सोमवार, 27 जुलाई 2026

‘दोई दो’ : भारतेंदु की कलम से नि:सृत एक लोककथा / बलराम अग्रवाल

'हिन्दी की पहली लघुकथा' सम्बन्धी मेरा एक शोधालेख ‘साहित्य अमृत’ के लघुकथा विशेषांक, जनवरी 2017 में प्रकाशित हुआ था। उस ओर मेरी खोज निरन्तर जारी रही, अभी भी जारी है। उस दिशा में कार्य करते हुए भारतेन्दु हरिश्चन्द्र रचित कुछ रचनाओं के संकलन ‘परिहासिनी’ की एक प्रामाणिक प्रति राजस्थान के एक पुस्तकालय में मुझे मिली, जिसे उपलब्ध कराने का पूरा श्रेय लघुकथा पर विपुल साहित्य प्रस्तुत कर चुके, सादुलपुर, राजस्थान के डॉ॰ रामकुमार घोटड़ को है। ‘परिहासिनी’ का जिक्र हमें सबसे पहले वाराणसी से डॉ॰ हरीश शर्मा के सम्पादन में प्रकाशित ‘भारतेन्दु समग्र’ में मिला था। वहीं से हमने भारतेन्दु की ‘अंगहीन धनी’ और ‘अद्भुत संवाद’ सरीखी मारक लघुकथाएँ प्राप्त कीं और आगामी खोज होने तक उन्हें हिन्दी की पहली लघुकथा माना। लेकिन डॉ॰ हरीश शर्मा द्वारा लिखित सम्पादकीय टिप्पणी ने कुछ मित्रों को इस भ्रम में डाल दिया कि ‘परिहासिनी’ भारतेन्दु की मौलिक कृति न होकर संकलित कृति है, इसलिए उपर्युक्त रचनाओं के लेखक का नाम स्पष्ट न होने के कारण इन्हें भारतेन्दु की रचना नहीं माना जा सकता। ‘परिहासिनी’ की जो प्रति हमें मिली है, उसे खड्गविलास प्रेस, बांकीपुर, पटना से सन् 1889 में क्षत्रियपत्रिका सम्पादक म॰ कु॰ बाबू रामदीन सिंह ने प्रकाशित किया है। पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर लिखा है—‘परिहासिनी अर्थात् हँसी, दिल्लगी, पंच, चोज की बातें और चुटकिले। भारत भूषण भारतेन्दु श्री हरिश्चन्द्र लिखित।’

‘भारतेन्दु समग्र’ के सम्पादक डॉ॰ हरीश शर्मा ने इस कृति का प्रकाशन काल 1876 से 1880 के बीच लिखा है। बहुत सम्भव है कि उन्होंने अनुमान के आधार पर ऐसा लिखा हो; और यह भी सम्भव है कि म॰ कु॰ बाबू रामदीन सिंह द्वारा प्रकाशित ‘परिहासिनी’ 1876-80 के मध्य प्रकाशित कृति का संशोधित, परिवर्द्धित संस्करण हो, यद्यपि इसे ‘प्रथम बार’ प्रकाशित बताया गया है और 70 पृष्ठीय इस कृति का तत्कालीन मूल्य है—मात्र छ: आना यानी आज की मुद्रा में मात्र छत्तीस पैसे। एक बात और, डॉ॰ हरीश शर्मा द्वारा सम्पादित ‘भारतेन्दु समग्र’ के ‘परिहासिनी’ खण्ड में बहुत-सी ऐसी रचनाएँ नहीं है, जो म॰ कु॰ बाबू रामदीन सिंह द्वारा प्रस्तुत संकलन में हैं। उक्त संग्रह से एक ऐसी रचना यहाँ प्रस्तुत है, जो लोककथा के रूप में बहु-प्रचलित है। कुछ लोककथाओं में इसे कालिदास से जोड़कर भी सुनाया जाता है। बहरहाल, इसका लिखित, प्रकाशित रूप सर्वप्रथम भारतेंदु जी की प्रस्तुत ‘परिहासिनी’ में ही मिलता है इसलिए मुक्तकंठ से इसे हिन्दी खड़ी बोली की पहली लिखित कहानी, लोककथा, लघुकथा में भी शामिल किया जा सकता है। लोककथा के रूप में प्रचलित होने के बावजूद अपने कथा-गुणों के कारण यह रचना भी अपने आकलन के लिए आ खड़ी हुई है, इसका स्वागत किया जाना चाहिए। यह रचना निश्चित रूप से भारतेन्दु के जीवन-काल में किसी पत्र-पत्रिका में अवश्य छपी होगी। उसे तलाशकर तय करना होगा कि इसका प्रथम प्रकाशन काल क्या है और यह किस पत्र/पत्रिका में सबसे पहले छपी। इस कथा-रचना में भारतेन्दु द्वारा अपनाई गयी ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा के प्रति उनकी सदाशयता का प्रमाण है। अपने समय की स्त्री को वे कितनी बुद्धिमती, साहसी, ममतामयी और गरिमामयी प्रस्तुत करते हैं, यह भी उल्लेखनीय है। रचना की वर्तनी को मैंने यथासम्भव ज्यों का त्यों ही लिखा है, तथापि यथानुरूप पैरा अपनी ओर से जरूर सेट किए हैं।

दोई दो/भारतेन्दु हरिश्चन्द्र 'परिहासिनी' (1889 संस्करण; सम्पादक:म. कु. रामदीन सिंह)

चार यार परदेस निकले। एक रोज चलते-चलते इनको प्यास लगी और रास्ते में कहीं पानी नहीं मिलता था। इत्तिफाकन, एक गाँव के किनारे एक दरख्त के साये में जा बैठे। इतने में कुछ फासले पर कुछ औरतें एक कुएँ पर पानी भरती दिखलाई पड़ीं। इस पर एक बोला, “मुझसे तो अब प्यास साधी नहीं जाती। सो, मैं तो कुएँ पर जा पानी माँगकर पीऊँगा।”

ऐसा कह चल खड़ा हुआ और कुएँ पर जाकर एक औरत से कहा, “बाई-2, मुझे पानी पिला दे।”

यह सुन उस औरत ने पूछा, “आप कौन हैं?”

उसने कहा, “मैं मुसाफिर हूँ।”

औरत ने कहा, “मुसाफिर तो दुनिया में दो हैं; आप तीसरे कौन? इसका जवाब दो, तो पानी पिलाऊँ।”

यह सुन, आप लौटे और अपने साथियों से सब हाल कहा। इस पर दूसरा बोला, “मैं जाता हूँ।”

यह कह चल दिया। जाकर उसी औरत से कहा, “बाई-2, मुझे पानी पिला दे।”

उसने पूछा, “आप कौन हैं?”

उसने कहा, “मैं गुण्डा हूँ।”

यह सुन उस औरत ने कहा, “गुण्डे तो दुनिया में दो हैं! आप तीसरे कौन हैं?”

इस पर आप को भी जवाब न आया और लौटकर अपने साथियों से कहा। यह हाल सुन, तीसरा उठा और कुएँ पर जाकर कहा, “बाई-2, मुझे पानी पिला दे।”

उसने पूछा, “आप कौन हैं?”

उसने कहा, “हम गरीब हैं।”

औरत ने कहा, “गरीब तो दुनिया में दो हैं! आप तीसरे कौन?”

यह सुन आप भी अपना-सा मुँह ले लौटे। यह माजरा सुन, चौथा भी चला और जाकर कहा, “बाई-2, मुझे पानी पिला दे।”

उसने कहा, “तुम कौन हो?”

उसने कहा, “हम लुच्चे हैं!”

यह सुन औरत ने कहा, “लुच्चे तो दुनिया में दो हैं! आप तीसरे कौन? इसका जवाब दो, तो पानी पिलाऊँ।”

इनसे भी कुछ जवाब न बन पड़ा। आप भी लौट आये।

इतने में, उस औरत ने सिर पर घड़ा धर, घर की राह ली और घर में घड़ा रख, एक लौटे में पानी भर, और दौने में चार लड्डू रख आँचल से ढौंक, ले चली; और जाकर, जहाँ चारों आदमी ठहरे थे, पहुँची और चारों को एक-2 लड्डू खिला पानी पिला रही थी कि ये सब माजरा उसका देख, किसी ने उसके घरवाले के पास आकर कहा कि तुम्हारी औरत को चार आदमी भगाए लिये जाते हैं।”

वो सुनते ही राजा के पास दौड़ा गया और सब हाल कहा। राजा ने दस-पन्द्रह आदमी भेज इन्हें उस औरत के साथ अपने दरबार में पकड़ बुलाया और सब हाल पूछा। उन्होंने सब जैसे का तैसा कह सुनाया। सब बातें न राजा ने उस औरत से दोई दो के माने पूछे। औरत ने कहा, “हुजूर, मुसाफिर दो—एक सूरज, दूसरा चाँद। गुण्डे दो—एक अन्न, दूसरा जल। गरीब दो—एक लड़की, दूसरी गाय; और लुच्चे दो… अगर मेरी जान बक्शी जाय तो बतलाऊँ!”

राजा ने कहा, “अच्छा, कहो!”

औरत ने कहा, “एक लुच्चा तो मेरा खाविंद है जो बिना समझे आपसे रिपोर्ट की और दूसरे लुच्चा आप हैं जो मुझ-सी पतिव्रता स्त्री को कचहरी में बुला खुला-खुली इजहार लेते हैं!

मैंने कुएँ पर पानी इनको इस सबब से नहीं पिलाया कि एक तो यह भूखे थे और दूर धूप के मारे चले आये। इससे मैंने यह मुनासिब समझा, कि इनको कुछ खिलाकर पानी पिलाना चाहिए।”

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