मंगलवार, 5 मार्च 2024

आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र की लघुकथाएँ, भाग-4 / बलराम अग्रवाल

 ‘कवि-हृदय कथाकार आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र’ शीर्षक से डॉ॰ ॠचा शर्मा द्वारा सम्पादित ‘आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र रचनावली, भाग-1 (लघुकथाएँ-बोधकथाएँ / प्रथम संस्करण 2024) में भूमिका स्वरूप संकलित आलेख की चौथी, समापन किस्त…

दिनांक  01-3-2024 को प्रकाशित तीसरी किस्त से आगे……

इस संग्रह में गुरु-शिष्य संवाद की इतनी कथाएँ हैं कि ‘गुरु-शिष्य संवाद’ शीर्षक से एक स्वतन्त्र संग्रह की सम्भावना को शक्ति प्रदान करती हैं। ‘बाल-सूर्य’, ‘तब कोई बात नहीं’, ‘अन्तिम शरण’, ‘आगा-पीछा’, ‘नया आविष्कार’, ‘पूर्णत्व’, ‘निर्बलता की मौत’, ‘अन्तर-निर्देश’ इस संग्रह अन्य सशक्त रचनाएँ हैं।

आचार्य मिश्र का कथाकार मन मनुष्यों की बात ही न करता हो, ऐसा नहीं है। वे दरअसल, धर्म-दर्शन और इहलोक दोनों के मध्यमार्गी कथाकार हैं। उदाहरणस्वरूप देखिए, उनकी यह बोध-कथा ‘मध्यम-मार्ग’—

नीचे धरातल पर रेलगाड़ी जा रही थी, बहुत ऊपर आकाश में एक हवाई जहाज और बीच मध्य आकाश में एक श्वेत कपोत क्रीड़ा कर रहा था।

नीचे से रेल ने पुकारा—आओ, भद्र! तुम मुझे बहुत अच्छे लग रहे हो। नीचे का धरातल बहुत ही सुहावना होता है। मैं इसी से तो दिन-रात इसके वक्ष से लगी-लगी चला करती हूँ। मेरे निकट आओ, तुम्हें भी मैं अपने साथ लेकर चलूँगी?

ऊपर से हवाई जहाज ने कहा—आओ भद्र। तुम मुझे बहुत प्रिय हो। अत्यन्त श्वेत, निर्मल तुम्हारी काया है। संसार में बहुमूल्य वस्तुएँ सबसे ऊपर ही रहा करती हैं। इसी से तो मैं दिन-रात ऊपर ही ऊपर उड़ा करता हूँ। मैं तुम्हें, तुम जहाँ हो, उससे भी ऊपर ले चलूँगा?

कपोत ने एक बार नीचे देखा, एक बार ऊपर, फिर दो क्षण बाद कहा—सखि! सखे! मैं तो मध्यम-मार्ग का अनुयायी हूँ। नीचे आता हूँ तो मेरा आत्मसम्मान जाता है; ऊपर आता हूँ तो मेरा अहंकार जागता है।

‘उड़ने के पंख’ (प्र. सं.1960) आचार्य मिश्र की 66 बोधकथाओं-लघुकथाओं का संग्रह है। फुटनोट के अनुसार ‘लघु-बोधकथा तथा हिन्दी साहित्य में उसकी उपलब्धि की सम्भावना’ शीर्षक जयकुमार ‘जलज’ के ‘जागरण’ में प्रकाशित लेख को इसकी भूमिका के रूप में अपनाया गया है। जैसाकि ऊपर कपोत ने कहा, नीचे आने पर उसका आत्मसम्मान जाता है और ऊपर आने पर अहंकार जागता है; इसलिए वह मध्य-मार्ग का अनुसरण करता है। कथाओं के स्वरूप को देखें तो आचार्य मिश्र निचले, मध्य और ऊपरी—तीनों मार्गों के कथा लेखक ठहरते हैं। उड़ने के पंख में संग्रहीत उनकी ‘मानवीय धर्म’ शीर्षक लघुकथा देखिए—

एक अंग-रक्षक ने डरते-डरते एक मिनिस्टर से पूछा—स्वामिन्। आप लोग अपने प्राण भय से सब समय सशंकित क्यों रहा करते हैं? सुना है, देश-भक्त तो सदा अपने प्राणों को हथेली पर लिये संसार में निडर घूमा करते हैं?

मिनिस्टर महोदय ने क्रोध से उत्तर दिया—अरे, जान पड़ता है, तू बधिर है? हमने अनेक बार तो अपने भाषणों में घोषणा की है कि हमारा सर्वस्व हमारा नहीं, जनता का है; तन भी, मन भी, धन भी और प्राण भी। फिर दूसरों की धरोहर की, यत्न से सब समय रक्षा करना, क्या मानवीय धर्म नहीं है?

इस कथा में करारा व्यंग्य है। भाषा, शिल्प, शैली अपने समय की संस्कृतनिष्ठ है इसलिए अग्राह्य लग सकती है; अन्यथा लगभग यही कथ्य आज भी लघुकथा में अपनाये जा रहे हैं। भाषा में संस्कृतनिष्ठता की बात करें तो आचार्य मिश्र की ‘कला का उपभोक्ता’ शीर्षक रचना का यह पहला पैरा पढ़ें—‘एक गृह-निर्माण-कला-विशारद एक धनिक की विशालकाय अट्टालिका का निर्माण कर जब उससे नीचे उतरा तो अपनी जीर्ण-शीर्ण पर्ण-कुटी में विश्राम के लिये जा बैठा।’ इस भाषा में आचार्यत्व के दर्शन होते हैं। अक्टूबर 1958 में इस कथा की रचना हुई है। तब तक इस भाषा के प्रयोग से हिन्दी लगभग मुक्त हो चुकी थी। सुदर्शन की लघुकथाओं का संग्रह ‘झरोखे’ 1947-48 में आ चुका था जो सरल हिन्दुस्तानी भाषा में है। विष्णु प्रभाकर, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, रावी और हरिशंकर परसाई भी उक्त काल में लघुकथाएँ लिख रहे थे, लेकिन संस्कृतनिष्ठ हिन्दी में नहीं। आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र की भाषा संस्कृतनिष्ठ है। ‘आचार्य मिश्र की कहानी कला’ शीर्षक ‘पंचतत्व’ की भूमिका में श्रीयुत् प्रकाश चन्द्र गुप्त ने लिखा है—‘इन रचनाओं में कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि उनकी आत्मा कहानी की अपेक्षा काव्य के अधिक निकट है। हिन्दी कहानी के इतिहास में विशेष रूप से दो प्रवृत्तियाँ परिलक्षित होती हैं। ‘प्रसाद’ की काव्यमय शैली और प्रेमचन्द की यथार्थवादी, आदर्शोन्मुखी शैली। इन दोनों धाराओं ने हिन्दी कहानी को समृद्ध किया है। आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र ‘प्रसाद’ के ‘रोमैन्टिक स्कूल’ के अनुयायी हैं।’ दर्शन और राग के काव्य मिश्रित गुण से सम्पन्न रचना ‘अचल की अनुभूति’ देखें—

एक सद्यविवाहिता सुन्दरी प्रियतमा-पत्नी ने अपने पति को अपनी कोमल भुजाओं में लपेटते हुए कहा—प्रियतम, यदि नारी के ये दो क्षण जीवन में किसी तरह अचल हो जाते!

उसके पति ने उत्तर दिया—प्रिय, यदि ऐसा हो जाता तो नारी और पुरुष दोनों संसार में एक प्रकार के पाषाण होकर रह जाते; न उनमें सुखाभास रहता, न दुखाभास।

डॉ. रामकुमार वर्मा ने ‘खाली भरे हाथ’ की भूमिका में लिखा है—‘बोध कथाओं में कथा तत्व कम और ज्ञान तत्व अधिक रहता है। संक्षिप्तता बोध कथा का प्रमुख गुण है; किन्तु इस संक्षिप्तता में जीवन की व्यापकता मुखरित होती है। आचार्य मिश्र जी की लघुकथाओं में जीवन के गहन और व्यापक तत्व सूक्ष्मता के साथ स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त हुए हैं और उनकी ‘बोध कथाएँतो हिन्दी साहित्य को अपने प्रकार की पहिली और ऐसी अनूठी देन हैं जो मानवता के प्रकाश स्तम्भ की भाँति समाज का मार्ग सदैव ही आलोकित करती रहेंगी।’ इस सन्दर्भ में प्रस्तुत है आचार्य मिश्र की लघुकथा ‘धरती के प्राणी, आकाश की उड़ान’—

एक विमान को आकाश में उड़ते देख एक बालक ने अपनी माता से पूछा—अम्मा! यह क्या है?

माता ने उत्तर दिया—पुत्र! विमान। वह नित्य आकाश में उड़ा करता है। जो आकाश में उड़कर इधर-उधर जाना चाहते हैं, उन्हें बिठाकर आकाश में ले जाया करता है।

बालक ने फिर पूछा—अम्मा। जो धरती के प्राणी है, वे आकाश में क्यों जाना चाहते हैं?

माता ने उत्तर दिया—पुत्र! शायद वे धरती पर न रहना चाहते हों?

बालक ने फिर पूछा—तो क्या अम्मा! वे यह नहीं जानते, धरती के प्राणी धरती पर रहकर ही फल-फूल सकते हैं?

जानते तो हैं, पुत्र।माता ने उत्तर दिया—फिर भी वे शायद ऐसा समझते हों, हम किसी दिन इस धरती को भी अपने साथ आकाश में विमान की तरह ले उड़ेंगे!

‘उड़ने के पंख’ में बोध-कथाओं की प्रधानता है। आचार्य मिश्र की कथाएँ वस्तुत: कवि के हृदय से उद्भूत कथाएँ हैं। उनके गद्य में काव्य का प्रभाव और प्रवाह दोनों हैं। उनकी बोधकथाओं और लघुकथाओं दोनों में काव्यत्व है। ‘मित्र के लक्षण’ उनकी एक अलग तरह की उल्लेखनीय रचना है।

‘मिट्टी के आदमी’ (प्र. सं.1966) के आवरण पर पाठकों के लिए एक महत्वपूर्ण सूचना आचार्य मिश्र ने दी है—‘संसार की विभिन्न भाषाओं में अनूदित अभूतपूर्व व्यंग्य लघुकथाएँ’। इनमें कौन-सी लघुकथा कब, किस भाषा में अनूदित हुई, यह उल्लेख कहीं नहीं है। बहरहाल, इस आधार पर इन लघुकथाओं का व्यंग्य के क्षेत्र में भी समुचित सम्मान किया जाना चाहिए था, जो सम्भवत: नहीं हुआ। प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित इस संग्रह, में 32 लघुकथाएँ हैं। इनमें  ‘स्त्री-पूजा’ स्त्री-विमर्श की उत्कृष्ट प्रगतिशील लघुकथा है, भले ही इसको एक दैवी पात्र के माध्यम से दृष्टान्त-शैली में लिखा गया है। ‘जन-हित,जन-सेवा’ तथा  ‘मिट्टी के आदमी’ भी उत्कृष्ट कथाएँ हैं। ‘मिट्टी के आदमी’ में जीवित मनुष्यों में एक चेतना-विशेष की कमी के दर्शन पागल दिखने वाला पात्र राजा को कराता है। ‘नयी विद्या का उपदेश’ का सेठ यजमान अपने विद्वान पुरोहित से कहता है कि आप मुझे यह सिखाइए कि—‘यजमान! अपनी ही चिन्ता किया कर। अपना ही पेट भरा कर। स्वार्थ ही इस कलिकाल में मनुष्य जीवन के सुख का मूल है। परमार्थ की बात सोचेगा तो भूखा मर जायेगा। व्यापार बिगड़ जायेगा। साहूकारा टूट जायेगा। रही पाप-पुण्य के स्पर्श की बात ? उसके धोने वालों की तो आज संसार में कमी नहीं! पर, जिनका पेट भरा होता है. उनके पास ये बिना बुलाये ही दौड़ आते हैं, घोर भूखों के पास बार-बार बुलाने पर भी तो कभी नहीं जाते।’ वर्तमान सामाजिक चाल-चलन की दृष्टि से यह एक व्यवहारिक शिक्षा है। ‘आतिथ्य-लाभ’ मित्र की लम्पटई को सामने रखती है और सामान्य गृहस्थ को सावधान करती है। ‘जन-हित, जन-सेवा’ का कथ्य आज के भारत की राजनीतिक स्थिति से उठाया गया लगता है, जबकि इसका रचनाकाल 1966 के आसपास का है। ‘नया सम्बन्ध’ और ‘अन्धों का संग’ विशुद्ध व्यंग्य कथाएँ हैं। ‘तीन दिन का दुर्भाग्य’, ‘तीसरे पैर का खोट’, ‘वनराज का पीलिया’, ‘संसार का नियम’, ‘अमृत की घूँट’, ‘अमृत और विष’ उत्कृष्ट बोध-कथाएँ है। ‘भाई-भाई’ में आचार्य मिश्र ने स्त्रियों के एक मनोविज्ञान को सामने रखा है; यहकि स्त्री अपना सब-कुछ लुटते देख सकती है, आभूषण नहीं। जब तक चोर घर की अन्य वस्तुएँ चुरा रहा था, तरुणी भार्या अपने जार के साथ डरी-सहमी खड़ी रही। जैसे ही चोर ‘एक-एक कर उस घर की स्वामिनी के प्रिय आभूषण निकालने लगा तो उस समय वह अपनी वर्तमान (यानी पति की अनुपस्थिति में प्रेमी के साथ होने की) स्थिति को सर्वथा भूल गई और जिस जगह खड़ी थी, वहीं बड़ी-बड़ी जोर-जोर से चिल्लाने लगी—‘हाय, रे! मैं तो आज बुरी तरह लुट गई।’ परिणामत:  चोर तो भागा ही, डर के मारे उसका प्रेमी भी भाग खड़ा हुआ। इस संग्रह की अनेक रचनाएँ लघुकथा के बजाय शॉर्ट स्टोरी हैं। ‘केले और सेव की प्लेट’ सरीखी अनेक रचनाओं में व्यंग्य के साथ-साथ हास्य का भी पुट है।

इसप्रकार, अनेक विविधताओं से युक्त कथा-लेखन प्रस्तुत कर हिन्दी लघुकथा साहित्य को समृद्ध करने वाले आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र लघुकथा के महत्वपूर्ण पूर्वज सिद्ध होते हैं। उनकी लघुकथा-चेतना के पुनर्पाठ, पुनर्आलोचन की आवश्यकता तो है ही, उन पर शोध की दृष्टि से भी अनेक कार्य होने चाहिए। अस्तु।

लेखक सम्पर्क : एफ-1703, आर जी रेजीडेंसी, सेक्टर 120, नोएडा-201301 (उप्र) /

मोबाइल : 8826499115

शुक्रवार, 1 मार्च 2024

आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र की लघुकथाएँ, भाग-3 / बलराम अग्रवाल

‘कवि-हृदय कथाकार आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र’ शीर्षक से डॉ॰ ॠचा शर्मा द्वारा सम्पादित ‘आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र रचनावली, भाग-1 (लघुकथाएँ-बोधकथाएँ / प्रथम संस्करण 2024) में भूमिका स्वरूप संकलित आलेख की तीसरी किस्त…

दिनांक 26-02-2024 को प्रकाशित दूसरी किस्त से आगे……

युग की ज्वलन्त समस्याओं का आग्रह था कि साहित्य, कविता, कला नव-संस्कृति की प्राण-प्रतिष्ठा में अपना जीवन्त सहयोग दें। पूँजीवादी प्रतिस्पर्द्धा में संसार की सम्पत्ति एक छोटे से वर्ग के अधिकार में है और पूँजीवादी शोषण धनी और निर्धन के बीच में खाई बना रहा है। समाज में सर्वहारी और सर्वहारा में भीषण संघर्ष है। व्याधिग्रस्त, संघर्ष-ध्वस्त खंडित-पीड़ित मानवता की ओर अब कवि/कथाकार ने दृष्टिपात किया। चिरकाल से कविता/कथा का प्रेय-श्रेय वर्ग-विशेष और व्यक्ति-विशेष रहा। अब उसने सामान्य मानवता का वरण किया। अब कविता/कथा ने अपना आराध्य सर्वहारा को बनाया।

मैं कवि/कथाकार और कविता/कथा का उल्लेख कर रहा हूँ क्योंकि ये कथाएँ अपनी प्रकृति में अपने समय के काव्य के ही अधिक निकट ठहरती हैं।

लघुकथा संग्रह ‘खाली-भरे हाथ’ (प्र. सं.1958) में 72 लघुकथाएँ संग्रहीत हैं। ‘खाली-भरे हाथ’ शीर्षक से पूर्व संग्रह ‘पंचतत्व’ के ‘बोध-कथाएँ’ खंड की अन्तिम कथा भी है। इससे यह अनुमान अनायास ही सामने आ खड़ा होता है कि इस संग्रह की लघुकथाओं पर बोध-कथाओं की छाया हो सकती है। इस संग्रह की ‘बोध कथाएँ’ शीर्षक से लिखित भूमिका में डॉ. रामकुमार वर्मा ने लिखा है— ‘संस्कृत साहित्य में ‘हितोपदेशऔर पंचतन्त्रकी कथाओं में लघुकथाओं का रूप स्पष्ट हो सका है। इन कथाओं में प्रधान रूप से कथात्मक तत्व कम और जीवन के लिये बोध तत्व ही प्रधान है। जीवन के शाश्वत तथ्यों से सम्बन्धित प्रश्नों का मनोरंजनपूर्ण हल है, जो साधारण रूप से ग्राह्य है। इन सब कथाओं के बोध-तत्व व्यवहारिक हैं; किन्तु आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र की रचनाओं में उनसे कहीं अधिक बोधगम्य अभिव्यक्तियाँ और सरलतापूर्वक ग्राह्य सत्य की अभिव्यक्ति हैं। उनकी लघुकथाएँ युग के मानव के विभिन्न पार्श्वों को लेकर चली हैं। वर्तमान की अभिव्यक्ति में ही वे संस्कृत साहित्य की लघुकथाओं से विशिष्ट कोटि की हैं। उनमें युग-मानव का सत्य साकार हो उठा है।’ मात्र 41 शब्दों में लिखित इसकी ‘आत्म-लक्ष्य’ शीर्षक रचना से यह कथन सिद्ध भी होता है। देखिए—

एक व्याथ ने अपने तीक्ष्ण शर से विद्ध तड़फड़ाते हुए हरिण के पास जाकर उल्लास से कहा—अहा! देखा मेरा अचूक निशाना?

तड़फते हुए हरिण ने अपने प्राण छोड़ते हुए भग्न स्वर में कहा—बन्धु! एक बार अपने लगाकर तो देख!

क्योंकि ये बोध-कथाएँ हैं, इसलिए इनमें से बहुत-सी कथाओं के पात्र मूर्त-अमूर्त मानवेतर भी हैं। इन कथाओं के सन्दर्भ में ‘बोध’ से तात्पर्य निरा बोध नहीं है; बल्कि विद्रोह के स्वर भी इनमें छिपे पड़े हैं। देखिए, मात्र 65 शब्दों में कही गयी ‘जीने का मन्त्र’ शीर्षक यह कथा—

खट्-खट् करती खड़ाऊँ से एक दिन उसके स्वामी पंडित ने पूछा—भद्रे! क्या बात है, कि पैरों के नीचे इतना दबे रहने पर भी आज तक तुम्हारा स्वर मन्द नहीं हुआ?

खड़ाऊँ ने पैरों के नीचे दबे-दबे ही उत्तर दिया—मैं तो जीना चाहती हूँ, पण्डित! संसार में, जो किसी से दबकर अपना स्वर मन्द कर देते हैं, वे जीते नहीं, मर जाते हैं!                                                      

इस बोध-कथा को पढ़कर एकाएक अपनी ही एक कविता याद हो आयी। उसका एक अंश यों है—

जूता,

जो चरमराता है,

मर्द का पाँव काट खाता है।

ये उसका

अपना तौर है यारो,

ये बगावत का दौर है यारो!

शंकराचार्य ने कहा था—‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ अर्थात् मात्र ब्रह्म ही सत्य है, सम्पूर्ण जगत् मिथ्या है। सवाल यह पैदा होता है कि सत्य ब्रह्म ने मिथ्या जगत् की रचना क्यों की अथवा सत्य ब्रह्म से मिथ्या जगत् कैसे उपजा? दूसरे, क्या सत्य से असत्य यानी मिथ्या उत्पन्न हो सकता है? आचार्य मिश्र ने इस प्रकरण को आधार बनाकर मात्र 37 शब्दों की दर्शन आधारित एक बोध-कथा ‘परम-सत्य’ की रचना की है—

एक ब्रह्मज्ञानी ने जगत् से कहा—तू मिथ्या है। केवल एक ब्रह्म ही तो सत्य है।

जगत् ने उत्तर दिया—अज्ञानी। यदि मैं मिध्या होता, तो तेरा और तेरे ब्रह्मज्ञान का आज अस्तित्व ही कहाँ होता?

नारी की चाह’ आचार्य मिश्र की मनोविश्लेषण आधारित बोधकथा है—

एक रानी ने एक दिन अपनी मुँहलगी दासी को उदास मन देख पूछा—दासी! तुम देखती हो, मैं तुम्हें हृदय से प्यार करती हूँ; और तुम्हारी सुख-सुविधा का अपने से भी अधिक ध्यान रखती हूँ। फिर न जाने तुम्हारे मन में कौन-सा दुःख छुपा है?

दासी ने डरते-डरते उत्तर दिया—बस, यही तो, रानी नहीं हूँ।

‘मौन-सत्य’ मातृ-हृदय दर्शन की बोध-कथा है—

एक माँ ने अपने उत्पाती बालक के उत्पातों से दुःखी होकर झुंझलाहट से भर, एक दिन अपने बालक से कहा—दुष्ट! तू न होता तो अच्छा था, मैं तो तुझसे दुःखी हो गई।

बालक ने तत्काल अपने दोनों हाथों में माँ का कण्ठ भरकर कहा—अम्मा! सच कहना, मैं न होता, तो तू सचमुच सुखी होती?'

उत्तर से माँ अवाक् थी। 

स्त्री-हृदय दर्शन की बोध-कथा है ‘प्रसन्नता के आधार’—

एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा—गुरुदेव! बालक क्या पाकर प्रसन्न रहता है?

गुरु ने कहा—किसी का दुलार।

और,शिष्य ने पूछा—गुरुदेव! युवा?

गुरु ने कहा—किसी का प्यार।

शिष्य ने पूछा—और गुरुदेव। वृद्ध क्या पाकर प्रसन्न रहता है?

गुरु ने कहा—किसी का सत्कार!

और गुरुदेव।शिष्य ने पूछा—नारी क्या पाकर प्रसन्न रहती है?

गुरु ने कहा—तीनों; दुलार, प्यार, सत्कार।

‘आत्म-दुर्बलता’ मानव-हृदय दर्शन की बोध-कथा है—

एक दिन मनुष्य ने दुःखी होकर अपने पापों से कहा—दुष्टो! तुम सब समय मुझे घेरे ही रहते हो। एक क्षण को तो मुझसे दूर रहा करो?

उसके पापों ने उत्तर दिया—बन्धु। यदि तू हमें छोड़कर कहीं और मन लगा सके, तभी तो!

बुभुक्षा-दर्शन पर आधारित है बोध-कथा ‘रोटी और युद्ध’—

एक सैनिक को अनमने मन से युद्ध-स्थल में भेजते हुए उसकी स्त्री ने पूछा—स्वामिन्। मनुष्य दूसरे मनुष्यों से युद्ध क्यों किया करते हैं?

सैनिक ने उत्तर दिया—प्रिये! ऐसा जान पड़ता है, मनुष्य ने पहिली बार दूसरे मनुष्यों से तब युद्ध आरम्भ किया होगा, जब उन्होंने उसके हाथ की रोटी पहली बार छोनी होगी?

उसकी स्त्री ने दूसरा प्रश्न किया—और स्वामिन्। वह कभी इन युद्धों से विरत भी होगा?

सैनिक ने अपनी स्त्री के दूसरे प्रश्न का समाधान यह कहकर किया—शायद, तब, जब मनुष्य अपनी रोटी बिना हाथ पसारे ही दूसरों की आगे रखनी सीख लेगा!

                                                                                                           शेष आगामी अंक में………