने पूछा—गुरुदेव! युवा?

गुरु ने कहा—किसी का प्यार।

शिष्य ने पूछा—और गुरुदेव। वृद्ध क्या पाकर प्रसन्न रहता है?

गुरु ने कहा—किसी का सत्कार!

और गुरुदेव।शिष्य ने पूछा—नारी क्या पाकर प्रसन्न रहती है?

गुरु ने कहा—तीनों; दुलार, प्यार, सत्कार।

‘आत्म-दुर्बलता’ मानव-हृदय दर्शन की बोध-कथा है—

एक दिन मनुष्य ने दुःखी होकर अपने पापों से कहा—दुष्टो! तुम सब समय मुझे घेरे ही रहते हो। एक क्षण को तो मुझसे दूर रहा करो?

उसके पापों ने उत्तर दिया—बन्धु। यदि तू हमें छोड़कर कहीं और मन लगा सके, तभी तो!

बुभुक्षा-दर्शन पर आधारित है बोध-कथा ‘रोटी और युद्ध’—

एक सैनिक को अनमने मन से युद्ध-स्थल में भेजते हुए उसकी स्त्री ने पूछा—स्वामिन्। मनुष्य दूसरे मनुष्यों से युद्ध क्यों किया करते हैं?

सैनिक ने उत्तर दिया—प्रिये! ऐसा जान पड़ता है, मनुष्य ने पहिली बार दूसरे मनुष्यों से तब युद्ध आरम्भ किया होगा, जब उन्होंने उसके हाथ की रोटी पहली बार छोनी होगी?

उसकी स्त्री ने दूसरा प्रश्न किया—और स्वामिन्। वह कभी इन युद्धों से विरत भी होगा?

सैनिक ने अपनी स्त्री के दूसरे प्रश्न का समाधान यह कहकर किया—शायद, तब, जब मनुष्य अपनी रोटी बिना हाथ पसारे ही दूसरों की आगे रखनी सीख लेगा!

                                                                                                           शेष आगामी अंक में………

सोमवार, 26 फ़रवरी 2024

आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र की लघुकथाएँ, भाग-2 / बलराम अग्रवाल

 ‘कवि-हृदय कथाकार आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र’ शीर्षक से डॉ॰ ॠचा शर्मा द्वारा सम्पादित ‘आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र रचनावली, भाग-1 (लघुकथाएँ-बोधकथाएँ / प्रथम संस्करण 2024) में भूमिका स्वरूप संकलित आलेख की दूसरी किस्त…

दिनांक 23-02-2024 को प्रकाशित पहली किस्त से आगे……

तीत के अध्ययन से हम जानते हैं कि छायावाद के प्रभाव में आकर कवि तो कवि, कथाकार भी ‘स्व’ की अनिर्वचनीय वेदना और अनुभूति के रंग में ‘विश्व’ को डुबो रहे थे। उनके लिए आत्मवेदना ही सबसे ऊपर थी और वही ऐकान्तिक वेदना थी। ‘स्व’ की वेदना को ही तब के कवि-कथाकार विश्वव्यापी वेदना मानते थे। विश्व की वेदना को न तो वे पहचान ही सके और न ही  अपनी वेदना बना सके थे। काल का प्रभाव ही कुछ ऐसा था कि अधिकतर कवि-कथाकारों को सिवा अपनी धड़कन के और कोई अन्य ध्वनि न तो सुनने का अवकाश था, न देखने का। उदाहरण के लिए प्रस्तुत है आचार्य मिश्र की एक बोध-कथा ‘संयोग-वियोग’ जिसे गद्य-काव्य कहना अधिक उपयुक्त होगा—

एक दिन काले-काले मंघों ने इकट्ठा होकर तड़ित से कहा—देवि! वैसे तो तुम दिव्य हो; आलोकमयी हो: तुम्हें पाकर हम धन्य हुए हैं; परन्तु तुम्हारी वाणी अत्यन्त भीम है। जब तुम गर्जन करती हो तो भय से हमारे आलिंगन छूट जाते हैं। उस समय तुम भी हमारे वक्ष से बाहिर निकलकर खड़ी हो जाती हो। यदि तुम्हारी वाणी भी मधुर होती तो हम उम्र भर भी तुम्हारा यह वियोग न देखते।

तड़ित ने उत्तर दिया—बन्धुओ, फिर संसार को यह ज्ञान कैसे होता—कालिमा में भी कुछ दिव्य है; आलोक में भी कहीं तिमिर छिपा है; संयोग में भी वियोग रहता है और वियोग में कहीं न कहीं संयोग छिपा रहता है।     

कथाकार की यह वह अवस्था है, जब समस्त प्रकृति उसको अपने ही हृदय में स्पन्दित दिखाई देती है। अपनी दिव्य दृष्टि से वह सूर्य-चन्द्र-तारों का नाच देखता है। उषा और संध्या की आभा और अरुणिमा देखता है। मेघों की आँख-मिचौली, कमल और कुसुम, हरसिंगार और मौलश्री, जवाकुसुम और पाटन के फूलों तथा जुही की कलियों की लास-लीला देखता है। उसने छाया और ज्योत्स्ना, इन्द्रधनुष और विद्युत् की रंगरेलियाँ देखीं, रात को तारों की जाली और फूलों के गजरे पहनाये; सरिताओं, तारिकाओं जुगनुओं, किरणों, लहरियों में, मधुबयार के झोंकों में और तितलियों, कोकिलों, भौरों, पपीहों, झींगुरों, मेघों के स्पन्दन, गुंजन, कूजन, क्रन्दन, नर्तन, निस्वन और गर्जन में प्रेम और प्रणय के हजारों-हजार सन्देश सुने। अपनी सीमित पुतलियों पर त्रिलोकी के चित्र अंकित किये, पर इस पृथ्वी पर हो रहे एक विराट जीवन-स्पन्दन, विश्वव्यापी धड़कन, विराट हलचल और कोलाहल को न तो उनकी आँख देख पायी और न उनके कान ही सुन पाये। रहस्यवादी कवि/कथाकार स्वप्नजीवी मानव अथवा आकाशचारी पक्षी की तरह क्षितिज के पार ‘अनन्त’ की झाँकी देख आते हैं, जहाँ सागर-लहरी और अम्बर प्रेमालाप करते हैं, जहाँ वसुधा विराट् पुरुष का चरण-चिह्न सी दिखाई देती है, जहाँ से जीवन काल के कपोलों पर ढुलका अश्रुकण-सा रह जाता है, जहाँ पहुँचने पर मनुष्य का प्राण बाँसुरी की एक फूंक और वीणा की एक झंकार की भाँति, उठ उठकर विलीन होता दिखाई देता है। भारतीय दार्शनिक की दृष्टि इस सापेक्ष जगत् को असत्य और मृषा मानती है तथा इससे परे किसी निरपेक्ष सत्य को देखती है जो मन, वाणी और बुद्धि से अगम्य है। वह दृश्य-जगत् और ऐहिक-जीवन को ‘माया’, ‘छाया’ मानकर उसके प्रति विराग का अंकुर उपजाता है, जो अनेक दिशाओं में हुए पलायनों में पल्लवित होता है। जहाँ यह दार्शनिक दृष्टि से अनुपम है, वहीं यह भी सत्य है कि शताब्दियों की भारतीय दासता का बीज भी इसी मानसिक अवस्था में छिपा हुआ है। जीवन सघर्ष का हमारे लिए कोई मूल्य नहीं रह गया था। कवि/कथाकार ने जीवन की नश्वरता ही देखी, अमृतत्व नहीं।

रहस्यवादी कवि/कथाकार ने महा-शून्य में घूमते ज्योतिष्क पिण्डों को पुतलियों में बाँधा, शून्य को हृदय में समेटा, प्रलय को पालना बनाया, मृत्यु-जीवन को जागृति का तट बनाया। देखिए, ‘अथः इति’ शीर्षक यह बोध-कथा—

एक दिन अथः ने इति से कहा—यदि मेरे जीवन में तून आती तो में अन्तहीन होकर संसार में अमर हो जाता!

इति ने स्नेह से हँसकर उत्तर दिया—सखे! यदि मैं तेरे जीवन में कभी न आती, तो तू नारी के पावन चरण स्पर्श के अनन्त सुख से वंचित न रह जाता; जिससे तेरी सारी कृतियाँ ही निष्फल होकर रह जातीं।

अपने इस विराट् रूप के भावन में वह धरती पर कीट-मकोड़ों सरीखे रेंगने वाले मनुष्यों को भूल गया। क्यों? इसलिए कि उसने कुछ विशेष विषयों के स्पर्श से स्वयं को विलग नहीं किया। देखिए, बोध-कथा ‘संसार’—

भक्त ने एक दिन अत्यन्त तल्लीनता से भगवान् की आराधना कर भारी दुःख से कहा—प्रभो! यह संसार तो बड़ा पापमय है। चारों ओर राग-द्वेष, घृणा-अहंकार, छल-प्रपंच ही इसमें दिखाई देता है।

भक्तवत्सल भगवान् ने उत्तर दिया—यह तेरी दृष्टि का दोष है भक्त!  अपनी दृष्टि से कह, वह संसार के राग-द्वेष, घृणा-अहंकार, छल-प्रपंच का स्पर्श करना ही छोड़ दे। स्पर्श ही तो किसी वस्तु से मोह या घृणा उत्पन्न किया करता है!

सियाराम मय सब जग जानीके विश्वासी बाबा तुलसीदास संन्यासी होकर भी भव की पीड़ा से पीड़ित थे—‘भव बंधन काटिहिं नर ज्ञानी’। परन्तु अपने गुप्त अन्तर-लोक में अपने प्रियतम से प्रेमालाप करनेवाले रहस्यवादियों ने पृथ्वी के गर्भ में सिसक रहे नंगों-भूखों का रुदन-क्रंदन नहीं सुना। समाधि तोड़कर जग-जीवन के सृजन-सिंचन-संहार का भावना उसने नहीं किया था। अभी तक धर्म-दर्शन में डूबी लघुकथा ने अन्तर्जीवन की भावना का अनुसंधान तो किया था,  किन्तु बहिर्जीवन की समस्याओं का विश्लेषण नहीं किया था। आत्मा के रहस्य खोजने में शरीर की भूख-प्यास, व्यथा-वेदना की आह-कराह विश्व-वातावरण में भरती रही, परन्तु दर्शन-कुंठित हमारा कथाकार हिमालय की भाँति जड़ीभूत, निश्चल, निस्पन्द, ध्यान-मग्न ही रहा। परन्तु अन्त में उसे अपनी आँख खोलनी पड़ी और उसे आसपास, पैरों के तले देखना पड़ा। ‘धरती के प्राणी आकाश की उड़ान’ शीर्षक बोध-कथा में आचार्य मिश्र ने वायुयान में उड़ने वाले मनुष्यों के बारे में एक बालक के मुख से अपनी माता से यह प्रश्न कराया—“तो क्या अम्मा! वे यह नहीं जानते, धरती के प्राणी धरती पर रहकर ही फल-फूल सकते हैं?तात्पर्य यह कि आचार्य मिश्र धरती से जुड़े कथा-यथार्थ को जानते हैं।

स्वप्नजीवी कविता/कथा को भी युग-जीवन की ओर से आह्वान आता था। युग-धर्म का आग्रह था कि हमारा कवि/कथाकार अपने चारों ओर के समाज-जीवन, राष्ट्र-जीवन और विश्व-जीवन को देखता, उसके हास-अश्रु, आशा-आकांक्षा, व्यथा-वेदना-प्यास को कविता/कथा में सजीवता देता और काव्य अथवा कथा जीवन का मर्म हैइसको चरितार्थ करता। राष्ट्र-जीवन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दासता से हमारे जीवन में एक जघन्य जड़ता आ गई थी। अंगों पर मूर्च्छा का अभिशाप था, मरण के धक्के से जीवन हतप्रभ और म्लान था, आत्मा विमूढ़ और स्तंभित हो गई थी, चेतना निष्प्राण; कानों में रोदन-क्रंदन गूंज रहे थे, पीड़ितों का चीत्कार हमारे रक्त की रही-सही चेतना को कुंठित कर रहा था, सर्वनाश की गाज लकवे की भाँति शरीर पर गिर गई थी। कण-कण में संघर्षण की शक्तियाँ सजग हो रही थीं, विप्लव भूचाल बनता हुआ आगमन की सूचना दे रहा था और हमारी कविता/कथा जीवन से विच्छिन्न थी ! हमारा कवि/कथाकार तंद्रिल-स्वप्निल मादकता की मधुछाया में सो रहा था!!

जीवन की पुकार निरन्तर कवि/कथाकार के कानों को नहीं, प्राणों को छू रही थी। ‘वस्तु-जीवन की ओर’ उन्मुख होकर वह अपने लीला-विलास से कुछ क्षण चुराकर मुहूर्त भर दृष्टि डाल लेता था और ‘भिक्षुक’ और ‘विधवा’ की मूतियाँ अपने काव्य-मंदिर में प्रतिष्ठित कर देता था। जीवन-जागृति, बल-बलिदान के पथ पर जानेवाली राष्ट्रीय स्वतन्त्रता की साधना आशा-निराशा, जय-पराजय के उत्थान-पतन के साथ चल ही रही थी।

अर्थनीति में शोषण-पीड़न और राजनीति में दमन-दलन किसी भी कवि/कथाकार का ध्यान खींचने के लिए पर्याप्त थे। यह नहीं कि हिन्दी के कवि/कथाकार, जीवन के हाहाकार के प्रति उदासीन थे; अन्तर इतना ही रहा कि उसके प्रति एक जीवित सम्वेदना और उसे मिटाने का उत्कट आवेग उनमें अभी मुखरित नहीं हुआ था। परन्तु अब कवि/कथाकार की अन्तर्मुखता बाहर फैले हुए जन-जीवन में डूबने के लिए छटपटाने लगी। स्वप्नलोक को छोड़कर वह वस्तु-जगत में ही अब साहित्य का सत्य साकार देखने लगा ।

भारत की समस्या वस्तुतः विश्व-समस्या का ही एक अभिन्न अंग है। रुग्ण भारतीय समाज की चिकित्सा यदि भारत-राष्ट्र की स्वतन्त्रता में निहित है। वो भारत राष्ट्र की स्वतन्त्रता किसी नवीन विश्व-रचना में। नई संस्कृति का अभ्युदय हुए बिना विश्वकल्याण स्वप्न था। अतः आज की समस्या निरी सामाजिक और राजनीतिक न होकर सांस्कृतिक भी है।

                                                       शेष आगामी अंक में………

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2024

आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र की लघुकथाएँ, भाग-1 / बलराम अग्रवाल

‘कवि-हृदय कथाकार आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र’ शीर्षक से डॉ॰ ॠचा शर्मा द्वारा सम्पादित ‘आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र रचनावली, भाग-1 (लघुकथाएँ-बोधकथाएँ / प्रथम संस्करण 2024) में भूमिका स्वरूप संकलित आलेख की पहली किस्त…

साहित्य की कोई भी धारा एकाएक नहीं प्रारम्भ होती, वह अपने अतीत से, पूर्ववर्ती स्रोत से शक्ति और सामर्थ्य लेती है। नवीनतम होते हुए भी उससे जुड़ाव रखती है। लघुकथा के संदर्भ में यह बात विशेष रूप से ध्यान रखने वाली है। गुरु-गंभीर होते हुए भी ‘यशी वकील’ आज चुटकुले के समकक्ष समझी जा सकती है। ‘अंगहीन धनी’ और ‘अद्भुत संवाद’ शीर्षक गुरु गम्भीर लघुकथाएँ ‘परिहासिनी’ नामक जिस पुस्तिका में संकलित हैं, उसे स्वयं भारतेंदु जी ने कुछेक जनों के ‘हास-परिहास और विनोदार्थ संकलित किया’ कहा था। ‘एक टोकरीभर मिट्टी’ अपनी प्रकृति में बोधकथा-जैसी ठहरती है। बावजूद इस सबके ये हमारी थाती हैं। ये, वो टहनी हैं, जिनकी किसी न किसी गाँठ से हम फूट निकले हैं। पूर्ववर्ती लघु आकारीय कथाओं को हमें इसी दृष्टि पढ़ना-परखना चाहिए।

‘खाली भरे हाथ’ की भूमिका ‘बोध कथाएँ’ में डॉ. रामकुमार वर्मा ने लिखा है—‘साहित्य में सत्यं शिव सुन्दरम् की त्रिवेणी प्रवाहित करना ही आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र का ध्येय रहा है।’

आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र की लघुकथाओं पर विचार रखने से पूर्व उनकी प्रकृति के बारे में जान लेना आवश्यक और महत्वपूर्ण दोनों है। उनके कहानी संग्रह धूप-दीप की ‘यह धूप-दीप’ शीर्षक भूमिका (पृष्ठ 3) में श्रीयुत् कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने स्पष्ट लिखा है—‘वे राजनीति में आये, पर बढ़ न सके। वे साहित्य में आये और ठहर गये। पर उनके जीवन की पृष्ठभूमि राजनैतिक है या साहित्यिक ? असल में उनका मानसिक धरातल सांस्कृतिक है और राजनीति एवं साहित्य उनके लिये संस्कृति के पोषक तत्व होकर जीवन में आये है। संक्षेप में वे सांस्कृतिक होकर भी युगदर्शी है, युग के साथ हैं और अपनी कहानियों में जैसे पुकारकर कह रहे हैं—‘ठहरो, यह कलाविहीन राजनीति हमारे जीवन को एक मशीन के रूप में परिणत कर देगी, यह भयंकर है और ठहरो, राजनीतिविहीन यह कला हमारे जीवन को अकर्मण्य स्वप्नों से भर देगी, यह भी भयंकर है। इस प्रकार वे कला में राजनीति और राजनीति में कला का साहचर्य देखते हैं यानी कला और उपयोगिता के समन्वय में ही जीवन का सुख पाते हैं।’ बाबा तुलसीदास के शब्दों में—‘सन्त हृदय नवनीत समाना’। आचार्य मिश्र का जीवन उनके समकालीन कथाकार कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ की दृष्टि में ऐसा ही रहा।

आचार्य मिश्र के ज्येष्ठ सुपुत्र वैद्य शरद कुमार मिश्र ‘शरद’ के लघुकथा संग्रह ‘धूप और धुआँ’ में ‘हिन्दी साहित्य में लघुकथाएँ’ शीर्षक से भूमिका स्वरूप लिखे अपने लेख में लक्ष्मण त्रिपाठी जी ने लिखा है—‘आचार्य मिश्र जी की लघुकथाओं में यथार्थ के कठोर धरातल पर कल्पना और आदर्श की नींव डाली गई रहती है। उनकी लघुकथाओं में कथा के तत्व पूर्णरूपेण सन्निहित रहते हैं। जो कुछ उन्हें कह‌ना है, उसे बिना किसी भूमिका के कह देते हैं, सीधे-सादे शब्दों में बहुत ही सरलता के साथ और इसीलिए उनकी लघुकथाएं पाठक के अन्तर्मन को कुछ इस तरह स्पर्श कर लेती हैं कि वह उन्हें भुलाये नहीं भूल पाता। ‘पंचतत्व’ आचार्य मिश्र जी की चुनी हुई लघुकथाओं का संग्रह है, जिसमें भावात्मक सामाजिक ऐतिहासिक लघुकथाएं, लोक-कथाएं और बोध-कथाएं संग्रहीत हैं।’

शरद कुमार मिश्र ‘शरद’ के ही अन्य लघुकथा संग्रह ‘निर्माण के अंकुर’ में ‘हिन्दी लघुकथा : उपलब्धि और सम्भावना’ शीर्षक लेख में डॉ॰ राजकुमार शर्मा ने हिन्दी लघुकथा के प्रकार, प्रवृत्ति और प्रकृति पर बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें कही हैं। लघुकथा पर बात करने वाले प्रत्येक आलोचक और शोधार्थी के लिए यह एक आवश्यक लेख है। आचार्य मिश्र की लेखन-यात्रा के बारे में उन्होंने लिखा है—‘जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि सर्वप्रथम 1920-1921 ई में आचार्य जी की लघुकथाएँ प्रकाशित हुई थीं। साहित्यिक, राजनैतिक अथवा राजनीति-साहित्येतर कारणों से बीच में तीस वर्ष का अन्तराल पड़ गया। किन्तु पुनः सन् 1951 से आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र की सबल लेखनी का मौन-काल समाप्त हुआ, वह फिर मुखर हो उठी। परिणामतः 'मौत की खोज' कहानी संकलन में कुछ पुरानी और कुछ नई कहानियों के साथ उनकी तीन लघुकथाएँ (1) मौत की खोज (2) धन का विभाजन, तथा (3) अव्यर्थ स्तुति भी प्रकाशित हुईं, जिन्हें विद्वान आलोचकों तथा सुरुचि-सम्पन्न पाठकों ने हिन्दी में अपने प्रकार की अकेली बेजोड़ और अभूतपूर्व स्वीकार किया।’

आचार्य मिश्र ने विजयादशमी सन् 1957 में प्रकाशित ‘पंचतत्व’  को अपनी लघुकथाओं का पहला संग्रह माना है। इसमें उनकी 52 लघुकथाएँ संग्रहीत हैं। इस पुस्तक की ‘आचार्य मिश्र की कहानी कला’ शीर्षक अपनी भूमिका में श्रीयुत् प्रकाश चन्द्र गुप्त ने लिखा है—‘ ‘जय-पराजय’ माला की कुछ रचनाएँ और भी पुरानी हैं। उन (रचनाओं) का रचनाकाल सन् 1921 से शुरू होता है।’ (इस पुस्तक का पृष्ठ 13) डॉ. राजकुमार शर्मा ने भी अपने आलेख ‘हिन्दी लघुकथा : उपलब्धि और सम्भावना’ (वैद्य शरद कुमार मिश्र ‘शरद’ का लघुकथा संग्रह ‘निर्माण के अंकुर’, पृष्ठ ‘ड’) में लिखा है—‘1920-21 ई. के लगभग प्रकाशित आचार्य जी की लघुकथाओं के शीर्षक हैं—बूढ़ा ब्यापारीतथा अग्नि मित्र की प्रेम परीक्षा। प्रथम रचना महात्मा गाँधी पर आधारित प्रतीकात्मक शैली में भावात्मक लघुकथा है। दूसरी लघुकथा व्यंग्यात्मक शैली में सामाजिक रचना है। और, 1951 के बाद की प्रकाशित आचार्य जी की रचनाओं में मौत की खोज’, ‘पंचतत्व’, ‘खाली भरे हाथ’, ‘उड़ने के पंख’, ‘जय-पराजय’, ‘मिट्टी के आदमीशीर्षक संग्रह प्रमुख हैं।तो क्या यह माना जाए कि आचार्य मिश्र का कथा-रचनाकाल 1920-21 से शुरू होता है। अपनी ­इसी भूमिका में प्रकाश चन्द्र गुप्त जी आगे लिखते हैं—‘आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र भावना और कल्पना से परिपूर्ण कहानियाँ लिखते हैं। यथार्थ और विचार की अपेक्षा उनकी कला प्रतीकात्मक और आदर्शोन्मुखी अधिक है। स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद और चण्डी प्रसाद ‘हृदयेश’ की परम्परा का अनुसरण लेखक ने इन कहानियों में किया है। उसकी भाषा काव्यमयी और आलंकारिक है। स्वस्थ भावना और अनुभूति से लेखक की सभी रचनाएँ ओत-प्रोत हैं।’ गुप्त जी का आकलन इन सभी रचनाओं के बारे में शत-प्रतिशत सही है। इस भूमिका के आरम्भ में गुप्त जी ने लिखा है—‘इस संकलन में आपकी सामाजिक और ऐतिहासिक कथाएँ हैं, और कुछ लघु-कथाएँ भी।’ यह भूमिका भी निश्चित रूप से इस पुस्तक के प्रकाशन-वर्ष समय में ही लिखी गयी होगी। इस भूमिका के अन्त में गुप्त जी ने कहा है—‘आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र की कहानियों में हमें स्वस्थ प्रेरणा प्रचुर मात्रा में मिलती है। इन रचनाओं में कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि उनकी आत्मा कहानी की अपेक्षा काव्य के अधिक निकट है। हिन्दी कहानी के इतिहास में विशेष रूप से दो प्रवृत्तियाँ परिलक्षित होती हैं—‘प्रसाद’ की काव्यमय शैली और प्रेमचन्द की यथार्थवादी, आदर्शोन्मुखी शैली। इन दोनों धाराओं ने हिन्दी कहानी को समृद्ध किया है। आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र  ‘प्रसाद’ के ‘रोमैन्टिक स्कूल’ के अनुयायी हैं। उनकी कला रसदायिनी तो है ही, पाठक की भावनाओं को उन्नत और उदार बनाती है।’ गुप्ता जी का यह कथन कि ‘आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र  ‘प्रसाद’ के ‘रोमैन्टिक स्कूल’ के अनुयायी हैं’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह न केवल आचार्य मिश्र की प्रस्तुत लघुकथाओं के सन्दर्भ में बल्कि उक्त काल के शेष लघुकथा-लेखन के सन्दर्भ में भी युक्तियुक्त ठहर सकता है।

आचार्य मिश्र के ‘पंचतत्व’ नामक संग्रह की 52 कथाओं को 5 खंडों में विभक्त किया गया है—भावात्मक लघुकथाएँ (10), सामाजिक लघुकथाएँ (15), ऐतिहासिक लघुकथाएँ (8), लोक-कथाएँ (9) तथा बोध-कथाएँ (10)। समकालीन दृष्टि से आकलन करें तो ‘सामाजिक लघुकथाएँ’ के अलावा शेष सभी खंड अतीत की ऐसी घटना बनकर रह गये हैं जिनका महत्व लघुकथा विधा के क्रमिक विकास की दृष्टि से, लघुकथा का ऐतिहासिक विकास-क्रम जानने की दृष्टि से ही बना रह गया है, अन्यथा नहीं। उदाहरणार्थ, ‘भावात्मक लघुकथाएँ’ में ‘पंचतत्व’ शीर्षक की लघुकथा वस्तुत: केन-उपनिषद के एक आख्यान का पुनर्लेखन है। पुनर्लेखन के ऐसे उदाहरण कुछेक अन्य कथाएँ भी हैं। इससे प्रतीत होता है कि वह काल पूर्व आख्यानों के पुनर्लेखन का भी रहा होगा। यों तो इन दिनों भी ‘चाणक्य के दाँत’ जैसी लघुकथाएँ लिखी जा रही हैं। ‘सामाजिक लघुकथाएँ’ में अपेक्षाकृत लम्बे आकार की कथाएँ हैं। ये सब की सब शब्द संख्या और आकार की रूढ़ता को तोड़ती ऐसी कथाएँ हैं जिन्हें आज की परिस्थिति में ‘लघुकथा’ कहते स्वयं मुझे भी संकोच होता है। इनमें ‘एक राजनैतिक इंटरव्यू’ (रचनातिथि:12-8-57) आज की दृष्टि से भी अत्यन्त स्तरीय लघुकथा है। ‘स्टेशन मास्टर’ शीर्षक रचना लघुकथा के रूढ़ कलेवर को तोड़ती सशक्त और सुन्दर रचना है। इस खंड की ‘अग्निमित्र की प्रेम परीक्षा’ तथा ‘मौत की खोज’ अपने समय में खासी चर्चित रह चुकी हैं। ‘बोध-कथाएँ’ खंड की रचनाओं में आचार्य मिश्र ने अपनी अनुपम मौलिकता का परिचय दिया है। उक्त खंड से ‘पुरुष की पहचान’ शीर्षक यह रचना उदाहरणार्थ प्रस्तुत है—

एक दिन एक मनुष्य ने अपनी स्त्री से, जो उसकी नित्य की नई-नई माँगों से विक्षुब्ध हो गया था, झुंझलाकर कहा—भई! अब मैं बहुत थक गया हूँ। मैं अब तुम्हारी कोई भी माँग पूरी नहीं कर सकता। 

उसकी स्त्री ने अविचलित भाव से उत्तर दिया—प्रियतम! क्या तुम पुरुष नहीं हो? मैंने बचपन में सुना था पुरुष कभी थका नहीं करते! 

                                                        शेष आगामी अंक में………

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2024

विष्णु प्रभाकर की लघुकथाएँ, भाग-4 / बलराम अग्रवाल

              'इन्द्रप्रस्थ भारती' के 'विष्णु प्रभाकर विशेषांक' में प्रकाशित लम्बे लेख की चौथी, समापन कड़ी

 मानवीय संवेदना की आदर्श अभिव्यक्ति

गत भाग 3 दिनांक 19-02-2024 से आगे भाग-4, समापन कड़ी…………

विष्णु जी हिंदी एकांकी के उन्नायकों में रहे हैं इसलिए उनकी लघुकथाओं में संवादों की प्रचुरता, कथानक की क्षिप्रता आदि एकांकी के भी अनेक गुण देखने को मिलते हैं। ‘दो बच्चों का घर’ को इस तथ्य का उत्कृष्ट उदाहरण कहा जा सकता है। कथोपकथन की सुन्दरता के साथ-साथ ‘बिंध गया सो मोती’ में ताँगेवाले की कला-हृदयता का भी चित्रण है।

उसने स्थिर, शान्त स्वर में कहा—“बाबूजी, सिनेमा में कला नहीं होती, कारीगरी होती है। सैकड़ों बार प्रैक्टिस करने पर जब कभी एक बार अच्छा अभिनय हो जाता है, तो उसी को वे फिल्म में भर लेते हैं। लेकिन ड्रामे में हर बार अभिनय करना होता है। जिस बार भी खराब होगा, ड्रामा खराब हो जायेगा। इसलिए कलाकार को हमेशा कलाकार रहना होता है।”

इसी परिप्रेक्ष्य में लघुकथा ‘दोस्ती’ का यह दृश्य देखिए—

वे चले गये । यात्रियों की दृष्टि अब विधायक पर थी। अपनी व्यथा भूलकर एक ने विधायक से पूछा, “उन्होंने आपकी सब चीजें लौटा दीं!”

“जी हाँ ।”

“आप उन्हें जानते हैं ?

“जी हाँ।”

“कौन हैं ?

उनका लीडर मेरा सहपाठी रहा है और

“और...?”

“इस इलाके का उप-पुलिस अधीक्षक है वह।”

क्या···!!” एक साथ कई कण्ठ-स्वर चीख उठे ।

दो क्षण बाद किसी ने साहस किया, “आप विधायक हैं। आपको इसकी रिपोर्ट मुख्यमन्त्री से करनी चाहिए।”

मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा।”

फिर एक साथ कई कण्ठ-स्वर उठे, “क्यों नहीं करेंगे !”

“क्योंकि उसने मुझसे दोस्ती निभायी । मैं उससे निभाऊँगा।”

यह रचना तत्कालीन राजनीतिकों के मूल्यविहीन चरित्र पर गहरा व्यंग्य प्रस्तुत करती है।

‘कौन जीता कौन हारा’ (1989) में संग्रहीत रचनाओं को ‘निवेदन’ शीर्षक अपनी भूमिका में विष्णु जी ने ‘लघु रचनाओं’ का तीसरा संग्रह कहा है, लघुकथाओं का नहीं; जबकि 1982 में प्रकाशित ‘आपकी कृपा है’ की ‘दो शब्द’ शीर्षक समूची भूमिका को लघुकथा केन्द्रित रखा है। दूसरी बात, ‘निवेदन’ में उन्होंने लिखा है, ‘पहला संग्रह ‘जीवन पराग’ सन् 1963 में सस्ता साहित्य मण्डल दिल्ली से प्रकाशित हुआ था।’ जबकि उनके सुपुत्र श्री अतुल कुमार जी के सौजन्य से प्राप्त उनके निजी पुस्तकालय से प्राप्त, सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली के ही सस्ता साहित्य प्रकाशन से सन् 1957 में प्रकाशित इस पुस्तक का तीसरा संस्करण मेरे सामने है।  

खलील जिब्रान के लघु-आकारीय कथा साहित्य ने हिन्दी पाठकों और कथाकारों, दोनों को बहुत गहरे प्रभावित किया है। उनकी रचनाओं का बहुत-सा हिन्दी अनुवाद सस्ता साहित्य मंडल से प्रकाशित हुआ है। स्वयं विष्णु जी ने उनमें से एक लघुकथा ‘मोती’ को उद्धरण स्वरूप प्रस्तुत किया है (‘दो शब्द’, ‘आपकी कृपा है’, 1982, पृष्ठ 6)। खलील जिब्रान की एक अन्य लघुकथा ‘पारखी’, निम्न प्रकार है :

एक किसान को अपने खेत में एक बेहद खूबसूरत मूर्ति दबी मिली। बेचने के लिए वह उसे पुरानी वस्तुओं के एक संग्रहकर्ता के पास ले गया। संग्रहकर्ता ने अच्छी कीमत देकर उस मूर्ति को खरीद लिया।

धन लेकर आदमी अपने घर की ओर चल दिया। रास्ते में वह सोचने लगा - "इतने रुपयों से कितनी ही ज़िन्दगी कट जाएगी! समझ में नहीं आया कि कोई आदमी हजारों साल तक जमीन में दबी पड़ी रही एक मूर्ति के लिए इतना धन कैसे दे सकता है?"

उधर, संग्रहकर्ता उस मूर्ति को निहार रहा था। वह सोच रहा था - "क्या सुन्दरता है ! एकदम जीवन्त!! स्वप्न-जैसी दिव्य!!! हजार सालों से सोई पड़ी सहज मुखाकृति। कोई कैसे इतनी खूबसूरत चीज को केवल कुछ रुपयों के बदले बेच सकता है? केवल मुर्दा और स्वप्नहीन आदमी ही ऐसा कर सकता है।"

विष्णु जी कीधन्य है आपकी परखमें पाठक कोपारखीकी छाया नजर आ सकती है।          

विष्णु जी की अनेक लघुकथाओं को उत्कृष्ट लघुकथा के रूप में उद्धृत किया जाता है। उनमेंफर्क  (आपकी कृपा है : 1982; पृष्ठ 13) को सम्भवत: सर्वाधिक उद्धृत किया जाता है। वह भी मुख्यत: एक सैनिक के इस उत्तर के मद्देनजर—‘…जानवर हैं, फर्क करना नहीं जानते!’ शोधार्थियों का दशकों से इस एक ही वाक्य पर टिके रहना यह सिद्ध करता है कि हिन्दी कथा साहित्य के शोधार्थी अधिकांशत: मक्खी पर मक्खी मारने के अभ्यस्त है। शोध के नाम पर विश्वविद्यालयों में अध्ययन कम, कट एंड पेस्ट अधिक चलता है। ‘फर्क’ में उक्त समापन वाक्य के अलावा भी बहुत-कुछ है। मसलन, ‘फर्क’ में जो कथन दो देशों की सीमा के परिप्रेक्ष्य में भी कुछ कहा गया है। समापन वाक्य के तौर जो पंच विष्णु जी ने मारा है, वही पंच हरिशंकर परसाई ने ‘कबीर की बकरी’ में धर्म के परिप्रेक्ष्य में मारा है। ‘फर्क’ में विष्णु जी ने वस्तुत: एक दार्शनिक बिन्दु भी डाला है। वह बिन्दु है—द्वैत। लघुकथा की शुरुआत ही द्वैत दर्शन से होती है, देखिए—‘उस दिन उसके मन में इच्छा हुई कि भारत और पाक के बीच की सीमा-रेखा को देखा जाये। जो कभी एक देश था, वह अब दो होकर कैसा लगता है! दो थे तो दोनों एक-दूसरे के प्रति शंकालु थे।’ द्वैत हमेशा शंका और अविश्वास पैदा करता है। ‘पंचतन्त्र’ के पिंगलक और संजीवक अद्वैत तक ही मित्र बने रह सके थे, द्वैत उत्पन्न होते ही पिंगलक ने मित्र खो दिया और संजीवक ने जीवन। ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ को चरितार्थ करती है लघुकथा ‘दोस्ती’। ‘कौन जीता कौन हारा’ उनकी द्वन्द्व केन्द्रित लघुकथा है। उनका द्वन्द्व आत्म-संघर्ष जैसा कम आत्म-मंथन जैसा अधिक होता है। ‘कौन जीता कौन हारा’ का ‘लेखक’ पात्र कहता (स्वकथन) है—‘किसी का अविश्वास करने से विश्वास करके ठगा जाना कहीं अच्छा है।’ यह कोरा आदर्शवाद है। सांसारिकता के मद्देनजर ‘ठगा जाना’ कभी भी अच्छा नहीं कहा जाना चाहिए। कबीर कहते हैं—‘कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय/आप ठगे सुख ऊपजे, और ठगे दुख होय।’ ठगे जाने के ‘लेखक’ पात्र के मन्तव्य में और कबीर की इस साखी के मन्तव्य में पर्याप्त अन्तर है। ‘लेखक’ पात्र स्वयं से तर्क करता है—‘…कहो कि पिछले जन्म का कर्जदार था मैं या यह कि वह अपनी ईमानदारी गिरवी रख गया है मेरे पास या कि…।’ ‘वह अपनी ईमानदारी गिरवी रख गया है’ वाला भाव विष्णु जी की लघुकथा ‘चोरी का अर्थ’ में भी प्रकट हुआ है।

‘कौन जीता कौन हारा’ में कुल 16 रचनाएँ ऐसी हैं जो ‘जीवन पराग’ तथा ‘आपकी कृपा है’  दोनों ही संग्रहों में संग्रहीत नहीं हैं। यों तो इन रचनाओं को ‘आपकी कृपा है’ से परवर्ती रचनाएँ माना जाना चाहिए। इनमें अनेक लघुकथाएँ इस बात को सिद्ध भी करती हैं; तथापि कुछ रचनाएँ पुरानी फाइलों से निकली भी हो सकती हैं। इनमें से ‘अन्तर दो यात्राओं का’ में विष्णु जी लौकिक और पारलौकिक यात्राओं का दर्शन समझाने का यत्न करते हैं। कथानक का चुनाव और बुनावट, दोनों ही बहुत सुन्दर हैं। ‘आपन जन’ मेजबान के औपचारिक से शनै: शनै: अनौपचारिक होते जाने तथा मेहमान के भी सहज बने रहने की सुन्दर कथा है। ‘वह बच्चा थोड़े ही न था’ मन में अंकित कुछ संयोगों पर ईश्वर के प्रति विश्वास की कथा है। लघुकथा ‘सीमा’ वस्तुत: असीम राजनीतिक गिरावट को दर्ज करती है। ‘ब्रह्मानंद सरोवर—एक अनुभूति’ के पहले पैरा में जो पात्र ‘मैं’ है, तीसरे पैरा में वह ‘वह’ हो जाता है। प्रूफ की ऐसी असावधानी ‘पाप की कमाई’ में भी एक स्थान पर नजर आती है जब उसका पात्र सुदीप ‘मैं’ बन जाता है। बहरहाल, ‘ब्रह्मानंद…’ एक व्यक्ति की पलायनवादी वृत्ति और आत्मिक द्वंद्व के माध्यम से उस पर विजय पाने की कथा है।

‘कोशिश’ अकादमिक शिक्षा की रोजगार-विमुखता पर करारा व्यंग्य प्रस्तुत करती है। ‘नपुंसक’ का मकान मालिक यद्यपि शरीर और बल दोनों से कृश है परन्तु नम्बर दो के पैसे का उस पर अक्षय भंडार है। इस अक्षय भंडार के बूते उसमें अहंकार भी असीम है। लेकिन यह अहंकार उसमें ईमानदार और शान्त स्वभाव के अपने किरायेदार से आँख मिलाने का साहस पैदा नहीं कर पाता है। ‘संवेदन’ में मुख्यत: तीन पात्र हैं— (रेल)गाड़ी के डिब्बे में खिड़की के सहारे बैठा यात्री ‘मैं’, गोद में एक अधनंगे कुरूप-से बालक को लिये खिड़की के आगे आ गिड़गिड़ाने वाली भिखारिन और क्रूर पुलिसमैन। इसमें ‘मैं’ स्वयं को अति संवेदनशील सिद्ध करने का स्वांग रचता है—“सहसा मेरे अन्तर को एक हूक-सी चीर गयी। मेरी आँखें भर आयीं और मैं उस सिपाही को गालियाँ देने लगा!” ‘मैं’ को पात्र बनाकर जब कोई लघुकथा लिखी जाती है, तब स्वयं को महिमामंडित करने का भरपूर अवसर लेखक को मिलता है। कथा को, और कथाकार को भी, इस विकार से बचाए रखने की दृष्टि से सलाह दी जाती है कि लघुकथाएँ ‘मैं’ पात्र को लेकर न लिखी जाएँ। विष्णु जी की लघुकथा ‘पूज्य पिताजी’ में लेखक ‘मैं’ को धिक्कारता है, लेकिन ‘संवेदन’ में वह नपुंसक आक्रोश ही व्यक्त कर पाता है। ‘जब कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे, तब दूसरा गाल भी उसके आगे कर दो’—स्वाधीनता प्राप्ति के लिए आन्दोलित भारतीय जन को गांधी जी द्वारा पढ़ाया गया प्रभु ईसा का यह सुप्रसिद्ध पाठ है। विष्णु जी ने जीवनभर गांधी टोपी सिर पर रखी, कुर्ता-पाजामा अथवा कुर्ता-धोती धारण किया, पाँवों में भी चप्पलें ही पहनीं; गांधी जी लकुटी हाथ में रखते थे, विष्णु जी छड़ी। स्वभाव से भी और उनकी अधिकतर रचनाओं के केन्द्रीय स्वर के मद्देनजर उनको गांधीवादी मान लिया जाता है; परन्तु लघुकथा ‘विकृति और विकृति’ के माध्यम से थप्पड़ के लिए दूसरा गाल आगे कर देने के ईसा और गांधी, दोनों के दर्शन को वह ‘विकार’ सिद्ध कर देते हैं, उसके विरुद्ध रचनात्मक धिक्कार प्रस्तुत करते हैं। वस्तुत: व्यक्ति अथवा दल विशेष के विचार और वाद के अनुगमन से स्वयं को मुक्त रखते हुए लिखना ही स्वतन्त्र लेखन है। ‘लीक से हटकर’ की कथा के केन्द्र में भारत में 1982 में सम्पन्न एशियाई खेलों पर सत्तापक्ष और विपक्ष के राजनीतिक वक्तव्य हैं। इस कथा में लेखक के तौर पर विष्णु जी न तो सत्तापक्ष के साथ खड़े हैं न विपक्ष के, वह देश की उस जनता के साथ खड़े हैं जिसकी साँसें तत्कालीन प्रधानमन्त्री के सारगर्भित (!) भाषण के बाद तालियों की गड़गड़ाहट ने इस कदर तेज कर दी थीं कि उन्हें सँभालना मुश्किल हो गया था। इस लघुकथा के अन्तिम दो पैरा में विष्णु जी ने जिस स्तरीय कटाक्ष को प्रस्तुत किया है, वस्तुत: उसे ही सहज व्यंग्य कहा जाना चाहिए। सामाजिकों पर यही सहज व्यंग्य उनकी लघुकथा ‘आचरण की सभ्यता’ में दिखाई देता है, जब वह कटाक्षपूर्वक कहते हैं—‘घड़ी की सुइयों की तरह काम करने वाले ग्वाले के पास इतना अवकाश नहीं रह पाता था कि वह दूध की बोतलों को जमा होते हुए देख पाता और आसपास रहने वाले व्यक्ति इतने ईमानदार थे कि उन्होंने बोतलों की ओर नजर उठाकर भी नहीं देखा।’

लघुकथा ‘धातु और रुपया’ ढकोसलेबाज संन्यासियों, सामाजिकों और साहित्यकारों पर सार्थक चुटकी है। ‘आधा किलो सम्मान’ उन साहित्यकारों के दोमुँहे चरित्र पर टिप्पणी है जिनके बारे में ‘मन मन भावे, मूड़ हिलावे’ मुहावरा रचा गया होगा। ‘व्यवस्था का राजदार’ की व्याख्या ‘समरथ को नहिं दोस गुसाईं’ कहकर भी की जा सकती है। सच्चा व्यापारी वह है जो धन की तुलना में सामाजिक प्रतिष्ठा को वरीयता देता है। ‘धर्मराज के अवतार’ सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त एक ऐसे ही व्यापारी की कथा है। वह जुर्माने की रकम से दोगुनी राशि बैक डोर से रिश्वत में देकर अपनी प्रतिष्ठा को बचाता है।   

किसी कथाकार की प्रतिनिधि लघुकथाओं को यदि कुम्हार की तरह एक लौंदे के रूप में गूँदना  (रोंदना नहीं) सम्भव हो, तो दो बातें समझना आसान हो जाता है—पहला यह कि कथाकार की जमीन क्या है और दूसरा यह उसकी लघुकथाएँ किस मिट्टी की बनी हैं? मेरा आकलन है विष्णु जी धर्म-देश-सम्प्रदाय से विलग उस विशुद्ध मानवीय धरातल के व्यक्ति हैं जो वर्तमान में प्राय: दुर्लभ है; और उनकी लघुकथाएँ आदर्शोन्मुख दर्शन और आत्म-मंथन प्रकृति के द्वन्द्व की मिट्टी से बनी हैं। विष्णु प्रभाकर जी की लघुकथाओं के यही स्थायी भाव हैं और यही विशेषताएँ भी हैं।

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सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

विष्णु प्रभाकर की लघुकथाएँ, भाग-3 / बलराम अग्रवाल

                        'इन्द्रप्रस्थ भारती' के 'विष्णु प्रभाकर विशेषांक' में प्रकाशित लम्बे लेख की तीसरी कड़ी

                        मानवीय संवेदना की आदर्श अभिव्यक्ति

                      गत भाग 2 दिनांक 15-02-2024 से आगे…………

‘जीवन पराग’ में संग्रहीत ‘तर्क का बोझ’ रचना यों प्रारम्भ होती है—

नंगे पैर, सिर पर बिक्री के सामान का थाल रखे वह रोता हुआ चला रहा था । उसका रंग काला था, मुख कुछ सूजा और भद्दा, आँखें कीच से भरी हुईं, आवाज मोटी। उसने कुरता और जांघियानुमा निकर पहना था। वह बार-बार कुरते की बांह से आँसू पोंछ लेता था, पर आँसू थे कि रुकते ही नहीं थे। और हाँ, उसके हाथ में एक कमची भी थी जिससे शायद वह थाल की मक्खियाँ उड़ाया करता था। पर उस समय तो वह सबकुछ भूलकर जोर-जोर से रो रहा था।

शिखा से लेकर पाँव के नाखून तक पात्र का दैहिक वर्णन करने की उपर्युक्त-सरीखी कहानी-परम्परा को लघुकथा ने त्याग दिया है। लघुकथाकार के लिए तो कहा ही यह गया है कितू इधर-उधर की न बात कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा? ‘तर्क का बोझ’ में आत्मसंघर्ष का, मानसिक द्वंद्व का सुन्दर अंकन है। ‘भला काम’, ‘अतिथि’, ‘पश्चात्ताप’, ‘बड़ा दिल’ इस अर्थ में मूल्यवान है कि आगामी पीढ़ी का पाठक यह समझ सके कि किसी समय ऐसे आदर्श पात्र ही कथा का आकर्षण हुआ करते थे। जिस शिल्प में ‘मुक्ति’, ‘क्षमा’, ‘अनोखा दंड’, ‘घृणा पर विजय’, ‘गुण-ग्राहक’, ‘सेवा-भाव’, ‘वीर माता’, ‘सबसे बड़ा शिल्पी’, ‘ॠणी’, ‘सहानुभूति’, ‘कर्तव्य निष्ठा’, ‘किसका बेटा’, ‘अपनी अपनी समझ’, ‘सहिष्णुता’, ‘सेवा’, ‘निर्भयता’ को प्रस्तुत किया गया है, उस शिल्प की रचनाओं को उत्कृष्ट कथ्य और चमत्कारपूर्ण प्रस्तुति के बावजूद प्रेरक प्रसंग अथवा प्रेरक संस्मरण के अन्तर्गत ही रखा जा सकता है। स्पष्ट है कि आधुनिक लघुकथा ने शिल्प को भी परिमार्जित किया है। ‘चोर की ममता’ में राजबहादुर डाकुओं के एक गिरोह द्वारा घेर लिया जाता है। वह उपकृत भी डाकू सरदार द्वारा ही होता है, तब इसका शीर्षक ‘डाकू की ममता’ क्यों नहीं है? ‘जीवन पराग’ की इसी लघुकथा को ‘कौन जीता कौन हारा’ संग्रह में ‘ममता’ शीर्षक दिया गया है।

­­‘आपकी कृपा है’ में संग्रहीत रचनाओं के बारे में विष्णु जी ने लिखा है—‘दृष्टान्त से लेकर आठवें दशक तक की ये रचनाएँ सन् 1940 से सन् 1982 के बीच लिखी गयी हैं।’ लघुकथा लेखक के तौर पर तथा आठवें दशक में उभरे लघुकथा आन्दोलन के मद्देनजर अपने बारे में विष्णु जी कहते हैं—‘मूलत: और मुख्यत: लघुकथाकार नहीं हूँ। मैं यह भी स्वीकार करूँगा कि आज लघुकथा को लेकर जो आन्दोलन उभरा है, यदि वह न उभरा होता तो सम्भवत: मेरा ध्यान इस ओर इतनी गम्भीरता से न जाता और न यह संकलन अस्तित्व में आता।’(‘दो शब्द’, ‘आपकी कृपा है’, 1982, पृष्ठ 8)

लघुकथा में शब्दों की प्रयुक्ति को लेकर कुछ उदाहरण विष्णु जी की लघुकथाओं से प्रस्तुत किये जा सकते हैं। उनकी लघुकथा ‘ईश्वर का चेहरा’ का यह अंश देखिए—

प्रभा जानती है कि धरती पर उसकी छुट्टी समाप्त हो गयी है। उसे दुख नहीं है। वह तो चाहती है कि जल्दी से जल्दी अपने असली घर जाये। उसी के वार्ड में एक मुस्लिम खातून भी उसी रोग से पीड़ित है। न जाने क्यों, वह अक्सर प्रभा के पास आ बैठती है। सुख-दुख की बातें करती है। नयी-नयी पौष्टिक दवाइयाँ, फल तथा अंडे आदि खाने की सलाह देती है।

प्रभा सुनती है, मुस्करा देती है। सबीना बार-बार जोर देकर कहती है…

उपरोक्त पैरा में विष्णु जी ने जिस भाषा का प्रयोग किया है, वह दर्शन से जुड़ती है। ‘धरती पर छुट्टी समाप्त होने’ के अर्थ कितने गूढ़ हैं उन्हें ‘असली घर’ जाने से जोड़े बिना समझना कठिन है। गद्यात्मक होते हुए भी उसमें काव्यात्मक लय है, संगीतमय प्रवाह है। शब्द प्रयोग की कला देखिए कि ऊपर वह जिस ‘मुस्लिम खातून’ को इन्ट्रोड्यूस करते हैं, उसके नाम का उल्लेख नहीं करते। आज का लघुकथाकार वाक्य का प्रयोग कुछ-कुछ यों करता है—‘सुधीर ने अपनी पत्नी संजना से कहा…’ विष्णु जी की शब्द-प्रयोग कला इस वाक्य को यों प्रस्तुत करती—‘सुधीर ने अपनी पत्नी से कहा…’ और पत्नी के ‘संजना’ नाम को बड़ी कुशलता से वे आगे के किसी अन्य प्रसंग में स्पष्ट करते।

आज दुनियाभर में आतंक का पर्याय भले ही कोई न कोई मुस्लिम नाम है; लेकिन भारतीय साहित्य और सिनेमा, दोनों में मुस्लिम नाम सहयोग और सामाजिक समरसता का प्रतीक रहे हैं। विष्णु प्रभाकर जी लिखते हैं—‘उसे बराबर लगता रहा कि ईश्वर का अगर कोई चेहरा होगा तो सबीना के जैसा ही होगा।’ ‘मोहब्बत’ शीर्षक लघुकथा में व्यक्त हुआ है कि ‘ईद का दिन था। उस गाँव में ऐसा रिवाज था कि उस दिन हिन्दू लोग अपनी गाय-भैंसों का दूध मुसलमानों में बाँट देते थे।’ यह हिन्दू सदाशयता और सहयोग का चित्रण है। इसके बरक्स मुस्लिम सहृदयता का उदाहरण विष्णु जी की लघुकथा ‘और बहन राह देखती रही’ में हुआ है।

हिन्दू मुसलमानों के बीच जो सामाजिक दुराव था, वह भी विष्णु जी की लघुकथाओं में बड़ी ईमानदारी और साहस से पेश हुआ है। ‘पहचान’ में वह लिखते हैं—

‘बालिका झिझक रही थी। मुसलमान होकर वह हिन्दू युवक के पास कैसे बैठ सकती थी; लेकिन उसे बैठना पड़ा।’

‘मोहब्बत’ में दिखाते हैं—

मेरे चाचा पास ही खड़े थे। वे मुस्कुराये। बोले, “तुम्हारे घर की सिवैयाँ क्या हम खा सकते हैं? किसने दी हैं?”

माँ भी वहीं खड़ी थीं। वह समझ गयीं। बोलीं, “बेटे, हम लोग तुम्हारी पकायी हुई सिवैयाँ नहीं खा सकते। तुम बहुत अच्छे हो। इन्हें वापिस ले जाओ।”

लघुकथा ‘खद्दर की धोती’ में दो प्रयोग आकर्षित करते हैं। पहला—‘तत्कालीन हर प्रगतिशील धारा में वह बड़ी कुशलता से तैरते थे।’ दूसरा—‘उन्होंने झुककर उस धोती को देखा, परखा और फिर उसके गाल पर एक तमाचा मारा—“स्साला! यह धोती है या टाट!! बित्ता भर का लौंडा, पहनेगा मन-भर की धोती। चल हट।” यह दूसरा वाला, पारम्परिक पिता का यथार्थ चित्रण है। बेटे के गाल पर अनायास तमाचा जड़ देना उक्त काल के पिता का जैसे सार्वभौमिक अधिकार था। इस परिप्रेक्ष्य में ‘शैशव की ज्यामिति—तीन कोण’ भी विशेष द्रष्टव्य है।

विष्णु जी की अनेक लघुकथाओं में मनोविश्लेषणात्मक अभिव्यक्ति देखते ही बनती है। ‘पूज्य पिताजी’, ‘कौन जीता कौन हारा’ आदि अनेक लघुकथाओं में इसे रेखांकित किया जा सकता है। लघुकथा ‘पहचान’ का यह दृश्य देखें :

बालिका ने बुर्का उठाकर उसकी ओर देखा। वह पठान थी। अवस्था होगी चौदह-पन्द्रह वर्ष, पर रूप की जैसे प्रतिमा हो। वैसा ही सुमिष्ठ था उसका स्वर।

बोली, भाईजान, आप कहाँ जा रहे हैं?

तब तक वह न जाने कहाँ पहुँच गया था। क्या-क्या प्रिय-अप्रिय सोच गया था। ‘भाईजान’ सम्बोधन सुनकर काँप उठा। यह सजगता, यह अवस्था!

उत्तर दिया, काजीहौज जा रहा हूँ।

‘पहचान’ लघुकथा में ही यह प्रयोग देखिए—‘घोड़ा दौड़ रहा था और सड़क बहुत तेजी से पीछे छूट रही थी। शायद इतनी ही तेजी से ग्रेटा गारबो ट्रेन के आगे गिरी थी…’

‘किस्मत की फाइल’, ‘मणि का प्रभाव’, ‘धन्य है आपकी परख’, ‘ईर्ष्या’ आदि पुरातन कलेवर वाली लघु-आकारीय कहानियाँ ही हैं, लघुकथा नहीं। ‘मेरा यक्ष’ जैसी लघुकथाएँ लिखने के पीछे विष्णु जी की पीढ़ी के कथाकारों का कुछ मन्तव्य हो सकता है; लेकिन आज के कथाकार के लिए इस तरह के कथ्य को प्रस्तुत करने का कोई कारण नजर नहीं आता है। ‘दो बच्चों का घर’ दृश्य प्रति दृश्य एक सुन्दर कथा है। इसमें हर दृश्य जीवन्त है। मुख्य बात इसमें यह है कि बच्चे भी अपने परिवार के प्रति उतनी ही जिम्मेदारी महसूस करते हैं, जितनी कि बड़े लोग। ‘नाम और काम’ निष्काम सेवा का उदाहरण प्रस्तुत करती कथा है। ‘आँखों देखा झूठ’ का विशेष स्थापत्य यह है कि ‘कभी-कभी आँखें वही देखती हैं जो मन और मस्तिष्क उसे देखने के लिए कहते हैं।’

शेष आगामी अंक में…………

 

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