रविवार, 25 जुलाई 2021

समकालीन लघुकथा : हास-परिहास बनाम गम्भीरता-2/बलराम अग्रवाल

 गतांक से आगे...

हास्य, व्यंग्य और विनोद-- ये जीवन के अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग हैं; अथवा कहें कि जीवन इनसे अलग नहीं है, तो अनुचित न होगा। प्रत्येक काल में इनका महत्व सदा अक्षुण्ण रहा है। जातक काल में भी मानव जीवन से इनका सम्बन्ध और उस सम्बन्ध की अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति तत्कालीन साहित्य में देखी जा सकती है। साहित्य में सरसता, सरलता व रोचकता का समावेश करने के लिए हास्य-विनोद अत्यन्त आवश्यक है। साहित्य में हास्य का इतना अधिक महत्व है कि उसे 'रस' माना गया है। साहित्य कैसा भी हो--धार्मिक, राजनैतिक या सामाजिक; उसमें जीवन को व्यक्त करने वाले इन तत्वों का होना नैसर्गिक है।

जातक-साहित्य में धर्मोपदेशों की प्रधानता है। बुद्ध ने स्वानुभूत सार तत्व को जन-सामान्य के कल्याण के लिए प्रसारित व प्रचारित किया। यह धर्मोपदेश जातक कथाओं के माध्यम से भी जन-जन तक पहुँचा। इस दृष्टि से देखेँ तो स्पष्ट हो जाता है कि जातक-साहित्य धार्मिक-साहित्य है। कल्पना जहाँ काव्य को मोहक रूप प्रदान करती है, वहाँ हास्यादि भी इस मनोरमता की वृद्धि ही करते हैं। हास्यादि तत्व ऐसे हैं जिनसे पाठक के मन पर अमित प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि हास्य-व्यंग्य और विनोद से परिपूर्ण जातक कथाएँ मानव-मन को प्रभावित करने वाली हैं।

भगवान बुद्ध का यह प्रयास था कि शील और सदाचार के मार्ग पर जनता आ सके। इसके लिए जन-सामान्य को बाध्य नहीं किया जा सकता था किन्तु मानव मन की सहज प्रवृत्ति को आकर्षित करके धर्मोपदेश ग्रहण कराए जा सकते थे। अत: इस कार्य को हास्यादि पूर्ण जातक कथाओं ने सफलतापूर्वक पूर्ण किया। बुद्ध ने अपने सिद्धान्तों, मान्यताओं, शिक्षाओं को घटनाओं, संवादों और परिस्थितियों के माध्यम से प्रकाशित किया। उन्होंने प्रकारान्तर से अन्य सिद्धान्तों का खंडन किया। वस्तुत: जातक चासनी चढ़ी कुनैन की तरह हैं, जिसे श्रोता व पाठक धैर्यपूर्वक ग्रहण कर लेता है। यह चासनी है, हास्य, व्यंग्य व विनोद की। इसके अतिरिक्त अन्य सिद्धान्तों व विधर्मियों तथा विपक्षियों की मान्यताओं पर व्यंग्य करना भी जातककार का लक्ष्य है। इनमें भावनाओं व क्रियाओं में मूर्खता दिखाकर उपहास भी किया है । जातक कथाएँ इस दृष्टि से अत्यन्त रोचक, सार्थक, सोद्देश्य व मनोरम बन गई हैं ।

'पालि जातकावलि' के प्रथम जातक 'सुंसुमार जातक' में बन्दर व मगर का परस्पर वैर तथा बन्दर की प्रत्युत्पन्नमति और मगर की स्थूल बुद्धि का सुन्दर चित्रण किया गया है। मगर का अपनी स्थूल बुद्धि से बन्दर को हरे-भरे प्रदेश में ले जाने का लालच देकर उसे मार डालने का प्रयास करना और बन्दर को मालूम होने पर उसके द्वारा मगर का ठगा जाना, हास्य, विनोद व व्यंग्य का सुन्दर उदाहरण है ।

"हे मगर, तुम्हारा शरीर ही बड़ा है, बुद्धि नहीं। तुमको मैंने ठग लिया अब कहीं और जाओ।" बन्दर के इस संवाद के द्वारा मूर्ख व विपक्षियों का उपहास भी ज्ञात होता है कि केवल शरीर बड़ा होने से ही बुद्धि तीक्ष्ण नहीं होती और ऐसे व्यक्ति घोखा ही खाते हैं। 

'चानरिन्द जातक' में भी वानर और कुम्भील के संवाद अत्यन्त हास्यपूर्ण, चुटीले तथा व्यंग्यात्मक हैं, जो पाठक को न केवल चमत्कृत ही करते हैं अपितु उसे हँसाते भी हैं। पत्थर से वार्तालाप करने की कल्पना भी कितनी रोचक है। देखिए–"हे पत्थर, क्या आज जवाब नहीं दोगे ?" फिर से, "हे पत्थर, क्यों मेरी बात का  आज जवाब नहीं देते हो?"

कुम्भील ने सोचा कि 'अन्य दिनों में यह पत्थर इस वानर को जवाब देता होगा' अतः आज मैं जवाब दूँगा।"

कुम्भील यह न सोच सका कि पत्थर कैसे बोल सकता है! एक सामान्य-सा सिद्धान्त है कि असत्य से सत्य को जाना जा सकता है। यह सिद्धान्त यहाँ भी लागू दिखाई देता है। वानर इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण व्यवहार से कुम्भील की कपटता को जान लेता है ।

अंत में कुम्भील उसकी प्रशंसा भी करता है--"हे वानर, जिसको तेरे समान ये चारों धर्म प्राप्त हैं—सत्य, धर्म, धृति और त्याग, वह शत्रु को जीत लेता है।" इस प्रशंसा से शत्रु का उपहास (स्वयं द्वारा) जहाँ स्पष्ट है, वहाँ प्रत्युत्पन्नमतित्व व विनोद की झलक भी मिलती है ।

जातक कथाओं में इस प्रकार के प्रसंगों की कमी नहीं है । 'बक-जातक' में भी हास्य और विनोद का पुट अत्यन्त सुन्दर है। केकड़े और बगुले का मामा-भानजे का सम्बन्ध व तदनुरूप वार्तालाप शुद्ध हास्य की सृष्टि करता है । इतना ही नहीं बगुले की मरण-भयभीत दशा का वर्णन भी अत्यन्त विनोदकर है ।

सम्पूर्ण जातक हास्य व विनोद का वातावरण उपस्थित करता है ।

'सोहचम्म जातक' में भी विनोद की पर्याप्त सामग्री है। बनिये का गधे को सिंह चर्म पहनाकर खेतों में छोड़ देना और स्वयं विश्राम करने का प्रसंग अत्यन्त विनोदपूर्ण है। किन्तु गधे की आवाज से किसानों का भय दूर होना और फिर उसकी पिटाई होना, ये सभी हास्यपूर्ण स्थितियां तो हैं ही, साथ ही नीति सिद्धान्तों की पोषक भी हैं। 'भले बुरे सब एक से जब लौं बोलत नाहि'--इसका सुन्दर उदाहरण है यह जातक ।

'न-च-जातकं' में भी हास्य की झलक है। व्यक्ति कभी-कभी अति प्रसन्न होकर ऐसे कार्य कर डालता है, जिसके कारण वह उपहास का पात्र तो बनता ही है, अन्यों के लिए हास्य की स्थिति भी उत्पन्न करता है। मोर की जब बहुत प्रशंसा होती है और हंस की बेटी उसे पति रूप में पसन्द करती है, तो प्रसन्नता के अतिरेक में मोर सब-कुछ भूलकर नाचने लगता है और वह नाचते-नाचते नंगा हो जाता है, जिसके फलस्वरूप न तो उसे हंसदुहिता मिलती है और न प्रशंसा।

"वाणी मनोज्ञ है, पीठ सुन्दर है, गर्दन वैदूर्य मणि के समान है तथा चार हाथ लम्बी पाँखें हैं, किन्तु नाचना आने मात्र से तुझे मैं अपनी पुत्री नहीं दूँगा।"

'उलूक जातक' के द्वारा भी हास्य उत्पन्न होता है। काक का यह कहना कि—"देखो, राज्यभिषेक के समय इसका (उल्लू का) मुख ऐसा है, इसके क्रोधित होने पर कैसा होगा ?" उपहासात्मक तो है ही; अदर्शनीय व्यक्तियों पर व्यंग्य भी है ।

'चम्मसारक-जातक' तो वस्तुतः शुद्ध हास्यपूर्ण है। किसी परिव्राजक का मेढ़े को अपना आदर-सत्कार करने वाला समझना हास्यपूर्ण ही है। मेंढ़ा पीछे हटता है उसे मारने के लिए वह उसे आदरसूचक समझकर कहता है--"यह पशु उत्तम स्वभाव का है । सुन्दर और प्रिय आचरण वाला है, जोकि जाति और मंत्र से युक्त ब्राह्मण का सत्कार कर रहा है। यह श्रेष्ठ और यशस्वी मेंढा है।"

परिव्राजक की यह गाथा पाठक को हंसी से लोट-पोट कर देती है।

इसके अतिरिक्त 'वैदब्भ जातक', 'उच्छंगजातक', आदि के द्वारा भी हास्य व विनोद की झलक प्राप्त होती है ।

विवेचन के आधार पर सहज ही हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जातकों में हास्य, विनोद व व्यंग्य के वातावरण के द्वारा रोचकता, नवीनता, ग्राह्यता का समावेश स्वतः ही हो गया है। हास्यादि का जातकों में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है, यह निर्विवाद है ।

(डॉ. पुष्पा अग्रवाल की पुस्तक 'पालि साहित्य का इतिहास', पृष्ठ 69-73 से साभार)

नोट : नि:सन्देह, इस लेख में कुछेक जातक कथाओं को उद्धरण स्वरूप प्रस्तुत किया गया है, लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि हास्य, व्यंग्य व विनोद आदि केवल जातकों का ही विषय रहे हैं अथवा हैं।--बलराम अग्रवाल 

समकालीन लघुकथा : हास-परिहास बनाम गम्भीरता-1/बलराम अग्रवाल

अस्सी के दशक में एक शिगूफा खूब चला था--जिस लघ्वाकारीय कथा में हास्य-व्यंग्य हो, वह लघुकथा और जिसमें गम्भीरता हो, वह लघु-कहानी।

वह दौर बहुत पीछे छूट गया। यहाँ तक कि शिगूफा छोड़ने वाले भी, मरे मन से ही सही, थक-हारकर रुख बदल बैठे। लघुकथा-लेखन से जुड़ी पीढ़ियों में गत सदी के आठवें दशक से लेकर इस सदी के दूसरे दशक तक, कुल पाँच दशक की भिन्न-भिन्न पीढ़ियों के लेखक-आलोचक विद्यमान हैं। इनमें पुरानी पीढ़ी के जिन लोगों ने लघुकथा सम्बन्धी अपने मन्तव्य को प्रारम्भ से ही स्पष्ट रखा है, उनमें  भगीरथ परिहार,  अशोक भाटिया,   रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, सुकेश साहनी, सतीश राठी का नाम लिया जा सकता है। जगदीश कश्यप का मन्तव्य भी स्पष्ट था लेकिन वे कुछेक दुर्भावनाओं के चलते अनर्गल वक्तव्य देने और अपनी पीढ़ी के लेखकों को नीचा दिखाने के प्रयासों से बाज नहीं आते थे। उनकी इस दुष्प्रवृत्ति ने लघुकथा के साथ-साथ स्वयं उनका भी कम नुकसान नहीं किया। आठवें दशक के प्रति वह इतने अधिक मोहित थे कि नवें दशक पर कम ही बात करते थे; लेकिन एक बार उन्होंने नवें दशक के लघुकथा-कार्यों का श्रेय स्वयं को ही देने का प्रयास भी किया था। बहरहाल, अपने आप को आगे रखने की उनकी कमजोरी को नजरअंदाज कर दिया जाए तो लघुकथा को लेकर उनके मन्तव्यों की स्पष्टता को नकारा नहीं जा सकता।

अभी, एक आलोचना पुस्तक पढ़ते हुए 'आधुनिक लघुकथा में गम्भीरता है न कि हास-परिहास' उपशीर्षक से निम्न पैरा पढ़ने में आया :

भारतेन्दु हरिशचन्द्र की 'परिहासिनी'  से  उद्धृत 'अंगहीन धनी' में एक धनिक और उसके नौकर मोहना की कथा है। धनिक के पास उसके कुछ प्रतिष्ठित मित्र भी बैठे हैं। बत्ती बुझाने के लिए वह घण्टी बजाकर मोहना को बुलाता है। मोहना कमरे में आता है और बत्ती बुझाकर हँसते हुए कमरे से बाहर चला जाता है। दूसरे नौकरों द्वारा हँसी का कारण पूछने पर वह कहता है कि धनिक के पास पन्द्रह हट्टे-कट्टे जवान बैठे हैं पर किसी से भी बत्ती नहीं बुझी ।

हालांकि इसमें व्यंग्य है । एक घटना है। लघुता है। कसाव है। व्यंग्यात्मक अंत है। कम पात्र हैं। सरल और पात्रानुकूल भाषा है। वर्णनात्मक शैली है। रचना अनुसार शीर्षक है। ये सब होते हुए भी इसमें गम्भीरता नहीं है। ऐसा लगता है, जैसे हँसी-मजाक हो। भारतेन्दु जी ने यह रचना परिहास हेतु ही लिखी थी। इसलिए यह रचना लघुकथा की कई विशेषताओं को लिए हुए भी परिहास के कारण पूर्ण लघुकथा की कोटि में नहीं आती।

भारतेन्दु हरिशचन्द्र की एक अन्य रचना 'अद्भुत संवाद' भी 'परिहासिनी' से ही उद्धृत की गई है। यह संवाद शैली में है। दो ही पात्र हैं और इस रचना का उद्देश्य भी यह है कि सम्भ्रान्त परिवार के लोग स्वयं कार्य न करके दूसरों से लेना चाहते हैं। इसमें घोड़े वाले और दूसरे आदमी के आपसी संवाद हैं। इसमें भी लघुकथा के कुछ तत्त्व संवाद शैली, कसाव, सरल भाषा, लघुता, कम पात्र, प्रश्न शैली, एक घटना आदि स्पष्टतः दिखाई देते हैं किन्तु बातचीत में केवल मात्र हास-परिहास दिखाई देने के कारण इस रचना में गम्भीरता का लोप हो जाता है। आधुनिक लघुकथा गम्भीरता चाहती है न कि हँसी-मजाक।

सन्दर्भित  दोनों लघुकथाएँ:

1- अंगहीन धनी

एक धनिक के घर उसके बहुत से प्रतिष्ठित मित्र बैठे थे। नौकर बुलाने को घंटी बजी। मोहना भीतर दौड़ा, पर हँसता हुआ लौटा; और नौकरों ने पूछा, "क्यों हँस रहे हो?" तो उसने जवाब दिया, "भाई सोलह हट्टे-कट्टे जवान थे। उन सभों से एक बत्ती न बुझे, जब हम गए तब बुझे।"

2-अद्भुत संवाद

'ए जरा हमारा घोड़ा पकड़े रहो। "

"यह कूदेगा तो नहीं।"

"कूदेगा! भला कूदेगा क्यों ? लो संभाल लो।"

"यह काटता है ?"

"नहीं काटेगा, लगाम पकड़े रहो।"

“क्या इसे दो आदमी पकड़ते हैं, तब सम्हलता है?"

"नहीं।"

"फिर हमें क्यों तकलीफ देते हैं? आप तो हई हैं।"  

दोनों  का प्रकाशन सन्दर्भ : परिहासिनी, 1875

इन दोनों रचनाओं के साथ मैंने उक्त टिप्पणी को व्यापक विचारार्थ 'लघुकथा साहित्य' पर पोस्ट किया और प्रमुख रूप से निम्न प्रतिक्रियाएँ पाईं :

मनोरंजन सहाय : यदि कथा में लघुकथा के सभी तत्त्व मौजूद हैं तो केवल इस आधार पर कि इसे केवल हास्य के लिये लिखा गया है, उसे विधा विशेष की श्रेणी से बाहर रखना सहज  प्रतीत नहीं होता।

'अंगहीन धनी' शीर्षक कथा के अंत में नौकर का संवाद तो शीर्षक की सार्थकता का प्रतीक है।

दूसरी कथा के संवादों का पूर्ण ज्ञान नहीं हो पाया है।

आजकल तो मामूली से चुटकुलों पर और उन्हीं की भाषा में लघुकथाएँ लिखी जा रही हैं और साहित्यिक ग्रुप्स के मंचों पर सादर प्रकाशित-प्रसारित की जा रहीं है।

भारतेंदु जी का काल तो इस विधा का शैशवकाल ही था।

उमेश महादोषी : पहली बात तो लघुकथा मनोरंजक होकर भी गंभीर हो सकती है। दूसरे, अन्य विधाओं की तरह लघुकथा की भी विकास यात्रा को ध्यान में रखा जाना चाहिए। सम्पूर्णता में विकसित होने तक कई तत्वों का समावेश होता है। इसलिए उक्त दोनों रचनाओं को लघुकथा में स्वीकृति मिलनी ही चाहिए।

      जो मित्र लघुकथा को केवल गंभीरता के आधार पर चिन्हित करना चाहते हैं, उन्हें 'गंभीरता' को भी परिभाषित करना चाहिए।

बलराम अग्रवाल : कई गम्भीर बातें हँसकर भी कही जाती हैं और वह हँसी भीतर तक चीर डालने वाली होती है।

शुभ्रा झा : सर, कई बार अप्रत्यक्ष रूप मे गंभीर बात प्रत्यक्ष रूप से  हंसी-ठिठोली में भी प्रस्तुत होती है । भावों का प्रतिपादन महत्वपूर्ण है, माध्यम अलग हो सकते है ।

सतीशचन्द्र श्रीवास्तव  : जो बात गंभीरता से नहीं कही जा सकती, वही बात अक्सर हास-परिहास में बड़ी आसानी से कह दी जाती है।

इसलिए, मात्र हास-परिहास के कारण किसी लघुकथा को पूर्णतः लघुकथा नहीं माना जा सकता। ये बात गले नहीं उतरती, जबकि उसमें लघुकथा के सभी तत्व मौजूद हों। हास-परिहास भी अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण भाग है। इसे अन्यथा नहीं लिया जा सकता और नहीं इसके कारण किसी भी लघुकथा को खारिज या कमजोर कहना उचित होगा।

डॉ. श्याम गुप्त  : आधुनिक लघुकथा गम्भीरता चाहती है न कि हँसी-मजाक।—यह मानक किसने बनाया??---आधुनिक तथाकथित लघुकथाकार--लघुकथा व कथाकारों  को अपनी चेरी बनाकर रखना चाहते हैं---अन्यथा ऐसे कथन का कोइ औचित्य नहीं है---किसी भी विषय पर लघुकथा लिखी जानी चाहिए अन्यथा प्रगति रुक जायगी ...-

उपरोक्त दोनों कथाएं बहुत दूरस्थ सन्देश   देती हैं एवं मेरे विचार से सम्पूर्ण लघुकथाएं हैं --- अब कोइ यह न कहे कि लघुकथा में सरोकार नहीं होना चाहिए ---

डॉ. संध्या तिवारी : "आधुनिक कथा में गम्भीरता है न कि हास परिहास"--सबसे पहले तो मुझे यह शीर्षक  समझ नहीं आया।

"आधुनिक लघुकथा में गम्भीरता होनी चाहिए, न कि हास-परिहास"--यह शीर्षक कुछ ऐसा होना चाहिए था।

चूंकि ये लघुकथाएं भारतेन्दु जी की हैं और यह बात जग-जाहिर है। इसलिए इसे कोई भी काटेगा नहीं।

परन्तु यह किसी गुमनाम लेखक की होती तो यहां अखाड़ा खुद गया होता।

उपरोक्त टिप्पणियों में जो बात निकलकर आई,  वह ठीक है कि जो रचना की गई उस पर देशकाल वातावरण आदि का जबरदस्त प्रभाव होता है और जब ये लघुकथाएं लिखी गई होंगी तो कहने-सुनने की इतनी आज़ादी नहीं रही होगी, जितनी आज है। उस समय को देखते हुए ये कथायें स्तरीय हैं, लेकिन हमेशा से ही क्लासिक की अपनी पहचान अपनी मांग रही है। ये लघुकथाएं लघुकथा की श्रेणी में भले ही हों, क्लासिक नहीं हैं, और जिसने भी आलोचनात्मक टिप्पणी की है उसका मानना क्लासिक लघुकथा से रहा होगा।

किसी भी विधा में कोई भी विधा घुसपैठ बना लेती है। शर्त इतनी है कि पैबंद सरीखी अलग से न छिकी हो।--ऐसा मेरा मानना है।

कांता रॉय (संध्या तिवारी की टिप्पणी पर प्रश्न) : जी, मेरा भी प्रश्न यही है कि अगर यह किसी नए रचनाकार ने लिखा होता तो क्या वह स्वीकार्य होती? 

संध्या तिवारी (प्रत्युत्तर) : कान्ता रॉय जी, बिल्कुल। लेकिन आज में और भारतेंदु युग में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है। आरंभ में सृजन उतना परिपक्व नहीं होता, लेकिन आगे की पीढ़ियां यदि वहीं दोहराती रहें तो विधा का विकास कैसे होगा, और विधा के विकास के लिए आने वाली पीढ़ी को उसमें सुन्दरता, कुछ नई बात , कुछ तकनीक के स्तर पर गुणवत्ता, शब्दों का चयन, अर्थ गाम्भीर्य और भावों की गहनता मानीखेज हो जाती है।

इसलिए आज यदि कोई लघुकथा साधक ऐसी रचना लिखे तो हास्य का पात्र तो होना ही चाहिए।

कांता रॉय (प्रतिप्रश्न) : आज के संदर्भ में जब इसकी चर्चा करें तो वर्तमान परिदृश्य को भी साथ लेकर बात करें। अन्यथा ऐसी रचनाएं पढ़कर नई पीढ़ी गफलत में पड़ सकती है।

बलराम अग्रवाल (प्रत्युत्तर) : ऐसी रचनाएँ ससन्दर्भ पढ़ी जाती हैं। उसके बाद भी यदि कोई गफलत में पड़ता है तो बेशक पड़ा करे।

विरेंदर वीर मेहता : इस पोस्ट पर टिप्पणी करने से पहले सर्वप्रथम यह विचार करना भी जरूरी होगा कि किसी रचना पर किसी गंभीर आलोचक की टिप्पणी को एक सिरे से नकारा जाना एक अच्छी परंपरा नहीं होती। साथ ही टिप्पणी किस काल और किस नजरिए से की जाती है, उसका भी अपना एक महत्व है। 

बहरहाल इस टिप्पणी के संदर्भ में एक बात अवश्य ही स्वीकार योग्य नहीं है कि आधुनिक लघुकथा में गम्भीरता है हास-परिहास नहीं।  

प्रस्तुत दोनों लघुकथाओं भले ही एक व्यंग्य के साथ समाप्त होती है लेकिन उनके शीर्षक की गहराई में देखा जाए तो न केवल कथा के अंत में किए गए हास्य जनित व्यंग्य में कहे गए अनकहे की गूंज सुनाई देती है बल्कि इस कथा को गंभीर कथा की श्रेणी के समकक्ष रखने के योग्य भी कही जा सकती है।

रजनीश दीक्षित  : गंभीरता की वजह से रचना को लघुकथा श्रेणी में मान्यता मिलना और हास्य का पुट होने से लघुकथा की श्रेणी से बाहर कर देना, लघुकथा पर एक और अंकुश लगाने वाली बात हो गई।

पुष्पा जगुआर : चूकि भारतेंदु जी अपने काल को दोनों लघुकथाओं में  स्पष्ट रूप से हास्य -परिहास के द्वारा प्रत्यक्ष किया है, जहाँ पूर्ण स्वतंत्रता नहीं होती है वहाँ व्यंग्यात्मक शैली की तेवर आते हैं।अतः लघुकथा में शीर्षक से लेकर सारे तत्व मौजूद होते हुए भी गम्भीरता का लोप है, किन्तु सामंतवादी परम्परा की बात खुल कर आया है।  जिसे 'अंगहीन धनी' और 'अद्भुत संवाद'  में हास्य परिहास के द्वारा नौकर का आत्मिक दर्द और उस आदमी का आत्मिक  विद्रोह साफ व्यक्त हुआ है। लघुकथा को लघुकथा के मानक न मानना अपनी परिभाषा की कसौटी पर तौलना है। बावजूद इसके, कुछ हो न हो लघुकथा के बीज तो है ।

राजश्री झा : अंगहीन धनिक संपुट लोक लघुकथा हैं, सभी पुट, अलग-अलग उद्देश्यों को कहती, परिहास्य की उत्तरोत्त क्षणिकता प्रदेय है, पात्र-विमर्श है।

अब, इस सम्बन्ध में  'पालि साहित्य का इतिहास' पुस्तक में  लिखित डॉ. पुष्पा अग्रवाल का यह आलेख प्रस्तुत है :

                        आलेख आगामी अंक में...