लघुकथा में भारतीयता-1 से आगे जारी…
अन्तरा करवड़े की लघुकथा ‘गाँव की लड़की’ भारतीयता की भावना से ओतप्रोत है। सन्तोष यह कि उसे पहचानने वाली आँखें भी उस पब्लिक स्कूल के प्रांगण में मौजूद थीं जहाँ वह प्राइमरी कक्षा की टीचर के तौर पर इंटरव्यू देने गयी थी। तात्पर्य यह कि अंग्रेजी माध्यम शिक्षा के बावजूद देश में भारतीय संस्कार अभी शेष है और उसे पहचानने वाले, उसको सम्मान देने वाले भी अभी मौजूद हैं।
‘हिन्दी की कालजयी लघुकथाएँ’ में प्रो. बी. एल. आच्छा की यह टिप्पणी द्रष्टव्य है—‘बलराम अग्रवाल की 'गोभोजन कथा' साम्प्रदायिक कट्टरता की जमी हुई काई को छितराकर उदात्त मानवीय संवेदन को जगा देने का सहज विन्यास है। जाति, वर्ण, मजहब, भाषा, भूगोल, संस्कृति, रंग के अनेक विभेद हमारे उदात्त सोच को कठोर परतों में बदल देते हैं, पर जब भी ये चट्टानें किसी मानवीय वेदना से उपजे दर्दीले प्रवाह से टकराती हैं, तो सहकार की भीतरी परतें सजल हो जाती हैं। अभाव और पीड़ाएँ जब हाहाकार मचाते हैं, तो चेहरे पर आई मुद्राएँ इन कठोर परतों को भी हिला-डुलाकर अपने मानवीय राग से साक्षात् करवा देती हैं। यह कथा नाटकीय अन्दाज में शुरू होती है, दृश्यात्मक संवेदनों में कदम भरती है, पर अन्त तक आते-आते मानवीय स्पर्श के द्रवणांक में पिघल जाती है।’ यह मानवीय स्पर्श ही भारतीयता है।
भारतीय दर्शन मुक्ति की कामना का दर्शन है। प्रत्येक बन्धन, प्रत्येक मोह, प्रत्येक गलित परम्परा, रीति, रिवाज, यहाँ तक कि त्याज्य संस्कार से भी मुक्ति का विज्ञान भारतीय दर्शन है। इस सत्य को उर्मि कृष्ण की लघुकथा ‘दृष्टि’ में देखा जा सकता है जिसमें विधवा बहू से सास कहती है—‘बेटी, हमारे युगों के संस्कार हमारी बेड़ियाँ बन गये हैं।’ उत्तर में बहू उसे बताती है—‘मम्मी, आप तो पढ़ी-लिखी हैं। समझदार हैं। अनुभवों की गठरी आपके पास है। फिर इन बेड़ियों को गहना क्यों बना रही हैं?’
भारतीय समाज में ये बेड़ियाँ एक ही प्रकार की नहीं हैं। मधुदीप की ‘खुरण्ड’ में ये बेड़ियाँ अलग प्रकार की हैं। शकुन्तला किरण की ‘अप्रत्याशित’ में ये बेड़ियाँ अलग प्रकार की हैं। सुधा भार्गव ने भी ‘बेड़ियों की जकड़न’ शीर्षक से एक लघुकथा लिखी है। बेड़ियाँ जहाँ नहीं टूट पा रही हैं वहाँ अलग तरह की कसमसाहट और कुंठा है।
यह समझ लेना आवश्यक है कि भारतीय अस्मिता का, भारतीय चेतना का प्रसार ही आवश्यक नहीं है, उसका संरक्षण भी आवश्यक है। भारतीयता के संरक्षण का मार्ग भी एकदम ॠजु नहीं है, उसमें अन्य अनेक संस्कृतियाँ भी आ मिली हैं जिनके कारण कहीं-कहीं यह टेड़ा-मेड़ा और संघर्ष भरा भी है। शकुन्तला किरण ने ‘तार’ में इसे चित्रित किया है। ‘तार’ में दर्ज संवादों को पढ़कर ॠग्वेद के ‘यम-यमी संवाद’ का याद हो आना स्वाभाविक है। युवा आवेगों से हमारी पारम्परिक दृष्टि जानबूझकर लगभग अपरिचित रहती है। इस अबोधता को हम मूल्यों से जोड़कर देखने लगती है। शकुन्तला किरण की ‘धुँधला दर्पण’ का यही कथ्य है। उनका लघुकथा लेखन 1980 तक ही चला। उनकी मात्र 13 या 14 लघुकथाएँ मिलती हैं लेकिन उनमें ‘चेकिंग’ और ‘शॉप इंसपेक्टर’ जैसी टकराव के तेवर वाली लघुकथाओं में तत्कालीन आपात्काल के घिनौने चित्रों को साहसपूर्ण ढंग से उकेरा गया है। लघुकथा ‘इमरजेंसी’ में उनके द्वारा प्रयुक्त संकेत अनुकरणीय हैं। आशा के विपरीत पापा क्रूर चरित्र वाली माँ के पक्ष में बेटी पर ही बरस पड़ते हैं—“…आज सत्ताईस साल हो गये मुझे इस घर को धकाते-धकाते। पर, पिछले सात-आठ वर्ष से इसके आने के बाद थोड़ा चैन मिला है।…” यह वस्तुत: पिता नहीं, पिता पर माँ का आतंक बोल रहा है। अब संकेत को खोलते हैं—भारत में संविधान लागू हुआ 1948 में। उसके बाद 27 साल यानी सन् 1975, आपात्काल का आगाज। ‘पिछले सात-आठ वर्ष से चैन मिला है’ यानी 1975 ॠण 8=1967 से इन्दिरा गाँधी का सत्ता में आना। पापा को आतंकित देख बेटी सोचती है—‘आखिर अभी उसे रहना तो इसी घर में है… सिर्फ रहना ही क्यों, खाना भी है, पढ़ना भी है…’ यानी समय की प्रतिकूलता देखते हुए मौन रहने की नीति का अनुसरण बेटी करती है।
भारतीयता वर्जनाओं में नहीं, वर्जनाओं के रोध में है। बस, मन शुद्धि और साहस से भरा होना चाहिए। सुधा भार्गव की लघुकथा ‘अनुभूति’ से यह आभास मिलता है। उनकी लघुकथा ‘कीमत’ में भी यही गुण है। भारतीय संस्कार ‘कीमत’ की नायिका महक के कारण रमणीय है, संस्कार का यह रमणीय गुण ही भारतीयता है। ‘सुहागन’ में उनकी नायिका कहती है— ‘कोई औरत बूढ़ी नहीं होती, जब तक उसका पति जिन्दा होता है।’
कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर की लघुकथा ‘इन्जीनियर की कोठी’ में इन्जीनियर साहब कहते हैं, “आनेवाले हमें मान के साथ स्मरण करें या फिर गालियों के साथ, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारा आज का निर्णय किस कोटि का है।”
मधुदीप की लघुकथा ‘मजहब’ में दर्ज दो पात्रों के भारतीय और अभारतीय संस्कार को देखा जा सकता है। उनकी लघुकथा ‘राजनीति’ में वर्तमान राजनीति का घृणित चेहरा प्रकट होता है जो भारतीय चरित्र पर नये सिरे से बहस को आमन्त्रित करता-सा लगता है। भारतीय संविधान की आखिर वह कौन-सी धारा है जिसके चलते एक राजनेता किसी भी न्याय और दण्ड व्यवस्था पर सवारी गाँठता नजर आता है। उसे हटा क्यों नहीं दिया जाता। ‘तुम बहरे क्यों हो गये हो’ में भी मधुदीप भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य को दिखाते है। धर्म किस तरह आदमी को टूल बनाता है, यह उनकी ‘धर्म’ शीर्षक लघुकथा में अंकित है।
भारतीय संस्कार में स्त्री की दैहिक शुचिता भी एक प्रश्न खड़ा करती रही है। यह राम के काल में जिस प्रकार की है, महाभारत काल में वैसी नहीं है। सत्यवती विवाह पूर्व व्यास जी की और कुन्ती कर्ण की माँ बन चुकी थी। द्रोपदी के पाँच पति कहे जाते हैं। इसके बावजूद कुन्ती और द्रोपदी दोनों को पंचकन्याओं (अहल्या, मंदोदरी, तारा, कुन्ती और द्रोपदी) में गिना जाता है। स्पष्ट है कि भारतीय दर्शन में शुचिता एक अलग ही तरह का भाव है जो देह से सर्वथा भिन्न है।
युगल की लघुकथा ‘तीर्थयात्रा’ दाम्पत्य प्रेम की उच्चता का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करती है। परस्पर प्रेम का अन्यतम उदाहरण सतीश राठी की ‘संवाद’ लघुकथा भी प्रस्तुत करती है। सुकेश साहनी की ‘ठण्डी रजाई’ जिस द्वन्द्व को पाठक के सम्मुख प्रस्तुत करती है, वह सहज मानवीय द्वन्द्व है और सहज मानवीय द्वन्द्व ही भारतीयता है, वह चाहे संसार के किसी भी समुदाय के किसी भी व्यक्ति में क्यों न हो।
डॉ॰ कमल किशोर गोयनका ने लघुकथा को जीवन की आलोचना कहा है। उनका कहना है कि ‘मानवीय जीवन इसका उत्स-बिंदु ही नहीं है, इसके बीज से जो वृक्ष बनता है, उस पर जो फूल-पत्तियाँ जन्म लेती हैं, वे सब मानव जीवन को ही रूपायित करती हैं। लघुकथा मानव-जीवन से ओतप्रोत है, उसे आत्मसात् किए है, उसका वास्तविक प्रतिबिम्ब है।’ इस सब के मद्देनजर ही वह स्थापना देते हैं कि ‘जिस रूप में लघुकथाकारों ने लघुकथा के अस्तित्व को स्थापित करने तथा उसे निरन्तर बलशाली, युगधर्म के अनुरूप एवं सन्दर्भ से परिपूर्ण विधा बनाने का सफल प्रयास किया है, वह साहित्य के इतिहास में एक अनूठा उदाहरण ही माना जाएगा।’
इस देश का नेतृत्व आम आदमी को भावुक बनाकर किस तरह छलता आ रहा है, इस ओर सचेत करती है शंकर पुणतांबेकर की लघुकथा ‘आम आदमी’। रामेश्वर काम्बोज हिमांशु की ‘ऊँचाई’, अशोक भाटिया की ‘फैसला’ और रूप देवगुण की ‘जगमगाहट’ में भारतीयता के ऊँचे-नीचे, स्तुत्य और भयावह सभी पक्षों का दर्शन मिलता है। समकालीन लघुकथाकारों में अनेक ऐसे हैं जिन्होंने असंगत हो चुकी अनेक परम्परागत विचारधाराओं पर सवाल उठाए हैं, उन पर चोट की है।
अशोक भाटिया की ‘भीतर का सच’ में परम्परागत भारतीय सोच पर संवादात्मक विमर्श मिलता है तो ‘कपों की कहानी’ में पारम्परिक और प्रगतिशील मन के मध्य द्वन्द्व। ‘आत्मालाप’ में वह बताते हैं कि अकेलापन बुढ़ापे का पर्याय है। ‘बीसवीं सदी की आखिरी शाम’ में दर्ज करते हैं कि मूल्यों की कितनी गिरावट के साथ हम इक्कीसवीं सदी में प्रविष्ट हुए हैं। भारतीय जनमानस जाति, उपजाति, गोत्रादि जैसे किन-किन चोंचलों में अभी भी फँसा है, इन सब पर गहरी चोट करती है उनकी लघुकथा ‘पहचान’। संध्या तिवारी भी ‘जन्म-जन्मांतर’ में गहरी चोट करती हैं, लेकिन अलग तरह से। संध्या जी ‘चप्पल के बहाने’ में भी एक विमर्श को आमन्त्रित करती हैं। अशोक भाटिया की ‘कोण’ और ‘रिश्ते’ भारतीयता की भावना को अच्छे-से प्रस्तुत करती हैं। पाश्चात्य संस्कृति ने भी भारतीय रीति-रिवाजों, चाल-चलनों आदि पर समुचित प्रभाव डाला है। अशोक भाटिया की ‘सच्चा प्यार’ इसका अच्छा उदाहरण है।
‘मूल्य परिवर्तन’ में माधव नागदा स्त्री-पुरुष के आचार का भी अंकन करते हैं और उनके रूढ़ मन का भी। भारतीय संस्कृति ने विशेषकर लड़कियों के लिए अनेक वर्जनाएँ निश्चित की हुई हैं। इन वर्जनाओं पर अनेक लघुकथाकारो ने अनेक लघुकथाएँ रची हैं। इनमें चित्रा मुद्गल की ‘दूध’ और माधव नागदा की ‘उलझन में शताब्दियाँ’ का उल्लेख आवश्यक है। माधव नागदा बताते हैं कि मनुष्य के जीवन में ‘खरा सोना’ आज्ञाकारी सन्तान है, और कुछ नहीं। लघुकथा ‘कर्मयोगी’ में खेत को जोत रहे किसान को योग-प्रशिक्षक द्वारा अभिवादन कराकर माधव नागदा कर्म की महत्ता को प्रतिष्ठित करते हैं। मधु जैन की ‘अस्तित्व’ भारतीयता के नये द्वार खोलती है। ‘वह जो नहीं कहा’ (स्नेह गोस्वामी) की नायिका सुबह से शाम तक पति के न होने को एन्जॉय करती है लेकिन अन्तत: कह उठती है—‘पर फिर भी तुम्हें मिस कर रही हूँ। अपनी मीटिंग जल्दी से खत्म करो और कल आ जाओ। मुझे नींद नहीं आ रही है।’ तात्पर्य यह कि ‘ये लो मैं हारी पिया, हुई तेरी जीत रे!’ स्त्री और पुरुष दोनों का जीवन-साथी के प्रति यह समर्पण भाव ही भारतीयता है। इस लघुकथा का यह अंत नहीं है, सिर्फ समापन है। लघुकथा तो इसके बाद प्रारम्भ होती है। सबसे बड़ी बात यह कि इस पूरी रचना के शब्द-शब्द में नायिका अनुपस्थित पति को उलाहने सुनाती हुई एक अल्हड़ भारतीय युवती के रूप में विद्यमान है। अपने सारे उलाहने वह पति के सम्मुख शायद न कह पाती हो। इस रचना को पढ़ते हुए जयशंकर प्रसाद की ‘कलावती की शिक्षा’ भी अनायास याद आ जाती है।
समकालीन लघुकथा के कुछ संकलन भारतीय संस्कार की ऊँचाई-नीचाई को रेखांकित करने की दृष्टि से भी प्रकाशित किए गये हैं। गत वर्ष वसुधा गाडगिल और अन्तरा करवड़े ने ‘छिति जल पावक गगन समीर’ को केन्द्र में रखकर लघुकथाएँ रचनी प्रारम्भ की हैं। इनमें जल तत्व पर केन्द्रित लघुकथाओं का संग्रह ‘धारा’ नाम से प्रकाशित हो चुका है। इन दिनों वे अग्नि तत्व पर केन्द्रित लघुकथाओं की रचना में रत हैं। लता अग्रवाल ने भारतीय संस्कृति के महान ग्रन्थ महाभारत को केन्द्र में रखकर लिखी अपनी 121 लघुकथाएँ ‘गान्धारी नहीं हूँ मैं’ नाम से प्रकाशित की हैं। ‘माँ के आसपास’ शीर्षक से कथाकार प्रतापसिंह सोढ़ी के, ‘बुजुर्ग जीवन की लघुकथाएँ’ शीर्षक से सुरेश शर्मा के तथा ‘लघुकथाएँ जीवन-मूल्यों की’ शीर्षक से सुकेश साहनी व रामेश्वर काम्बोज हिमांशु के सम्पादन में मूल्यवान लघुकथा संकलन आए हैं। कुछ अन्य सकथाकारों के भी संस्कृति केन्द्रित लघुकथा संग्रह आए हैं और यह धारा सतत जारी है। (समाप्त)
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