हिन्दी में कहानी की सबसे पहली पुस्तकें अपने अत्यन्त अपरिपक्व रूप में 16वीं शताब्दी में गोकुलनाथकृत ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ तथा ‘दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता’ को माना जाता है । इनके बाद विक्रम संवत् 1680 में जटमल रचित ‘गोरा बादल की कथा’, जिसका आधार एक ऐतिहासिक घटना थी, आती है। तत्पश्चात् 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक गद्य में कोई अन्य कथा-पुस्तक नहीं मिलती। उपेन्द्रनाथ अश्क लिखते हैं कि—इसका यह मतलब नहीं कि उस समय घटनाएँ नहीं होती थीं, या कहानी सुनने-सुनाने में किसी की रुचि न थी । कारण यह था कि लोग जो कुछ सुनना या सुनाना चाहते थे, काव्य द्वारा ही सुनना-सुनाना चाहते थे। ‘प्रेम मार्गी सूफी शाखा’ के कवियों ने पद्य में ही कहानियाँ लिखीं। जायसी का ‘पद्मावत’ इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। गद्य में कहानी न लिखे जाने का दूसरा कारण यह भी था कि उस समय आज की तरह छापेखाने की सुविधाएँ न थीं। इसलिए कहानी कही-सुनी तो खूब जाती रही, अपने लिखित साहित्यिक रूप में सामने न आ सकी। जो भी हो, 16वीं-17वीं शताब्दी के बाद 19वीं शताब्दी में ही हिन्दी गद्य को कुछ उत्तेजना मिली।
गद्य में लघुकथा-लेखन की परम्परा विकसित न होने और कथा-लेखन में काव्य की ही प्रधानता बनी रहने के कारण सन् 1800 ई. तक के काल को ‘लघुकथा का वैदिक युग’ कहना श्रेयस्कर होगा।
सन् 1801 ई. से सन् 1900 ई. तक
सन् 1800 ई. से 1825 ई. तक का काल गद्यपरक कथा लेखन के किसी प्रमाण का अभी तक भी अंधेरे में है। बहुत सम्भव है कि भविष्य में ऐसा कोई प्रमाण कोई शोधार्थी खोज निकाले। खड़ीबोली के प्रयोग के सम्बन्ध में सन् 1803 ई. में सदल मिश्र ने ‘नासिकेतोपाख्यान’ में लिखा है—‘अब संवत् 1860 में ‘नाशिकेतोपाख्यान’ को, जिसमें चन्द्रावती की कथा कही है, देववाणी से कोई-कोई समझ नहीं सकता, इसलिए ‘खड़ीबोली’ में किया।’
30 मई 1826 ई. को पं॰ जुगल किशोर शुकुल के संपादन में कलकत्ते से छपा हिन्दी का प्रथम (साप्ताहिक) पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ ऐसी ऐतिहासिक घटना है जिसके पीछे हिन्दी गद्य-निर्माण की विराट संभावनाएँ छिपी थीं। उसमें ‘लघुकथा’ की दृष्टि से ‘यशी वकील’ शीर्षक यह उद्धरण उल्लेखनीय है :
एक यशी वकील वकालत का काम करते-करते बुड्ढा होकर अपने दामाद को यह काम सौंप के आप सुचित हुआ। दामाद कई दिन काम करके एक दिन आया ओ प्रसन्न होकर बोला, ‘हे महाराज! आपने जो फलाने का पुराना वो संगीन मोकद्दमा हमें सौंपा था, सो आज फैसला हुआ।’ यह सुनकर वकील पछता करके बोला, ‘तुमने सत्यानाश किया। उस मोकद्दमे से हमारे बाप बड़े थे, तिस पीछे हमारे बाप मरती समय हमें हाथ उठाकर के दे गए ओ हमने भी उसको बना रखा ओ अब तक भलीभाँति अपना दिन कटा ओ वही मोकद्दमा तुमको सौंप कर समझा था कि तुम भी अपने बेटे-पोते-परोतों तक पलोगे; पर तुम थोड़े से दिनों में उसे खो बैठे।’
उन्नीसवीं सदी में प्रकाशित, अभी तक प्राप्त यह पहली गद्य-कथा है। यह रचना ‘ठट्ठे की बात’ स्तम्भ तले ‘उदंत मार्तंड’ के आषाढ़ वदी 8 संवत् 1883 (ईस्वी सन् के हिसाब से यह दिन बुधवार, 12 जुलाई 1826 ई. पड़ता है) अंक में प्रकाशित हुई थी। इस पत्र मे छपी ‘बहुत मोटा और बड़ा आदमी’, ‘लूट की छूट’ आदि शीर्षक रचनाएँ/खबरें भी ‘कथापन’ की दृष्टि से खोज का विषय हैं।
इसके बाद, प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 ई. से पहले हिन्दी के अनेक पत्र अकेले कलकत्ता से प्रकाशित हुए। इनमें ‘बंगदूत’, ‘प्रजामित्र’, ‘सामदंत मार्तंड’ और हिन्दी का प्रथम दैनिक समाचार-पत्र ‘सुधावर्षण’ शामिल हैं।
सन् 1900 ई. (विक्रम संवत् 1957) से पूर्व हिन्दी के जो पत्र-पत्रिकाएँ अस्तित्व में आये, उनकी सूची निम्न प्रकार है—
1- अलमोड़ा-अखबार सं॰ 1928 (सन्1871) संपादक : सदानन्द मालवीय
2- हिन्दी दीप्ति-प्रकाश सं॰ 1929 (सन्1872) संपादक : कार्तिकप्रसाद खत्री
3- बिहार-बंधु सं॰ 1929 (सन्1872) संपादक : केशवराम भट्ट
4- सदादर्श सं॰ 1931 (सन्1874) संपादक : श्रीनिवास दास
5- काशी-पत्रिका सं॰ 1933 (सन्1876) संपादक : लक्ष्मीशंकर मिश्र
6- भारत-बंधु सं॰ 1933 (सन्1876) संपादक : तोताराम
7- भारत-मित्र सं॰ 1934 (सन्1877) संपादक : रुद्रदत्त
8- मित्र-विलास सं॰ 1934 (सन्1877) संपादक : कन्हैयालाल
9- हिन्दी-प्रदीप सं॰ 1934 (सन्1877) संपादक : बालकृष्ण भट्ट
10- आर्य्य-दर्पण सं॰ 1934 (सन्1877) संपादक : बख्तावर सिंह
11- सार सुधा-निधि सं॰ 1935 (सन्1878) संपादक : सदानन्द मिश्र
12- उचित वक्ता सं॰ 1935 (सन्1878) संपादक : दुर्गाप्रसाद मिश्र
13- सज्जनकीर्ति-सुधाकर सं॰ 1936 (सन्1879) संपादक : बंशीधर
14- भारतसुदशा-प्रवर्त्तक सं॰ 1936 (सन्1879) संपादक : गणेश प्रसाद
15- आनन्द कादम्बिनी सं॰ 1939 (सन्1882) संपादक : उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’
16- देश-हितैषी सं॰ 1939 (सन्1882) संपादक : मुंशी मुन्ना लाल शर्मा, अजमेर
17- शुभचिन्तक सं॰ 1940 (सन्1883) संपादक : सीताराम
18- सदाचार मार्तंड सं॰ 1940 (सन्1883) संपादक : लाला लालचंद्र शास्त्री
19- हिन्दुस्तान सं॰ 1940 (सन्1883) संपादक : राजारामपालसिंह, इंग्लैंड
20- दिनकर-प्रकाश सं॰ 1940 (सन्1883) संपादक : रामदास वर्मा
21- धर्म-दिवाकर सं॰ 1940 (सन्1883) संपादक : देवीसहाय
22- प्रयाग-समाचार सं॰ 1940 (सन्1883) संपादक : देवकीनन्दनत्रिपाठी
23- ब्राह्मण सं॰ 1940 (सन्1883) संपादक : प्रतापनारायणमिश्र
24- भारत-जीवन सं॰ 1941 (सन्1884) संपादक : रामकृष्ण वर्मा
25- भारतेंदु सं॰ 1941 (सन्1884) संपादक : रामचरण गोस्वामी
26- कविकुलकंज-दिवाकर सं॰ 1941 (सन्1884) संपादक : रामनाथ शुक्ल
27- पीयूष-प्रवाह सं॰ 1941 (सन्1884) संपादक : अम्बिकादत्त व्यास
इन पत्रिकाओं में कुछ केवल साहित्य-सेवा के उद्देश्य से प्रकाशित की गयी थीं, कुछ धार्मिक और सामाजिक सुधारों के उद्देश्य से तो कुछ के प्रकाशन का उद्देश्य दोनों ही रहे। इनके उत्तरोत्तर प्रचार से लाभ यह हुआ कि हिन्दी गद्य का साहित्यिक रूप दिन-प्रतिदिन परिष्कृत होने लगा। दूसरे, धीरे-धीरे वह अपरिमित प्रयोग में आने लगा। इन सभी पत्र-पत्रिकाओं में नहीं तो इनमें से अनेक में तत्कालीन कथा-लेखन के प्रयास अवश्य मिल सकते हैं, जिनकी पहचान की जानी आवश्यक है।
चुटकुले और चुटकिले अर्थात् उद्बोधक चुटकियाँ
समय के साथ-साथ गद्य के उद्देश्यों में भी परिस्थितियों के अनुसार बदलाव नजर आते हैं। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारतेन्दु ने अपने ही ढंग से निराली लड़ाई लड़ी। उन्होंने अपने समय में प्रचलित अनेक ‘चुटकुलों’ के साथ मिलाकर कुछ उद्देश्यपूर्ण ‘चुटकिले’ भी लिखे, स्वयं द्वारा सम्पादित पत्रों में तो उन्हें छापा ही, अपने समय की अन्य पत्र-पत्रिकाओं में भी छपवाया और उन सब को संकलित कर सन् 1875 ई. में ‘परिहासिनी’ नामक पुस्तिका प्रकाशित कर डाली (‘भारतेन्दु समग्र’ में उसके सम्पादक हेमन्त शर्मा ने ‘परिहासिनी’ का प्रकाशनकाल 1876-80 अनुमानित किया है)। ‘परिहासिनी’ में प्रचलित चुटकुलों के साथ अनेक स्वरचित उद्बोधक ‘चुटकिलों’ को सम्मिलित करने का उनका उद्देश्य अवश्य ही उस समय के उन राजभक्तों की आँख में धूल झोंकना रहा होगा जो लिखे गये एक-एक शब्द, एक-एक वाक्य पर गिद्ध-दृष्टि रखते थे तथा अपने अंग्रेज आकाओं की नजर में खरा बने रहने की कवायद में कवियों-लेखकों-पत्रकारों और प्रेस पर निषेधाज्ञा लागू करने-कराने के नये-नये बहाने तलाशते थे। ‘परिहासिनी’ में यों तो अनेक उल्लेखनीय लघुकथाएँ हैं लेकिन जिस लघुकथा का उल्लेख सर्वोपरि माना जाता है, वह निम्नवत् है :
एक धनिक के घर उसके बहुत-से प्रतिष्ठित मित्र बैठे थे। नौकर बुलाने को घंटी बजी। मोहना भीतर दौड़ा, पर हँसता हुआ लौटा।
और नौकरों ने पूछा, “क्यों बे, हँसता क्यों है?”
तो उसने जवाब दिया, “भाई, सोलह हट्टे-कट्टे जवान थे। उन सभों से एक बत्ती न बुझे। जब हम गए, तब बुझे।”
खेद का विषय है कि भारतेंदु की यह ‘चुटकिला मुहिम’ उनसे आगे नहीं बढ़ पाई।
उन्होंने जहाँ कुछ सोद्देश्य चुटकियाँ लिखीं, वहीं प्रेमघन जी ने उन्हें मात्र मनोरंजनार्थ माना, समझा और लिखा। आगे निरर्थक मनोरंजन से आहत प्रतापनारायण मिश्र ने चुटीलेपन को लगभग त्यागने का ही संकल्प ले डाला। ‘ब्राह्मण’ के एक अंक में उन्होंने लिखा—‘जी बहलाने के लेख हमारे पाठकों ने बहुत-से पढ़ लिये। यद्यपि इनमें भी बहुत-सी समयोपयोगी शिक्षा रहती है, पर वाग्जाल में फँसी हुई ढूढ़ निकालने-योग्य। अत: अब हमारा विचार है कि कभी-कभी ऐसी बातें भी लिखा करें जो इस काल के लिए प्रयोजनीय हैं तथा हास्यपूर्ण न होके सीधी-सादी भाषा में हों। हमारे पाठकों का काम है कि उन्हें नीरस समझ के छोड़ न दिया करें तथा केवल पढ़ ही न डाला करें, वरंच उनके लिए तन से, धन से कुछ न हो सके तो वचन ही से यथावकाश कुछ करते भी रहें।’
इस उद्धरण से अनेक तथ्य स्पष्ट होते हैं। उनमें एक यह है कि हिन्दी भाषा-भाषी संसार साहित्य के ‘रस’ परिपाक से हटकर ‘शुष्कता’ की ओर बढ़ गया था और दूसरा यह कि पाठकों का गंभीर साहित्यिक और नैतिक उत्थान ही बाद के गद्यकारों का उद्देश्य बन गया था।
उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ीबोली गद्य
हिन्दी गद्य की जो सशक्त शैली, संवेदन-प्रस्तुति की जो क्षमता तथा उदार परंपरा आज हमें प्राप्त है, गद्य का जो वर्तमान स्वरूप हमारे सामने है, वह असंख्य हिन्दी-प्रेमियों और राष्ट्र-हितैषियों की निरंतर साधना का परिणाम है। 1857 ई. के बाद अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में भयंकर कठिनाइयों का सामना करते हुए भी उन्नीसवीं शताब्दी में गद्य-निर्माण की चेष्टा कितनी तेज और पुष्ट थी, इसका प्रमाण ‘कविवचन सुधा’ (1867 ई.), ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका’ (1873 ई.), ‘बिहार बंधु’ (1874 ई.; कहीं-कहीं इसका काल 1872 ई. भी लिखा है, लेकिन उस काल की फाइलें अप्राप्य हैं), ‘भारत मित्र’ (1878 ई.), ‘सार सुधानिधि’ (1879 ई.) और ‘उचितवक्ता (1880 ई.) के पन्नों पर लिखी इबारत है। इस काल के रचनाकारों, पत्रकारों, विचारकों, वक्ताओं ने कई-कई दायित्वों का निर्वाह एक-साथ किया। उन्होंने गद्य की भाषा को तो सँवारा ही, स्वयं को सुरक्षित रखते हुए स्वाधीनता आंदोलन में भी स्वयं को बनाये रखा। जिस तरह 1857 ई. में स्वाधीनता-सेनानियों ने ‘रोटी और कमल’ को परस्पर संकेत का ‘कोड’ बनाया था, भारतेंदु हरिश्चंद्र ने आग को सुलगाने और सुलगाए रखने का काम संकेत-प्रधान साहित्य रचकर किया। इस दिशा में उनकी रचना ‘अंधेर नगरी चौपट्ट राजा’ से तो सब परिचित हैं ही, ‘परिहासिनी’ से कम लोग परिचित हैं। इस पुस्तिका में उनके द्वारा रचित हास-परिहास, चोज की बातें और चुटकिले आदि संग्रहीत हैं। अनेक चुटकिलों के माध्यम से ही भारतेंदु ने जन-जागरण का दायित्व निर्वाह किया। वे अच्छी तरह जानते थे कि ब्रिटिश शासन से जुड़े छोटे-बड़े सभी अधिकारी लिखे और बोले जा रहे शब्दों पर ‘गिद्धों और कुत्तों’ जैसी चेष्टाएँ रखते हैं। गिद्ध की आँखें तेज होती हैं और कुत्ते के कान। इस तथ्य का एक प्रमाण हमें डॉ॰ प्रदीप जैन की पुस्तक ‘सोजे वतन, जब्ती की सच्चाई’ से मिलता है कि प्रेमचंद का पहला कहानी संग्रह ‘सोजे वतन’ अपने प्रकाशन के एक साल बाद ब्रिटिशकालीन सी आई डी द्वारा मात्र इसलिए संदिग्ध मान लिया गया कि उसकी बिक्री लाहौर में किताबों की उस दुकान से हो रही थी, जहाँ भगतसिंह के चाचा अजीतसिंह का लिखा क्रांतिकारी साहित्य बिकता था।
‘परिहासिनी’ के प्रकाशन का समय 1857 की क्रांति के मात्र 18 वर्ष बाद (सन् 1875 ई.) का है, जब ब्रिटिश खुफिया विभाग भारतीयों की हर गतिविधि को संदेह की दृष्टि से देखने का अभ्यस्त-सा हो गया था। ऐसे में भारतेंदु ने ‘परिहासिनी’ के मुखपृष्ठ पर ‘हँसी-दिल्लगी, पंच, चोज की बातें और चुटकिले’ लिखकर चालाक खेल खेला। उक्त पुस्तक के रूप में मीठे पानों से भरी जो तश्तरी अंग्रेज बहादुरों और उनके पिट्ठुओं के आगे पेश की, उसमें ‘अंगहीन धनी’ और ‘अद्भुत संवाद’ जैसे भी अनेक पान थे, जिनमें गुलकंद के रूप में वाजीकारक तत्व था, उत्प्रेरक और उद्वेलक।
पुस्तक संपादन का ‘परिहासिनी’ जैसा कौशल उनके बाद अन्य अनेक लेखक, संपादक उपयोग में लाते रहे। इसका एक प्रमाण राकेश पाण्डे ने अपनी ‘ब्रिटिश काल में प्रतिबंधित साहित्य में गाँधी’ नामक पुस्तक में किया है। उन्होंने 1941 में प्रतिबन्धित एक ऐसी पुस्तक से कुछ सामग्री प्रमाणस्वरूप प्रस्तुत की है, जिसके आवरण पर उसका नाम ‘वैद्य की लाचारी’ छपा है जबकि भीतरी पन्नों पर ‘बिरहा’ शैली में क्रांतिकारी गीत आदि छपे हैं। (आगामी अंक में जारी…)