सोमवार, 27 जुलाई 2026

लघुकथा में भारतीयता-1 /बलराम अग्रवाल

 किसी भी देश का उत्थान वहाँ की दार्शनिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर ही आधारित होता है। एक उन्नत देश जब कभी भी, किसी काल विशेष में पतन को प्राप्त होता है तो मुख्य रूप से उसके दो ही कारण होते हैं। पहलावहाँ के समाज ने राष्ट्र के उत्थान की दार्शनिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को विकृत रूप से स्वीकार कर लिया हो। दूसराअपने दार्शनिक और सांस्कृतिक सिद्धान्तों की जानकारी रखते हुए भी वहाँ के नागरिक दैनिक व्यावहारिक जीवन में उन सिद्धान्तों का उपयोग न करते हों। याद रखें, असुर वही कहलाता है जो  सुरों की जानकारी होते हुए भी उनके नियम का अनुपालन नहीं करता है। सुरों की जानकारी से विहीन लोग बेसुरे कहे जा सकते हैं, असुर नहीं। भारत की वर्तमान स्थिति का सूक्ष्म अवलोकन करने पर पता लगेगा कि यहाँ का जनमानस उपरोक्त दोनों कारणों से प्रभावित होलम्बे समय से भ्रमित और किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में रहा है। इसी कारण यहाँ का जनमानस लगातार अर्थाभाव के गर्त में धँसता और पराधीन होता गया है। पराधीनता हमारे यहाँ एकाएक नहीं, शनै: शनै: आयी है।

स्वाधीनता व्यक्ति के विचार में, भाषा में, खान-पान, रहन-सहन में दिखाई देनी चाहिए, न कि अनर्गल बयानबाजी में। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अर्थ आज का बड़े से बड़ा पत्रकार और लेखक भी सही-सही समझता है, यह संदेहास्पद है। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर आज जो दिखाई दे रहा है, वह उच्छृंखलता है, स्वतन्त्रता का विक्षिप्त रूप है। इसीलिए देश में अपसंस्कृति का समुचित फैलाव हुआ है, संस्कृति की लगातार छिछालेदर हो रही है। याद रखें, लक्ष्मी का एक नाम चंचला भी है। तात्पर्य यह कि धन कभी भी स्थिर होकर एक स्थान पर नहीं टिकता। उसका प्रवाह वर्तुलाकार होता है। भारतीय जन जिस धन के पीछे भाग रहा है, वह धन आज भी अनेक बहुराष्ट्रीय वस्तुओं की खरीद के, ऐशो-आराम के संसाधन जुटाने के माध्यम से विदेश की ओर भाग रहा है। भारतीय मेधा का हाल आज यह है कि ‘दुनिया (अनेक बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ) है मेरे पीछे लेकिन मैं तेरे (धन के) पीछे, अपना बना ले मेरी जान, हाए मैं तेरे कुर्बान!’ इस हविश ने हमारे चिन्तन की, हमारी संस्कृति की दशा-दिशा को संवेदनहीन स्वार्थपरता और अपसंस्कार में बदल दिया है। समकालीन हिन्दी लघुकथाकारों ने इस संवेदनहीनता, स्वार्थपरता और अपसंस्कृत चाल-चलन को रेखांकित करती अनगिनत लघुकथाएँ साहित्य को दी हैं। यही नहीं, उन्होंने संवेदनशीलता, परहित कातरता और सांस्कृतिक उच्चता का आदर्श प्रस्तुत करती लघुकथाएँ भी यथेष्ट गुणवत्ता के साथ साहित्य को दी हैं। उमेश महादोषी की लघुकथा ‘वो दहलीज’ में भारतीय संस्कार की उच्चता का अंकन उल्लेखनीय है।

साहित्य और कला भारतीय जीवन-पद्धति के अभिन्न अंग हैं। जीवन से अलग उनकी स्वतन्त्र स्थिति नहीं है। साहित्य में कथा, कथा में भी लघुकथा; मेरा मानना है कि जीवन में कला और लघुकथा रक्त, मांस, मज्जा यहाँ तक साँस के आने-जाने जितनी घुली-मिली हैं। इनकी प्रतीति ऐन्द्रिय नहीं, लगभग अतीन्द्रिय होती है। तभी कोई कलाकार, कोई कथाकार कुछ रच पाता है।

‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने पुस्तक के ‘आधुनिक गद्य : संवत् 1900 से 1925 तक’ खण्ड में ‘उदंत मार्तण्ड’ को ‘संवाद पत्र’ बताते हुए लिखा है—‘यह पत्र एक ही वर्ष चलकर सहायता के अभाव में बंद हो गया। इसमें ‘खड़ी बोली’ का ‘मध्यदेशीय भाषा’ के नाम से उल्लेख किया गया है।’ सही तथ्य यह है कि हिन्दी के इस प्रथम साप्ताहिक का प्रथम अंक 30 मई सन् 1826 को प्रकाशित हुआ था और सरकारी सहायता के अभाव में मात्र 79 अंक प्रकाशित करने के बाद पौष बदी 1, 1884 (तदनुसार, मंगलवार 4 दिसम्बर 1827) को लगभग डेढ़ साल बाद इसका प्रकाशन स्थगित कर देना पड़ा था। इसके कुछ अंकों में इसके संपादक जुगल किशोर सुकुल (कुछ लोग इस नाम को शुद्ध करके ‘युगल किशोर शुक्ल’ भी लिखते हैं, मूलत: वह जुगल तथा सुकुल ही लिखते थे, युगल और शुक्ल नहीं) ने ‘ठट्ठे की बात’ शीर्ष के अन्तर्गत कुछ लघु-आकारीय गद्य कथाएँ प्रकाशित की थीं। उनमें से एक को उक्त काल के गद्य का नमूना प्रस्तुत करने की दृष्टि से शुक्ल जी ने उद्धृत किया, लेकिन वे इसमें कथा की उपस्थिति नहीं देख पाए क्योंकि वह युग कथा के लघु रूप को देख पाने का था ही नहीं और न ऐसा अनुमान ही किसी तत्कालीन आलोचक को रहा होगा कि भविष्य में कथा के लघु रूप का विकास भी हिन्दी करेगी। यहाँ प्रस्तुत है, ‘उदंत मार्तंड’ के आषाढ़ वदी 8, संवत् 1883 (तदनुसार मंगलवार, 27 जून 1826 / नोट : यह पत्र प्रत्येक मंगलवार को प्रकाशित होता था।) अंक में प्रकाशित उक्त रचना :

एक यशी वकील वकालत का काम करते-करते बुड्ढा होकर अपने दामाद को यह काम सौंप के आप सुचित हुआ।

दामाद कई दिन काम करके एक दिन आया ओ प्रसन्न होकर बोला, "हे महाराज! आपने जो फलाने का पुराना वो संगीन मोकद्दमा हमें सौंपा थासो आज फैसला हुआ।"

यह सुनकर वकील पछता करके बोला, "तुमने सत्यानाश किया। उस मोकद्दमे से हमारे बाप बड़े थेतिस पीछे हमारे बाप मरती समय हमें हाथ उठाकर के दे गए ओ हमने भी उसको बना रखा ओ अब तक भलीभाँति अपना दिन कटा ओ वही मोकद्दमा तुमको सौंपकर समझा था कि तुम भी अपने बेटे-पोते-परोतों तक पलोगेपर तुम थोड़े से दिनों में उसे खो बैठे।"

अधिक से अधिक धन कमाने की लालसा ने न्याय का जो ध्वंस ब्रिटिशकाल के वकीलों की बदौलत हुआ, उसे भारतीय वकीलों ने भी अपने ही जातिभाइयों का गला काटते हुए जारी रखा। ‘ठट्ठे की बात’ में इस सत्य को गहराई से अंकित किया गया है।

लघ्वाकारीय कथाओं की अनदेखी ही वह कारण रहा कि उपन्यास के नाम पर भारतेंदु की अधूरी रचना ‘एक अद्भुत अपूर्व स्वप्न’ को तो बार-बार उद्धृत किया जाता रहा,  पूर्ण होते हुए भी परिहासिनी’ की किसी रचना का कभी कोई नोटिस नहीं लिया गया, उन्हें नवीन दृष्टि से देखने की कभी आवश्यकता ही नहीं समझी गयी जबकि इसमें छपी ‘अद्भुत संवाद’ एक उद्देश्यपूर्ण रचना है। इस पुस्तिका का हास-परिहास से इतर कभी संज्ञान नहीं लिया गया और न ही ‘ब्रिटिश शासन का कथापरक प्रतिरोध’ के रूप में कहीं उल्लेख किया गया। उद्वेलन का दायित्व लघुकथाएँ नकारात्मक चरित्रों की प्रस्तुति के माध्यम से भी उतनी ही शिद्दत से निभाती हैं जितनी शिद्दत से विद्रोही और सकारात्मक चरित्रों की प्रस्तुति के माध्यम से। कथा के इन दोनों ही प्रकारों में मुख्य भूमिका नि:संदेह कथाकार के कौशल की होती है। सकारात्मक विद्रोह प्रस्तुत करने का सफल उदाहरण भारतेंदु हरिश्चन्द्र की रचना ‘अद्भुत संवाद’ है। यह रचना गाँधी जी के ‘सविनय अवज्ञा’ की आधारभूमि है, भले ही उन्होंने इसे कभी पढ़ा न हो। देखिए :

“एजरा हमारा घोड़ा तो पकड़े रहो।”

“यह कूदेगा तो नहीं?”

“कूदेगा! भला कूदेगा क्योंलो सँभालो।”

“यह काटता है?”

“नहीं काटेगालगाम पकड़े रहो।”

“क्या इसे दो आदमी पकड़ते हैं। तब सम्हलता है?”

“नहीं !”

“फिर हमें क्यों तकलीफ देते हैंआप तो हई हैं।”

कोई माने न माने, हिन्दी लघुकथा साहित्य में यह सविनय अवज्ञा अथवा प्रतिरोध की प्रथम प्रस्तुति है जिसका सूत्रपात भारतेंदु की कलम से हुआ था और ‘अद्भुत संवाद’ उसका अन्यतम उदाहरण है। एक भारतेंदु ही थे, जिन्होंने चुटकुलों को जन-उद्बोधन का माध्यम बनाया। लेकिन ब्रिटिश पराधीनता के विरुद्ध अपने इस संदेश को वे मुखर होकर अपने अन्य साथी लेखकों में प्रचारित नहीं कर पाए। उन्होंने ‘समझदार को इशारा ही काफी’ में विश्वास किया और यथेष्ट  सहयोग पाने में लगभग असफल ही रहे। परिणाम यह रहा कि उनके काल के ‘प्रेमघन’ आदि अनेक लेखकों ने चुटकुले तो बहुत लिखे, लेकिन वे चुटकुलों के माध्यम से ब्रिटिश विरोध और जन-उद्बोधन के भारतेंदु के उद्देश्य को नहीं पहचान पाए, सामान्य चुटकुलाकार की तरह सतही गुदगुदाहट ही देते रहे। एक बात और, भारतेंदु की ‘परिहासिनी’ के मुखपृष्ठ पर शब्द ‘चुटकुला’ नहीं ‘चुटकिला’ छपा है। ‘चुटकी’ शब्द वैद्यक में घरेलू इलाज के लिए प्रयुक्त होता रहा है जिसका एक उदाहरण सन् 1957 में देहाती पुस्तक भण्डार, दिल्ली से अमोलचन्द्र शुक्ला ‘सोमरस’ के सम्पादन में प्रकाशित ‘साधू की चुटकी (सन्यासी चिकित्सा शास्त्र)’ है। इसके अलावा स्वाधीनता संग्राम काल में प्रकाशित कुछ ऐसी पुस्तकों का भी पता चला है जिनके मुखपृष्ठ पर वैद्यक आदि की किताब दर्शाया गया था जबकि अन्दर बहुत-सी सामग्री स्वाधीनता आंदोलन को बनाए रखने और तेज करने सम्बन्धी है। इसी से भारतेंदु द्वारा प्रयुक्त ‘चुटकिला’ शब्द के निहित अर्थ भी समझे जा सकते हैं।

स्वाधीनता अथवा पराधीनता केवल भूखण्ड विशेष तक ही सीमित नहीं रहतीं, इनका विस्तार जन-जन के मन और मस्तिष्क तक होता है। पराधीन देश की सिर्फ सम्पत्ति ही नहीं लूटी जाती, ज्ञान सम्पदा और अभिव्यक्ति की आजादी भी लूट ली जाती है। मुझे अक्सर ही महसूस होता है कि हम भारतीयसंस्कृति और दर्शन की उस चोटी पर पहुँच चुकी जाति रहे हैंजिस पर या तो धैर्य और साहस के साथ टिके रहना होता है; या फिर पतन निश्चित है। लेशमात्र विचलन भी उस अवस्था के समाज को नीचे लेजा सकता है। भारतीय समाज ने दर्शन और संस्कृति की उस उच्चतम चोटी पर युगों तक पाँव रखे हैं जिस पर गर्व किया जा सकता है। लेकिन लज्जित भी हमें कम नहीं होना चाहिए कि हम अनुशासित और एकजुट नहीं रह सके। इस विचलन के परिणामस्वरूप गत लगभग 700-800 वर्ष का त्रासपूर्ण इतिहास हमारे सामने है। देश को स्वाधीन हुए भी लगभग 75 वर्ष होने को आए लेकिन स्वाधीनता के उचित अर्थों से हम आज भी परिचित नहीं हैं। या तो हम किसी विचार का अंध-समर्थन करते हैं या फिर अंध-विरोध। विचार का विवेकपूर्ण आकलन करने का विकास हम स्वयं में नहीं कर पाये। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उसके लिए भी हमें विदेशी आकलनकर्ताओं की ओर ताकना पड़ता है। अगर एकपक्षीय विचार के पोषक हैं तो राष्ट्र और उसकी संस्कृति के विकास में आप सहायक सिद्ध नहीं हो सकते।

किसी भी राष्ट्र की अस्मिता के तीन अवयव होते हैं—राष्ट्र, राष्ट्री और राष्ट्रीयता। भारत के सम्बन्ध में इन्हें भारत, भारती (अथवा भारतीय) तथा भारतीयता कह सकते हैं। इनमें भारत एक भौगोलिक भूखण्ड है, भारती उक्त भूखण्ड की सीमा के अंतर्गत निवास करने वाले उसके नागरिक हैं (वे किसी भी धर्म, सम्प्रदाय और समुदाय के क्यों न हों); परन्तु भारतीयता इन दोनों से अलग अत्यन्त विस्तृत भाव है। अन्य दो की तरह यह शब्द मात्र नहीं है, बल्कि भारतभूमि का दर्शन और संस्कार है। इसलिए ‘भारतीयता’ का विस्तार पृथिवी के उन राष्ट्रों में भी सम्भव है, जहाँ वर्तमान में कोई भारतीय भले ही न रहता हो, लेकिन भारत के व्यापारियों, मजदूरों, कलाकारों, कथाकारों, शिल्पकारों आदि के माध्यम से यहाँ का दर्शन और संस्कृति किसी समय में वहाँ उतरी अवश्य थी।

वस्तुत: भारतीयता मात्र शब्द नहीं एक भाव हैसंस्कृति हैअस्मिता हैअनुशासन है, दर्शन है। जैसे हिन्दुओं में बहुदेव के प्रति आस्था हैवैसे ही भारतीयों में सर्वधर्म समभाव की भावना हैलेकिन सर्वधर्म समभाव में और थोपे गये ‘सेक्यूलरिज्म’ में सैद्धान्तिक अन्तर है। भारतीय हृदयवह संसार के किसी भी भाग में क्यों न रहता होसर्वधर्म समभाव में विश्वास करता है और उसका अनुकरण भी करता है। अभी तक का अनुभव यह है कि सेक्युलर मानसिकता का व्यक्तिआन्तरिक रूप से अपने जन्मजात धर्म से जुड़ा रहता है और मौका मिलते ही उसकी गोद में बैठ दूसरे धर्मावलम्बियों पर पत्थर फेंकना शुरू कर देता है। उमेश महादोषी की 'जेहाद का दूसरा चेहरा' शीर्षक लघुकथा में रूबिया ऐसी ही सेक्युलर पात्र है। सेक्युलरिज्म वस्तुतः एक लबादा हैजिसे आवश्यकतानुसार लोग ओढ़ते और उतारकर फेंकते रहे हैं। पारखी आँखें जैसे ओढ़ी हुई खाल के भीतर भेड़िए को पहचान लेती हैं वैसे ही ओढ़े हुए सेक्युलरिज्म को भी व्यक्ति के एक ही वाक्य से पहचान लेती हैं। भारतीयता वस्तुत: मानवीय दर्शन का ही दूसरा नाम है। यही कारण है कि विश्वभर में इससे युक्त प्रत्येक व्यक्ति विश्वसनीय बना हुआ है।        (आगामी अंक में जारी…)

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