सोमवार, 27 जुलाई 2026

खड़ीबोली का कथा-गद्य और लघुकथा का पुनर्प्रस्फुटन-1 / बलराम अग्रवाल

 हिन्दी में कहानी की सबसे पहली पुस्तकें अपने अत्यन्त अपरिपक्व रूप में 16वीं शताब्दी में गोकुलनाथकृत ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ तथा ‘दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता’ को माना जाता है । इनके बाद विक्रम संवत् 1680 में जटमल रचित ‘गोरा बादल की कथा’, जिसका आधार एक ऐतिहासिक घटना थी, आती है। तत्पश्चात् 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक गद्य में कोई अन्य कथा-पुस्तक नहीं मिलती। उपेन्द्रनाथ अश्क लिखते हैं कि—इसका यह मतलब नहीं कि उस समय घटनाएँ नहीं होती थीं, या कहानी सुनने-सुनाने में किसी की रुचि न थी । कारण यह था कि लोग जो कुछ सुनना या सुनाना चाहते थे, काव्य द्वारा ही सुनना-सुनाना चाहते थे। ‘प्रेम मार्गी सूफी शाखा’ के कवियों ने पद्य में ही कहानियाँ लिखीं। जायसी का ‘पद्मावत’ इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। गद्य में कहानी न लिखे जाने का दूसरा कारण यह भी था कि उस समय आज की तरह छापेखाने की सुविधाएँ न थीं। इसलिए कहानी कही-सुनी तो खूब जाती रही, अपने लिखित साहित्यिक रूप में सामने न आ सकी। जो भी हो, 16वीं-17वीं शताब्दी के बाद 19वीं शताब्दी में ही हिन्दी गद्य को कुछ उत्तेजना मिली।

गद्य में लघुकथा-लेखन की परम्परा विकसित न होने और कथा-लेखन में काव्य की ही प्रधानता बनी रहने के कारण सन् 1800 ई. तक के काल को ‘लघुकथा का वैदिक युग’ कहना श्रेयस्कर होगा।

सन् 1801 ई. से सन् 1900 ई. तक

सन् 1800 ई. से 1825 ई. तक का काल गद्यपरक कथा लेखन के किसी प्रमाण का अभी तक भी अंधेरे में है। बहुत सम्भव है कि भविष्य में ऐसा कोई प्रमाण कोई शोधार्थी खोज निकाले। खड़ीबोली के प्रयोग के सम्बन्ध में सन् 1803 ई. में सदल मिश्र ने ‘नासिकेतोपाख्यान’ में लिखा है—‘अब संवत् 1860 में ‘नाशिकेतोपाख्यान’ को, जिसमें चन्द्रावती की कथा कही है, देववाणी से कोई-कोई समझ नहीं सकता, इसलिए ‘खड़ीबोली’ में किया।’

30 मई 1826 ई. को पं॰ जुगल किशोर शुकुल के संपादन में कलकत्ते से छपा हिन्दी का प्रथम (साप्ताहिक) पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ ऐसी ऐतिहासिक घटना है जिसके पीछे हिन्दी गद्य-निर्माण की विराट संभावनाएँ छिपी थीं। उसमें ‘लघुकथा’ की दृष्टि से ‘यशी वकील’ शीर्षक यह उद्धरण उल्लेखनीय है :

एक यशी वकील वकालत का काम करते-करते बुड्ढा होकर अपने दामाद को यह काम सौंप के आप सुचित हुआ। दामाद कई दिन काम करके एक दिन आया ओ प्रसन्न होकर बोला, ‘हे महाराज! आपने जो फलाने का पुराना वो संगीन मोकद्दमा हमें सौंपा था, सो आज फैसला हुआ।’ यह सुनकर वकील पछता करके बोला, ‘तुमने सत्यानाश किया। उस मोकद्दमे से हमारे बाप बड़े थे, तिस पीछे हमारे बाप मरती समय हमें हाथ उठाकर के दे गए ओ हमने भी उसको बना रखा ओ अब तक भलीभाँति अपना दिन कटा ओ वही मोकद्दमा तुमको सौंप कर समझा था कि तुम भी अपने बेटे-पोते-परोतों तक पलोगे; पर तुम थोड़े से दिनों में उसे खो बैठे।’

उन्नीसवीं सदी में प्रकाशित, अभी तक प्राप्त यह पहली गद्य-कथा है। यह रचना ‘ठट्ठे की बात’ स्तम्भ तले ‘उदंत मार्तंड’ के आषाढ़ वदी 8 संवत् 1883 (ईस्वी सन् के हिसाब से यह दिन बुधवार, 12 जुलाई 1826 ई. पड़ता है) अंक में प्रकाशित हुई थी। इस पत्र मे छपी ‘बहुत मोटा और बड़ा आदमी’, ‘लूट की छूट’ आदि शीर्षक रचनाएँ/खबरें भी ‘कथापन’ की दृष्टि से खोज का विषय हैं।

इसके बाद, प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 ई. से पहले हिन्दी के अनेक पत्र अकेले कलकत्ता से प्रकाशित हुए। इनमें ‘बंगदूत’, ‘प्रजामित्र’, ‘सामदंत मार्तंड’ और हिन्दी का प्रथम दैनिक समाचार-पत्र ‘सुधावर्षण’ शामिल हैं।

सन् 1900 ई. (विक्रम संवत् 1957) से पूर्व हिन्दी के जो पत्र-पत्रिकाएँ अस्तित्व में आये, उनकी सूची निम्न प्रकार है—

1- अलमोड़ा-अखबार सं॰ 1928 (सन्1871) संपादक : सदानन्द मालवीय

2- हिन्दी दीप्ति-प्रकाश सं॰ 1929 (सन्1872) संपादक : कार्तिकप्रसाद खत्री

3- बिहार-बंधु सं॰ 1929 (सन्1872) संपादक : केशवराम भट्ट

4- सदादर्श सं॰ 1931 (सन्1874) संपादक : श्रीनिवास दास

5- काशी-पत्रिका सं॰ 1933 (सन्1876) संपादक : लक्ष्मीशंकर मिश्र

6- भारत-बंधु सं॰ 1933 (सन्1876) संपादक : तोताराम

7- भारत-मित्र सं॰ 1934 (सन्1877) संपादक : रुद्रदत्त

8- मित्र-विलास सं॰ 1934 (सन्1877) संपादक : कन्हैयालाल

9- हिन्दी-प्रदीप सं॰ 1934 (सन्1877) संपादक : बालकृष्ण भट्ट

10- आर्य्य-दर्पण सं॰ 1934 (सन्1877) संपादक : बख्तावर सिंह

11- सार सुधा-निधि सं॰ 1935 (सन्1878) संपादक : सदानन्द मिश्र

12- उचित वक्ता सं॰ 1935 (सन्1878) संपादक : दुर्गाप्रसाद मिश्र

13- सज्जनकीर्ति-सुधाकर सं॰ 1936 (सन्1879) संपादक : बंशीधर

14- भारतसुदशा-प्रवर्त्तक सं॰ 1936 (सन्1879) संपादक : गणेश प्रसाद

15- आनन्द कादम्बिनी सं॰ 1939 (सन्1882) संपादक : उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’

16- देश-हितैषी सं॰ 1939 (सन्1882) संपादक : मुंशी मुन्ना लाल शर्मा, अजमेर

17- शुभचिन्तक सं॰ 1940 (सन्1883) संपादक : सीताराम

18- सदाचार मार्तंड सं॰ 1940 (सन्1883) संपादक : लाला लालचंद्र शास्त्री

19- हिन्दुस्तान सं॰ 1940 (सन्1883) संपादक : राजारामपालसिंह, इंग्लैंड

20- दिनकर-प्रकाश सं॰ 1940 (सन्1883) संपादक : रामदास वर्मा

21- धर्म-दिवाकर सं॰ 1940 (सन्1883) संपादक : देवीसहाय

22- प्रयाग-समाचार सं॰ 1940 (सन्1883) संपादक : देवकीनन्दनत्रिपाठी

23- ब्राह्मण सं॰ 1940 (सन्1883) संपादक : प्रतापनारायणमिश्र

24- भारत-जीवन सं॰ 1941 (सन्1884) संपादक : रामकृष्ण वर्मा

25- भारतेंदु सं॰ 1941 (सन्1884) संपादक : रामचरण गोस्वामी

26- कविकुलकंज-दिवाकर सं॰ 1941 (सन्1884) संपादक : रामनाथ शुक्ल

27- पीयूष-प्रवाह सं॰ 1941 (सन्1884) संपादक : अम्बिकादत्त व्यास

इन पत्रिकाओं में कुछ केवल साहित्य-सेवा के उद्देश्य से प्रकाशित की गयी थीं, कुछ धार्मिक और सामाजिक सुधारों के उद्देश्य से तो कुछ के प्रकाशन का उद्देश्य दोनों ही रहे। इनके उत्तरोत्तर प्रचार से लाभ यह हुआ कि हिन्दी गद्य का साहित्यिक रूप दिन-प्रतिदिन परिष्कृत होने लगा। दूसरे, धीरे-धीरे वह अपरिमित प्रयोग में आने लगा। इन सभी पत्र-पत्रिकाओं में नहीं तो इनमें से अनेक में तत्कालीन कथा-लेखन के प्रयास अवश्य मिल सकते हैं, जिनकी पहचान की जानी आवश्यक है।

चुटकुले और चुटकिले अर्थात् उद्बोधक चुटकियाँ

समय के साथ-साथ गद्य के उद्देश्यों में भी परिस्थितियों के अनुसार बदलाव नजर आते हैं। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारतेन्दु ने अपने ही ढंग से निराली लड़ाई लड़ी। उन्होंने अपने समय में प्रचलित अनेक ‘चुटकुलों’ के साथ मिलाकर कुछ उद्देश्यपूर्ण ‘चुटकिले’ भी लिखे, स्वयं द्वारा सम्पादित पत्रों में तो उन्हें छापा ही, अपने समय की अन्य पत्र-पत्रिकाओं में भी छपवाया और उन सब को संकलित कर सन् 1875 ई. में ‘परिहासिनी’ नामक पुस्तिका प्रकाशित कर डाली (‘भारतेन्दु समग्र’ में उसके सम्पादक हेमन्त शर्मा ने ‘परिहासिनी’ का प्रकाशनकाल 1876-80 अनुमानित किया है)। ‘परिहासिनी’ में प्रचलित चुटकुलों के साथ अनेक स्वरचित उद्बोधक ‘चुटकिलों’ को सम्मिलित करने का उनका उद्देश्य अवश्य ही उस समय के उन राजभक्तों की आँख में धूल झोंकना रहा होगा जो लिखे गये एक-एक शब्द, एक-एक वाक्य पर गिद्ध-दृष्टि रखते थे तथा अपने अंग्रेज आकाओं की नजर में खरा बने रहने की कवायद में कवियों-लेखकों-पत्रकारों और प्रेस पर निषेधाज्ञा लागू करने-कराने के नये-नये बहाने तलाशते थे। ‘परिहासिनी’ में यों तो अनेक उल्लेखनीय लघुकथाएँ हैं लेकिन जिस लघुकथा का उल्लेख सर्वोपरि माना जाता है, वह निम्नवत् है :

एक धनिक के घर उसके बहुत-से प्रतिष्ठित मित्र बैठे थे। नौकर बुलाने को घंटी बजी। मोहना भीतर दौड़ा, पर हँसता हुआ लौटा।

और नौकरों ने पूछा, “क्यों बे, हँसता क्यों है?”

तो उसने जवाब दिया, “भाई, सोलह हट्टे-कट्टे जवान थे। उन सभों से एक बत्ती न बुझे। जब हम गए, तब बुझे।”

खेद का विषय है कि भारतेंदु की यह ‘चुटकिला मुहिम’ उनसे आगे नहीं बढ़ पाई।

उन्होंने जहाँ कुछ सोद्देश्य चुटकियाँ लिखीं, वहीं प्रेमघन जी ने उन्हें मात्र मनोरंजनार्थ माना, समझा और लिखा। आगे निरर्थक मनोरंजन से आहत प्रतापनारायण मिश्र ने चुटीलेपन को लगभग त्यागने का ही संकल्प ले डाला। ‘ब्राह्मण’ के एक अंक में उन्होंने लिखा—‘जी बहलाने के लेख हमारे पाठकों ने बहुत-से पढ़ लिये। यद्यपि इनमें भी बहुत-सी समयोपयोगी शिक्षा रहती है, पर वाग्जाल में फँसी हुई ढूढ़ निकालने-योग्य। अत: अब हमारा विचार है कि कभी-कभी ऐसी बातें भी लिखा करें जो इस काल के लिए प्रयोजनीय हैं तथा हास्यपूर्ण न होके सीधी-सादी भाषा में हों। हमारे पाठकों का काम है कि उन्हें नीरस समझ के छोड़ न दिया करें तथा केवल पढ़ ही न डाला करें, वरंच उनके लिए तन से, धन से कुछ न हो सके तो वचन ही से यथावकाश कुछ करते भी रहें।’

इस उद्धरण से अनेक तथ्य स्पष्ट होते हैं। उनमें एक यह है कि हिन्दी भाषा-भाषी संसार साहित्य के ‘रस’ परिपाक से हटकर ‘शुष्कता’ की ओर बढ़ गया था और दूसरा यह कि पाठकों का गंभीर साहित्यिक और नैतिक उत्थान ही बाद के गद्यकारों का उद्देश्य बन गया था।

उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ीबोली गद्य

हिन्दी गद्य की जो सशक्त शैली, संवेदन-प्रस्तुति की जो क्षमता तथा उदार परंपरा आज हमें प्राप्त है, गद्य का जो वर्तमान स्वरूप हमारे सामने है, वह असंख्य हिन्दी-प्रेमियों और राष्ट्र-हितैषियों की निरंतर साधना का परिणाम है। 1857 ई. के बाद अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में भयंकर कठिनाइयों का सामना करते हुए भी उन्नीसवीं शताब्दी में गद्य-निर्माण की चेष्टा कितनी तेज और पुष्ट थी, इसका प्रमाण ‘कविवचन सुधा’ (1867 ई.), ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका’ (1873 ई.), ‘बिहार बंधु’ (1874 ई.; कहीं-कहीं इसका काल 1872 ई. भी लिखा है, लेकिन उस काल की फाइलें अप्राप्य हैं), ‘भारत मित्र’ (1878 ई.), ‘सार सुधानिधि’ (1879 ई.) और ‘उचितवक्ता (1880 ई.) के पन्नों पर लिखी इबारत है। इस काल के रचनाकारों, पत्रकारों, विचारकों, वक्ताओं ने कई-कई दायित्वों का निर्वाह एक-साथ किया। उन्होंने गद्य की भाषा को तो सँवारा ही, स्वयं को सुरक्षित रखते हुए स्वाधीनता आंदोलन में भी स्वयं को बनाये रखा। जिस तरह 1857 ई. में स्वाधीनता-सेनानियों ने ‘रोटी और कमल’ को परस्पर संकेत का ‘कोड’ बनाया था, भारतेंदु हरिश्चंद्र ने आग को सुलगाने और सुलगाए रखने का काम संकेत-प्रधान साहित्य रचकर किया। इस दिशा में उनकी रचना ‘अंधेर नगरी चौपट्ट राजा’ से तो सब परिचित हैं ही, ‘परिहासिनी’ से कम लोग परिचित हैं। इस पुस्तिका में उनके द्वारा रचित हास-परिहास, चोज की बातें और चुटकिले आदि संग्रहीत हैं। अनेक चुटकिलों के माध्यम से ही भारतेंदु ने जन-जागरण का दायित्व निर्वाह किया। वे अच्छी तरह जानते थे कि ब्रिटिश शासन से जुड़े छोटे-बड़े सभी अधिकारी लिखे और बोले जा रहे शब्दों पर ‘गिद्धों और कुत्तों’ जैसी चेष्टाएँ रखते हैं। गिद्ध की आँखें तेज होती हैं और कुत्ते के कान। इस तथ्य का एक प्रमाण हमें डॉ॰ प्रदीप जैन की पुस्तक ‘सोजे वतन, जब्ती की सच्चाई’ से मिलता है कि प्रेमचंद का पहला कहानी संग्रह ‘सोजे वतन’ अपने प्रकाशन के एक साल बाद ब्रिटिशकालीन सी आई डी द्वारा मात्र इसलिए संदिग्ध मान लिया गया कि उसकी बिक्री लाहौर में किताबों की उस दुकान से हो रही थी, जहाँ भगतसिंह के चाचा अजीतसिंह का लिखा क्रांतिकारी साहित्य बिकता था।

‘परिहासिनी’ के प्रकाशन का समय 1857 की क्रांति के मात्र 18 वर्ष बाद (सन् 1875 ई.) का है, जब ब्रिटिश खुफिया विभाग भारतीयों की हर गतिविधि को संदेह की दृष्टि से देखने का अभ्यस्त-सा हो गया था। ऐसे में भारतेंदु ने ‘परिहासिनी’ के मुखपृष्ठ पर ‘हँसी-दिल्लगी, पंच, चोज की बातें और चुटकिले’ लिखकर चालाक खेल खेला। उक्त पुस्तक के रूप में मीठे पानों से भरी जो तश्तरी अंग्रेज बहादुरों और उनके पिट्ठुओं के आगे पेश की, उसमें ‘अंगहीन धनी’ और ‘अद्भुत संवाद’ जैसे भी अनेक पान थे, जिनमें गुलकंद के रूप में वाजीकारक तत्व था, उत्प्रेरक और उद्वेलक।

पुस्तक संपादन का ‘परिहासिनी’ जैसा कौशल उनके बाद अन्य अनेक लेखक, संपादक उपयोग में लाते रहे। इसका एक प्रमाण राकेश पाण्डे ने अपनी ‘ब्रिटिश काल में प्रतिबंधित साहित्य में गाँधी’ नामक पुस्तक में किया है। उन्होंने 1941 में प्रतिबन्धित एक ऐसी पुस्तक से कुछ सामग्री प्रमाणस्वरूप प्रस्तुत की है, जिसके आवरण पर उसका नाम ‘वैद्य की लाचारी’ छपा है जबकि भीतरी पन्नों पर ‘बिरहा’ शैली में क्रांतिकारी गीत आदि छपे हैं।        (आगामी अंक में जारी…)

खड़ीबोली का कथा-गद्य और लघुकथा का पुनर्प्रस्फुटन-2 / बलराम अग्रवाल

कुछ कौशल ऐसे होते हैं, जिनका अनुसरण भी करने के लिए असाधारण मेधा की आवश्यकता होती है। भारतेंदु काल के ‘प्रेमघन’ आदि ने भी कितने ही चुटकुले लिखे, लेकिन वे भारतेंदु के चुटकिलों के उद्देश्य और उनकी मारक शक्ति को पहचान नहीं पाये और इसीलिए उनके द्वारा रचित चुटकुले चुटकुले ही रहे, चुटकिले नहीं बन सके। ‘प्रेमघन’ जी ने अनेक लघु-आकारीय नाट्य प्रहसन भी रचे और उनमें उन्हें काफी सफलता भी मिली है। एकांकी और नाट्य साहित्य पर काम करने वालों को उनमें बहुत-कुछ मिल सकता है। तो हिन्दी समाज को भारतेंदु ने अलग ही ढंग से चेताने और समकालीन लेखकों को भी स्वयं सरीखा संस्कार देने का प्रयास किया था; लेकिन उनके बाद 1947-48 ई. में परसाई के आने तक वह सरस्वती लुप्त ही रही; और परसाई के काल में भी कथन की उस भंगिमा, साहस और धार को कोई अन्य अपनी लेखनी में नहीं उतार पाया।

हिन्दी समाज के सांस्कृतिक और राजनीतिक उन्नयन में सक्रिय योगदान के लिए उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध की समूची साहित्यिक जाति का यह देश हमेशा ही ॠणी रहेगा। वैचारिक मेधा और अद्भुत रचना-चेतना के बूते इस दौर की पीढ़ी ने स्वाधीनता आंदोलन को ऐसी आग पकड़ाई जिसका अनुमान अंग्रेज लम्बे समय तक लगा ही न सके।

भाषा और शैली के निर्माण में भी इस काल का बड़ा योगदान है। यह काल युगीन राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत करने का काल रहा। लघुकथा के विकास की अनुकूल भूमि इस काल में तैयार होती दिखाई देती है, लेकिन जिस उर्वरा-शक्ति की आवश्यकता उसे थी, आगामी वर्षों में अनेक अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक कारणों से वह अन्य विधाओं में विभाजित हो गयी और लघुकथा को एक बार पुन: शांत हो बैठ जाना पड़ा।

सन् 1900 ई. से सन् 1970 ई. तक

जनवरी 1900 ई. में हिन्दी साहित्य की ऐतिहासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। बाबू श्यामसुन्दर दास के बाद 1903 ई. में महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864-1938 ई.) इसके सम्पादक हुए और 1920 ई तक रहे। लगभग 80 वर्षों तक इस पत्रिका का प्रकाशन निरन्तर होता रहा। चालीस वर्ष के अंतराल के बाद सन् 2020 ई. से इसका प्रकाशन पुन: प्रारम्भ हुआ है।

छोटे आकार में हिन्दी की पहली कहानी ‘सरस्वती’ के 1916 ई. अंक में छपी, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की ‘झलमला’ मिलती है। सन् 1978 ई. में गाजियाबाद से जगदीश बत्रा के संपादन में प्रकाशित ‘सर्वोदय विश्ववाणी’ के एक अंक में बलराम अग्रवाल द्वारा इसे हिन्दी की पहली लघुकथा घोषित किया गया था। तदुपरांत लम्बे समय तक इसे ही हिन्दी की पहली लघुकथा के रूप में प्रस्तुत भी किया जाता रहा। यहाँ तक कि ‘कथाबिंब’ के लघुकथा विशेषांक में उसके अतिथि संपादक कृष्ण कमलेश ने काफी काट-छाँटकर इसे पुन: पहली लघुकथा के रूप में प्रस्तुत किया था। बख्शी जी ने ‘झलमला’ नाम से ही अपना कहानी संग्रह भी प्रकाशित कराया। सन् 1900 ई. के बाद 1935 ई. तक अनेक कहानीकारों का नाम कथा-साहित्य में अंकित है; इनमें से केवल सुदर्शन का ही लघुकथा संग्रह ‘झरोखे’ (1947 ई.) प्रकाश में आया, किसी अन्य का नहीं।

किसी खड़ीबोली कथा-रचना के लिए ‘लघु-कथा’ शब्द का प्रयोग पहली बार ‘हंस’ के अक्टूबर 1938 ई. अंक में देखने को मिलता है। उसके बाद विष्णु प्रभाकर, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, जगदीश चन्द्र मिश्र प्रभाकर, हरिशंकर परसाई, राधाकृष्ण, भवभूति मिश्र, जानकीवल्लभ शास्त्री आदि अनेक कथाकारों ने लघुकथा-लेखन को अपनाया। सन् 1964 ई. से यह अनेक पत्र-पत्रिकाओं में बहुतायत में स्थान पाने लगी। सन् 1964-65 ई. के बाद पूरन मुद्गल, सुरेन्द्र मंथन, सतीश दुबे तथा 1970 ई. के बाद नयी पीढ़ी के अनेक कथाकार इस विधा से आ जुड़े। व्यावसायिक कथा पत्रिका ‘सारिका’ के माध्यम से कथाकार-सम्पादक कमलेश्वर ने इस विधा को बहु-प्रसारित किया, यह निर्विवाद है। सन् 1970-2000 ई. के मध्य की लघुकथा पीढ़ी में रमेश बतरा, बलराम, भगीरथ, बलराम अग्रवाल, जगदीश कश्यप, अशोक भाटिया, सिमर सदोष, कमलेश भारतीय, पृथ्वीराज अरोड़ा, शकुन्तला किरण, सतीशराज पुष्करणा, सतीश राठी, सुकेश साहनी, चित्रा मुद्गल आदि का नाम प्रमुख रूप से लिया जा सकता है।

प्रबुद्ध कथा-चिंतकों की बेचैनी अर्थात् लघुकथा का पुनर्प्रस्फुरण काल साहित्यकार उपेन्द्रनाथ अश्क कहते हैं—‘चन्द्रकान्ता संतति’ तथा इसी प्रकार की कौतूहल प्रधान कहानियाँ हर उम्र में नहीं पढ़ी जाती । जीवन में एक समय आता है, जब सब-कुछ सुनहला दिखायी देता है। कोई गम नहीं, दुख नहीं, उत्तरदायित्व का बोझ नहीं,

तब ऐसी चीजें पढ़ने मे मन लगता है। पर ज्यों ही हम, जीवन की यथार्थताओं के संघर्ष में आते है; स्वप्न जब हमारे स्वप्न नहीं रहते; तभी हम ऐसी कहानियों से ऊब उठते हैं। तब हम कोई ऐसी चीज चाहते हैं, जो हमारे सामने जीवन की यथार्थता को खोलकर रख दे; हमारे सुख-दुखों का दिग्दर्शन कराये; हमारी विपत्तियों में हमें सान्त्वना दे, हमारी कठिनाइयों मे हमारा पथ प्रदर्शन करे और जीवन को, मानव को समझने में हमारी सहायता करे।

साहित्य के इतिहास मे भी जिस समय वे कौतूहलपूर्ण, मनोरंजन मात्र का या धर्म का पहलू लिये हुए, कहानियाँ लिखी गयीं, तब जीवन संघर्ष अपेक्षाकृत कम जटिल था; जीविका का प्रश्न भी सम्भवत: आज जैसा विकट न था; लोगों के पास समय भी काफ़ी था। तब लोग बैठे धर्म ज्ञान की चर्चा कर सकते थे, कौतूहलपूर्ण कहानियाँ पढ़और सुन सकते थे। पर आज, जब जीवन संघर्ष ने सपने देखने वाले युवक को एकदम प्रौढ़ बना दिया है और रोजी-रोटी की चिन्ता ने उसके पास समय नही छोड़ा है, तब यह आवश्यकथा कि पुरानी कौतूहलपूर्ण लम्बी-लम्बी कहानियों का स्थान छोटी भावपूर्ण, जीवन से मेल खाने वाली कहानियाँ लेतीं। अब तक हम कहानी को उसके व्यापक  अर्थ में लेते रहे हैं, जिसमें साधारण छोटी घटना से लेकर ‘चन्द्रकान्ता संतति’ तक भी कहानी है, पर यहीं से ‘छोटी कहानी’ नाम की एक नयी चीज आती है, जो अपनी पृथक् कला रखने के साथ ही आज की आवश्यकताओं को पूरा करती है ।’

वह आगे कहते हैं—‘हमें यह मानने में संकोच न होना चाहिए कि छोटी-छोटी कहानियाँ लिखने की यह कला हमने यूरोप से ली है। कम-से-कम इसका आज का विकसित रूप तो पश्चिम ही का है। यह माना कि हमारे यहाँ प्राचीन विषय कुछ और हैं, शैली कुछ और है। कथा-साहित्य में विकास हुआ और उसके विषय में चाहे उतना बड़ा परिवर्तन न हुआ हो, पर शैली तो बिलकुल ही बदल गयी । ‘अलिफ़-लैला’ उस समय का आदर्श था, उसमें बहुरूपता थी, वैचित्र्य था, कौतूहल था, रोमांस था, पर उसमें जीवन की समस्याएँ न थीं, मनोविज्ञान के रहस्य न थे, अनुभूतियों की इतनी प्रचुरता नथी, जीवन अपने सत्य रूप में इतना स्पष्ट न था।’

समय के अनुसार लघुकथा के कथ्य, शिल्प, शैली सभी में बदलाव आया है, आना ही चाहिए था। कल जो लघुकथा लिखी जाती थी, प्रकाशन आरम्भ होने के बाद लगभग एक दशक तक, कम स्पेस की रचना के रूप में ‘हंस’ में जो गद्य-गीत छपते थे, वैसे आज नहीं लिखे जाते। यह भी सत्य है कि हम लघुकथा की जो परिभाषा कल दे रहे थे, उसमें परिवर्तन हुआ है। इसी तथ्य के मद्देनजर आज की लघुकथाओं की जो परिभाषा आज दे रहे हैं, वह कल के साहित्य-समाज को ग्राह्य होगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता। शुरू-शुरू में किसी घटना का ठीक-ठाक ढंग से वर्णन करने को ही ‘कहानी’ कह दिया जाता था। लम्बे समय तक घटनाओं का झंझावात ही कहानियों का मुख्य अंग रहा है और बहुत-से लेखकों की नजर में अब भी है; लेकिन यह सत्य है कि कहानी में आमूल-चूल बदलाव आया है।

अगर हम 1950 से 1980 के बीच कुछेक गम्भीर कथा-आलोचकों की कहानी संबंधी चिंताएँ पढ़ें तो कहानी को लेकर अधिकतर बातें उनके मानस में घुमड़ रहे उन कारणों को प्रकट कर रही हैं जिनके कारण वे अपने समय की कहानी के कलेवर से बेचैन रहे हैं। प्रेमचंद का यह कहना कि ‘गल्प का आधार अब घटना नहीं, भीतरी या बाहरी द्वन्द्वों की अभिव्यक्ति है। उसमें घटनाएँ आ भी सकती हैं और नहीं भी आ सकतीं।’ अपने समय का अत्यंत महत्वपूर्ण वक्तव्य है जिस पर कहानी से हटकर लघुकथा की दृष्टि से ध्यान दिया जाना चाहिए था, लेकिन नहीं दिया गया।

इसी क्रम में कथाकार इलाचन्द्र जोशी का यह वक्तव्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि—‘वर्तमान युग की ‘छोटी कहानी’ एक प्रकार की गद्य-कविता है, जो वास्तविक जीवन के आधार पर खड़ी होती है। जीवन का चक्र माना परिस्थितियों के संघर्ष से उल्टा-सीधा चलता रहता है। इस सुवृहत् चक्र की किसी विशेष परिस्थिति की स्वाभाविक गति के प्रदर्शित करने में ही कहानी की विशेषता है।’

जोशी जी कवि भी हैं। वे कहानी की भाषा को भी काव्यात्मक प्रवाह के रूप में देखते हैं। उनकी यह बात लघुकथा की भाषा की ओर संकेत कर रही है। अश्क जी लिखते हैं—कहानी की धारा को देखकर यह कहा जा सकता है कि आधुनिक छोटी कहानी एक ऐसी रचना है जिसका आधार किसी मनोवैज्ञानिक सत्य या मानव जीवन अथवा समाज की किसी समस्या पर रखा गया हो; और जो बिना इधर-उधर भटके सीधी अपने ध्येय पर पहुँच जाय; और यदि उसमें कोई घटना वर्णित है तो उसका चित्रण इकहरा और रसपूर्ण हो।’

प्रकारान्तर से क्या वह लघुकथा के ही गुण को व्यक्त नहीं कर रहे थे? अवश्य; लेकिन उनके दृष्टि-पथ में आज की लघुकथा नहीं, लघु-कथा थी यानी शॉर्ट-स्टोरी का शब्दानुवाद। इस प्रकार, पूर्ववर्ती कहानी-चिंतक लघुकथा के आने की आहट को सुन तो रहे थे, सही-सही समझ नहीं पा रहे थे; और स्वीकार तो ‘कहानी’ (न कि कहानीपन) के पूर्वाग्रह से ग्रसित पुरातन मानसिकता के अनेक पैरोकार आज भी नहीं ही कर पा रहे हैं। जबकि इन्हीं के बीच डॉ॰ गोपाल राय सरीखे प्रबुद्ध आलोचक ने चार खण्डों में प्रकाशित अपने ‘कहानी का इतिहास’ ग्रन्थ में ‘लघुकथा’ को कथा-साहित्य की स्वतन्त्र विधा स्वीकार किया है।

सन्दर्भ :

1- जगन्नाथप्रसाद शर्मा, हिंदी गद्यशैली का विकास, नागरी प्रचारिणी सभा,काशी, प्र.सं. संवत् 1987; परिवर्द्धित सं. सं. 2006

2- डॉ॰ प्रदीप जैन, सोजे वतन-जब्ती की सच्चाई, पराग बुक्स, साहिबाबाद, गाजियाबाद-201005, 2021

3- राकेश पाण्डे, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबंधित साहित्य में गाँधी, डायमंड बुक्स, नई दिल्ली, 2019

4- उपेन्द्र नाथ अश्क; हिन्दी कहानी : एक अंतरंग परिचय; प्रकाशक : नीलाभ प्रकाशन, 5,

खुसरोबाग रोड, इलाहाबाद-1, प्रथम संस्करण : 1967

5- डॉ॰ लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय; आधुनिक हिन्दी साहित्य की भूमिका (1757-1857ई); संस्करण 1952

6- डॉ॰ बलराम अग्रवाल; लघुकथा:अतीत के पन्नों से; सन्दर्भ : ‘लघुकथा वृत्त’, अक्टूबर 2018

7- हेमन्त शर्मा (सम्पादक), भारतेन्दु समग्र, पिशाचमोचिनी, वाराणसी, 1989 संस्करण

8- रामचन्द्र शुक्ल; हिन्दी साहित्य का इतिहास

लघुकथा में भारतीयता-1 /बलराम अग्रवाल

 किसी भी देश का उत्थान वहाँ की दार्शनिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर ही आधारित होता है। एक उन्नत देश जब कभी भी, किसी काल विशेष में पतन को प्राप्त होता है तो मुख्य रूप से उसके दो ही कारण होते हैं। पहलावहाँ के समाज ने राष्ट्र के उत्थान की दार्शनिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को विकृत रूप से स्वीकार कर लिया हो। दूसराअपने दार्शनिक और सांस्कृतिक सिद्धान्तों की जानकारी रखते हुए भी वहाँ के नागरिक दैनिक व्यावहारिक जीवन में उन सिद्धान्तों का उपयोग न करते हों। याद रखें, असुर वही कहलाता है जो  सुरों की जानकारी होते हुए भी उनके नियम का अनुपालन नहीं करता है। सुरों की जानकारी से विहीन लोग बेसुरे कहे जा सकते हैं, असुर नहीं। भारत की वर्तमान स्थिति का सूक्ष्म अवलोकन करने पर पता लगेगा कि यहाँ का जनमानस उपरोक्त दोनों कारणों से प्रभावित होलम्बे समय से भ्रमित और किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में रहा है। इसी कारण यहाँ का जनमानस लगातार अर्थाभाव के गर्त में धँसता और पराधीन होता गया है। पराधीनता हमारे यहाँ एकाएक नहीं, शनै: शनै: आयी है।

स्वाधीनता व्यक्ति के विचार में, भाषा में, खान-पान, रहन-सहन में दिखाई देनी चाहिए, न कि अनर्गल बयानबाजी में। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अर्थ आज का बड़े से बड़ा पत्रकार और लेखक भी सही-सही समझता है, यह संदेहास्पद है। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर आज जो दिखाई दे रहा है, वह उच्छृंखलता है, स्वतन्त्रता का विक्षिप्त रूप है। इसीलिए देश में अपसंस्कृति का समुचित फैलाव हुआ है, संस्कृति की लगातार छिछालेदर हो रही है। याद रखें, लक्ष्मी का एक नाम चंचला भी है। तात्पर्य यह कि धन कभी भी स्थिर होकर एक स्थान पर नहीं टिकता। उसका प्रवाह वर्तुलाकार होता है। भारतीय जन जिस धन के पीछे भाग रहा है, वह धन आज भी अनेक बहुराष्ट्रीय वस्तुओं की खरीद के, ऐशो-आराम के संसाधन जुटाने के माध्यम से विदेश की ओर भाग रहा है। भारतीय मेधा का हाल आज यह है कि ‘दुनिया (अनेक बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ) है मेरे पीछे लेकिन मैं तेरे (धन के) पीछे, अपना बना ले मेरी जान, हाए मैं तेरे कुर्बान!’ इस हविश ने हमारे चिन्तन की, हमारी संस्कृति की दशा-दिशा को संवेदनहीन स्वार्थपरता और अपसंस्कार में बदल दिया है। समकालीन हिन्दी लघुकथाकारों ने इस संवेदनहीनता, स्वार्थपरता और अपसंस्कृत चाल-चलन को रेखांकित करती अनगिनत लघुकथाएँ साहित्य को दी हैं। यही नहीं, उन्होंने संवेदनशीलता, परहित कातरता और सांस्कृतिक उच्चता का आदर्श प्रस्तुत करती लघुकथाएँ भी यथेष्ट गुणवत्ता के साथ साहित्य को दी हैं। उमेश महादोषी की लघुकथा ‘वो दहलीज’ में भारतीय संस्कार की उच्चता का अंकन उल्लेखनीय है।

साहित्य और कला भारतीय जीवन-पद्धति के अभिन्न अंग हैं। जीवन से अलग उनकी स्वतन्त्र स्थिति नहीं है। साहित्य में कथा, कथा में भी लघुकथा; मेरा मानना है कि जीवन में कला और लघुकथा रक्त, मांस, मज्जा यहाँ तक साँस के आने-जाने जितनी घुली-मिली हैं। इनकी प्रतीति ऐन्द्रिय नहीं, लगभग अतीन्द्रिय होती है। तभी कोई कलाकार, कोई कथाकार कुछ रच पाता है।

‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने पुस्तक के ‘आधुनिक गद्य : संवत् 1900 से 1925 तक’ खण्ड में ‘उदंत मार्तण्ड’ को ‘संवाद पत्र’ बताते हुए लिखा है—‘यह पत्र एक ही वर्ष चलकर सहायता के अभाव में बंद हो गया। इसमें ‘खड़ी बोली’ का ‘मध्यदेशीय भाषा’ के नाम से उल्लेख किया गया है।’ सही तथ्य यह है कि हिन्दी के इस प्रथम साप्ताहिक का प्रथम अंक 30 मई सन् 1826 को प्रकाशित हुआ था और सरकारी सहायता के अभाव में मात्र 79 अंक प्रकाशित करने के बाद पौष बदी 1, 1884 (तदनुसार, मंगलवार 4 दिसम्बर 1827) को लगभग डेढ़ साल बाद इसका प्रकाशन स्थगित कर देना पड़ा था। इसके कुछ अंकों में इसके संपादक जुगल किशोर सुकुल (कुछ लोग इस नाम को शुद्ध करके ‘युगल किशोर शुक्ल’ भी लिखते हैं, मूलत: वह जुगल तथा सुकुल ही लिखते थे, युगल और शुक्ल नहीं) ने ‘ठट्ठे की बात’ शीर्ष के अन्तर्गत कुछ लघु-आकारीय गद्य कथाएँ प्रकाशित की थीं। उनमें से एक को उक्त काल के गद्य का नमूना प्रस्तुत करने की दृष्टि से शुक्ल जी ने उद्धृत किया, लेकिन वे इसमें कथा की उपस्थिति नहीं देख पाए क्योंकि वह युग कथा के लघु रूप को देख पाने का था ही नहीं और न ऐसा अनुमान ही किसी तत्कालीन आलोचक को रहा होगा कि भविष्य में कथा के लघु रूप का विकास भी हिन्दी करेगी। यहाँ प्रस्तुत है, ‘उदंत मार्तंड’ के आषाढ़ वदी 8, संवत् 1883 (तदनुसार मंगलवार, 27 जून 1826 / नोट : यह पत्र प्रत्येक मंगलवार को प्रकाशित होता था।) अंक में प्रकाशित उक्त रचना :

एक यशी वकील वकालत का काम करते-करते बुड्ढा होकर अपने दामाद को यह काम सौंप के आप सुचित हुआ।

दामाद कई दिन काम करके एक दिन आया ओ प्रसन्न होकर बोला, "हे महाराज! आपने जो फलाने का पुराना वो संगीन मोकद्दमा हमें सौंपा थासो आज फैसला हुआ।"

यह सुनकर वकील पछता करके बोला, "तुमने सत्यानाश किया। उस मोकद्दमे से हमारे बाप बड़े थेतिस पीछे हमारे बाप मरती समय हमें हाथ उठाकर के दे गए ओ हमने भी उसको बना रखा ओ अब तक भलीभाँति अपना दिन कटा ओ वही मोकद्दमा तुमको सौंपकर समझा था कि तुम भी अपने बेटे-पोते-परोतों तक पलोगेपर तुम थोड़े से दिनों में उसे खो बैठे।"

अधिक से अधिक धन कमाने की लालसा ने न्याय का जो ध्वंस ब्रिटिशकाल के वकीलों की बदौलत हुआ, उसे भारतीय वकीलों ने भी अपने ही जातिभाइयों का गला काटते हुए जारी रखा। ‘ठट्ठे की बात’ में इस सत्य को गहराई से अंकित किया गया है।

लघ्वाकारीय कथाओं की अनदेखी ही वह कारण रहा कि उपन्यास के नाम पर भारतेंदु की अधूरी रचना ‘एक अद्भुत अपूर्व स्वप्न’ को तो बार-बार उद्धृत किया जाता रहा,  पूर्ण होते हुए भी परिहासिनी’ की किसी रचना का कभी कोई नोटिस नहीं लिया गया, उन्हें नवीन दृष्टि से देखने की कभी आवश्यकता ही नहीं समझी गयी जबकि इसमें छपी ‘अद्भुत संवाद’ एक उद्देश्यपूर्ण रचना है। इस पुस्तिका का हास-परिहास से इतर कभी संज्ञान नहीं लिया गया और न ही ‘ब्रिटिश शासन का कथापरक प्रतिरोध’ के रूप में कहीं उल्लेख किया गया। उद्वेलन का दायित्व लघुकथाएँ नकारात्मक चरित्रों की प्रस्तुति के माध्यम से भी उतनी ही शिद्दत से निभाती हैं जितनी शिद्दत से विद्रोही और सकारात्मक चरित्रों की प्रस्तुति के माध्यम से। कथा के इन दोनों ही प्रकारों में मुख्य भूमिका नि:संदेह कथाकार के कौशल की होती है। सकारात्मक विद्रोह प्रस्तुत करने का सफल उदाहरण भारतेंदु हरिश्चन्द्र की रचना ‘अद्भुत संवाद’ है। यह रचना गाँधी जी के ‘सविनय अवज्ञा’ की आधारभूमि है, भले ही उन्होंने इसे कभी पढ़ा न हो। देखिए :

“एजरा हमारा घोड़ा तो पकड़े रहो।”

“यह कूदेगा तो नहीं?”

“कूदेगा! भला कूदेगा क्योंलो सँभालो।”

“यह काटता है?”

“नहीं काटेगालगाम पकड़े रहो।”

“क्या इसे दो आदमी पकड़ते हैं। तब सम्हलता है?”

“नहीं !”

“फिर हमें क्यों तकलीफ देते हैंआप तो हई हैं।”

कोई माने न माने, हिन्दी लघुकथा साहित्य में यह सविनय अवज्ञा अथवा प्रतिरोध की प्रथम प्रस्तुति है जिसका सूत्रपात भारतेंदु की कलम से हुआ था और ‘अद्भुत संवाद’ उसका अन्यतम उदाहरण है। एक भारतेंदु ही थे, जिन्होंने चुटकुलों को जन-उद्बोधन का माध्यम बनाया। लेकिन ब्रिटिश पराधीनता के विरुद्ध अपने इस संदेश को वे मुखर होकर अपने अन्य साथी लेखकों में प्रचारित नहीं कर पाए। उन्होंने ‘समझदार को इशारा ही काफी’ में विश्वास किया और यथेष्ट  सहयोग पाने में लगभग असफल ही रहे। परिणाम यह रहा कि उनके काल के ‘प्रेमघन’ आदि अनेक लेखकों ने चुटकुले तो बहुत लिखे, लेकिन वे चुटकुलों के माध्यम से ब्रिटिश विरोध और जन-उद्बोधन के भारतेंदु के उद्देश्य को नहीं पहचान पाए, सामान्य चुटकुलाकार की तरह सतही गुदगुदाहट ही देते रहे। एक बात और, भारतेंदु की ‘परिहासिनी’ के मुखपृष्ठ पर शब्द ‘चुटकुला’ नहीं ‘चुटकिला’ छपा है। ‘चुटकी’ शब्द वैद्यक में घरेलू इलाज के लिए प्रयुक्त होता रहा है जिसका एक उदाहरण सन् 1957 में देहाती पुस्तक भण्डार, दिल्ली से अमोलचन्द्र शुक्ला ‘सोमरस’ के सम्पादन में प्रकाशित ‘साधू की चुटकी (सन्यासी चिकित्सा शास्त्र)’ है। इसके अलावा स्वाधीनता संग्राम काल में प्रकाशित कुछ ऐसी पुस्तकों का भी पता चला है जिनके मुखपृष्ठ पर वैद्यक आदि की किताब दर्शाया गया था जबकि अन्दर बहुत-सी सामग्री स्वाधीनता आंदोलन को बनाए रखने और तेज करने सम्बन्धी है। इसी से भारतेंदु द्वारा प्रयुक्त ‘चुटकिला’ शब्द के निहित अर्थ भी समझे जा सकते हैं।

स्वाधीनता अथवा पराधीनता केवल भूखण्ड विशेष तक ही सीमित नहीं रहतीं, इनका विस्तार जन-जन के मन और मस्तिष्क तक होता है। पराधीन देश की सिर्फ सम्पत्ति ही नहीं लूटी जाती, ज्ञान सम्पदा और अभिव्यक्ति की आजादी भी लूट ली जाती है। मुझे अक्सर ही महसूस होता है कि हम भारतीयसंस्कृति और दर्शन की उस चोटी पर पहुँच चुकी जाति रहे हैंजिस पर या तो धैर्य और साहस के साथ टिके रहना होता है; या फिर पतन निश्चित है। लेशमात्र विचलन भी उस अवस्था के समाज को नीचे लेजा सकता है। भारतीय समाज ने दर्शन और संस्कृति की उस उच्चतम चोटी पर युगों तक पाँव रखे हैं जिस पर गर्व किया जा सकता है। लेकिन लज्जित भी हमें कम नहीं होना चाहिए कि हम अनुशासित और एकजुट नहीं रह सके। इस विचलन के परिणामस्वरूप गत लगभग 700-800 वर्ष का त्रासपूर्ण इतिहास हमारे सामने है। देश को स्वाधीन हुए भी लगभग 75 वर्ष होने को आए लेकिन स्वाधीनता के उचित अर्थों से हम आज भी परिचित नहीं हैं। या तो हम किसी विचार का अंध-समर्थन करते हैं या फिर अंध-विरोध। विचार का विवेकपूर्ण आकलन करने का विकास हम स्वयं में नहीं कर पाये। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उसके लिए भी हमें विदेशी आकलनकर्ताओं की ओर ताकना पड़ता है। अगर एकपक्षीय विचार के पोषक हैं तो राष्ट्र और उसकी संस्कृति के विकास में आप सहायक सिद्ध नहीं हो सकते।

किसी भी राष्ट्र की अस्मिता के तीन अवयव होते हैं—राष्ट्र, राष्ट्री और राष्ट्रीयता। भारत के सम्बन्ध में इन्हें भारत, भारती (अथवा भारतीय) तथा भारतीयता कह सकते हैं। इनमें भारत एक भौगोलिक भूखण्ड है, भारती उक्त भूखण्ड की सीमा के अंतर्गत निवास करने वाले उसके नागरिक हैं (वे किसी भी धर्म, सम्प्रदाय और समुदाय के क्यों न हों); परन्तु भारतीयता इन दोनों से अलग अत्यन्त विस्तृत भाव है। अन्य दो की तरह यह शब्द मात्र नहीं है, बल्कि भारतभूमि का दर्शन और संस्कार है। इसलिए ‘भारतीयता’ का विस्तार पृथिवी के उन राष्ट्रों में भी सम्भव है, जहाँ वर्तमान में कोई भारतीय भले ही न रहता हो, लेकिन भारत के व्यापारियों, मजदूरों, कलाकारों, कथाकारों, शिल्पकारों आदि के माध्यम से यहाँ का दर्शन और संस्कृति किसी समय में वहाँ उतरी अवश्य थी।

वस्तुत: भारतीयता मात्र शब्द नहीं एक भाव हैसंस्कृति हैअस्मिता हैअनुशासन है, दर्शन है। जैसे हिन्दुओं में बहुदेव के प्रति आस्था हैवैसे ही भारतीयों में सर्वधर्म समभाव की भावना हैलेकिन सर्वधर्म समभाव में और थोपे गये ‘सेक्यूलरिज्म’ में सैद्धान्तिक अन्तर है। भारतीय हृदयवह संसार के किसी भी भाग में क्यों न रहता होसर्वधर्म समभाव में विश्वास करता है और उसका अनुकरण भी करता है। अभी तक का अनुभव यह है कि सेक्युलर मानसिकता का व्यक्तिआन्तरिक रूप से अपने जन्मजात धर्म से जुड़ा रहता है और मौका मिलते ही उसकी गोद में बैठ दूसरे धर्मावलम्बियों पर पत्थर फेंकना शुरू कर देता है। उमेश महादोषी की 'जेहाद का दूसरा चेहरा' शीर्षक लघुकथा में रूबिया ऐसी ही सेक्युलर पात्र है। सेक्युलरिज्म वस्तुतः एक लबादा हैजिसे आवश्यकतानुसार लोग ओढ़ते और उतारकर फेंकते रहे हैं। पारखी आँखें जैसे ओढ़ी हुई खाल के भीतर भेड़िए को पहचान लेती हैं वैसे ही ओढ़े हुए सेक्युलरिज्म को भी व्यक्ति के एक ही वाक्य से पहचान लेती हैं। भारतीयता वस्तुत: मानवीय दर्शन का ही दूसरा नाम है। यही कारण है कि विश्वभर में इससे युक्त प्रत्येक व्यक्ति विश्वसनीय बना हुआ है।        (आगामी अंक में जारी…)

लघुकथा में भारतीयता-2 /बलराम अग्रवाल

लघुकथा में भारतीयता-1 से आगे जारी…

अन्तरा करवड़े की लघुकथा ‘गाँव की लड़की’ भारतीयता की भावना से ओतप्रोत है। सन्तोष यह कि उसे पहचानने वाली आँखें भी उस पब्लिक स्कूल के प्रांगण में मौजूद थीं जहाँ वह प्राइमरी कक्षा की टीचर के तौर पर इंटरव्यू देने गयी थी। तात्पर्य यह कि अंग्रेजी माध्यम शिक्षा के बावजूद देश में भारतीय संस्कार अभी शेष है और उसे पहचानने वालेउसको सम्मान देने वाले भी अभी मौजूद हैं।

‘हिन्दी की कालजयी लघुकथाएँ’ में प्रो. बी. एल. आच्छा की यह टिप्पणी द्रष्टव्य है—‘बलराम अग्रवाल की 'गोभोजन कथासाम्प्रदायिक कट्टरता की जमी हुई काई को छितराकर उदात्त मानवीय संवेदन को जगा देने का सहज विन्यास है। जातिवर्णमजहबभाषाभूगोलसंस्कृतिरंग के अनेक विभेद हमारे उदात्त सोच को कठोर परतों में बदल देते हैंपर जब भी ये चट्टानें किसी मानवीय वेदना से उपजे दर्दीले प्रवाह से टकराती हैंतो सहकार की भीतरी परतें सजल हो जाती हैं। अभाव और पीड़ाएँ जब हाहाकार मचाते हैंतो चेहरे पर आई मुद्राएँ इन कठोर परतों को भी हिला-डुलाकर अपने मानवीय राग से साक्षात् करवा देती हैं। यह कथा नाटकीय अन्दाज में शुरू होती हैदृश्यात्मक संवेदनों में कदम भरती हैपर अन्त तक आते-आते मानवीय स्पर्श के द्रवणांक में पिघल जाती है।’ यह मानवीय स्पर्श ही भारतीयता है।

       भारतीय दर्शन मुक्ति की कामना का दर्शन है। प्रत्येक बन्धनप्रत्येक मोहप्रत्येक गलित परम्परारीतिरिवाजयहाँ तक कि त्याज्य संस्कार से भी मुक्ति का विज्ञान भारतीय दर्शन है। इस सत्य को उर्मि कृष्ण की लघुकथा ‘दृष्टि’ में देखा जा सकता है जिसमें विधवा बहू से सास कहती है—‘बेटीहमारे युगों के संस्कार हमारी बेड़ियाँ बन गये हैं।’ उत्तर में बहू उसे बताती है—‘मम्मीआप तो पढ़ी-लिखी हैं। समझदार हैं। अनुभवों की गठरी आपके पास है। फिर इन बेड़ियों को गहना क्यों बना रही हैं?’ 

भारतीय समाज में ये बेड़ियाँ एक ही प्रकार की नहीं हैं। मधुदीप की ‘खुरण्ड’ में ये बेड़ियाँ अलग प्रकार की हैं। शकुन्तला किरण की ‘अप्रत्याशित’ में ये बेड़ियाँ अलग प्रकार की हैं। सुधा भार्गव ने भी ‘बेड़ियों की जकड़न’ शीर्षक से एक लघुकथा लिखी है। बेड़ियाँ जहाँ नहीं टूट पा रही हैं वहाँ अलग तरह की कसमसाहट और कुंठा है।

यह समझ लेना आवश्यक है कि भारतीय अस्मिता का, भारतीय चेतना का प्रसार ही आवश्यक नहीं है, उसका संरक्षण भी आवश्यक है। भारतीयता के संरक्षण का मार्ग भी एकदम ॠजु नहीं है, उसमें अन्य अनेक संस्कृतियाँ भी आ मिली हैं जिनके कारण कहीं-कहीं यह टेड़ा-मेड़ा और संघर्ष भरा भी है। शकुन्तला किरण ने ‘तार’ में इसे चित्रित किया है। ‘तार’ में दर्ज संवादों को पढ़कर ॠग्वेद के ‘यम-यमी संवाद’ का याद हो आना स्वाभाविक है। युवा आवेगों से हमारी पारम्परिक दृष्टि जानबूझकर लगभग अपरिचित रहती है। इस अबोधता को हम मूल्यों से जोड़कर देखने लगती है। शकुन्तला किरण की ‘धुँधला दर्पण’ का यही कथ्य है। उनका लघुकथा लेखन 1980 तक ही चला। उनकी मात्र 13 या 14 लघुकथाएँ मिलती हैं लेकिन उनमें ‘चेकिंग’ और ‘शॉप इंसपेक्टर’ जैसी टकराव के तेवर वाली लघुकथाओं में तत्कालीन आपात्काल के घिनौने चित्रों को साहसपूर्ण ढंग से उकेरा गया है। लघुकथा ‘इमरजेंसी’ में उनके द्वारा प्रयुक्त संकेत अनुकरणीय हैं। आशा के विपरीत पापा क्रूर चरित्र वाली माँ के पक्ष में बेटी पर ही बरस पड़ते हैं—“…आज सत्ताईस साल हो गये मुझे इस घर को धकाते-धकाते। पर, पिछले सात-आठ वर्ष से इसके आने के बाद थोड़ा चैन मिला है।…” यह वस्तुत: पिता नहीं, पिता पर माँ का आतंक बोल रहा है। अब संकेत को खोलते हैं—भारत में संविधान लागू हुआ 1948 में। उसके बाद 27 साल यानी सन् 1975, आपात्काल का आगाज। ‘पिछले सात-आठ वर्ष से चैन मिला है’ यानी 1975 ॠण 8=1967 से इन्दिरा गाँधी का सत्ता में आना। पापा को आतंकित देख बेटी सोचती है—‘आखिर अभी उसे रहना तो इसी घर में है… सिर्फ रहना ही क्यों, खाना भी है, पढ़ना भी है…’ यानी समय की प्रतिकूलता देखते हुए मौन रहने की नीति का अनुसरण बेटी करती है।

   भारतीयता वर्जनाओं में नहीं, वर्जनाओं के रोध में है। बस, मन शुद्धि और साहस से भरा होना चाहिए। सुधा भार्गव की लघुकथा ‘अनुभूति’ से यह आभास मिलता है। उनकी लघुकथा ‘कीमत’ में भी यही गुण है। भारतीय संस्कार ‘कीमत’ की नायिका महक के कारण रमणीय हैसंस्कार का यह रमणीय गुण ही भारतीयता है। ‘सुहागन’ में उनकी नायिका कहती है— ‘कोई औरत बूढ़ी नहीं होती, जब तक उसका पति जिन्दा होता है।’

   कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर की लघुकथा ‘इन्जीनियर की कोठी’ में इन्जीनियर साहब कहते हैं, “आनेवाले हमें मान के साथ स्मरण करें या फिर गालियों के साथ, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारा आज का निर्णय किस कोटि का है।”

   मधुदीप की लघुकथा ‘मजहब’ में दर्ज दो पात्रों के भारतीय और अभारतीय संस्कार को देखा जा सकता है। उनकी लघुकथा ‘राजनीति’ में वर्तमान राजनीति का घृणित चेहरा प्रकट होता है जो भारतीय चरित्र पर नये सिरे से बहस को आमन्त्रित करता-सा लगता है। भारतीय संविधान की आखिर वह कौन-सी धारा है जिसके चलते एक राजनेता किसी भी न्याय और दण्ड व्यवस्था पर सवारी गाँठता नजर आता है। उसे हटा क्यों नहीं दिया जाता। ‘तुम बहरे क्यों हो गये हो’ में भी मधुदीप भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य को दिखाते है। धर्म किस तरह आदमी को टूल बनाता है, यह उनकी ‘धर्म’ शीर्षक लघुकथा में अंकित है।

भारतीय संस्कार में स्त्री की दैहिक शुचिता भी एक प्रश्न खड़ा करती रही है। यह राम के काल में जिस प्रकार की है, महाभारत काल में वैसी नहीं है। सत्यवती विवाह पूर्व व्यास जी की और कुन्ती कर्ण की माँ बन चुकी थी। द्रोपदी के पाँच पति कहे जाते हैं। इसके बावजूद कुन्ती और द्रोपदी दोनों को पंचकन्याओं (अहल्या, मंदोदरी, तारा, कुन्ती और द्रोपदी) में गिना जाता है। स्पष्ट है कि भारतीय दर्शन में शुचिता एक अलग ही तरह का भाव है जो देह से सर्वथा भिन्न है।

युगल की लघुकथा ‘तीर्थयात्रा’ दाम्पत्य प्रेम  की उच्चता का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करती है। परस्पर प्रेम का अन्यतम उदाहरण सतीश राठी की ‘संवाद’ लघुकथा भी प्रस्तुत करती है। सुकेश साहनी की ‘ठण्डी रजाई’ जिस द्वन्द्व को पाठक के सम्मुख प्रस्तुत करती है, वह सहज मानवीय द्वन्द्व है और सहज मानवीय द्वन्द्व ही भारतीयता है, वह चाहे संसार के किसी भी समुदाय के किसी भी व्यक्ति में क्यों न हो।

डॉ॰ कमल किशोर गोयनका ने लघुकथा को जीवन की आलोचना कहा है। उनका कहना है कि ‘मानवीय जीवन इसका उत्स-बिंदु ही नहीं है, इसके बीज से जो वृक्ष बनता है, उस पर जो फूल-पत्तियाँ जन्म लेती हैं, वे सब मानव जीवन को ही रूपायित करती हैं। लघुकथा मानव-जीवन से ओतप्रोत है, उसे आत्मसात् किए है, उसका वास्तविक प्रतिबिम्ब है।’ इस सब के मद्देनजर ही वह स्थापना देते हैं कि ‘जिस रूप में लघुकथाकारों ने लघुकथा के अस्तित्व को स्थापित करने तथा उसे निरन्तर बलशाली, युगधर्म के अनुरूप एवं सन्दर्भ से परिपूर्ण विधा बनाने का सफल प्रयास किया है, वह साहित्य के इतिहास में एक अनूठा उदाहरण ही माना जाएगा।’

इस देश का नेतृत्व आम आदमी को भावुक बनाकर किस तरह छलता आ रहा है, इस ओर सचेत करती है शंकर पुणतांबेकर की लघुकथा ‘आम आदमी’। रामेश्वर काम्बोज हिमांशु की ‘ऊँचाई’, अशोक भाटिया की ‘फैसला’ और रूप देवगुण की ‘जगमगाहट’ में भारतीयता के ऊँचे-नीचे, स्तुत्य और भयावह सभी पक्षों का दर्शन मिलता है। समकालीन लघुकथाकारों में अनेक ऐसे हैं जिन्होंने असंगत हो चुकी अनेक परम्परागत विचारधाराओं पर सवाल उठाए हैं, उन पर चोट की है।

अशोक भाटिया की ‘भीतर का सच’ में परम्परागत भारतीय सोच पर संवादात्मक विमर्श मिलता है तो ‘कपों की कहानी’ में पारम्परिक और प्रगतिशील मन के मध्य द्वन्द्व। ‘आत्मालाप’ में वह बताते हैं कि अकेलापन बुढ़ापे का पर्याय है। ‘बीसवीं सदी की आखिरी शाम’ में दर्ज करते हैं कि मूल्यों की कितनी गिरावट के साथ हम इक्कीसवीं सदी में प्रविष्ट हुए हैं। भारतीय जनमानस जाति, उपजाति, गोत्रादि जैसे किन-किन चोंचलों में अभी भी फँसा है, इन सब पर गहरी चोट करती है उनकी लघुकथा ‘पहचान’। संध्या तिवारी भी ‘जन्म-जन्मांतर’ में गहरी चोट करती हैं, लेकिन अलग तरह से। संध्या जी ‘चप्पल के बहाने’ में भी एक विमर्श को आमन्त्रित करती हैं। अशोक भाटिया की ‘कोण’ और ‘रिश्ते’ भारतीयता की भावना को अच्छे-से प्रस्तुत करती हैं। पाश्चात्य संस्कृति ने भी भारतीय रीति-रिवाजों, चाल-चलनों आदि पर समुचित प्रभाव डाला है। अशोक भाटिया की ‘सच्चा प्यार’ इसका अच्छा उदाहरण है।

मूल्य परिवर्तन’ में माधव नागदा स्त्री-पुरुष के आचार का भी अंकन करते हैं और उनके रूढ़ मन का भी। भारतीय संस्कृति ने विशेषकर लड़कियों के लिए अनेक वर्जनाएँ निश्चित की हुई हैं। इन वर्जनाओं पर अनेक लघुकथाकारो ने अनेक लघुकथाएँ रची हैं। इनमें चित्रा मुद्गल की ‘दूध’ और माधव नागदा की ‘उलझन में शताब्दियाँ’ का उल्लेख आवश्यक है। माधव नागदा बताते हैं कि मनुष्य के जीवन में ‘खरा सोना’ आज्ञाकारी सन्तान है, और कुछ नहीं। लघुकथा ‘कर्मयोगी’ में खेत को जोत रहे किसान को योग-प्रशिक्षक द्वारा अभिवादन कराकर माधव नागदा कर्म की महत्ता को प्रतिष्ठित करते हैं। मधु जैन की ‘अस्तित्व’ भारतीयता के नये द्वार खोलती है। ‘वह जो नहीं कहा’ (स्नेह गोस्वामी) की नायिका सुबह से शाम तक पति के न होने को एन्जॉय करती है लेकिन अन्तत: कह उठती है—‘पर फिर भी तुम्हें मिस कर रही हूँ। अपनी मीटिंग जल्दी से खत्म करो और कल आ जाओ। मुझे नींद नहीं आ रही है।’ तात्पर्य यह कि ‘ये लो मैं हारी पिया, हुई तेरी जीत रे!’ स्त्री और पुरुष दोनों का जीवन-साथी के प्रति यह समर्पण भाव ही भारतीयता है। इस लघुकथा का यह अंत नहीं है, सिर्फ समापन है। लघुकथा तो इसके बाद प्रारम्भ होती है। सबसे बड़ी बात यह कि इस पूरी रचना के शब्द-शब्द में नायिका अनुपस्थित पति को उलाहने सुनाती हुई एक अल्हड़ भारतीय युवती के रूप में विद्यमान है। अपने सारे उलाहने वह पति के सम्मुख शायद न कह पाती हो। इस रचना को पढ़ते हुए जयशंकर प्रसाद की ‘कलावती की शिक्षा’ भी  अनायास याद आ जाती है।

समकालीन लघुकथा के कुछ संकलन भारतीय संस्कार की ऊँचाई-नीचाई को रेखांकित करने की दृष्टि से भी प्रकाशित किए गये हैं। गत वर्ष वसुधा गाडगिल और अन्तरा करवड़े ने ‘छिति जल पावक गगन समीर’ को केन्द्र में रखकर लघुकथाएँ रचनी प्रारम्भ की हैं। इनमें जल तत्व पर केन्द्रित लघुकथाओं का संग्रह ‘धारा’ नाम से प्रकाशित हो चुका है। इन दिनों वे अग्नि तत्व पर केन्द्रित लघुकथाओं की रचना में रत हैं। लता अग्रवाल ने भारतीय संस्कृति के महान ग्रन्थ महाभारत को केन्द्र में रखकर लिखी अपनी 121 लघुकथाएँ ‘गान्धारी नहीं हूँ मैं’ नाम से प्रकाशित की हैं। ‘माँ के आसपास’ शीर्षक से कथाकार प्रतापसिंह सोढ़ी के, ‘बुजुर्ग जीवन की लघुकथाएँ’ शीर्षक से सुरेश शर्मा के तथा ‘लघुकथाएँ जीवन-मूल्यों की’ शीर्षक से सुकेश साहनी व रामेश्वर काम्बोज हिमांशु के सम्पादन में मूल्यवान लघुकथा संकलन आए हैं। कुछ अन्य सकथाकारों के भी संस्कृति केन्द्रित लघुकथा संग्रह आए हैं और यह धारा सतत जारी है।   (समाप्त)