सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

लघुकथा: परम्परा और विकास-1 / बलराम अग्रवाल





  •  दोस्तो, लघुकथा-वार्ता के इस अंक से शीघ्र प्रकाश्य अपनी आलोचना पुस्तक 'हिन्दी लघुकथा और मनोविज्ञान' का प्रकाशन शुरू कर रहा हूँ। इस पुस्तक के मुखपृष्ठ का चित्र सुप्रसिद्ध मित्र-चित्रकार के॰ रवीन्द्र के बनाया है। बहुत कृतघ्न हैं हम…शुक्रिया तक अदा करना नहीं जानते। इस अध्याय की आगामी कड़ी अगले सप्ताह। आप सब की सम्मतियों का  इंतज़ार रहेगा।----बलराम अग्रवाल


पहला अध्याय

पहली किस्त

आवरण : के. रवीन्द्र
समकालीन लघुकथा’ पर बात प्रारम्भ करने के क्रम में ‘लघुकथा’ पर बात का आ जाना सामान्य बात है। विकास की दृष्टि से ‘समकालीन लघुकथा’ पूर्वकालीन ‘लघुकथा’ से अनेक अर्थों में भिन्न है। इस बात को स्पष्ट करने के लिए ‘लघुकथा’ की पूर्वकालीन परम्परा और उसके समकालीन विकास, दोनों पर दृष्टिपात आवश्यक है। लघुकथा-साहित्य को हिन्दी, भारतीय एवं विश्व लघुकथा कोश प्रदान करने वाले प्रबुद्ध सम्पादक बलराम के अनुसार, ‘यह कहने में अब कोई संकोच नहीं है कि लघुकथा ने कथा-विधा के रूप में अपना एक स्वतन्त्र अस्तित्व कायम कर लिया है। लघुकथा न तो परवर्ती कथा-विधाओं की नकल है और न ही कहानी को काट-छाँटकर गढ़ी गई विधा; और न ही असफल कथाकारों की आइडेंटिटी का माध्यम मात्र।’

    लघुकथा की परम्परा के बारे में डाॅ. ब्रजकिशोर पाठक की बात मानें तोलघुकथा’ शब्द आज नया अवश्य है, परन्तु परम्परागत कहानी-लेखन में लघुकथाएँ पंच, परिहास, गल्प, गप्प, चुटकुला शब्दों के ही पर्याय हैं।’ वह लिखते हैं किद्विवेदी-युग में, निश्चित रूप से, समकालीन समस्याएँ कलात्मक गंभीरता के साथ अभिव्यक्त हुईं; परन्तु भारतेन्दु-युगीन चित्त-विनोदी गल्प-गप्प-परिहास कथा-परम्परा मरी नहीं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण है बाबू रामगुलाम ‘राम’ द्वारा संपादित ‘बजरंगी समाचार’ (सन् 1914-15)। इस मासिक में बहुतेरे चुटकुले लघुकथा की रूपाकृति में मुद्रित हैं।...परिहास, पंच और चुटकुलों की यह परम्परा प्रेमचंद-युग में कथा-लेखन से कट गई; लेकिन वह लोकगीतों की तरह लोककंठों में पुनः जा बसी।’

    यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि समाचार पत्र में लघुकथा की रूपाकृति में चुटकुले के प्रकाशन की परम्परा सन् 1826 में प्रकाशित 'उदन्त मार्तण्ड' ने शुरू कर दी थी।

    परम्परागत कहानी-लेखन में ‘लघुकथाओं’ के हास-परिहास, पंच और चुटकुलों का पर्याय होने की डाॅ. पाठक की बात से मैं समझता हूँ कि आम सहमति असम्भव ही है तथापि सातवें दशक के उत्तरार्द्ध से प्रारम्भ कर आठवें दशक के प्रथम पाँचेक वर्षों तक कमलेश्वर के सम्पादन में ‘सारिका’ में ‘लघुकथा’ शीर्ष-तले प्रकाशित होती रहने वाली अधिकांश रचनाएँ ऐसी ही होती थीं। बाद में व्यंग्य को ‘लघुकथा’ का मुख्य-अवयव कहा जाने लगा। हास-परिहास, पंच और चुटकुलों को साहित्य के स्तर पर ला खड़ा करने का श्रेय भी हिन्दी गद्य का जनक माने जाने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को ही जाता है। उनकी पुस्तक ‘परिहासिनी’ की रचनाओं पर विचार करते हुए बलराम अग्रवाल का मत है किअगर आज की दृष्टि से देखें तो भारतेन्दु बाबू की प्रस्तुत लघु रचनाओं में से अनेक विशुद्ध चुटकुला हैं। वे न तो कथा के वर्तमान स्तर तक परिष्कृत हैं और न आधुनिक व्यंग्य के स्तर तक। इनमें से अनेक तो आज चुटकुलों के रूप में प्रचलित भी हैं। हो सकता है कि उनके काल में भी इसी रूप में प्रचलित रही हों और यह भी हो सकता है कि वह स्वयं इनके रचयिता हों। जो भी हो, इन्हें कलमबद्ध कर, पुस्तक रूप में प्रकाशित करने वाले वह पहले व्यक्ति अवश्य हैं। भविष्य में कभी भी किसी के द्वारा अगर ‘चुटकुला’ पर शोध सम्भव हुआ तो कोई आश्चर्य नहीं कि हिन्दी में प्रथम चुटकुला-लेखक अथवा चुटकुला-लेखन के प्रणेता भी भारतेन्दु बाबू ही सिद्ध हों। बहरहाल, चुटकुला और व्यंग्य में मूल अन्तर यह है कि व्यंग्य आहत-मन से उपजा सांकेतिक स्वर है। मुद्रा में सहज रहकर भी तेवर में यह आक्रामक प्रकृति रखता है। चुटकुला न तो तेवर में आक्रामक होने की क्षमता रखता है और न ही प्रकृति में। इन दोनों से अलग व्यंग्य आक्षेपरहित रहकर प्रक्षेपित होता है। अभिव्यक्त होने के लिए यह किसी दर्शन-विशेष की प्रतीक्षा नहीं करता लेकिन अनुशासनबद्ध अवश्य रहता है। प्रतिपक्षी के लिए व्यंग्य मारक होता है और स्वपक्षी के लिए सुखद, आह्लादकारी और तुष्टिकारक। चुटकुला जीवन-क्षणों को प्रफुल्लित, आनन्दित और हास्यमय बनाने वाली सहज अभिव्यक्ति है। अन्य विषयों की तरह कोई शक नहीं कि यह भी अनेक बार जीवनानुभवों से ही उत्पन्न और निःसृत होता है परन्तु वैचारिक गम्भीरता से जो रिश्ता व्यंग्य का बनता है, वह चुटकुले का अक्सर नहीं बनता।’

    लघुकथा की ऐतिहासिकता सम्बन्धी खोज पर विचार रखते हुए दिनेश द्विवेदी कहते हैं, लघुकथा को स्टोरी या फिक्शन में खोजने की बजाय यदि गल्प में खोजा जाय तो बेहतर और सुविधाजनक होगा क्योंकि गल्प गप जरूर हो सकता है, मगर उसके तेवर, शैली, वक्रता और सम्पूर्णता में लघुकथा की समानता पैदा होती है।’

    ‘प्रतिनिधि लघुकथाएँ’ की भूमिका ‘पूर्वा’ में विष्णु प्रभाकर के वक्तव्य को उद्धृत करते हुए अपनी पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा’ में डाॅ. शकुन्तला किरण ने लिखा है कि कुछ विद्वान लघुकथा की परम्परा को प्राचीन ग्रन्थों-धर्मग्रन्थों, वेद, ब्राह्मण, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पंचतंत्र, हितोपदेश, कथासरित्सागर आदि को कथाओं-उपकथाओं से जोड़ते हैं। यथा; लघुकथा नयी दृष्टि नहीं है, प्राचीनकाल से इसका अस्तित्व नाना रूपों में रहा है। दृष्टान्त, रूपक और नीतिकथाएँ लघुकथा का ही रूप हैं।’ लगभग इसी तरह की बात शंकर पुणताम्बेकर भी कहते हैं, लघुकथा का इतिहास चाहें तो वेदों के काल से ही ट्रेस किया जा सकता है...ब्राह्मण और उपनिषद-ग्रन्थों की रूपक-कथाओं, पुराण-कथाओं, बौद्धों की जातक कथाओं आदि में हमें लघुकथा के सहज दर्शन प्राप्त हो सकते हैं...पंचतंत्र और हितोपदेश की कथाएँ भी अच्छी-खासी लघुकथाएँ कही जा सकती हैं।’

    लघुकथा की बात चले और भावनात्मक रूप से भारत की मिट्टी को, इसके प्राच्य ग्रंथों को श्रद्धा की दृष्टि से देखने वाला व्यक्ति इसका उत्स वेदों और पुराणों से न बताए, यह हो नहीं सकता। उदाहरण के लिए, लघुकथा का आद्य ग्रंथ हमारे वेद हैं अथर्वदेव के कथात्मक चिह्न अलौकिकता, आध्यात्मिकता, सृष्टि-मूल के व्याख्यायुक्त कथानकों से पूर्ण हैं। ऋग्वेद में कथात्मक उद्बोधन हैं जो प्रेरक, हृदयस्पर्शी तथा प्रभावपूर्ण हैं।’

    इस संदर्भ में हजारीप्रसाद द्विवेदी का यह कथन द्रष्टव्य है, भारतीय परम्परा यह है कि किसी भी नए शास्त्र के प्रवर्त्तन के समय उसका मूल ‘वेदों’ में अवश्य खोजा जाता है। वेद ज्ञानस्वरूप हैं, उनमें त्रिकाल का ज्ञान बीज रूप में सुरक्षित है। भारतीय मनीषी अपने किसी ज्ञान को अपनी स्वतन्त्र उद्भावना नहीं मानते।’

    इस सदाशयता के चलते ही खोज उपनिषद् आदि तक भी पहुँचती ही है। अपने एक लेख में चक्रधर नलिन लिखते हैं, उपनिषद् लघुकथाओं का भंडार हैं। पुराणों में असंख्य उद्बोधक बालकथाएँ यत्र-तत्र भरी पड़ी हैं। शतपथ ब्राह्मण, आरण्यक साहित्य, मैत्रायणी संहिता (1.5.12) में प्रचुर लघुकथाओं के दर्शन होते हैं। संस्कृत साहित्य में पंचतंत्र तथा हितोपदेश लघुकथाओं का आदि रूप हैं। ‘मैत्रायणी संहिता’ (1.5.12) में आदि लघुकथा का रूप मिलता है। शतपथ ब्राह्मण गंधर्व कथाओं का भंडार है। इस पर उपदेशात्मक प्रवृत्ति हावी है। उपनिषदों में दार्शनिक व्याख्या-युक्त अविस्मरणीय लघुकथाएँ हैं।
    अपभ्रंश एवं पालि साहित्य में लघुकथाओं की प्रचुरता है। बुद्ध जन्म के पूर्व की लघुकथाओं में उपदेश-वृत्ति प्रधान है। बुद्धकालिक लघुकथाओं में सामाजिक चित्रण की बहुलता है। इसमें राजा, भिक्षु, योद्धा, गृहस्थ एवं पुरोहित आदि संबंधी लघुकथाओं का समायोजन है। इनमें सामाजिक ज्ञान है। जातक लघुकथाओं (बुद्ध काल के बाद की) में कला और उपदेशात्मकता प्रबल है। जैन लघुकथाओं की वर्ण्य-सामग्री में डाकू, व्यापारी, राजा, यात्री गृहस्थ आदि संबंधी रोचकतापूर्ण कथाएँ और उपदेशक पद की सत्तर प्राकृत कथाएँ यथार्थ-बोध के साथ ही आदर्श-कथाओं से अन्तर्लघुकथाएँ गुम्फित अवश्य हैं, पर प्रत्येक में एक नई ज्ञान चेतना है। महाभारत जैसी लघुकथाएँ विश्व-साहित्य में दुर्लभ हैं। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में प्रकृति और जीव, पशुपक्षियों संबंधी लघुकथाएँ वर्णित हो जो उन्नत लघुकथा-यात्रा की प्रामाणिकता सिद्ध करती हैं।’
    लेकिन ‘लघुकथा’ को पश्चिम की देन मानने वाले भी अनेक विद्वान हिन्दी क्षेत्र में विद्यमान हैं। अब, पहली बात तो यह कि जहाँ तक वेद-पुराणों में इसके ‘बीज’ मिलने की बात है, यह स्पष्ट कर देना समीचीन ही है कि इसके बारे में प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी सांस्कृतिक समझ के दायरे में ही चक्कर काट रहा है। जैसे कि ‘फ्लैश फिक्शन’ के उत्स के बारे में पश्चिमी विचारकों का मत यह है कि, फ्लैश फिक्शन की जड़ें पीछे ईसप की कथाओं तक फैली हैं तथा अध्येताओं ने बोलेस्लाॅ प्रस, अन्तोन चेखव, ओ. हेनरी, फ्रैंज काफ्का, एच. पी. लवक्राफ्ट, आर्थर सी. क्लार्क, रे ब्रेडबरी, कुर्त वोने जूनियर, फ्रैडरिक ब्राउन और लीडिया डेविस के नाम भी इसमें शामिल कर लिए हैं।’ (Flash fiction has roots going back to Aesop's Fables, and practitioners have included Boles?aw Prus, Anton Chekhov, O. Henry, Franz Kafka, H.P. Lovecraft, Ernest Hemingway, Arthur C. Clarke, Ray Bradbury, Kurt Vonnegut, Jr., Fredric Brown and Lydia Davis.)
    और दूसरी बात यह कि वर्तमान लघुकथा का नये रूप में संस्कार पश्चिम में हुआ--इस कथन की पुष्टिस्वरूप कोई प्रमाण हमें नहीं मिलता है। इंटरनेट पर ‘विकिपीडिया, द फ्री एन्साइक्लोपीडिया’ ‘फ्लैश फिक्शन’ के बारे में यह जानकारी देता है, फ्लैश फिक्शन’ विधा की उत्पत्ति जेम्स थाॅमस, डेनिस थाॅमस एवं टाॅम हजूका द्वारा सन् 1992 में सम्पादित कृति ‘72 वेरी शाॅर्ट स्टोरीज़’ से मानी जानी चाहिए।...जैसा कि सम्पादकों ने प्राक्कथन में कहा है, ‘फ्लैश फिक्शन’ वह कथात्मक रचना है जो डाइजेस्ट आकार की साहित्यिक पत्रिका के आमने-सामने के दो पृष्ठों पर आ जाय या 750 शब्दों के आसपास की हो।’ (The term "Flash fiction" may have originated from a 1992 anthology of that title. (2) As the editors said in their introduction, their definition of a "flash fiction" was a story that would fit on two facing pages of a typical digest-sized literary magazine, or about 750 words.)
    इस संबंध में यह भी उल्लेखनीय है कि अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में लघुकथा सिर्फ लघुकथा नहीं है। उसके कुछ और भी नाम हैं, जैसे--आशुकथा, अणुकथा, पोस्टकार्ड कथा, हथेली कथा या पाम स्टोरी, छोटी कहानी अथवा लघुकहानी तथा कौंधकथा।...इस दृष्टि से देखें तो अंग्रेजी में 1992 में शुरू होने वाली ‘कौंधकथा’ (फ्लैश फिक्शन) कुछेक आंतरिक असमानताओं के बावजूद 1971 में शुरू होने वाली हिन्दी लघुकथा की अनुगामी ही है, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह 1982 में शुरू होने वाली चीनी लघुकथा कुछेक असमानताओं के बावजूद उसकी अनुगामी सिद्ध होती है।’
    यह कथन भी अवश्य सप्रमाण अनेक स्थानों पर मिल जाता है कि लघुकथा के क्षेत्र में भारत ही संसार का गुरु रहा है। फ्रेंच भाषा में फेबुल्स-दे-पिल्पे के नाम से प्रकाशित ग्रन्थ पंचतंत्रा के अरबी अनुवाद पर आधारित था जो पहलवी भाषा से उसमें अनूदित था। (मोरिया लोच, डिक्शनरी आॅफ फोकलोर भाग-1, पृष्ठ 361)’
    नन्दल हितैषी कहते हैं, भारतीय परिवेश में कथाओं की एक पुरानी और लम्बी परम्परा है, उन लम्बी-लम्बी कथाओं में तमाम स्वतंत्र रूप से उपकथाएँ भी हैं जो मूल कथा को विस्तार देती हैं। इन्हीं उपकथाओं में जीवित हैं लघुकथाएँ--कभी बोध देने के लिए, कभी उपदेश देने के लिए, कभी ज्ञान देने के लिए तो कभी व्यवस्था को बेपरदा करने के लिए।’ तथा डाॅ. कमल किशोर गोयनका कहते हैं, यह सर्वविदित है कि प्राचीनकाल में ‘लघुकथा’ का रूप मिलता है और वो लघुकथाएँ पूरे जीवन का अंग थीं। उनका प्रयोग और शिक्षण मनुष्य को संस्कारित करने के लिए किया जाता था अर्थात् उनका बड़ा उद्देश्य था और वे सैकड़ों-हजारों वर्षों तक मानवीय स्मृति का अंग बनी हुई थीं।’
नंदल हितैषी का यह भी कहना है कि, भारतीय परिवेश की पौराणिक कथाएँ, अन्तर्कथाएँ, उपदेश कथाएँ, बोध कथाएँ, ईसप, पंचतंत्र और हितोपदेश आदि की छोटी-छोटी कसी हुई कहानियाँ लघुकथाओं की ऐतिहासिक स्रोत रही हैं।’
    लेकिन डाॅ. ब्रजकिशोर पाठक कहते हैं, इसका लेखन भारतीय हास-परिहास की मौखिक कथा-परम्परा से जुड़ा है। इस कथा-परम्परा का लेखन में प्रथम प्रवेश भारतेन्दु-युग की गल्प-गप्प परिहास-कथाओं से हुआ। द्विवेदी-युग में यत्किंचित संख्या में ये ‘चुटकुले’ के नाम से मुद्रित हुए। हिन्दी कहानी-लेखन की परम्परा का आरम्भ लघुकथाओं से ही हुआ तथा चर्चित हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानियाँ अधिकांशतः लघुकथाएँ ही हैं। प्रेमचंद-युग से लघुकथा-लेखन की यह परम्परा लोकगीतों की तरह लोककंठी हो गई। इसका फिर से आविर्भाव आज़ादी के बाद, श्री भवभूति मिश्र की रचनाओं से हुआ। ‘लघुकथा’ शब्द पहली बार इन्हीं के द्वारा प्रयुक्त भी हुआ।’
    लेकिन जिस ‘लघुकथा’ का आकलन हम इन पृष्ठों पर कर रहे हैं, वह निःसन्देह उपर्युक्त सबसे भिन्न प्रकृति की रचना है। इस सत्य को समझते हुए विक्रम सोनी लिखते हैं, आज की मशीनी मनःस्थिति की जन्मायी कुंठा, संत्रास, जैसे मनोभावनाओं के बीच समकालीन साहित्य को अपना चेहरा स्पष्ट प्रमाणित करने के लिए कुछ कम संघर्ष नहीं करना पड़ रहा है।...पंचतंत्र, हितोपदेश और जातक कथाओं को लघुकथाओं की श्रेणी में सगर्व लिया गया था। लेकिन, महज आकार की वजह से। लघुकथात्मकता के अन्य तत्त्व, गुण नहीं थे उनमें। जीवन के आदर्शवादी पक्ष को कलात्मक ढंग से उपदेशों के माध्यम से उकेरा गया था। 1970 तक इसी कथातत्व के आस-पास की अधिकांश लघुकथाएँ लिखी जाती रहीं। इसीलिए सातवें दशक तक की अधिकतर लघुकथाएँ अपने तांत्रिक, उपदेशीय तत्त्वों के कारण महज आदर्शवादी बनकर रह गयीं। अतः इस कालखंड को लघुकथा के इतिहास का गौरवशाली खंड नहीं माना जा सकता।’
    तथापि आज के विचारक की एक सोच यह भी है कि ‘लघुकथा साधारणतया कहानी कला के ही एक रूप में स्वीकार की जा सकती है और इसी कारण समय-समय पर इसके माध्यम से बहुत महत्वपूर्ण और बड़ी-बड़ी बातें सूक्ष्म कलेवर में अभिव्यक्ति पाती रही हैं। इस शताब्दी की उषःवेला में लघुकथाओं ने युग की आवश्यकता और जन चेतना की गम्भीरता को व्यक्त करने के लिए नये तेवर और शिल्प ग्रहण करने शुरू कर दिये। विष्णु प्रभाकर, रामनारायण उपाध्याय, हरिशंकर परसाई, रावी, बीर राजा, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ आदि ने इसे भी अपने कथा-लेखन की एक विधा के रूप में अपनाया, इसे नये तेवर देने में विशेष भूमिका निभाई।’
                                                          
                            आगामी अंक में जारी…
 

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

सूची--लघुकथा संग्रह व लघुकथा संकलन सन् 1971 से 2000

'लघुकथा-वार्ता' के इस अंक में कुछ उन लघुकथा संग्रहों व  संकलनों की सूची प्रस्तुत है, जिनका उल्लेख मेरे शोध-प्रबन्ध में हुआ था। इस सूची को भी अब अद्यतन करने की प्रक्रिया जारी है। अत: जिन मित्रों की जानकारी में इनके अतिरिक्त भी लघुकथा के संग्रह/संकलन/विशेषांक/सम्मेलन आदि हैं, वे कृपया मेरे ई-मेल 2611ableram@gmail.com पर या फेसबुक पर इन-बॉक्स सूचित अवश्य करें। --बलराम अग्रवाल
लघुकथा संग्रह (सन् 1971 से 2000 तक)
1.     ऐतिहासिक लघुकथाएँ: आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र: 1971
2.     सिसकता उजास: डाॅ सतीश दुबे: 1974
3.     नया पंचतन्त्र: रामनारायण उपध्याय: प्र. सं. 1974
4.     मोहभंग: प्रो. कृष्ण कमलेश: प्र. सं. 1975
5.     निर्माण के अंकुर: शरद कुमार मिश्र ‘शरद’: प्र. सं. विजयादशमी, 1975
6.     अभिमन्यु का सत्ताव्यूह: श्रीराम ठाकुर ‘दादा’: प्र. सं. 1977
7.     कालपात्र: दुर्गादत्त दुर्गेश: प्र. सं. जनवरी, 1979
8.     एक और अभिमन्यु: सनत मिश्र: प्र. सं. अप्रैल, 1979
9.     नीम चढ़ी गुरबेल: श्रीराम मीणा: प्र. सं. 1980
10.   मिट्टी की गंध: चन्द्रभूषण सिंह ‘चन्द्र’: 1984
11.   मुटठी भर आक्रोश: मुकेश रावल: 1985
12.   प्रसंगवश: सतीशराज पुष्करणा: प्र. सं.: 1987
13.   तुलसी चौरे पर नागफनी: डाॅ उपेन्द्र प्रसाद राय: 1987
14.   यहीं-कहीं: सुरेश जांगिड़ उदय: 1989
15.   बदलती हवा के साथ: डाॅ सतीशराज पुष्करणा: 1990
16.   अभिप्राय: कमल चोपड़ा: 1990
17.   भीड़ में खोया आदमी: डाॅ सतीश दुबे: 1990
18.   अपने-अपने दायरे: पवन शर्मा: 1990
19.   हिस्से का दूध: मधुदीप: 1991
20.   डरे हुए लोग: सुकेश साहनी: 1991
21.   अतीत का प्रश्न: मालती महावर: 1991
22.   इस बार: कमलेश भारतीय: 1992
23.   मृगजल: बलराम: 1992
24.   जहर के खिलाफ: सतीशराज पुष्करणा: 1993
25.   इक्कीस जूते: रामकुमार आत्रोय: 1993
26.   सरसों के फूल: बलराम अग्रवाल: 1994
27.   रुकी हुई हंसिनी: बलराम: 1995
28.   खाते बोलते हैं: अशोक वर्मा: 1995
29.   जंग लगी कीलें: पवन शर्मा: 1996
30.   मैं समय हूँ: विपिन जैन: 1996
31.   प्रहार: गोविन्द गौड़: 1996
32.   तीन न तेरह: पृथ्वीराज अरोड़ा: 1997
33.   ईश्वर की कहानियाँ: विष्णु नागर: 1997
34.   प्रेक्षागृह: डाॅ सतीश दुबे: 1998
35.   आग: माधव नागदा: 1998
36.   आँखों वाले अँधे: रामकुमार आत्रोय: 1999
37.   उल्लास: चैतन्य त्रिवेदी: 2000
38.   अंधेरे के विरुद्ध: डाॅ मिथिलेश कुमारी मिश्र: 2000


लघुकथा संकलन (सन् 1971 से 2000 तक)

1. दो धाराएँ: डाॅ. ब्रजभूषण सिंह आदर्श एवं शशांक आदर्श: प्र.सं. 1972
2. गुफाओं से मैदान की ओर: रमेश जैन एवं भगीरथ परिहार (सं.): प्र.सं. 1974
3. प्रतिनिधि लघुकथाएँ: डाॅ. सतीश दुबे एवं सूर्यकान्त नागर (सं.): प्र.सं. दिसम्बर 1976
4. श्रेष्ठ लघुकथाएँ: शंकर पुणताम्बेकर (सं.): प्र. सं. 1977
5. समान्तर लघुकथाएँ: नरेन्द्र मौर्य व नर्मदाप्रसाद उपाध्याय (सं.): प्र. सं. दिसम्बर 1977
6. आठवें दशक की लघुकथाएँ: डाॅ सतीश दुबे (सं.): 1979
7. कितनी आवाजें: विकेश निझावन, हीरालाल नागर (सं.): 1980
8. बोलते हाशिये: राजा नरेन्द्र (सं.): 1981
9. लघुकथा: दिशा एवं दिशा: अरविंद, कृष्ण कमलेश (सं.): 1981
10. हस्ताक्षर: शमीम सर्मा (सं.): 1982
11. स्वरों का आक्रोश, हरनाम शर्मा (सं.): 1983
12. आतंक: धीरेन्द्र शर्मा, नन्दल हितैषी (सं.): 1983
13. प्रतिवाद: सं. कमल चोपड़ा (सं.): 1984
14. सबूत दर सबूत: महेन्द्र सिंह महलान, मोहन योगी (सं.): 1984
15. अनकहे कथ्य: अशोक वर्मा (सं.): 1984
16. चीखते स्वर: नरेन्द्र प्रसाद ‘नवीन’ (सं.): 1984
17. कथानामा-1: बलराम (सं.): प्र.सं.1985
18. कथानामा-2: बलराम (सं.): प्र.सं.1985
19. आज के प्रतिबिम्ब: डाॅ. सतीशराज पुष्करणा (सं.): 1985
19अ- अक्षरों का विद्रोह : सुशील राजेश( सं.) 1985
20. आयुध: कमल चोपड़ा (सं.): 1986
21. हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ लघुकथाएँ: डाॅ सतीशराज पुष्करणा (सं.): 1986
22. आवाजें: रूप देवगुण, राजकुमार निजात (सं.): 1986
23. अपवाद: कमल चोपड़ा (सं.): 1986
23अ-तीसरा क्षितिज : सतीश राठी  (सं.) : 1986 
24. संघर्ष: महेन्द्र सिंह महलान, अंजना अनिल (सं.): 1987
25. बिहार की हिन्दी लघुकथाएँ: डाॅ. सतीशराज पुष्करणा (सं.): 1988
27. जिन्दगी के आसपास: राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’ (सं.): 1989
27अ तलाश जारी है : अशोक शर्मा भारती (सं.): 1989
28. अलाव फूँकते हुए: कुलदीप जैन (सं.): 1990
29. भारतीय लघुकथा कोश-1: बलराम (सं.): 1990
30. भारतीय लघुकथा कोश-2: बलराम (सं.): 1990
31. समक्ष: सतीश राठी (सं.): 1991
32. हिन्दी की सशक्त लघुकथाएँ: रूप देवगुण (सं.): 1991
33. साँझा हाशिया: कुमार नरेन्द्र (सं.): 1991
34. मंथन: महेन्द्र सिंह महलान, अंजना अनिल (सं.): 1991
35. अपराजित कथा-1: रामजी शर्मा ‘रजिका’ (सं.): 1991
36. हिन्दी की जनवादी लघुकथाएँ : रामयतन यादव (सं.): 1991
36अ- मनोबल : सतीश राठी, अनंत श्रीमाली (सं.) : 1991
37. स्त्री-पुरुष संबंधों की लघुकथाएँ: सुकेश साहनी (सं.): 1992
38. महानगर की लघुकथाएँ: सुकेश साहनी (सं.): 1993
39. परिहासिनी: बलराम अग्रवाल (सं.): 1996
40. तीसरा क्षितिज: सतीश राठी (सं.): 1996
41. देह-व्यापार की लघुकथाएँ: सुकेश साहनी (सं.): 1997
42. कथाबिंदु: रूपसिंह चन्देल, सुभाष नीरव, हीरालाल नागर (सं.): 1997
43. दिशाएँ: डाॅ सतीशराज पुष्करणा (सं.): 2000
44. बीसवीं सदी: प्रतिनिधि लघुकथाएँ: सुकेश साहनी (सं.): 2000