रविवार, 25 जुलाई 2021

समकालीन लघुकथा : हास-परिहास बनाम गम्भीरता-2/बलराम अग्रवाल

 गतांक से आगे...

हास्य, व्यंग्य और विनोद-- ये जीवन के अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग हैं; अथवा कहें कि जीवन इनसे अलग नहीं है, तो अनुचित न होगा। प्रत्येक काल में इनका महत्व सदा अक्षुण्ण रहा है। जातक काल में भी मानव जीवन से इनका सम्बन्ध और उस सम्बन्ध की अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति तत्कालीन साहित्य में देखी जा सकती है। साहित्य में सरसता, सरलता व रोचकता का समावेश करने के लिए हास्य-विनोद अत्यन्त आवश्यक है। साहित्य में हास्य का इतना अधिक महत्व है कि उसे 'रस' माना गया है। साहित्य कैसा भी हो--धार्मिक, राजनैतिक या सामाजिक; उसमें जीवन को व्यक्त करने वाले इन तत्वों का होना नैसर्गिक है।

जातक-साहित्य में धर्मोपदेशों की प्रधानता है। बुद्ध ने स्वानुभूत सार तत्व को जन-सामान्य के कल्याण के लिए प्रसारित व प्रचारित किया। यह धर्मोपदेश जातक कथाओं के माध्यम से भी जन-जन तक पहुँचा। इस दृष्टि से देखेँ तो स्पष्ट हो जाता है कि जातक-साहित्य धार्मिक-साहित्य है। कल्पना जहाँ काव्य को मोहक रूप प्रदान करती है, वहाँ हास्यादि भी इस मनोरमता की वृद्धि ही करते हैं। हास्यादि तत्व ऐसे हैं जिनसे पाठक के मन पर अमित प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि हास्य-व्यंग्य और विनोद से परिपूर्ण जातक कथाएँ मानव-मन को प्रभावित करने वाली हैं।

भगवान बुद्ध का यह प्रयास था कि शील और सदाचार के मार्ग पर जनता आ सके। इसके लिए जन-सामान्य को बाध्य नहीं किया जा सकता था किन्तु मानव मन की सहज प्रवृत्ति को आकर्षित करके धर्मोपदेश ग्रहण कराए जा सकते थे। अत: इस कार्य को हास्यादि पूर्ण जातक कथाओं ने सफलतापूर्वक पूर्ण किया। बुद्ध ने अपने सिद्धान्तों, मान्यताओं, शिक्षाओं को घटनाओं, संवादों और परिस्थितियों के माध्यम से प्रकाशित किया। उन्होंने प्रकारान्तर से अन्य सिद्धान्तों का खंडन किया। वस्तुत: जातक चासनी चढ़ी कुनैन की तरह हैं, जिसे श्रोता व पाठक धैर्यपूर्वक ग्रहण कर लेता है। यह चासनी है, हास्य, व्यंग्य व विनोद की। इसके अतिरिक्त अन्य सिद्धान्तों व विधर्मियों तथा विपक्षियों की मान्यताओं पर व्यंग्य करना भी जातककार का लक्ष्य है। इनमें भावनाओं व क्रियाओं में मूर्खता दिखाकर उपहास भी किया है । जातक कथाएँ इस दृष्टि से अत्यन्त रोचक, सार्थक, सोद्देश्य व मनोरम बन गई हैं ।

'पालि जातकावलि' के प्रथम जातक 'सुंसुमार जातक' में बन्दर व मगर का परस्पर वैर तथा बन्दर की प्रत्युत्पन्नमति और मगर की स्थूल बुद्धि का सुन्दर चित्रण किया गया है। मगर का अपनी स्थूल बुद्धि से बन्दर को हरे-भरे प्रदेश में ले जाने का लालच देकर उसे मार डालने का प्रयास करना और बन्दर को मालूम होने पर उसके द्वारा मगर का ठगा जाना, हास्य, विनोद व व्यंग्य का सुन्दर उदाहरण है ।

"हे मगर, तुम्हारा शरीर ही बड़ा है, बुद्धि नहीं। तुमको मैंने ठग लिया अब कहीं और जाओ।" बन्दर के इस संवाद के द्वारा मूर्ख व विपक्षियों का उपहास भी ज्ञात होता है कि केवल शरीर बड़ा होने से ही बुद्धि तीक्ष्ण नहीं होती और ऐसे व्यक्ति घोखा ही खाते हैं। 

'चानरिन्द जातक' में भी वानर और कुम्भील के संवाद अत्यन्त हास्यपूर्ण, चुटीले तथा व्यंग्यात्मक हैं, जो पाठक को न केवल चमत्कृत ही करते हैं अपितु उसे हँसाते भी हैं। पत्थर से वार्तालाप करने की कल्पना भी कितनी रोचक है। देखिए–"हे पत्थर, क्या आज जवाब नहीं दोगे ?" फिर से, "हे पत्थर, क्यों मेरी बात का  आज जवाब नहीं देते हो?"

कुम्भील ने सोचा कि 'अन्य दिनों में यह पत्थर इस वानर को जवाब देता होगा' अतः आज मैं जवाब दूँगा।"

कुम्भील यह न सोच सका कि पत्थर कैसे बोल सकता है! एक सामान्य-सा सिद्धान्त है कि असत्य से सत्य को जाना जा सकता है। यह सिद्धान्त यहाँ भी लागू दिखाई देता है। वानर इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण व्यवहार से कुम्भील की कपटता को जान लेता है ।

अंत में कुम्भील उसकी प्रशंसा भी करता है--"हे वानर, जिसको तेरे समान ये चारों धर्म प्राप्त हैं—सत्य, धर्म, धृति और त्याग, वह शत्रु को जीत लेता है।" इस प्रशंसा से शत्रु का उपहास (स्वयं द्वारा) जहाँ स्पष्ट है, वहाँ प्रत्युत्पन्नमतित्व व विनोद की झलक भी मिलती है ।

जातक कथाओं में इस प्रकार के प्रसंगों की कमी नहीं है । 'बक-जातक' में भी हास्य और विनोद का पुट अत्यन्त सुन्दर है। केकड़े और बगुले का मामा-भानजे का सम्बन्ध व तदनुरूप वार्तालाप शुद्ध हास्य की सृष्टि करता है । इतना ही नहीं बगुले की मरण-भयभीत दशा का वर्णन भी अत्यन्त विनोदकर है ।

सम्पूर्ण जातक हास्य व विनोद का वातावरण उपस्थित करता है ।

'सोहचम्म जातक' में भी विनोद की पर्याप्त सामग्री है। बनिये का गधे को सिंह चर्म पहनाकर खेतों में छोड़ देना और स्वयं विश्राम करने का प्रसंग अत्यन्त विनोदपूर्ण है। किन्तु गधे की आवाज से किसानों का भय दूर होना और फिर उसकी पिटाई होना, ये सभी हास्यपूर्ण स्थितियां तो हैं ही, साथ ही नीति सिद्धान्तों की पोषक भी हैं। 'भले बुरे सब एक से जब लौं बोलत नाहि'--इसका सुन्दर उदाहरण है यह जातक ।

'न-च-जातकं' में भी हास्य की झलक है। व्यक्ति कभी-कभी अति प्रसन्न होकर ऐसे कार्य कर डालता है, जिसके कारण वह उपहास का पात्र तो बनता ही है, अन्यों के लिए हास्य की स्थिति भी उत्पन्न करता है। मोर की जब बहुत प्रशंसा होती है और हंस की बेटी उसे पति रूप में पसन्द करती है, तो प्रसन्नता के अतिरेक में मोर सब-कुछ भूलकर नाचने लगता है और वह नाचते-नाचते नंगा हो जाता है, जिसके फलस्वरूप न तो उसे हंसदुहिता मिलती है और न प्रशंसा।

"वाणी मनोज्ञ है, पीठ सुन्दर है, गर्दन वैदूर्य मणि के समान है तथा चार हाथ लम्बी पाँखें हैं, किन्तु नाचना आने मात्र से तुझे मैं अपनी पुत्री नहीं दूँगा।"

'उलूक जातक' के द्वारा भी हास्य उत्पन्न होता है। काक का यह कहना कि—"देखो, राज्यभिषेक के समय इसका (उल्लू का) मुख ऐसा है, इसके क्रोधित होने पर कैसा होगा ?" उपहासात्मक तो है ही; अदर्शनीय व्यक्तियों पर व्यंग्य भी है ।

'चम्मसारक-जातक' तो वस्तुतः शुद्ध हास्यपूर्ण है। किसी परिव्राजक का मेढ़े को अपना आदर-सत्कार करने वाला समझना हास्यपूर्ण ही है। मेंढ़ा पीछे हटता है उसे मारने के लिए वह उसे आदरसूचक समझकर कहता है--"यह पशु उत्तम स्वभाव का है । सुन्दर और प्रिय आचरण वाला है, जोकि जाति और मंत्र से युक्त ब्राह्मण का सत्कार कर रहा है। यह श्रेष्ठ और यशस्वी मेंढा है।"

परिव्राजक की यह गाथा पाठक को हंसी से लोट-पोट कर देती है।

इसके अतिरिक्त 'वैदब्भ जातक', 'उच्छंगजातक', आदि के द्वारा भी हास्य व विनोद की झलक प्राप्त होती है ।

विवेचन के आधार पर सहज ही हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जातकों में हास्य, विनोद व व्यंग्य के वातावरण के द्वारा रोचकता, नवीनता, ग्राह्यता का समावेश स्वतः ही हो गया है। हास्यादि का जातकों में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है, यह निर्विवाद है ।

(डॉ. पुष्पा अग्रवाल की पुस्तक 'पालि साहित्य का इतिहास', पृष्ठ 69-73 से साभार)

नोट : नि:सन्देह, इस लेख में कुछेक जातक कथाओं को उद्धरण स्वरूप प्रस्तुत किया गया है, लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि हास्य, व्यंग्य व विनोद आदि केवल जातकों का ही विषय रहे हैं अथवा हैं।--बलराम अग्रवाल 

समकालीन लघुकथा : हास-परिहास बनाम गम्भीरता-1/बलराम अग्रवाल

अस्सी के दशक में एक शिगूफा खूब चला था--जिस लघ्वाकारीय कथा में हास्य-व्यंग्य हो, वह लघुकथा और जिसमें गम्भीरता हो, वह लघु-कहानी।

वह दौर बहुत पीछे छूट गया। यहाँ तक कि शिगूफा छोड़ने वाले भी, मरे मन से ही सही, थक-हारकर रुख बदल बैठे। लघुकथा-लेखन से जुड़ी पीढ़ियों में गत सदी के आठवें दशक से लेकर इस सदी के दूसरे दशक तक, कुल पाँच दशक की भिन्न-भिन्न पीढ़ियों के लेखक-आलोचक विद्यमान हैं। इनमें पुरानी पीढ़ी के जिन लोगों ने लघुकथा सम्बन्धी अपने मन्तव्य को प्रारम्भ से ही स्पष्ट रखा है, उनमें  भगीरथ परिहार,  अशोक भाटिया,   रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, सुकेश साहनी, सतीश राठी का नाम लिया जा सकता है। जगदीश कश्यप का मन्तव्य भी स्पष्ट था लेकिन वे कुछेक दुर्भावनाओं के चलते अनर्गल वक्तव्य देने और अपनी पीढ़ी के लेखकों को नीचा दिखाने के प्रयासों से बाज नहीं आते थे। उनकी इस दुष्प्रवृत्ति ने लघुकथा के साथ-साथ स्वयं उनका भी कम नुकसान नहीं किया। आठवें दशक के प्रति वह इतने अधिक मोहित थे कि नवें दशक पर कम ही बात करते थे; लेकिन एक बार उन्होंने नवें दशक के लघुकथा-कार्यों का श्रेय स्वयं को ही देने का प्रयास भी किया था। बहरहाल, अपने आप को आगे रखने की उनकी कमजोरी को नजरअंदाज कर दिया जाए तो लघुकथा को लेकर उनके मन्तव्यों की स्पष्टता को नकारा नहीं जा सकता।

अभी, एक आलोचना पुस्तक पढ़ते हुए 'आधुनिक लघुकथा में गम्भीरता है न कि हास-परिहास' उपशीर्षक से निम्न पैरा पढ़ने में आया :

भारतेन्दु हरिशचन्द्र की 'परिहासिनी'  से  उद्धृत 'अंगहीन धनी' में एक धनिक और उसके नौकर मोहना की कथा है। धनिक के पास उसके कुछ प्रतिष्ठित मित्र भी बैठे हैं। बत्ती बुझाने के लिए वह घण्टी बजाकर मोहना को बुलाता है। मोहना कमरे में आता है और बत्ती बुझाकर हँसते हुए कमरे से बाहर चला जाता है। दूसरे नौकरों द्वारा हँसी का कारण पूछने पर वह कहता है कि धनिक के पास पन्द्रह हट्टे-कट्टे जवान बैठे हैं पर किसी से भी बत्ती नहीं बुझी ।

हालांकि इसमें व्यंग्य है । एक घटना है। लघुता है। कसाव है। व्यंग्यात्मक अंत है। कम पात्र हैं। सरल और पात्रानुकूल भाषा है। वर्णनात्मक शैली है। रचना अनुसार शीर्षक है। ये सब होते हुए भी इसमें गम्भीरता नहीं है। ऐसा लगता है, जैसे हँसी-मजाक हो। भारतेन्दु जी ने यह रचना परिहास हेतु ही लिखी थी। इसलिए यह रचना लघुकथा की कई विशेषताओं को लिए हुए भी परिहास के कारण पूर्ण लघुकथा की कोटि में नहीं आती।

भारतेन्दु हरिशचन्द्र की एक अन्य रचना 'अद्भुत संवाद' भी 'परिहासिनी' से ही उद्धृत की गई है। यह संवाद शैली में है। दो ही पात्र हैं और इस रचना का उद्देश्य भी यह है कि सम्भ्रान्त परिवार के लोग स्वयं कार्य न करके दूसरों से लेना चाहते हैं। इसमें घोड़े वाले और दूसरे आदमी के आपसी संवाद हैं। इसमें भी लघुकथा के कुछ तत्त्व संवाद शैली, कसाव, सरल भाषा, लघुता, कम पात्र, प्रश्न शैली, एक घटना आदि स्पष्टतः दिखाई देते हैं किन्तु बातचीत में केवल मात्र हास-परिहास दिखाई देने के कारण इस रचना में गम्भीरता का लोप हो जाता है। आधुनिक लघुकथा गम्भीरता चाहती है न कि हँसी-मजाक।

सन्दर्भित  दोनों लघुकथाएँ:

1- अंगहीन धनी

एक धनिक के घर उसके बहुत से प्रतिष्ठित मित्र बैठे थे। नौकर बुलाने को घंटी बजी। मोहना भीतर दौड़ा, पर हँसता हुआ लौटा; और नौकरों ने पूछा, "क्यों हँस रहे हो?" तो उसने जवाब दिया, "भाई सोलह हट्टे-कट्टे जवान थे। उन सभों से एक बत्ती न बुझे, जब हम गए तब बुझे।"

2-अद्भुत संवाद

'ए जरा हमारा घोड़ा पकड़े रहो। "

"यह कूदेगा तो नहीं।"

"कूदेगा! भला कूदेगा क्यों ? लो संभाल लो।"

"यह काटता है ?"

"नहीं काटेगा, लगाम पकड़े रहो।"

“क्या इसे दो आदमी पकड़ते हैं, तब सम्हलता है?"

"नहीं।"

"फिर हमें क्यों तकलीफ देते हैं? आप तो हई हैं।"  

दोनों  का प्रकाशन सन्दर्भ : परिहासिनी, 1875

इन दोनों रचनाओं के साथ मैंने उक्त टिप्पणी को व्यापक विचारार्थ 'लघुकथा साहित्य' पर पोस्ट किया और प्रमुख रूप से निम्न प्रतिक्रियाएँ पाईं :

मनोरंजन सहाय : यदि कथा में लघुकथा के सभी तत्त्व मौजूद हैं तो केवल इस आधार पर कि इसे केवल हास्य के लिये लिखा गया है, उसे विधा विशेष की श्रेणी से बाहर रखना सहज  प्रतीत नहीं होता।

'अंगहीन धनी' शीर्षक कथा के अंत में नौकर का संवाद तो शीर्षक की सार्थकता का प्रतीक है।

दूसरी कथा के संवादों का पूर्ण ज्ञान नहीं हो पाया है।

आजकल तो मामूली से चुटकुलों पर और उन्हीं की भाषा में लघुकथाएँ लिखी जा रही हैं और साहित्यिक ग्रुप्स के मंचों पर सादर प्रकाशित-प्रसारित की जा रहीं है।

भारतेंदु जी का काल तो इस विधा का शैशवकाल ही था।

उमेश महादोषी : पहली बात तो लघुकथा मनोरंजक होकर भी गंभीर हो सकती है। दूसरे, अन्य विधाओं की तरह लघुकथा की भी विकास यात्रा को ध्यान में रखा जाना चाहिए। सम्पूर्णता में विकसित होने तक कई तत्वों का समावेश होता है। इसलिए उक्त दोनों रचनाओं को लघुकथा में स्वीकृति मिलनी ही चाहिए।

      जो मित्र लघुकथा को केवल गंभीरता के आधार पर चिन्हित करना चाहते हैं, उन्हें 'गंभीरता' को भी परिभाषित करना चाहिए।

बलराम अग्रवाल : कई गम्भीर बातें हँसकर भी कही जाती हैं और वह हँसी भीतर तक चीर डालने वाली होती है।

शुभ्रा झा : सर, कई बार अप्रत्यक्ष रूप मे गंभीर बात प्रत्यक्ष रूप से  हंसी-ठिठोली में भी प्रस्तुत होती है । भावों का प्रतिपादन महत्वपूर्ण है, माध्यम अलग हो सकते है ।

सतीशचन्द्र श्रीवास्तव  : जो बात गंभीरता से नहीं कही जा सकती, वही बात अक्सर हास-परिहास में बड़ी आसानी से कह दी जाती है।

इसलिए, मात्र हास-परिहास के कारण किसी लघुकथा को पूर्णतः लघुकथा नहीं माना जा सकता। ये बात गले नहीं उतरती, जबकि उसमें लघुकथा के सभी तत्व मौजूद हों। हास-परिहास भी अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण भाग है। इसे अन्यथा नहीं लिया जा सकता और नहीं इसके कारण किसी भी लघुकथा को खारिज या कमजोर कहना उचित होगा।

डॉ. श्याम गुप्त  : आधुनिक लघुकथा गम्भीरता चाहती है न कि हँसी-मजाक।—यह मानक किसने बनाया??---आधुनिक तथाकथित लघुकथाकार--लघुकथा व कथाकारों  को अपनी चेरी बनाकर रखना चाहते हैं---अन्यथा ऐसे कथन का कोइ औचित्य नहीं है---किसी भी विषय पर लघुकथा लिखी जानी चाहिए अन्यथा प्रगति रुक जायगी ...-

उपरोक्त दोनों कथाएं बहुत दूरस्थ सन्देश   देती हैं एवं मेरे विचार से सम्पूर्ण लघुकथाएं हैं --- अब कोइ यह न कहे कि लघुकथा में सरोकार नहीं होना चाहिए ---

डॉ. संध्या तिवारी : "आधुनिक कथा में गम्भीरता है न कि हास परिहास"--सबसे पहले तो मुझे यह शीर्षक  समझ नहीं आया।

"आधुनिक लघुकथा में गम्भीरता होनी चाहिए, न कि हास-परिहास"--यह शीर्षक कुछ ऐसा होना चाहिए था।

चूंकि ये लघुकथाएं भारतेन्दु जी की हैं और यह बात जग-जाहिर है। इसलिए इसे कोई भी काटेगा नहीं।

परन्तु यह किसी गुमनाम लेखक की होती तो यहां अखाड़ा खुद गया होता।

उपरोक्त टिप्पणियों में जो बात निकलकर आई,  वह ठीक है कि जो रचना की गई उस पर देशकाल वातावरण आदि का जबरदस्त प्रभाव होता है और जब ये लघुकथाएं लिखी गई होंगी तो कहने-सुनने की इतनी आज़ादी नहीं रही होगी, जितनी आज है। उस समय को देखते हुए ये कथायें स्तरीय हैं, लेकिन हमेशा से ही क्लासिक की अपनी पहचान अपनी मांग रही है। ये लघुकथाएं लघुकथा की श्रेणी में भले ही हों, क्लासिक नहीं हैं, और जिसने भी आलोचनात्मक टिप्पणी की है उसका मानना क्लासिक लघुकथा से रहा होगा।

किसी भी विधा में कोई भी विधा घुसपैठ बना लेती है। शर्त इतनी है कि पैबंद सरीखी अलग से न छिकी हो।--ऐसा मेरा मानना है।

कांता रॉय (संध्या तिवारी की टिप्पणी पर प्रश्न) : जी, मेरा भी प्रश्न यही है कि अगर यह किसी नए रचनाकार ने लिखा होता तो क्या वह स्वीकार्य होती? 

संध्या तिवारी (प्रत्युत्तर) : कान्ता रॉय जी, बिल्कुल। लेकिन आज में और भारतेंदु युग में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है। आरंभ में सृजन उतना परिपक्व नहीं होता, लेकिन आगे की पीढ़ियां यदि वहीं दोहराती रहें तो विधा का विकास कैसे होगा, और विधा के विकास के लिए आने वाली पीढ़ी को उसमें सुन्दरता, कुछ नई बात , कुछ तकनीक के स्तर पर गुणवत्ता, शब्दों का चयन, अर्थ गाम्भीर्य और भावों की गहनता मानीखेज हो जाती है।

इसलिए आज यदि कोई लघुकथा साधक ऐसी रचना लिखे तो हास्य का पात्र तो होना ही चाहिए।

कांता रॉय (प्रतिप्रश्न) : आज के संदर्भ में जब इसकी चर्चा करें तो वर्तमान परिदृश्य को भी साथ लेकर बात करें। अन्यथा ऐसी रचनाएं पढ़कर नई पीढ़ी गफलत में पड़ सकती है।

बलराम अग्रवाल (प्रत्युत्तर) : ऐसी रचनाएँ ससन्दर्भ पढ़ी जाती हैं। उसके बाद भी यदि कोई गफलत में पड़ता है तो बेशक पड़ा करे।

विरेंदर वीर मेहता : इस पोस्ट पर टिप्पणी करने से पहले सर्वप्रथम यह विचार करना भी जरूरी होगा कि किसी रचना पर किसी गंभीर आलोचक की टिप्पणी को एक सिरे से नकारा जाना एक अच्छी परंपरा नहीं होती। साथ ही टिप्पणी किस काल और किस नजरिए से की जाती है, उसका भी अपना एक महत्व है। 

बहरहाल इस टिप्पणी के संदर्भ में एक बात अवश्य ही स्वीकार योग्य नहीं है कि आधुनिक लघुकथा में गम्भीरता है हास-परिहास नहीं।  

प्रस्तुत दोनों लघुकथाओं भले ही एक व्यंग्य के साथ समाप्त होती है लेकिन उनके शीर्षक की गहराई में देखा जाए तो न केवल कथा के अंत में किए गए हास्य जनित व्यंग्य में कहे गए अनकहे की गूंज सुनाई देती है बल्कि इस कथा को गंभीर कथा की श्रेणी के समकक्ष रखने के योग्य भी कही जा सकती है।

रजनीश दीक्षित  : गंभीरता की वजह से रचना को लघुकथा श्रेणी में मान्यता मिलना और हास्य का पुट होने से लघुकथा की श्रेणी से बाहर कर देना, लघुकथा पर एक और अंकुश लगाने वाली बात हो गई।

पुष्पा जगुआर : चूकि भारतेंदु जी अपने काल को दोनों लघुकथाओं में  स्पष्ट रूप से हास्य -परिहास के द्वारा प्रत्यक्ष किया है, जहाँ पूर्ण स्वतंत्रता नहीं होती है वहाँ व्यंग्यात्मक शैली की तेवर आते हैं।अतः लघुकथा में शीर्षक से लेकर सारे तत्व मौजूद होते हुए भी गम्भीरता का लोप है, किन्तु सामंतवादी परम्परा की बात खुल कर आया है।  जिसे 'अंगहीन धनी' और 'अद्भुत संवाद'  में हास्य परिहास के द्वारा नौकर का आत्मिक दर्द और उस आदमी का आत्मिक  विद्रोह साफ व्यक्त हुआ है। लघुकथा को लघुकथा के मानक न मानना अपनी परिभाषा की कसौटी पर तौलना है। बावजूद इसके, कुछ हो न हो लघुकथा के बीज तो है ।

राजश्री झा : अंगहीन धनिक संपुट लोक लघुकथा हैं, सभी पुट, अलग-अलग उद्देश्यों को कहती, परिहास्य की उत्तरोत्त क्षणिकता प्रदेय है, पात्र-विमर्श है।

अब, इस सम्बन्ध में  'पालि साहित्य का इतिहास' पुस्तक में  लिखित डॉ. पुष्पा अग्रवाल का यह आलेख प्रस्तुत है :

                        आलेख आगामी अंक में...

सोमवार, 28 जून 2021

समकालीन लघुकथा : लघ्वाकारीय शिल्प और संवाद शैली / बलराम अग्रवाल

'लघुकथा विश्वकोश' पटल पर कथाकार सुरेश बरनवाल ने 'तात्पर्य' शीर्षक निम्न रचना को लघुकथा कहकर एक प्रश्न के रूप में दिया है।

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'पुरुष ने चुम्बन लिया और स्त्री ने चुम्बन दिया। इससे क्या तात्पर्य निकलता है?'

'जी...इसका अर्थ है कि पुरुष प्रेम में है और स्त्री बदचलन है।'

'लघुकथा' होने के लिए ऐसे  (अति लघ्वाकारीय) शिल्प और शैली (संवाद शैली) की कथाओं में दो चीजों में से किसी एक (मुख्यतः समापन वाक्य का) अथवा दोनों का होना आवश्यक है। पहली चीज है, कथा-प्रसंग जिसे कि संवादों के माध्यम से ही  सहज स्पष्ट होना होता है और दूसरी पूर्णता। समापन वाक्य में अगर सर्वमान्य सत्य की अभिव्यक्ति न होकर एकपक्षीय हुई है, तो रचना अपूर्णता का आभास देती रहेगी। ऐसी दशा में, उसमें उपयुक्त कथा-प्रसंग और यथायोग्य समापन, दोनों आवश्यक हो जाते हैं। लेखक के मन्तव्य अथवा उसके आभास तक पहुँचने का मार्ग  पाठक को अवश्य मिलना चाहिए। उदाहरण के लिए उपर्युक्त रचना में समापन वाक्य को पुरुष सत्तात्मक मानसिकता का द्योतक बताकर बचाव की कोशिश की जा सकती है; लेकिन रचना में समापन वाक्य निर्णय की मुद्रा में आया प्रतीत होने से अधिकतर पाठकों के चिन्तन का एक ही दिशा में चले जाना स्वाभाविक माना जायेगा।  जबकि लेखक का मन्तव्य अवश्य ही वैसा नहीं रहा होगा।

लघ्वाकारीय शिल्प में संवाद शैली की आदर्श लघुकथा खलील जिब्रान की 'आजादी' है :

वह मुझसे बोले, "किसी गुलाम को सोते देखो, तो जगाओ मत। हो सकता है, वह आजादी का सपना देख रहा हो।"

"किसी गुलाम को सोते देखो, तो उसे जगाओ और आजादी के बारे में उसे बताओ।" मैंने कहा।

चाहें तो, इस रचना में पूर्व कथा-प्रसंग कुछ भी जोड़ सकते हैं जिसकी पहले वाक्य से संगति हो, लेकिन वह अनावश्यक ही सिद्ध होगा क्योंकि इस कलेवर में ही यह एक पूर्ण कथा है। 

एक अन्य लघुकथा रमेश बतरा की 'कहूँ कहानी' है। देखिए  :

-ए रफीक भाई। सुनो... उत्पादन के सुख से भरपूर थकान की खुमारी लिए, रात मैं घर पहुंचा तो मेरी बेटी ने एककहानी कही--‘एक लाजा है, वो बोत गलीब है।’

सिर्फ एक वाक्य। इसमें न पूर्व प्रसंग ही अनबूझ है न समापन संदेहास्पद। परन्तु प्रस्तुत रचना 'तात्पर्य' का समापन वाक्य सार्वभौमिक अथवा सर्व-स्वीकृत सत्य को प्रकट नहीं करता। वह एकपक्षीय पुरुष सत्तात्मक विचार की प्रस्तुति है, स्त्री का पक्ष इसमें ध्वनित ही नहीं है, इसलिए इसमें अधूरापन लगेगा ही। लघुकथा संकेत की विधा है, पहेली की विधा नहीं है।

दो पंक्तियों की, यहाँ तक कि एक पंक्ति की भी रचना में पूर्णता का जो गुण खलील जिब्रान,  मंटो, जोगिन्दर पाल, काफ्का, इब्ने इंशा आदि में मिलता है, वह असम्भव न सही, आसान नहीं है। उसे गहन अध्ययन और लम्बे अभ्यास से ही साधा जा सकता है। इसे अपनाने की जल्दबाजी कथाकार के वर्तमान मौलिक कथा-कौशल  को भी ले डूब सकती है।   

आइए, पढ़ते हैं, मंटो की लघुकथा 'रिआयत' : 

“मेरी आँखों के सामने मेरी जवान बेटी को न मारो…”

“चलो, इसी की मान लो… कपड़े उतारकर हाँक दो एक तरफ़…”

ये दो संवाद पूरा प्रसंग पाठक के समक्ष रखने में सक्षम हैं। पूर्व प्रसंग मात्र इतना है कि यह भारत-विभाजन के दौरान घटित है। इसके समापन में सर्व-स्वीकृत पूर्णता है, इसीलिए यह रचना अपूर्ण नहीं है, पूर्ण है।

संपर्क:8826499115

सोमवार, 21 जून 2021

समकालीन लघुकथा और प्रयोगधर्मिता / बलराम अग्रवाल

 कहानी का पुराना पैटर्न यह था कि विभिन्न घटनाक्रमों को कहानीकार 1, 2, 3 आदि संख्याओं के द्वारा अलग करते हुए रचना को आगे बढ़ाते और पूरा करते थे। यह पैटर्न कहानी ने अपनी पूर्ववर्ती उपन्यास विधा से लिया था।

लघुकथा क्योंकि 'कहानी' नहीं है और घटनांतर या दृश्यांतर को उसमें बरकरार रखना भी है, तो क्या करें? 1, 2, 3 के स्थान पर हमने दृश्य एक, दृश्य दो, दृश्य तीन लिखना शुरू कर दिया। बेशक, नया प्रयोग तो है लेकिन सिर्फ इतना कि बोतल का आकार बदल दिया गया है।

इन प्रयोगों से एक और भी संकेत यह मिलता है कि भीतर एक कहानीकार बैठा है जिसे ठोंक-ठोंककर हमने लघुकथाकार बनाया हुआ है। मुझे स्वयं अपने बारे में कई बार यह महसूस होता है और क्षोभ भी होता है कि मैंने अपनी कलम से कई कहानियों की हत्या की है, कभी अनजाने में तो कभी जिद में। लघुकथा को हम प्रयोगों की बारीक और धधकती हुई नलिका से निकाल रहे हैं, निकालें; लेकिन गर्भ से असमय निकाले जा रहे या अनगढ़ हाथों द्वारा दुनिया में लाए जा रहे बच्चे की तरह उसकी हत्या न हो जाए, यह ध्यान रखना भी जरूरी है। लघुकथा में प्रतीकों, बिम्बों, रूपकों के प्रयोग का हिमायती होने के बावजूद मैं यह मानता हूँ कि सामान्य से लेकर प्रबुद्ध तक, हर स्तर के पाठक को रचना में एक सरल कथा अवश्य चाहिए, सरल और सपाट कथा। हिन्दी लघुकथा में यह करिश्मा दिखाने वाले कथाकारों में पृथ्वीराज अरोड़ा और एन. उन्नी प्रमुख हैं।

(इन पंक्तियों पर अपनी राय प्रकट करने का अधिकार सबको है और मुझसे सवाल करने का भी; लेकिन किसी के किसी भी सवाल का जवाब मैं नहीं दे पाऊंगा। अग्रिम क्षमायाचना 🙏) 

20-7-2020 /09:50

गुरुवार, 17 जून 2021

दस्तावेज-1992


विषय : लघुकथा और लघु कहानी में अंतर।

दिनांक : 02-11-1992 / वार्ता रिकॉर्ड होने की तारीख।

           : 30-11-1992 / 'पत्रिका' कार्यक्रम में प्रसारण

           : 02-12-1992 / 'साहित्यिकी' कार्यक्रम में

              प्रसारण

भागीदार : राजकुमार गौतम, बलराम और बलराम                           अग्रवाल ।

कार्यक्रम अधिकारी : कुबेर दत्त, विवेकानंद। 

संचालक : डाॅ. अवनिजेश अवस्थी।


सोमवार, 24 मई 2021

हिन्दी लघुकथा : सीता हाँडा बनाम शकुन्तला किरण / बलराम अग्रवाल

इसी ब्लॉग पर 17 जनवरी 2015 को मैंने एक पोस्ट लिखी थी—‘हिन्दी लघुकथा:शोध की स्थिति’। लिंक https://wwwlaghukatha-varta.blogspot.com/2015/01/blog-post.html

 खेद है, उसी सम्बन्ध में पुन: लिखना पड़ रहा है। अभी, डॉ॰ शकुन्तला किरण (जन्म-07 फरवरी 1943) का देहावसान (23 मई 2021) हुआ है। उनके निधन पर शोकांजलि प्रस्तुत करते हुए डॉ॰ सत्यवीर मानव ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है—‘हिन्दी लघुकथा की ऐतिहासिक पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा’ की लेखिका और हिन्दी लघुकथा पर दूसरा शोधकार्य करने वाली शकुन्तला किरण हमारे बीच नहीं रहीं।’

इस शोकांजलि में सुधरा हुआ तथ्य यह है कि डॉ॰ शकुन्तला किरण छठे से दूसरे स्थान पर आ गयी हैं। डॉ॰ रामकुमार घोटड़ की सूची में (देखें उनके द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘भारत का हिन्दी लघुकथा संसार’, वर्ष 2011, पृष्ठ 160) वह छठे स्थान पर थीं।

शोध को मैं ‘नवीन तलाश’ की उत्कंठा और उसकी कार्यान्विति के रूप में देखता हूँ, न कि कुछेक पूर्वाग्रहों को पाले रखने और दोहराते जाने के रूप में। वर्ष 2015 के आसपास से हिन्दी लघुकथा में प्रथम शोध को लेकर एक पूर्वाग्रह उभरकर आया था। यह कि ‘हिन्दी लघुकथा विषय को लेकर प्रथम शोधकर्ता/शोधकर्त्री डॉ॰ सीता हाँडा हैं जिन्होंने सन् 1959 में राजस्थान विश्वविद्यालय से ‘आधुनिक हिदी साहित्य में लघुकथाओं के विकास का विवेचनात्मक अध्ययन’ विषय पर पी-एच॰ डी॰ शोधोपाधि ग्रहण की।’

गत सम्भवत: 2017 में लघुकथा सम्बन्धी शोध के दौरान ही मुझे एक पुस्तक मिली थी—'हिन्दी के स्वीकृत शोधप्रबन्ध' (लेखक उदयभानु सिंह, प्रथम संस्करण : 1959, संशोधित संस्करण : 1963; हिन्दी अनुसन्धान परिषद, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली के निमित्त इसे नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली ने प्रकाशित किया था।)

इस पुस्तक की मानें तो सीता हाँडा के शोध-विषय के सम्बन्ध में दिया गया लघुकथा सम्बन्धी उपर्युक्त तथ्य वस्तुत: गलत है। (देखेें, उक्त पुस्तक के पृष्ठ 343 की फोटो)

सम्भवत: डॉ॰ घोटड़ की ही खोज का अनुसरण  और परिवर्द्धन करते  हुए डॉ॰ सत्यवीर मानव ने अपनी शोकांजलि प्रस्तुत की है। यद्यपि मैं अब से पहले भी अपने अन्वेषक साथियों से अनुरोध करता रहा हूँ कि वे डॉ॰ सीता हाँडा के शोध-प्रबन्ध की प्रति प्रमाणस्वरूप प्रस्तुत करें। उक्त शोध की फोटोकॉपी उतरवाने, बाइन्डिंग कराने और डाक से भेजने का खर्चा मैं वहन करूँगा। डॉ॰ घोटड़ श्रमशील, जुझारू और ईमानदार लेखक हैं; लेकिन कुछ जगह वे चूक जाते हैं। मैं समझता हूँ कि सबसे पहले तथ्य प्रस्तुत करने की हड़बड़ी में उनसे चूक हुई होगी। डॉ॰ सत्यवीर मानव भी मेरे छोटे भाई सरीखे हैं। उन्होंने गहन अध्ययन किया है और डी॰ लिट्॰ शोधोपाधि ग्रहण की है। वे अवश्य जानते होंगे कि शोध में प्रामाणिकता का क्या महत्व है। वस्तुत: प्रामाणिक तथ्य ही शोध को विश्वसनीय बनाते हैं। यहाँ मैं फोटो के रूप में कुछ तथ्य प्रस्तुत कर रहा हूँ जिनके आधार पर डॉ॰ सीता हाँडा के शोध का विषय ही ‘लघुकथा’ से भिन्न सिद्ध हो जाता है। तथ्य यह है कि सीता हाँडा के शोध का वर्ष और विश्वविद्यालय का नाम तो ठीक लिखा गया है, लेकिन विषय में परिवर्तन कर दिया गया है। यह विषय परिवर्तन हमें डॉ॰ गिरिराज शरण अग्रवाल द्वारा सम्पादित ‘शोध संदर्भ’ के तत्सम्बन्धी यानी वर्ष 1959 के खण्ड में मिलता है। उक्त खण्ड में सीता हाँडा के शोधोपाधि प्राप्त मूल विषय ‘आधुनिक हिदी साहित्य में आख्यायिकाओं के विकास का विवेचनात्मक अध्ययन’ में ‘आख्यायिका’ के स्थान पर ‘लघुकथा’ लिखकर उसे ‘‘आधुनिक हिदी साहित्य में लघुकथाओं के विकास का विवेचनात्मक अध्ययन’ कर दिया गया है। चाहे जानबूझकर ऐसा किया गया, चाहे अनजाने में ऐसा हुआ है; लेकिन तथ्यात्मक दृष्टि से हुआ बहुत गलत है। ऐसा लगता है कि हमारे उत्कंठी मित्रों ने ‘शोध सन्दर्भ’ की सूचना को ही प्रामाणिक और अन्तिम मान लिया है।

उनके भ्रम के निवारणार्थ एक पुस्तक के कुछ जरूरी पन्नों की फोटोप्रति इस आलेख के साथ प्रस्तुत है। 

मोबाइल : 8826499115

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

समकालीन लघुकथा और ‘अतिरिक्त’ के अंक-2 / बलराम अग्रवाल

 दिनांक 20-3-2021 से आगे… समापन किस्त

अंक छ:नवम्बर 1972। इसमें किशोर काबरा  की ‘ईसा और मैं’बृजेन्द्र नाथ वैद्य की

‘बिल्कुल हो जायगा’, कृष्ण कमलेश की ‘चेहरा दर चेहरा’,जगदीश कश्यप की ‘मुखौटा प्रिय’ तथा भगीरथ की ‘प्रतिबद्धता’ लघुकथाएँ प्रकाशित हुई हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ‘अतिरिक्त’ ने अबोधतावश पहन रखा ‘लघु कहानी’ का चोला अंक छ: में पूरी तरह उतार फेंका था। अंक-6 में प्रकाशित सभी लघुकथाएँ क्रमश: निम्न प्रकार हैं:

ईसा और मैं / डॉ॰ किशोर काबरा

ड्राइंग रूम की शोभा बढाता सूली पर लटका ईसा का खिलौना बड़ा सलौना. पर खिलौना आखिर खिलौना. बच्चे आखिर बच्चे. बच्चों ने ईसा को सूली से उतार दिया. पूछा तो बोले-बेचारे को तकलीफ होती होगी. मैं भभक उठाये क्या जाने कल के छोकरे बड़ों की इज्जत करना? अरे ! ईसा तकलीफ सहेगा या नहीं, पर यहाँ कोई देखेगा तो क्या कहेगा ? और मैंने ईसा को पुनः सूली पर लटका दिया. ड्राइंगरूम फिर चमक उठा.

बिल्कुल हो जायगा / बृजेन्द्रनाथ वैद्य

नेताजी की शिकायत सुनने गया था. आपके विभाग में बड़े घपले हो रहे हैं, सीनियर तो पड़े हुए हैं और नए प्रमोट होते जा रहे हैं. आखिर सिफारिश का बोलबाला कब तक चलेगा ? जनतंत्र में ऐसा नहीं होना चाहिए .... उनकी शिकायत रजिस्टर में दर्ज कर दी गई... फिर वे कुर्सी से सर टिकाते हुए बोलेआपके यहाँ बांकेबिहारी है न ; उनका प्रमोशन केस ....जी साब, कल ही हो जायगा ...बिल्कुल हो जायगा साब।

तभी, घडी का बड़ा सूचक तेजी से आगे बढ़ गया था, दूसरा कुछ धीरे से। दोनोंएक और न्याय-अन्याय की पुकार पर समझौता कर लेते हैं।

चेहरा दर चेहरा / कृष्ण कमलेश

इस बार जो आदमी अन्दर आया, बेहद पिए हुए था। एकबारगी वह उस पर झपट पड़ा।

पहले पैसे। उसकी पपड़ाई हथेली पर एक तुड़ा-मुड़ा नोट आ गया। ...उसे बेहद तकलीफ हो रही थी, पर वह चुपचाप पड़ी रही। ....साली हरामजादी में दम ही नहीं है। मुफ्त के पैसे लेती है। लड़खड़ाते हुए वह बाहर निकल गया। पेंट के बटन ठीक करने का भी उसे होश नहीं था।

एक कराह के साथ वह उठ बैठी। अंगिया से तुड़ा-मुड़ा नोट निकालकर देखा। उजाले में अच्छी तरह देखा। नकली था। उसने अंगिया उतार फेंकी। कपड़े की दो गेंदें लुढ़ककर कोने में चली गईं, टकराई और ठहर गईं।

मुखौटा प्रिय / जगदीश चन्द्र कश्यप

एक दिन उसने प्रसिद्धि का मुखौटा कहीं से प्राप्त कर लिया। मेरी और उसकी दोस्ती की रेखाएँ तब बिल्कुल समानांतर हो गई थीं।

वह किसी कॉलेज में प्रोफ़ेसर था। उसके संपर्क में कितनी ही लड़कियाँ आई—शिष्याओं के रूप में। जैसे-जैसे वे उसका मुखौटारहित चेहरा देखतीं–किनारा करती जातीं। कहीं मुखौटे का औचित्य ही खत्म न हो जाय—उसने निहायत ही खानदानी, प्रखर व सर्विस में लगी एक लड़की से विद्रोह कराया और धर्मपत्नी के रूप में प्रतिष्ठापित किया।

एक दिन एक लड़की वही मुखौटा लिए उसके घर पर उपस्थित हुई। तबसे वही लड़की उसकी सब कुछ है। उसकी धर्मपत्नी के अधिकार उसने छीन लिए हैं—ऐसी मुझे खबर मिली है।

प्रतिबद्धता / भगीरथ

उसने जीवन के सपने संजोये थे। पर वे चटखते रहे, टूटते रहे। ठीक उस शीशे की तरह, जिसमें उसकी असली शक्ल कई खानों में विभक्त होकर टूटने का एहसास दे जाती है। पर बुद्ध जीवन [इच्छाविहीन] कैसे कर कल्पना होगी !

बेकारी के दिन व्यतीत करते हुए कितना फ्रस्ट्रेशन हुआ था उसे। सब सम्बन्ध अर्थहीन और निरर्थक हो गए थे। ये दिन मानसिक तौर पर बहुत ही यातनाजनक होते हैं। वह करीब-करीब विक्षिप्त-सा हो गया था।

वह पूर्ण विक्षिप्त होने से बच गया। उसे नौकरी मिल गई। पैसा पास में आया। उसकी कद्र हुई। यहाँ तक कि उसने खुद अपनी कद्र की।

वह सरकारी नौकरी में है, इसलिए वह सरकारी विचार से प्रतिबद्ध है। उसकी अपनी किसी मूल्य के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं है; क्योंकि उसका मूल्य उसकी भूख है, उसकी असुरक्षा है। इसीलिए उसकी प्रतिबद्धता भी शायद उनसे ही है।

जीवन परिधि में बँध गया। परिधि सुनहरे प्रकाश वाली। उसके अन्दर एक भयंकर घुटनभरा अंधकार और वह प्रकाश की चकाचौंध में अंधकार में ही डूबा रहा।

[भगीरथ जी के अनुसार, ‘प्रतिबद्धता’ शीर्षक यह लघुकथा ‘आत्महंता’ शीर्षक से ‘पेट सबके हैं’ (1996) में प्रकाशित हुई लेकिन कुछ परिवर्तित रूप में]

अंक सात, दिसंबर 1972 में शशि कमलेश का एक लेख ‘आठवाँ दशक और लघुकथा का रचना औचित्य’ प्रकाशित हुआ। इस लेख में वर्णित चिंताएँ कुछेक बदलावों के अथवा सुधारों के बावजूद आज भी ज्यों की त्यों हैं। शशि कमलेश के लेख के अतिरिक्त इस अंक में मात्र एक ही रचना समा सकी, वह है—रमेश जैन  की लघुकथा ‘कुतिया’। प्रस्तुत हैं शशि कमलेश का लेख तत्पश्चात् रमेश जैन की लघुकथा :

आठवाँ दशक और लघुकथा का रचना औचित्य / शशि कमलेश

ये उपेक्षित लघुकथाएँ

हर काल खण्ड समाज के विकास क्रम में कुछ न कुछ अलग होता ही है तो फिर साहित्य की विधा उस अलगपने से , उस बदलाव से अछूती कैसे रह सकती है. मिनी नवगीत मिनी कविता लघुकथा मिनी रूपक आदि के आंदोलनों से जिनमे पर्याप्त अर्थवत्ता भी है. लघुकथा का अभियान ज्यादा पुराना और एक हद तक ज्यादा सही भी लगता है.

संस्कृत के पंचतंत्र और हितोपदेश, फिर खलील जिब्रान और हिंदी साहित्य में रावी, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, हरिशंकर परसाई, हंसराज अरोड़ा, डॉ श्रीनिवासन,कमलेश भारतीय,मोहन राजेश,सुशीलेंदु, रमेश यादव, लक्षमेंद्र चोपड़ा,रमेश बतरा कृष्णा अग्निहोत्री भगीरथ कृष्ण कमलेश बृजभूषणसिंह मधुप मगध शाही लक्ष्मीकांत वैष्णव पुरुषोत्तम चक्रवर्ती अवधेश अमन शशि राजेश विष्णु सक्सेना आभा जोशी सुषमा सिंह तक में यह सिलसिला चला आ रहा है.शताधिक लघुकथाएँ इसी दशक में इधर उधर छपी है लेकिन सामायिक लेखन के नाम पर की गई किसी भी टिपण्णी में उनका जिक्र क्यों नहीं है? यह मेरी समझ के बाहर है.शायद लघुकथाओं का कोई सुरक्षित शिविर न हो या क्या पता अधिकांश लघुकथा को अपनी केन्द्रीय विधा मानकर न चल प् रहे हों और इसे महज पास टाइम मानते हों.

सारिका, कात्यायनी, अमिता, अंतर्यात्रा, रूपाम्बरा, कहानीकार, सप्तांशु, शताब्दी, सौर चक्र, जनसंसार, भास्कर,मिलाप, स्वदेश,अतिरिक्त आदि पत्र पत्रिकाएं जहाँ लघुकथाएँ निरंतर छपती रहती है वहां मरुगंधा,कहानी,नै कहानियां निहारिका आदि लघुकथाएँ छपने से परहेज करती है. व्यवसायिकता के कारण आम तौर पर सोलह या सत्रह फुलस्केप साइज़ के पृष्ठों की कहानी ही छपती है. लम्बी कहानी नारा भी शायद इसी लिए शुरू हुआ. फिर लम्बी कहानी को लेकर सारिका ने काफी हाय तौबा भी मचाया, क्या लघुकथा के खिलाफ साजिश नहीं है ?लोग चुटकले छाप सकते हैं, रंग-व्यंग्य छाप सकते हैं लेकिन लघुकथाओं के साथ अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं का यह सौतेला व्यवहार गंभीर चिंता और खेद की वास्तु है.

गलत आरोपों की शिकार लघुकथाएँ

लघुकथा एक सुगठित विधा है. सामान्यत: यह पैनी, सीधी और कंडेंस्ड होती है. कुछ इतनी कि किसी एक क्षण को जीती लगे, घेरती लगे.शायद यह किसी फॉर्म की तलाश है. कितनी ही चीजों से लघुकथा को अलग होना पड़ा है. गुलिस्ता-बोस्ता की उद्देश्य परकता, नीति कथाओं का केन्द्रीयपन, गद्यगीत की भावुकता आदि आदि. इसीलिए संत्रास [श्री हर्ष ], मांस [हंसराज अरोड़ा], अलगाव [रूपकिशोर मिश्र], प्रतीक्षा [रमेश यादव], चेहरा दर चेहरा [कृष्ण कमलेश] में गजब की बेववता है. और ये लघुकथाएँ अपने में सधी हुई है. प्रतीक्षा में अस्वीकृत और बाद में अवसरवादी बनजाने वाले लेखकों से अधिक लेखकीय और प्रकाशकीय व्यवस्था पर तीव्र व्यंग्य है.

कहने वाले कुछ भी कह सकते हैं. यह भी कि अधिकांश लघुकथाएँ जो आज छपती है, बड़ी कथाओं का छोटा रूप है या ये छोटी कथाओं में तबदील हो सकती है. दोनों ही बातें यह प्रमाण देती हैं कि विधा की उस हैसियत तक ये कथाएँ नहीं पहुंची है. जब तक ट्रांसफर संभव न हो, लघुकथा हार जाती है.

ऐसे लोग जो बाल की खाल निकालने के आदी हैं उन्हें एंटीकरप्शन [मोहन राजेश], वह [शशि कमलेश], शक [राजकुमार कपूर], गिनती [श्याम नारायण बैजल]सिर दर्द का इलाज [विनोद प्रिय] आदि लघुकथाएँ पढ़नी चाहिए. जहाँ तक मैं जानती हूँ, कोई भी लघुकथा ऐसी नहीं है जो बड़ी कथा में तबदील नहीं की जा सके और कोई भी कहानी ऐसी नहीं जिसका लघुकथा में रूपायन संभव न हो.आरोप लगाने वाले कुछ भी आरोप लगा सकते हैं लेकिन कथाओं का रिवाज उनके इल्जामों से सवालिया कटघरे में नहीं आयगा.

गोष्ठियों के निष्कर्ष

मथुरा, भोपाल, पिंजोर, नसीराबाद, हैदराबाद, ग्वालियर, ब्यावर, आदि विभिन्न शहरों में लघुकथा के रचना औचित्य को लेकर विचार गोष्ठियां आयोजित की गई. गोष्ठियों में प्रायः सभी इस बात पर सहमत प्रतीत हुए कि लघुकथाएँ आधुनिक युगबोध को लेकर बड़ी ईमानदारी से चल रही है. संत्रास [श्री हर्ष ], जहाँ एक क्षेत्र, एक दायरे विशेष की मानसिकता उभारती है वहां भीड़ [ लक्षमेंद्र चोपड़ा] किसी दायरे में यकीन नहीं रखते. युगधर्म [लक्ष्मीकांत वैष्णव] बाहरी और भीतरी दोनों स्तर पर चलती है, स्थितियों और आक्रोश की उनमे बड़ी गहरी पकड़ है. संतोष, कृपा, दया [विष्णु सक्सेना] एक सूक्ति कथा या बोधकथा जैसी प्रतीत होती है लेकिन उसका रूपक विधान रेखांकन योग्य है. लघुकथा के लिए रूपक [एलीगेरी] आउट ऑफ़ डेट हो गया है या नहीं, यह कह सकना खतरे से खली नहीं है.क्योंकि समकालीन हिंदी कहानी के नाम पर भी रूपकों, प्रतीकों, बिम्बों के सहारे रचना तंत्र बुना गया है.

अन्य लघुकथाओं में : एक युवक सिफारिश, रिश्वतखोरी और अन्य स्थानीय मुद्दों से समझौता न करने के कारण ओवर एज हो जाता है [ओवर एज-आभा जोशी]. एक व्यक्ति जो फ़ौज में भारती होने जाता है उसे छाती के बदले पेट का माप पहले दिखाई देता है [पेट का माप-सुशी लेंदु]. एक व्यक्ति जो भीड़ भाड़ की समस्या से त्रस्त है महानगर बोध उसे आहत किए हुए है सडक पार करना चाहता है और सडक पार नहीं कर पाता [वह शशि कमलेश]. आदमी आज जानवरों से भी गया बीता है और उसकी लड़ाई गधों की लड़ाई से भी गई गुजारी है [गंदर्भ युद्ध- प्रताप अपराजित], ज्योतिष और हस्तरेखा का ढोंग करने वालों की कलई खुलती जा रही है [पामिस्ट- मोहन राजेश], लबादा ओढ़े हुए ईमानदारी भीतर से कितनी नंगी है [व्यक्तित्व-मधुप मगधशाही ].सामाजिकता के नाम पर बाराती कितना शोषण करते हैं [बाराती-श्रीकांत चौधरी], आदमी किसी की सहानुभूति का पात्र बनना नहीं चाहता [कछुए –भगीरथ] आदि ऐसी दर्जनों लघुकथाएँ हैं जो समाज के ऊपरी और भीतरी तौर पर चलने वाले कयास को ध्वनित करती है. [कांच का घेरा-अवधेश कुमार अमन ]इकाई के टूटने की ऐसी ही छन्न सी आवाज है.

प्रश्न-प्रतिप्रश्न

बहरहाल, लघुकथाएँ लिखी जा रही है और लिखी जाती रहेंगी. सिलसिला सदियों पुराना है लेकिन सिलसिले को देखने वाली आँख [आँखें] कुछ और साजिशों में लगी है. कुछ सवाल अनायास उभरते हैं क्या नई लिखी जानेवाली हर कथा बासी नहीं लगती है ? शायद फार्मूलाबाजी के कारण जो अब लघुकथाओं में भी आ गई है. यदि कोई रचनाकार लघुकथा के लिए ही विशुद्ध रूप से समर्पित रहे तो बात कुछ बन सकती है जैसे रावी लेकिन जो लोग हर विधा में अपनी टांगअड़ाए रखना चाहते हैं जैसे प्रभाकर माचवे वे लोग सामायिक लेखन का न तो सही प्रतिनिधित्व करते हैं और न कर सकते हैं. समय तो उस फ़िल्टर पेपर की तरह है जिसमें काम की चीज छन कर रह जाती है.

कुतिया / रमेश जैन

मैली चादर पर पड़ी सलवटें धुआँ खाई छत तक रही है. वह नि:शब्द कमरे के एक कोने में खड़ी बिस्तर देख रही है.शायद उसे बाहर से आते शोरगुल की तनिक भी चिन्ता नहीं है. पर वह अधिक देर तक वैसा नहीं कर पाई. बाहर का शोर तेजी से अन्दर घुसाने लगा. दोपहर बासी मुर्दे की तरह सड़ने लगी. बच्चे भी बाहर आपस में गाली गलौज करने लगे.

पिछले वर्ष इसी बिस्तर पर मरते समय उसके पति से कहा था कि वह उसके बच्चे को पढ़ा लिखाकर होशियार बनाएगी. पर कुछ दिनों से वह मुन्ने को होशियार बनाने के चक्कर में स्वयं असुरक्षित रहने लगी है . कभी वह तो कभी वह. अब तक पता नहीं किस किस को अपने शरीर पर चढ़ा चुकी है.

वक्त कोड़े लगाता रहा, वह खाती रही.

बिस्तर से ध्यान हटाकर वह सोचने लगी –जल्दी ही रुपयों की व्यवस्था न हो पाई तो मुन्ने को किसी अच्छे स्कूल में दाखिला नहीं मिल पाएगा. वह नहीं चाहती –मुन्नू इन गंदे बच्चों की सोहबत में किसी मामूली स्कूल में अपनी जिंदगी सड़ने दे.

वह दृढ निश्चय में खो गई.

उसने तय किया –वह शाम को रामू गाड़ीवान से मिलेगी. पन्द्रह बीस मिनट की तो बात है. फिर वह निश्चिन्त हो गई.

अंक आठजनवरी 1973 इसमें मात्र दो लघुकथाएँ हैं—कृष्णा अग्निहोत्री की ‘न्याय’ तथा श्रीहर्ष की ‘आदेश’। ‘रचना बोध’ स्तम्भ के अंतर्गत अन्य पत्रिकाओं के बारे में चर्चा प्रस्तुत की गयी है। अंक-8 की दोनों लघुकथाएँ निम्न प्रकार हैं:

न्याय / कृष्णा अग्निहोत्री

उसका पिता शहर का नामी वकील....वह एक योग्य होनहार, एम ए एल एल बी लड़का, पिता ने बेटे से स्वतन्त्र रहकर कार्य करने का अनुरोध किया, परन्तु वह शासक बनकर सबके साथ न्याय करने को आतुर था.

बुद्धिमान बेटे का चयन सिविल जज के लिए हुआ. वह बहुत अच्छे ढंग से कार्य करता रहा लेकिन नई पीढ़ी का महत्वाकांक्षी युवक और आगे बढ़ने लगा, भाग्य से आइ ए एस की लिखित परीक्षा में वह मेरिट लिस्ट में आ गया, इंटरव्यू कार्ड पाते ही पिता कि वे उसके लिए भागा दौड़ी करेंगे, बेटे को अपमान का अनुभव हुआ.

-नहीं पिताजी, चाहे मैं इंटरव्यू में किसी भी नंबर सिलेक्ट हूँ, आप यह सब मत करिए, जो लड़का मेरिट में है वह सिलेक्ट तो होगा ही.

इंटरव्यू संपन्न हुआ बुद्धू साथियों का सिलेक्शन हुआ,रोष एवं ताव में आकर लड़के ने सेन्ट्रल गवर्नमेंट को इंटरव्यू में हुए अन्याय के प्रतिरोध में एक आवेदन भेजा.

उन्होंने उसके विभाग को लिख कि फैसला करें, कुछ दिनों बाद न्याय विभाग से एक लिफाफा मिला कि तुम्हारी सेवाओं की अब शासन को आवश्यकता नहीं.

लड़के अब समझ में नहीं आ रहा था कि न्याय मांगने कहाँ जाए? .

आदेश / श्रीहर्ष

प्रधानमंत्री अपने शयन कक्ष में आदमकद शीशे के सामने खड़े होकर चहरे को पौंछ रहे थे और शीशे में ही किसी नए मुहावरे को खोज रहे हैं .रजत जयंती तक तो गाड़ी चल गई आगे क्या होगा? आराम हराम से लेकर गरीबी हटाओ समाजवाद लाओ तक की यात्रा में बहुत कुछ बना बिगाड़ा लेकिन अब कैसे चलेगा ? पसीने की बूँदें ललाट पर उभर आई-शीशा हंसने लगा ! एयर कंडीशन कमरे में भी पसीना ! शीशा ही बोलने लगा –मुहावरा झुनझुने की तरह जनता में बजता है और फिर अपनी आवाज खोकर जनता के सिर से टकराने लगता है, तब चरों ओर खलबली मचती है, एक के बाद एक परेशानी.

निजी सचिव का प्रवेश- सर ! फिर सब प्रान्तों में लोग एक साथ्मिलकर नारे लगाने लगे हैं-क्या सारी चलें उल्टी पड़ने लगी है ? ...यस सर ... चीजों के दाम .... ठीक है ...ठीक है, मैं अख़बार पढता हूँ, यह सब दिखावटी चीखना चिल्लाना है.देश का स्तर जब उठेगा, चीजों के दाम भी बढ़ेंगे, जिन्हें यह देश महंगा लगे वे किसी दूसरे देश में चले जाएं , कौन कहता है गरीबी नहीं मिट रही है ? मैं कल ही हवाई जहाज से गाँवों को देख रहा था मुझे छोटे छोटे बच्चों की आँखों में मुस्कान की चमक दिखाई दी.मुझे विश्वास हो गया कि देश से गरीबी मिट रही है.

दूसरा सचिव- कुछ संसद सदस्य देश की महंगाई के बाबत आपसे मिलाने आए हैं...—उन्हें कह दो कि अभी इस समस्या पर विचार करने का समय नहीं आया है, हमें अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं पर सोचना-विचारना चाहिए.

बाहर-जनता एक स्वर में चीजों के बढे दामों के प्रतिवाद में नारे लगा रही है, भीतर प्रधानमंत्री पांडिचेरी की माताजी द्वारा भेजे गए लाल फूलों को सिरहाने रखकर पलंग में धंस रहे हैं.उनके आदेशानुसार पुलिस गोली चला रही है.

अंक नौ। इस पर महीना अंकित नहीं है, मात्र 1973 अंकित है। यह अंक ‘नारी अंक’ था। इसमें प्रभा सिंह की ‘सत्याग्रही’कमलेश धवन की ‘चश्मा दर चश्मा’कृष्णा अग्निहोत्री की ‘मातम’ लघुकथाएँ थीं। इनके अलावा कृष्ण कुमार भट्ट पथिक की ‘अतिरिक्त विचार’ शीर्षक से एक सामान्य टिप्पणी प्रकाशित है।

यहाँ एक तथ्य की ओर सभी का ध्यान दिलाना जरूरी समझता हूँ। यह कि ‘कमलेश धवन’ जगदीश कश्यप का ही छद्म नाम है। बेशक, इस नाम की लड़की उनके परिचय में थी, लेकिन वह लेखिका नहीं थी। जगदीश ने प्रेम के वशीभूत हो उस नाम के साथ संयुक्त रूप से, सह-लेखक का प्रयोग करते हुए भी कुछ रचनाएँ लिखीं। बाद में, जैसा कि उस काल में होता ही था, झगड़ा हुआ। बात थाने तक पहुँची और उन्हें ‘सरस्वती पुत्र’ भी लिखनी पड़ी।

सत्याग्रही / प्रभासिंह

वे सत्याग्रह करने आई थी। भूखमरी, बेरोजगारी, पिछड़ापन दूर करने और शिक्षा व्यवस्था को नया मोड़ देने के लिए।

वे राजनीति नहीं समझती थीं फिर इन सारी समस्याओं से ग्रस्त थी। जाड़े की हड्डी कंपा देने वाली सर्द रातों के लिए, एक कम्बल तक उनके पास नहीं था। और शरीर पर चिथड़े ही चिथड़े थे।

दल की ओर से सत्याग्रह और फिर गिरफता्री में, महिलाओं का नाम आ जाने से सत्याग्रह का रिकार्ड कायम हो जाता। बस इसी आधार पर वे सत्याग्रही दल के नेताओं द्वारा फुसलाकर लाई गई थी।

तीन दिनों के निरंतर प्रयास के बाद भी वे जेल नहीं ले जाई गई तो नेताओं के लिए वे बेकार साबित होने लगी और वे लोग उन्हें टरका देने के उपाय सोचने लगे।

चौथे दिन दल के नेताओं ने सुबह में कार्यालय खाली पाया। वे चली गई थी पर कार्यकर्ताओं के धोती, लोटा और कुछ कम्बलों के साथ ही।

वे अपने अभियान में सफल रही थी, जबकि नेताओं का सत्याग्रह विफल गया था।

चश्मा दर चश्मा / कमलेश धवन

उसने पिता को बताया कि वह उससे प्रेम करती है और उसीसे विवाह करेगी. पिता उत्तेजित नहीं हुए उन्होंने उसे एक चश्मा दिया.

उस चश्मे से जब उसने अपने प्रेमी को देखा तो वह एक वहशी, गन्दा और नीच आदमी लग रहा था. अपनी माँ को गन्दी गन्दी गालियाँ देता हुआ पीट रहा था. बुढ़िया चिल्ला रही थी. वह लेखक के स्थान पर गुंडा था.

उसने घबरा कर चश्मा उतार दिया. जब उसने प्रेमी का दिया चश्मा लगाया –वह उसमें एक खानदानी महान लेखक व प्रतिष्ठित व्यक्ति को देख रही थी. जिसकी आगोश में उसने कितनी ही हसीं रातें बिताई थीं. चारों ओर रंगीनी थी-चांदनी रात और मौन प्रेमालाप में दोनों घंटों डूबे रहते.

उसने तत्काल ही पिता द्वारा दिया गया चश्मा जमीन पर दे मारा, जिसके छोटे छोटे कण उसकी अँखियाँ चुंधिया रहे थे.

मातम / कृष्णा अग्निहोत्री

मिनी बस की बीस-पच्चीस सीटें. लगभग चालीस सवारी. कुछ सीट मोढों पर और कुछ खड़ी हुई.

वे थे पांच, शीघ्रता से चढ़े. कुछ परेशान, त्रस्त और घबराए हुए.

हाय री बहना धक् से रह गई. भाभी बेचारी शादी के लिए पहनावा लेकर गई रही और रास्ते में हार्ट फेल हो गया.

हाथ में तार देखकर मैं तो सिटपिटा गई, छोटे-छोटे बच्चे, परीक्षा का समय और घर में काऊ नाहीं! जैसे-तैसे इन्तजाम करके आई हूँ. न जावे तोऊ बदनामी. एक ठो भाभी रही. वैसे अपन बहन की पहचान रही तो कीमती कपडे ले गई रहे, मोर तो बच्चों को एक कमीज का कपड़ा भी मुश्किल से देत रही.

यही बात तो कहने को आती है, कभी सुख में उसने नन्द समझकर याद नहीं किया. अब कहाँ तो मंदसौर और कहाँ बरहानपुर. सौ रुपये टूट जाएंगे! समझ लो पानी में गए.

हाँ री मरनेवाली ने जीते जी तो बांधकर रखा नहीं और मरकर भी कष्ट दे रही है जाड़े में.

बडवाहा आ रहा है, तुम लोग वहां उतरना. उनके साथ के आदमी ने कहा.

क्यों?

अरे अभी तो खण्डवा फिर बरहानपुर पूरे छ घंटे में पहुचेंगे. रातभर जगे हैं. वहां जाने से तो मातम करना ही पड़ेगा, यहीं डटकर नाश्ता पानी कर लो. जैसे-तैसे नींद की झपकी लेकर वहां के रोने धोने को ताकत जुटा लो.

‘अतिरक्त विचार’ / कृष्ण कुमार भट्ट पथिक

प्रिय भाई,

दिसंबर अंक. शशि कमलेश का लेख ऊपरी सतही बात कहता है. उपलब्धि के नाम कमलेश ने अपने लोगों के नाम ही गिनाए हैं. यह बात आम पाठक के लिए नासमझी की बात है कि लघुकथा की महत्ता बताने के लिए लम्बी कहानी को क्यों कोसा गया है? लघुकथा की रचना प्रक्रिया लेख से गायब है और लेख के उदाहरण बताते हैं कि लेखक केवल लघुकथा लिख रहा है. एक अच्छी बात यह है कि ‘अतिरिक्त’ लघुकथा को समर्पित है और उसके पिछले अंक प्रमाण हैं कि ‘अतिरिक्त’ की लघुकथाएँ नपुंसक नहीं है. आदमी के चेहरे के आसपास घूमती है. यह तो आपके भावी प्रयास ही बताएँगे कि ‘अतिरिक्त’ आज के आदमी को कितना पकड़ सका है, हाँ, ‘अतिरिक्त’ कुछ करने का आश्वासन जरुर दे रहा है.

अंक दस  महीना  इस पर भी अंकित नहीं। वर्ष 1973। इसमें अनूप कुमार जैन की ‘समाजवाद का मुखौटा’मधुप मगधशाही की ‘सॉरी’ और जगदीश किंजल्क की ‘नियुक्ति’ लघुकथाएँ प्रकाशित हैं। 

समाजवाद का मुखौटा –अनूपकुमार जैन

जनप्रिय नेता विशाल जनसमूह के आगे आह्वान कर रहा था—भाइयों हमें समाजवाद लाना है और उसके लिए सभी को तैयार रहना है. अब कोई भूखा नहीं रहेगा –सबको रोटी, कपडा, मकान मिलेगा. जिनके पास फालतू पैसा है, उससे छीनकर जरूरतमंद लोगों में बांटा जायगा. इस पर तालियों की गडगडाहट हुई.

सुना नहीं, मैंने कहा बाहर निकल जाओ,सुबह सुबह आ जाते हैं साले.’ मैं ठिठक गया. जनप्रिय नेता लॉन में टहल रहा था. उस आदमी की गोद में कुम्हलाया बच्चा आतंकित सा इधर-उधर देख रहा था. सेठजी, मेरी बीबी की हालत खराब है, दवा दारू के लिए पच्चीस रुपये और दे दो.

हूँ’ एक तो चार दिन से काम पर नहीं आ रहा है और उल्टा तुझे पच्चीस और दूँ. पचास रुपये महीना लेता है और अब तक सत्तर रुपये ले चुका है. जाओ मैंने दूसरा नौकर रख लिया है. मेरे जितने रुपये निकलते हैं,जाओ माफ़ किए.

सेठजी, मेरी गरीबी का ख्याल करके ऐसा जुल्म न ढाओ और फूट-फूट कर रोने लगा.

हूँ’ गरीबी मिटने का ठेका मैंने ही लिया है क्या? देश में और लोग मर गए. अपने नेताओं के पास जाओ जो गरीबी मिटा रहे हैं, मांगो उन्हीं से पैसा. भाइयों, फालतू पैसा जरूरतमंद लोगों में बांटा जायेगा आदि शब्द मेरे कानों में पिघले शीशे की तरह खौलने लगे.

सॉरी –‘मधुप’ मगधशाही

गोया क़यामत के बाद उसका नंबर आया, ‘मे आई कम इन सर’ उसने [आया राम –गया राम] पल्ले के बाहर खड़े होकर कहा.

कम इन’ भीतर से आवाज आई. वह अन्दर आ गया. सामने लम्बी सी मेज के पीछे दबे आदमी ने उल्लू की तरह आँखे मिचमिचाकर पूछा- नाम ? ‘जी, गौतम.’कुछ पढ़े लिखे ?’ ‘जी, मैं ग्रेजुएट हूँ.’तो आप जा सकते हैं,’ और कुर्सी पर के आदमी की नजर उसके सिर से ऊपर फोकस लाईट की तरह उठ गई.

मगर मैं तो नौकरी के लिए...’’ उसने फोकस को अपनी सीध में उतारने की गरज से कहा.

ठीक है, लेकिन हमें लेबर के लिए मामूली पढ़े लिखे या अपढ़ आदमी की जरूरत है; ग्रेजुएट की नहीं.

उसने साहस से काम लिया, कहा, ‘क्लेरिकल जॉब भी कहाँ मिलता है सर! उधर तो सारी सीटें पहले ही से भरी है, इधर भी नहीं मिला तो ...’

मज़बूरी है.’ उस व्यक्ति ने सहानुभूति में चेहरे को सिकोड़ लिया , ‘एक ग्रेजुएट लेबर का काम करे, यह अपमान होगा मुझको पसंद नहीं. सॉरी

उसने सोचा –सामनेवाले ने साफ-साफ यह नहीं कहा कि एक ग्रेजुएट से लेबर का काम होगा नहीं. वह लौट पड़ा.

नियुक्ति – जगदीश किंजल्क

सरकार ने तीन सदस्यों की एक इंटरव्यू कमिटी नियुक्त की. कमेटी ने चार सौ उम्मीदवारों का साक्षात्कार लिया. कुल सोलह स्थान भरे जाने थे. साक्षात्कार के मध्य एक एम् ए बी एड लड़की आई और साक्षात्कार देकर चली गई.

बड़ी इंटेलीजेंट लड़की है.’ खन्ना ने आँखे मटकाकर कहा.

माना लड़की इंटेलिजेंट है. इस पद के लिए सर्वथा उपयुक्त है पर कैंडिडेट किसकी है?’ तिवारीजी ने गंभीरता से पूछा,पर उनका प्रश्न अनुत्तरित रहा.

किसी मंत्री का फोन है इसके लिए? चड्ढा ने उत्सुकता से पूछा. तिवारी ने कमिटी के हेड के नाते सिर हिला दिया.

थैली वाली भी नहीं यह?’ खन्ना के चेहरे पर आशा की लहरें दौड़ रही थीं.

नहीं यार, यह मात्र कैंडिडेट है.’ तिवारी जी ने उदास होकर कहा. इस पर चड्ढा ने घूरते हुए कहा, ‘तब क्या राय है इसके बारे में?’

ख़ामोशी में कुछ पल बीते पर तभी खन्ना ने कमेन्ट किया, ‘हटाओ यार जाने दो. ऐसे सूटेबल कैंडिडेट तो न जाने कितने मिलेंगे. पर हम किस किस को लेंगे? फिर इसके लिए तो...’

इस बीच तिवारी जी ने आवाज लगा दी, ‘नेक्स्ट कैंडिडेट.’

 अंक ग्यारह  पर भी महीना  अंकित नहीं। अनुमानत: माना जा सकता है कि यह नवम्बर माह रहा होगा। वर्ष 1973  में प्रकाशित इस अंक में धनराज चौधरी की  ‘आधुनिक’बलराम ‘रवि रश्मि’ [बलराम अग्रवाल पहले इसी नाम से लिखते थे—भगीरथ की टिप्पणी] की ‘अपने पाँव’, कृष्ण कमलेश की ‘अपरिभाषित’ लघुकथाएँ प्रकाशित हैं। अंत में नौवें अंक की लघुकथाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए मधुप मगधशाही और हंसराज अरोड़ा के पत्रांश छपे हैं।

आधुनिक –धनराज चौधरी

द्युमत्सेन पुत्र सत्यवान क्लब से थका हारा रात बारह बजे घर पहुँचता है. पीक थूक, ताला खोल, सुवेगा अन्दर ली. अश्वपति पुत्री सावित्री निद्रामग्न है. वह पास आ प्यार से पुकारता है, ‘सावित्री!’ सुप्त पत्नी अविचलित रहती है. सर्द हाथ प्यार से सावित्री के चेहरे पर फेरता है. निद्रा में विघ्न पड़ने पर नेत्र बंद किए ही वह गुस्से में पूछती है, ‘क्या है?’

खाना डालो प्रिये!’ सत्यवान के स्वर में मिठास है. पर वह अनसुना कर देती है. अपमान सा महसूस करते हुए वह दोहराता है, ‘खाना लगाओ भई!’मुझे नींद आ रही है, खुद ही ले लो.’ और रजाई मुंह पर खींच लेती है. लाचार सत्यवान मुड़ते हुए बडबडाता है, ‘कलयुग तेरी दुहाई! यह जन्म-जन्म की साथिन कथित पतिव्रता, मेरे लिए आरामदेह रजाई तक नहीं छोड़ सकती. क्या आशा करूँ क्लब में कट करते समय शापवश यदि मृत्यु हो जाय तो मेरी प्राण भिक्षा के लिए यमराज का पीछा करेगी.’

अपने पाँव- बलराम ‘रवि रश्मि’

दो साल पहले ही डायरी में लिखा था आत्म सम्मान की रक्षा के लिए मैं सब कुछ बलि चढ़ा दूंगा. उन दिनों पिता के हाथ मेरे आधार थे.

कुछ दिनों पूर्व अपने पांवों पर खड़ा होना निश्चित किया. सर्विस के लिए अनचाही पटरियों के समानांतर दौड़ना पड़ा. सम्मान समाप्त! अनजाने लोगों के सामने याचनाएं की आत्म सम्मान समाप्त!! सभी समझाते- भई सर्विस में सभी का भला बुरा सुनना पड़ता है.

जी, मैं स्वीकारता.

सोर्स लगाकर एब्जोर्ब हो जाना आसान है-काम करना नहीं, फाइल को ट्रे में पटक कर बॉस कहता है- यह ऑफिस है बाप का घर नहीं.

‘......’ मैं सॉरी भी नहीं कह पाता हूँ.

गेट आउट!’ तुरंत आज्ञा पालन करता हूँ. अपने पांवों की बजाय पिता के हाथों पर खड़ा होता –तो अभी इसकी मक्खी झाडे देता.

अपरिभाषित –कृष्ण कमलेश

सुखी दाम्पत्य जीवन को परिभाषित करना इतना आसान होता तो वह बड़े मजे में कह देता ......वह सुखी है, क्योंकि ....

लेकिन वह दुखी भी नहीं था. क्या नहीं था उसके पास, दहेज़ में मिली नई कार, पुश्तैनी बंगला, नौकर-चाकर, दोस्तों के बेफिक्र ठहाके ....क्लबों की रंगीनियां.

वह इस सब में सरोबार डूब चुका था. इन सारी रंगीनियों में ....लेकिन..... ! कुछ था ऐसा, जो कभी भी कचोट जाता उसे. पीने को बढ़िया शराब और पिलाने को नाजनीन साकी. शराब उसे अब खुमार नहीं देती –महज एक आदत या जरुरत जो भी कह लें.

जिस्म बदलते हैं, बिस्तरों पर बिछानेवाली चादरों की तरह. कोई हम बिस्तर उसे स्वर्गीय सुख नहीं देता.

बदले बैडशीट, बदले हम बिस्तर. बदले सन्दर्भों में वही ऊब पाए. लड़की ठंडी हो या गर्म उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. लड़की चाहे पेशेवर हो या ठेठ गृहस्तिन...

-और उसे लगता कोठे की औरत और कोठी की औरत में कोई फर्क नहीं है.

अतिरिक्त विचार

अंक -९ की तीनों ही लघुकथाएँ काफी सुन्दर है, सत्याग्रही [प्रभा सिंह] भीतर के नंगेपन को बड़े चमत्कारी ढंग से सामने लाती है. ’चश्मा-दर-चश्मा [कमलेश धवन] बदलते हुए विचार-मान्यताओं का सबूत है और मातम [कृष्णा अग्निहोत्री] खोखली परम्पराओं के बीच हमारी सही स्थिति [तस्वीर] . –‘मधुप’ मगधशाही

जहाँ प्रभासिंह ने आज के सत्याग्रह कर्ताओं के असल विवेक तथा नेताओं की तिकड़म को जाहिर किया वहीँ उन्होंने आन्दोलन को असफल भी करवा दिया जबकि आमतौर पर ऐसा होता नहीं. कुमारी कमलेश धवन को चाहिए कि वे न तो पिता का न प्रेमी का वरना अपना चश्मा ही व्यवहार करें कृष्णा जी ने आज के रिसते संबंधों को उभरा है. -हंसराज अरोड़ा

 अंक बारह  महीना इस पर भी अंकित नहीं है। 1973 में प्रकाशित इस अंक को ‘बंगला मिनी गल्प अंक’ कहा गया है। इसमें रमानाथ राय की ‘जगह’शिवशंकर दत्त की ‘समय’ और आशापूर्णा देवी की ‘रिस्क’ रचनाएँ प्रकाशित हैं।

अतिरिक्त [लघुकथा से प्रतिबद्ध] 

बंगला मिनी गल्प- एक परिचय 

महानगर बोध को लिए इस बार तीन बंगला लघुकथाएँ. ‘अतिरिक्त’ के लिए इन कथाओं का अनुवाद सुपरिचित कवी कार्तिकनाथ गौरीनाथ ठाकुर ने. 

जगह- रमानाथ राय 

बस रुकते न रुकते दस आदमी  घुसे. तेरह आदमी भी हो सकते हैं. उसके बाद एक लड़की ने ज्योंही चढ़ने की कोशिश की, बस स्टार्ट हो गई  

-भीतर जाइये. अन्दर गया.

-पाँव हटाइये. पांव हटाया.

-हाथ हटाइये. हाथ हटाया.

-घूमकर खड़ा रहिए. घूम कर खड़ा हुआ.

-सीधा होकर रहें. सीधा होकर खड़ा हुआ.

-किसी को कहीं धक्का लगा. आँख नहीं है क्या?

डंडा पकड़कर खड़ा रहा. पीछे से किसी ने ठेल दिया. झुकाते ही सामने से किसी ने धक्का दे मारा. इसके बाद संभल कर खड़ा होते ही एक आदमी ने बायीं ओर से धक्का दिया. साथ ही साथ और एक आदमी ने दायीं ओर से धक्का दिया. मेरा पांव किसी के पैर पर पड़ा.

-ओह! देखकर खड़ा रहें.

देखकर खड़ा होते ही और एक आदमी के पांव के ऊपर लात पड गई. असभ्य.

फिर पांव रखे जाने पर किसी की देह पर पांव लग गया.

-पक्का पूरा जानवर है तो ! 

फिर पांव रखने की जगह खोजने लगा.

-हुआ क्या आपको?

-बस से उतार दें इन्हें. एकदम देहाती है.

-ये सारे लोग क्यों जो.....

खूब बिगड़ गया. डंडे से हाथ हटा लिया. इच्छा हुई घूंसा मारू. हाथ अटक गए. इच्छा हुई लाठी मारूं. पांव फंस गए. इच्छा हुई....इच्छा हुई...फिर दुरस्त होकर खड़ा होने की कोशिश की. 

किन्तु दोनों पांव कहाँ रखूँगा? हाथ दोनों ?

[मिनी पत्रिका ‘बिंदु’ अप्रेल 70 ]        

समय- शिवशंकर दत्त 

दो बजे दोपहर में मेरा इंटरव्यू था. नौकरी की गारंटी. निकल पड़ा रास्ते में. काठ फोड़ धूप, जलती-भुनती दोपहर. घडी की बेल्ट का रिंग टूट गया. झुंझला गया मन. पास ही जूते का मोची. दीवार से उठंग कर ऊंघ रहा है. देखकर ही गुस्से से दहक उठा. पुकारा, इस रिंग को देखो तो. वह आँख मूंदे ही बोला-यह झंझट झमेले का काम है, सवा रूपया लगेगा.

सवा रूपया क्यों जो इच्छा हो ले लो, मगर झटपट कर डालो, देर हो रही है.

ऍन वक्त उसके नाम टेलीग्राम आया. वह बोला, ‘बाबू पढ़ दीजिए तो. मैंने पढ़ कर कहा, ‘तुम घर जाओ तुम्हारी बहू –

बात छीन कर वह बोला, ‘बची हुई तो है? मैंने घडी हाथ में लेकर हंसते हुए कहा, ‘बर्खुरदार बचा लिया. कितना लोगे? वह रोनी सी सूरत बनाकर घडी की सुई की तरफ ताकता हुआ बोला, ‘ओह, सत्यानाश, अब ट्रेन और मिलेगी नहीं-जो इच्छा हो दीजिए. जल्दी कीजिए देर हो रही है. [मिनी एक्स अप्रेल 70 से ]

   रिस्क- आशापूर्णा देवी 

‘टूर में जाने के समय बहू की रखवाली करने का भार दोस्त पर देकर जा रहे हो तुम? उस पर भी बैचलर दोस्त,’ 

जमाई बाबू हा-हा कर हंसने लगे,

‘यह तो देख रहा हूँ कि बिल्ली को मछली अघोरने के लिए रख छोड़ना.’

‘बात क्या बेहद सटीक नहीं हुई जमाई बाबू?

‘दुनिया भी तो अव्वल सभ्य नहीं हुई है, भाई. क्या आपकी ऐसी ही धारणा है कि इन सात दिनों के दरम्यान मेरा दोस्त मेरी औरत को लेकर भाग जाएगा ?’

‘भागकर हो सकता है, नहीं जाएगा –

जमाई बाबू ने बुजुर्गों जैसी हंसी हंसी, स्त्रियाँ तुरंत ही पैर के नीचे की जमीन नहीं छोड़ती है. लेकिन मन के फिसलने में कितने क्षण लगेंगे? जमाई बाबू जोर-जोर से हंसने लगे.

‘तो मन का.’  निखिल सेन भी जोर-जोर से हंसने लगे.’ जो मन सात दिनों के सुयोग में ही भाग जा सकता है, उस मन के रहने पर ही क्या और चले जाने पर ही क्या?’

‘बात ही बात में तो कहा जाता है, घी और आग की रिस्क लेने की जरुरत ही क्यों, बाबा?’

‘निश्चय ही, पहले तो सोचा नहीं –अभी सोचता हूँ वैसा ही यदि हो; क्योंकि आवश्यकता खूब तीव्र और प्रबल हो सकती है.’

[‘उस पार से ]

भगीरथ जी ने अनुसार—‘इसके बाद वह ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ संकलन की तैयारी में लग गये थे। वह कहते हैं, कि—बाद में ‘अतिरिक्त’ के जो अंक छपे, वे कविता को लेकर थे।’ उनके अनुसार—‘लघुकथा को लेकर ‘अतिरिक्त’ की इतनी-सी गाथा है।’ लेकिन हम जानते हैं कि लघुकथा को लेकर ‘अतिरिक्त’ की यह  गाथा ‘इतनी-सी’ न होकर ‘बहुत-बड़ी’ है, अपने आप में एक इतिहास है।

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