शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

लघुकथा : परम्परा और विकास-8 / बलराम अग्रवाल



आठवीं किस्त
दिनांक 03-12-2016 से आगे

आवरण : के॰रवीन्द्र
सन् 1956 के आसपास हिन्दी साहित्य की सभी मुख्य विधाओं का एक वृहद् संकलन ‘संकेत’ प्रकाशित हुआ, जिसके प्रधान संपादक उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ एवं अन्य दो सम्पादक कमलेश्वर व मार्कण्डेय हैं। इसमें अन्य विधाओं के अतिरिक्त एक भाग लघुकथाओं का भी है जिसमें रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की दो, सुदर्शन की दो, गंगाप्रसाद पाण्डेय की दो, सत्य की दो, बैकुण्ठनाथ मेहरोत्रा की दो, तथा शान्ति मेहरोत्रा एम. ए. की एक लघुकथा संकलित है। कथ्य और शिल्प की दृष्टि से ये कथाएँ सन्देशों के ही अधिक निकट हैं। प्रस्तुत संकलन की भूमिका में अन्य विधाओं का उल्लेख है, किन्तु लघुकथा का नहीं। डाॅ. शकुन्तला किरण लिखती हैं—‘इस हेतु जब अश्क जी को पत्र लिखकर कारण जानना चाहा तो उन्होंने लिखा—‘संकेत’ पर बहुत लम्बी भूमिका देने और उस भूमिका में सब विधाओं का उल्लेख करने की योजना थी, लेकिन इतनी सामग्री इकट्ठी हो गई कि लम्बी भूमिका देने का मोह छोड़ देना पड़ा। जल्दी में आमुख लिखा गया था, इसलिए उस विधा का उल्लेख रह गया। वैसे लघुकथा का महत्त्व तो मैं अब भी मानता हूँ, मैंने स्वयं लगभग 25 लघुकथाएँ लिखी हैं।’ अश्क जी के ही अनुसार—‘कुछ लघुकथाएँ उनके बृहद् कहानी-संग्रह ‘सत्तर श्रेष्ठ कहानियाँ’ में संकलित हैं, कुछ अन्य संग्रहों में और कुछ उनके प्रारम्भिक जीवन की हैं, जो अभी तक हिन्दी में प्रकाशित नहीं हुईं, यद्यपि वे उनकी फाइलों में सुरक्षित पड़ी हैं।’ डॉ॰ शकुन्तला किरण को लिखे अश्कजी के ही एक अन्य पत्र के अनुसार—‘वैसे मेरी लघुकथाओं का अलग से कोई संग्रह नहीं छपा, निम्नलिखित संग्रहों में मेरी तमाम लघुकथाएँ संकलित हैं, यानी जिन्हें मैं लघुकथाएँ समझता हूँ, कुछ अप्रकाशित भी हैं, ‘छींटे’ संग्रह में एक पृष्ठ से लेकर छह-सात पृष्ठ तक के बीच 14 लघुकथाएँ हैं।’ लघुकथा का आकार ‘छह-सात पृष्ठ तक के बीच’ मानने वाले इस वक्तव्य से अश्क जी की लघुकथा सम्बन्धी अवधारणा स्पष्ट हो जाती है।
       सन् 1957 में शरद कुमार मिश्र ‘शरद’ का लघुकथा-संग्रह ‘धूप और धुआँ’ प्रकाशित हुआ जिसमें उनकी 37 लघुकथाएँ संकलित हैं। इस संग्रह की अधिकांश लघुकथाएँ नीतिपरक एवं बोधपरक हैं। सन् 1957 में ही आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र की 52 बोधपरक लघुकथाओं का संग्रह ‘पंचतत्व’ भी प्रकाशित हुआ।
       सन् 1958 के एक प्रसंग को याद करते हुए डाॅ. ब्रजकिशोर पाठक ने राधाकृष्ण जी की बातचीत का उल्लेख करते हुए लिखा है कि राधाकृष्ण जी ने उनसे कहा था कि—‘मैं अब कहानियाँ नहीं लिखूँगा, चुटकुले बनाऊँगा। इन्हीं चुटकुलों को मैं ‘लघुकथा’ कहूँगा। लघुकथाओं का मेरा संग्रह ‘गेंद और गोल’ छप चला है।’ डाॅ. पाठक ने लिखा है कि—‘जहाँ तक मेरी जानकारी है राधाकृष्ण जी ने ‘गेंद और गोल’ के बाद जीवनभर मुख्यतः लघुकथाएँ ही लिखीं।’
       लेकिन ‘इसके बाद यह भी विचारणीय है कि लघुकथा चुटकुले का पर्याय है या नहीं है। गंभीरता से विचार करने पर कहा जा सकता है कि लघुकथा चुटकुले का पर्याय नहीं है... यह सत्य है कि चुटकुले में एक कथा अवश्य होती है किन्तु इसके बाद भी वह साहित्यिक विधा नहीं है और न ही बनी सकती है।... लघुकथाकारों को इस सम्बन्ध में सावधान रहना चाहिए, इसलिए भी कि लघुकथा चुटकुला नहीं होती है। लघुकथा और चुटकुले में मुख्य भेद यह कि कि चुटकुला पाठक/श्रोता का क्षण भर या पल भर मनोरंजन कर उसे हँसा अवश्य देता है जबकि लघुकथा उन्हें सोचने-समझने के लिए विवश करती है, हँसाने का प्रयास नहीं करती। वह काँटे की चुभन के साथ पाठक-श्रोता में कसक उत्पन्न करती है।’
       लगभग इसी बात को दिनेश द्विवेदी यों कहते हैं—‘सही बात तो यह होगी कि लघुकथा कहानी आंदोलन के समांतर ही चली है।’
        सन् 1958 में रावी की लघुकथाओं का प्रथम संग्रह ‘मेरे कथा-गुरु का कहना है’ भाग-1 प्रकाशित हुआ। भाग-1 के अन्तिम मुखपृष्ठ पर परिचय के तौर पर लिखा है—‘‘मेरे कथागुरु का कहना है’ श्री रावी की अपनी विशिष्ट शैली की लघुकथाओं का पहला संकलन है। मानव-मन की पकड़ के साथ-साथ जीवन का जो दर्शन, इन लघुकथाओं में उभरा है, उसके पीछे उनका गहरा अध्ययन और क्रान्तिपरक चिन्तन स्पष्ट झलकता है।’
             ‘ये लघुकथाएँ’ शीर्षक भूमिका (पृष्ठ 3) में रावी ने लघुकथा सम्बन्धी अपने विचार प्रकट यों किए हैं—‘...लघुकथाओं का यह मेरा पहला संकलन है। निष्परिधान सरलता ही सौन्दर्य का मर्म है और जीवन का भी। इस नाते मानव-मन की चिरप्रिया कथा अपने निरावरण अंतःलघु रूप में ही उसके अधिक निकट पहुँचती है।... लघुकथा सीधे हमारे सर्वकालिक बौद्धिक हृदय तक पहुँचती है... रूपक की शृंखला का दूर तक निर्वाह किया जा सके तो लघुकथा लम्बी भी हो सकती है...संक्षिप्तता और सरलता आते हुए युग की माँगें भी हैं... मेरी ये लघुकथाएँ आकार में कहीं-कहीं लम्बी कहानियों के समीप पहुँच गई हैं, पर टेक्नीक की दृष्टि से लघुकथाएँ ही हैं। इन कथाओं का स्रोत केवल मेरा अपने ढंग का चिन्तन है।’ पहली बात तो यह कि चिन्तन अलग बात है और टेक्नीक अलग। दूसरी यह कि 1958 में लघुकथा की टेक्नीक थी ही कहाँ? फिर, टेक्नीक के बहाना लेकर किसी लम्बी कहानी को कोई भी सुधी पाठक लघुकथा कैसे स्वीकार कर लेगा?
       ‘मेरे कथागुरु कहना है’ भाग-1 में 88 लघुकथाएँ हैं जिनमें अधिकांश लघुकथाएँ नीतिपरक व उपदेशपरक हैं। उनमें किसी-न-किसी सिद्धान्त के दर्शन होते हैं। रावी की लघुकथाएँ सामान्यतः नीतिपरक होने के साथ-साथ प्रतीकात्मक भी हैं और कई जगह प्रतीकों की जटिलता के कारण सामान्य पाठक उन्हें सही रूप में पकड़ पाने में असमर्थ होता है। यद्यपि रावी ने हर लघुकथा के अन्त में टिप्पणी देकर उसे सहज व सुगम बोधगम्य बनाने का भी प्रयास किया है। इस प्रकार रावी की लघुकथाएँ रूपक या प्रतीक आदि के माध्यम से कोई न कोई सन्देश देने वाली तत्त्व-कथा ही अधिक हैं। समकालीन हिन्दी लघुकथा की तरह व्यवस्था पर चोट करना उनका ध्येय नहीं है। ये रचनाएँ समकालीन लघुकथा के अनुशासन से इसलिए भी बाहर ठहरती हैं क्योंकि नैतिकता, सैद्धान्तिकता का उपदेश आधुनिक अथवा समकालीन कही जाने वाली हिन्दी लघुकथा का उद्देश्य नहीं है और न ही आध्यात्मिक क्षेत्र के दार्शनिक बिन्दुओं का विवेचन उसका प्रतिपाद्य है।
       सन् 1958 में ही भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन से रामनारायण उपाध्याय की पुस्तक ‘गरीब और अमीर पुस्तकें’ प्रकाशित हुई। वैसे यह लघु-व्यंग्य निबन्धों एवं रूपकों का संकलन है, किन्तु इसमें ‘बादल की हरकत’ जैसी एकाध लघुकथा के भी दर्शन हो जाते हैं। सन् 1958 में ही आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र का कथा-संग्रह ‘खाली-भरे हाथ’ प्रकाशित हुआ। इसमें उनकी 76 लघुकथाएँ हैं। पुस्तक के मुखपृष्ठ पर ‘मौलिक बोधकथाओं की सर्वप्रथम कृति’ प्रकाशित है तथा पुस्तक के हर पृष्ठ पर फोलियो भी ‘बोध कथाएँ’ ही प्रकाशित है।
       सन् 1959 के आसपास से ही ठाकुरदत्त शर्मा ‘पथिक’ की बोधकथाएँ भी प्रकाशित हुईं।
        सन् 1960 में भारतीय ज्ञानपीठ से लक्ष्मीचंद्र जैन का लघुकथा संग्रह ‘कागज की किश्तियाँ’ प्रकाशित हुआ। मनोज श्रीवास्तव के अनुसार—‘इस पुस्तक का दो तिहाई भाग ‘अध्ययन और मनन’ तथा ‘इतिहास और कल्पना’ के एकालापों से भरा है किंतु ‘यथागत की आख्यायिकाएँ’ शीर्षक से ग्यारह लघुकथाएँ अवश्य ही इस पुस्तक को हमारी सन्दर्भित दृष्टि के लिए महत्त्वपूर्ण करती हैं। ये सभी लघुकथाएँ अपने तापमान की ऊष्म उत्तेजना से हमें प्रभावित करने में असमर्थ रहती हैं। इनका असर शांत, स्निग्ध जलधार का है जिसमें सामयिकता की बनिस्बत शाश्वतता की सांस्कृतिक मानसिकता पर अधिक बल है। शायद इसीलिए लघुकथा की समकालीन तनावधर्मी शिल्प-संरचना से ये कुछ कटी भी नजर आती हैं। समकालीन लघुकथा दृष्टांत परम्परा की वाहक नहीं है।’
       सन् 1961 में अयोध्या प्रसाद गोयलीय की पुस्तक ‘लो कहानी सुनो’ भारतीय ज्ञानपीठ, काशी से प्रकाशित हुई। इसमें कई लघुकथाएँ बहुत तीखी हैं। यहीं से सन् 1961 में ही रावी के लघुकथा-संग्रह ‘मेरे कथा गुरु का कहना है’ भाग-2 का प्रकाशन हुआ। इसमें 69 लघुकथाएँ हैं। इसी सन् में डाॅ. ब्रजभूषण सिंह ‘आदर्श’ का कथा-संग्रह ‘आँखें, आँसू और कब्र’ प्रकाशित हुआ, जिसकी भूमिका विनय मोहन शर्मा द्वारा लिखित है। इसमें उनकी 30 लघुकथाएँ हैं, जो मानवीय विसंगतियों को उजागर करती हैं। लघुकथाओं में कथ्य और शिल्पगत नवीनता है।
         ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के 28 जनवरी, 1962 के अंक में ‘लघुकथाएँ’ शीर्षक के अन्तर्गत ठाकुरदत्त शर्मा ‘पथिक’ की तीन लघुकथाएँकोख, जिन्दगी के फूल, नदी-नाव प्रकाशित हुईं। सन् 1962 में ही अज्ञेय के सम्पादन में शान्ति मेहरोत्रा का कथा-संग्रह ‘खुला आकाश मेरे पंख’ प्रकाशित हुआ। इसमें सभी विधाओं की रचनाएँ हैं। ‘गिरवी रखी हुई आत्मा’ शीर्षक तले 5 लघुकथाएँ भी संकलित हैं।
       सन् 1963 में श्री आदित्य प्रताप सिंह की ‘बेटी की आवाज’ शीर्षक रचना सतना (म. प्र.) से प्रकाशित ‘जिज्ञासा’ के अंक-4 पृष्ठ 63-64 पर छपी, पर इसे लघुकथा नहीं माना जा सकता।
      जालंधर से प्रकाशित होने वाले दैनिक ‘हिन्दी मिलाप’ के 24 जून 1964 अंक में सिरसा (हरियाणा) के पूरन मुद्गल की लघुकथा ‘कुल्हाड़ा और क्लर्क’ प्रकाशित हुई। सन् 1964 में लिखी यशपाल की लघुकथा ‘संतोष का क्षण’ और सम्भवतः इसी समय की कथा-रचना ‘सीख’ को ‘सारिका’ के 2 जनवरी, 1978 के अंक में पृ. 27, एवं पृष्ठ 49 पर लघु-कहानी शीर्षक के अन्तर्गत प्रकाशित किया गया है। कानपुर से तिलक (सिंह परमार) के दो संग्रहों—‘पत्थर और प्रतिमा’ व ‘माँ’ तथा बैकुण्ठनाथ मेहरोत्रा का ‘ऊँचे और ऊँचे’, श्यामानन्द शास्त्री का ‘पाषाण के पंछी’, ज्योति प्रकाश का ‘दिल की गहराई से’, कामता प्रसाद सिंह ‘काम’ का ‘नाविक के तीर’ आदि संग्रहों के प्रकाशन का भी उल्लेख मिलता है।
      आगरा से निकलने वाली पत्रिका ‘नोक-झोंक’ के मई 1965 के अंक में डाॅ. सतीश दुबे की कुछ लघुकथाएँ ‘शरीफाना भ्रष्टाचार’ शीर्षक के अन्तर्गत प्रकाशित हुईं। 15 फरवरी, 1965 की ‘सरिता’ में भी ‘सतरंगी चूनर’ शीर्षक से डाॅ. सतीश दुबे की कई छोटी-छोटी लघुकथाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें तीखा व्यंग्य है। ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के 17 अप्रैल 1966 के अंक में भी डाॅ. सतीश दुबे की एक लघुकथा प्रकाशित हुई।
       सन् 1965-66 तक की लघुकथाओं के बारे में बलराम अपने लेख ‘लघुकहानी: गर्दिश में डूबा एक कथा सफर’ में लिखते हैं—‘1965 तक लघुकथा का कोई स्वरूप निश्चित नहीं हो सका, आनन्द (मोहन) का अपना अलग तीखा और प्रखर रंग था, (कन्हैयालाल मिश्र) प्रभाकर और जगदीश चन्द्र मिश्र जी के अपने रास्ते थे, तिलक (सिंह परमार) और जगदीश (चन्द्र मिश्र) प्राचीनता से इतना अधिक प्रभावित हैं कि उनकी रचनाएँ भी प्राचीन लगती हैं। अपनी वैचारिकता और प्रभावात्मकता के कारण, रावी और प्रभाकर अपने को टिकाए हुए हैं। आनन्द की रचनाएँ निखालिस आधुनिक हैं। काश!... वे जीवित... और सृजनरत होते।’
       सन् 1966 में आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र का संग्रह ‘मिट्टी के आदमी’ प्रकाशित हुआ, जिसमें 32 लघुकथाएँ हैं। पुस्तक के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित हैं—‘संसार की विभिन्न भाषाओं के अन्दर अनूदित अभूतपूर्व व्यंग्य लघुकथाएँ’।
              ‘सारिका’ के जून 1967 अंक में प्रकाशित काशीनाथ सिंह की तीन लघुकथाएँ—‘अकाल’, ‘पानी’, ‘प्रदर्शनी’ प्रकाशित हुईं। कथ्य एवं शिल्प की दृष्टि से इन्हें प्रभावशाली कहा जा सकता है। ‘सारिका’ के ही सितम्बर 1967 के अंक (पृष्ठ 87) में रावी की लघुकथा ‘कण्टक काट’ ‘व्यंग्य-बोध’ शीर्ष के अन्तर्गत प्रकाशित हुई। यह रचना व्यंग्य का थोड़ा पुट लिए हुए नीतिपरक बोधकथा ही है। ‘सारिका’ के जनवरी 1968 अंक (पृष्ठ 90) में ‘दो लघुकथाएँ’ शीर्षक के अन्तर्गत कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ की ‘चौधरी’ एवं ‘काम का आदमी’ प्रकाशित हुईं। दोनों ही तीखी एवं सशक्त लघुकथाएँ हैं।
       वाराणसी से कमल गुप्त के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘कहानीकार’ के नववर्षांक, जनवरी-फरवरी 1968 के अंक (पृष्ठ 9) में राजेन्द्र यादव की ‘अपने पार’ ‘सातवें दशक की एक संक्षिप्त कहानी’ शीर्ष-तले प्रकाशित हुई थी। इस रचना के बारे में इसी पृष्ठ पर ‘आत्मस्वीकृति’ के अन्तर्गत राजेन्द्र यादव कहते हैं—‘...इस कहानी के सम्बन्ध में, मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहूँगा कि रूप में यह छोटी है, फिर भी मुझे इससे बहुत संतोष है...शायद संग्रह का नाम भी इसी पर दूँ।’ ‘अपने पार’ 300 शब्दों के आसपास की कथा-रचना है।1
       सन् 1969 में प्रकाशित श्यामसुन्दर घोष की पुस्तक ‘साहित्य के नए रूप’ में पृष्ठ 58 पर लघुकथा के रूप का उल्लेख है तथा (पृष्ठ 130-131 पर) उदाहरणस्वरूप 5 लघुकथाएँ भी प्रकाशित की गई हैं लेकिन उनका चुनाव गलत है। कथ्य व शिल्प की दृष्टि से ये रचनाएँ समकालीन लघुकथाओं के निकट नहीं हैं। सन् 1969 की ‘सारिका’ के लगभग सभी अंकों में किसी-न-किसी रूप में लघुकथाएँ छपती रहीं, चाहे वे देश की विभिन्न भाषाओं की लघुकथाओं का हिन्दी अनुवाद हों या विदेशी लघुकथाओं का हिन्दी-रूपान्तरण अथवा लोककथा या बोधकथा का रूप हो। किसी कहानी का संक्षिप्त रूपान्तरण भी ‘लघुकथाएँ’ स्तम्भ के अन्तर्गत निरन्तर छपता रहा।
       सन् 1970 में ‘सारिका’ के लगभग सभी अंकों में प्रकाशित लघुकथाएँ अधिकतर विदेशी एवं विभिन्न प्रान्तों की भाषाओं से अनुवादित हैं।
                                                 आगामी अंक में जारी………

शनिवार, 3 दिसंबर 2016

लघुकथा : परम्परा और विकास-7 / बलराम अग्रवाल



सातवीं किस्त
दिनांक 20-11-2016 से आगे…

आवरण : के॰ रवीन्द्र
हिन्दी साहित्य की गद्य और पद्य दोनों विधाओं में यह उद्बोधन का काल ठहरता है। गद्य में प्रेमचंद ‘यही मेरा वतन है’ लिख रहे थे और प्रसाद ‘बीती विभावरी, जाग री!’। लघुकथा में यह उद्बोधन परम्परा-निर्वाह के रूप में विराजमान नजर आता है यानी नैतिक उद्बोधन के रूप में। तथापि इन्हीं रचनाओं के बीच बहुत-सी ऐसी रचनाएँ भी सामने आती रहीं जो पारम्परिक ज़मीन को तोड़ने का प्रयास करती प्रतीत होती हैं। प्रेमचंद और प्रसाद के बाद इनमें कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, विष्णु प्रभाकर, जगदीश चन्द्र मिश्र, सुदर्शन, अयोध्या प्रसाद गोयलीय, रावी आदि के नाम सामने आते हैं; लेकिन इन सभी का लघुकथा-चिंतन पारम्परिक ही ठहरता है। जमीन तोड़ने की कोई खास कोशिश इनमें नजर नहीं आती। रावी लघुकथाओं को अपनी उन्मुक्त काम-सम्बन्धी विशिष्ट सैद्धान्तिकी के प्रसार का माध्यम बनाते प्रतीत होते हैं। परसाई इस काल में अग्रगण्य सिद्ध होते हैं जिनकी लघुकथाएँ सन् 1950 के आसपास से नजर आनी शुरू होती हैं। समाज के विभिन्न समुदायों में आयी चारित्रिक गिरावट को परसाई ने अपनी बातचीत के दौरान अनेक बार स्पष्ट किया। कार्ल मार्क्स के हवाले से उन्होंने कहा—‘धर्म भ्रमात्मक सुख देता है, जबकि मनुष्य को वास्तविक सुख चाहिए जो सामाजिक परिवर्तन से प्राप्त होता है। शोषक वर्ग आम आदमी को भ्रमात्मक सुख में उलझाकर उसे वास्तविक सुख के लिए संघर्ष करने से रोकता है।’ परसाई के शुरू से आखिर तक लगभग समूचे लेखन में यह बेचैनी दिखाई देती है। लघुकथा को वे परम्परा की कन्दरा से बाहर लाने को व्यग्र नजर आते हैं, लेकिन अकेले पड़ जाते हैं। काश! उनके जैसी मेधा का दूसरा लेखक हिन्दी लघुकथा को उनके काल में मिल गया होता।
    हिन्दी की पहली लघुकथा के निर्धारण पर विद्वानों के बीच खासा मतभेद है। ‘अब तक जिन गद्य कथा-रचनाओं को पहली लघुकथा होने की दौड़ में गिना जाना चाहिए, वे प्रमुखतः निम्न प्रकार हो सकती हैं :
       1. अंगहीन धनी (परिहासिनी, 1876) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
       2. अद्भुत संवाद (परिहासिनी, 1976) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
       3. बिल्ली और बुखार (प्रामाणिकता अप्राप्य) माखनलाल चतुर्वेदी
       4. एक टोकरीभर मिट्टी (छत्तीसगढ़ मित्र, 1901) माधवराव सप्रे
       5. विमाता (सरस्वती, 1915) छबीलेलाल गोस्वामी
       6. झलमला (सरस्वती, 1916) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
       7. बूढ़ा व्यापारी (1919) आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र
       8. प्रसाद (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
       9. गूदड़ साईं (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
     10. गुदड़ी में लाल (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
     11. पत्थर की पुकार (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
     12. उस पार का योगी (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
     13. करुणा की विजय (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
     14. खण्डहर की लिपि (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
     15. कलावती की शिक्षा (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
     16. चक्रवर्ती का स्तम्भ (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
     17. बाबाजी का भोग (प्रेम प्रतिमा, 1926) प्रेमचंद
    अगर इनमें प्रेमचंद की उन लघ्वाकारीय कहानियों को भी स्वीकार करना चाहें जो मूलतः उर्दू में काफी पहले प्रकाशित हो चुकी थीं, परन्तु उनका रूपान्तर/लिप्यांतर काफी बाद में, यहाँ तक कि उनकी मृत्यु के भी वर्षों बाद प्रकाश में आया, तो वे निम्न प्रकार हैं :
       1. बाँसुरी (उर्दू कहकशां, जनवरी 1920; हिन्दी लिप्यान्तर गुप्तधन—1, 1962)
       2. राष्ट्र का सेवक (उर्दू पत्रिका ‘अलनाज़िर’ के जनवरी, 1917 अंक में तथा उर्दू शीर्षक ‘कौम का खादिम’ से ही उर्दू कहानी संग्रह प्रेम चालीसी, 1930 में; हिन्दी रूपान्तर गुप्तधन—2, 1962 में)
       3. बंद दरवाज़ा (उर्दू प्रेम चालीसी, 1930)
      4. दरवाज़ा (उर्दू पत्रिका ‘अलनाज़िर’ के जनवरी 1930 अंक में हिन्दी लिप्यान्तर ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’, 1988 में)’
       जैसाकि प्रस्तुत सूची से स्पष्ट है, क्रमांक 8 से क्रमांक 16 तक की नौ लघुकथाएँ जयशंकर प्रसाद के कहानी-संग्रह ‘प्रतिध्वनि’ में संग्रहीत हैं। सम्भवतः इसी आधार पर सन्तोष सरस ने ‘प्रतिध्वनि’ को हिन्दी का पहला लघुकथा-संग्रह माना है। उन्होंने लिखा है कि—‘जहाँ तक इस (लघुकथा) की ऐतिहासिकता का प्रश्न है, प्रथम लघुकथा-संग्रह स्वर्गीय प्रसाद कृत ‘प्रतिध्वनि’ है जो सन् 1926 ई. में प्रकाशित हुआ।’
       इस सूची में क्रमांक 4 पर अंकित स्व. माधवराव सप्रे की रचना ‘एक टोकरीभर मिट्टी’ के बारे में रमेश श्रीवास्तव का यह कथन दृष्टव्य है जिसमें वे यह स्पष्ट करते हैं कि ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में प्रकाशित कहानी ‘एक टोकरीभर मिट्टी’ को तत्कालीन पाठकवर्ग द्वारा किस रूप में ग्रहण किया गया था—‘लघुकथा का नये तथ्य से शुभारम्भ इसी शताब्दी में स्व. माधवराव सप्रे द्वारा हुआ। परन्तु उन दिनों पाठकों ने लघुकथा को विधा के रूप में ग्रहण न कर साप्ताहिक अखबार की रिपोर्ताज के रूप में ग्रहण किया।’ वह आगे लिखते हैं कि—‘पुनः 1945 में माहेश्वर की लघुकथा ‘सदियाँ बीतीं’ तथा 1950 में धर्मवीर भारती की लघुकथा ‘धुआँ’ प्रकाशित हुई। तब लघुकथा रचनाकारों तथा पाठकों की आँखों पर चढ़ गई। इसके बाद सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं और संकलनों ने लघुकथा को सँवारने का प्रयास किया, जिनमें से अधिकांश रचनाएँ तेवर की क्षमता को भूलकर गप्प-सपाट किस्से से जुड़ गईं...।’
            ‘बीसवीं सदी की हिन्दी कथा यात्रा’ के भाग 1 (प्र. सं. 2016) की भूमिका में कथाकार कमलेश्वर ने स्पष्ट लिखा है—‘यह अब निर्विवाद रूप से स्वीकृत हो गया है कि 'छत्तीसगढ़ मित्र' में सन् 1900 में प्रकाशित माधवराव सप्रे की कहानी ‘टोकरीभर मिट्टी’ (सही शीर्षक ‘एक टोकरीभर मिट्टी’बलराम अग्रवाल) हिन्दी की पहली आधुनिक कहानी है और यहीं से आधुनिक हिन्दी कहानी की यात्रा शुरू होती है।’ 
       क्या कहेंगे? यही कि कमलेश्वर को ‘कहानी’ और ‘लघुकथा’ के बीच अन्तर का ज्ञान नहीं था! क्या कोई रचना एक ही साथ कहानी और लघुकथा दोनों हो सकती है? यह एकदम नया सवाल है और इसका उत्तर पाने के लिए हमें आने वाले समय में लघुकथा के पगचिह्नों को बारीकी से देखते रहना पड़ सकता है।
          ‘सन् 1915 में ‘सरस्वती’ में ‘विमाता’ नामक लघुकथा छपी। यह 700 शब्दों के आसपास है तथा इसमें अन्त तक कौतूहल रहता है। इसका रूप शिक्षात्मक है।
       सन् 1916 में ‘सरस्वती’ में ही श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की लघुकथा ‘झलमला’ छपी, यह 650 शब्दों में है। इस लघुकथा में मोमबत्ती के प्रकाश (झलमला) के माध्यम से नायक की मनःस्थिति को मनोवैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।... सन् 1919-20 के आसपास श्री जगदीश चन्द्र मिश्र ने अपनी पहली लघुकथा ‘बूढ़ा व्यापारी’ लिखी। सन् 1924 में श्री शिवपूजन सहाय की लघुकथा ‘एक अद्भुत कवि’ मारवाड़ी मासिक (कलकत्ता) में छपी, इसकी शब्द संख्या 400 शब्दों के आसपास है। यह लघुकथा साम्प्रदायिक समस्या पर आधारित है। सन् 1929 में श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने ‘सेठजी’, ‘सलाम’ आदि लघुकथाएँ लिखीं। प्रभाकर जी ने काफी लघुकथाएँ लिखीं जो उनके संग्रह ‘आकाश के तारे धरती के फूल’ में संकलित हैं।’
       सन् 1938 में श्रीपतराय के संपादन में सरस्वती प्रेस, बनारस से प्रकाशित होने वाली ‘गल्प-संसार-माला’ के भाग-3 के ‘बँगला का गल्प साहित्य’ शीर्षक लेख में नंदगोपाल सेनगुप्त लिखते हैं—‘हमारे देश में प्राचीन काल में रूप-कथाएँ और पशु-पक्षियों की उपकथाएँ ही हुआ करती थीं। रूप-कथाएँ तो रहती थीं अन्तःपुर की महिलाओं की जवानी पर और उपकथाएँ होती थीं साहित्य के पृष्ठों में। जातक कथाएँ, कथा-सरित्सागर, पंचतंत्र और हितोपदेश इत्यादि में इस प्रकार की उपकथाएँ यथेष्ट थीं। पृथ्वी के अन्यान्य देशों की भाँति इस देश में भी इनके इतिहास की समाप्ति हो चुकी है। अब उनका स्थान ग्रहण किया है, मानवीय वेदनाओं से सम्पन्न छोटी कहानियों या गल्पों ने...’
       इन्दौर से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘वीणा’ के नवम्बर 1944 अंक के पृष्ठ 21 पर रामनारायण उपाध्याय की ‘दो लघुकथाएँ’ मिलती हैं—‘आटा और सीमेंट’ तथा ‘मजदूर और मकान’। ‘वीणा’ के ही अगस्त, 1945 के अंक में श्याम सुन्दर व्यास की लघुकथा ‘ध्वनि-प्रतिध्वनि’ प्रकाशित हुई। ‘वीणा’ में प्रकाशित ये रचनाएँ ‘लघुकथा’ शीर्षक के अन्तर्गत ही दी गई हैं।
       सन् 1947 के आसपास रामप्रसाद विद्यार्थी ‘रावी’ की पहली लघुकथा ‘शीशम का खूँटा’ सामने आई। रावी के अनुसार—‘पंचतंत्र, हितोपदेश, ईसप की कहानियाँ, खलील जिब्रान की लघु-कहानियाँ, बाइबिल की पैरेबिल्स, बुद्ध की जातक कथाएँ इस विधा की आदर्श कथाएँ हैं। मैंने भी अपनी लघुकथाओं को, अपनी लम्बी कहानियों से पृथक्, इस शैली में सीमित रखा है।...‘शीशम का खूँटा’ को मेरी पहली लघुकथा माना जा सकता है। यह कथा सन् 1947 के आसपास लिखी गई होगी। विविध पत्र-पत्रिकाओं में छपने के बाद ये कथाएँ संग्रहों में आई हैं।’
       सन् 1947-48 में प्रकाशित सुदर्शन के कथा-संग्रह ‘झरोखे’ में 48 के लगभग लघुकथाएँ हैं, किन्तु ये सभी किसी-न-किसी नीति-बोध को लेकर ही चली हैं। सन् 1950 में रामवृक्ष बेनीपुरी का कथा-संग्रह ‘गेहूँ और गुलाब’ छपा तथा सन् 1950 में ही जबलपुर से आनन्द मोहन अवस्थी का लघुकथा संग्रह—‘बन्धनों की रक्षा’ प्रकाशित हुआ जिसमें लगभग 28 लघुकथाएँ हैं। इसमें ‘आदमी’, ‘इन्सान?’, ‘दो आदमी’, ‘बन्धनों की रक्षा’, ‘चोर-चोर-चोर’, ‘भाग्य’, ‘श्राप’ आदि कुछ लघुकथाएँ तीखी एवं व्यवस्था पर चोट करने वाली हैं। इस संग्रह की भूमिका रामवृक्ष बेनीपुरी ने लिखी है तथा सम्मतियों में श्री पदुमलाल पुन्नलाल बख्शी, पं.  नरेन्द्र शर्मा, भवानी प्रसाद तिवारी तथा जगदीश चन्द्र जैन आदि के नाम हैं। सन् 1951 में अयोध्या प्रसाद गोयलीय का संग्रह ‘गहरे पानी पैठ’ भारतीय ज्ञानपीठ, काशी से छपकर आया। इसमें ‘117 कहानियाँ, किंवदंतियाँ, चुटकुले, लघुकथाएँ और संस्मरण हैं। यह कृति तीन खंडों में विभक्त है— (1) गुरुजनों के चरणों में बैठकर जो सुना (55 रचनाएँ), (2) इतिहास और धर्मग्रन्थों में जो पढ़ा (47 रचनाएँ) तथा (3) हिये की आँखों से जो देखा (15 रचनाएँ)। इन रचनाओं का उद्देश्य नीति एवं मनोरंजन प्रदान करना है। लघुकथा की वर्तमान विधान-विधि से ये रचनाएँ भिन्न हैं। कृति के खंड-खंड में धार्मिक और ऐतिहासिक चरित्रों से संबद्ध शिक्षात्मक लघुकथाएँ हैं।’
       सन् 1952 में कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ की लघुकथाओं का संग्रह ‘आकाश के तारे धरती के फूल’ भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ। ‘इन्हें पढ़कर अज्ञेय ने कहा था कि ‘यह हिन्दी की छोटी कहानी है और कहानी के इतिहास में इसे श्री प्रभाकर की नयी देन माना जायेगा।’ श्री रघु तिलक ने इन्हें कहानी मानने से इंकार करते हुए कहा—‘यह स्कैच लिखने की कला में एक नया प्रयोग है।’ 1935 में प्रेमचंद ने कहा कि—‘यह एक नई कलम है, गद्यकाव्य और कहानी के बीच एक नयी पौध, जिसमें गद्यकाव्य का चित्र और कहानी का चरित्र है।’ लेखकीय वक्तव्य स्वरूप लिखित ‘कहानियों की कहानी’ में इन मतों का उल्लेख स्वयं प्रभाकर जी ने किया है। इसके अतिरिक्त कोई अन्य लिखित प्रमाण इन कथनों का नहीं है। इस सम्बन्ध में मनोज श्रीवास्तव लिखते हैं—‘यह मानना ही होगा कि सन् 1952 में प्रकाशित इस पुस्तक में संग्रहीत लघुकथाएँ अनुभवों के साक्ष्य की सतही बाध्य विश्वसनीयता की कोई पूर्व सावधानी न रखते हुए भी अनुभवों की प्रगाढ़ता के कारण ही पाठक को आंदोलित करने में समर्थ हुई हैं।... निश्चित ही ये लघुकथाएँ गद्यकाव्य की-सी भंगिमा के साथ मन को छूती और बाँधती हैं।... प्रभाकर का भावुक कवि-हृदय सारी कहानियों में छाया हुआ है इसलिए लघुकथा का मौलिक व्यक्तित्व इनमें पूरी तरह खिल नहीं सका। मध्यस्थ, टहनियाँ, पहचान तो संवाद/विवाद मात्र हैं। प्रभाकर की भावुकता आरोपित नहीं है। वह निष्कपट और संवेदनशील व्यक्तित्व का अपरिहार्य प्रतिफलन है इसलिए अधिक नहीं अखरती और ये लघुकथाएँ एक अविस्मरणीय स्थान बना पाने में सक्षम होती हैं।’ डॉ॰ शकुन्तला किरण 
       सन् 1953 में रामनारायण उपाध्याय का कथा-संग्रह ‘अनजाने-जाने-पहचाने’ प्रकाशित हुआ। इसमें रेखाचित्र, संस्मरण, बोलती रेखाएँ आदि के अन्तर्गत शराबी, वाद-विवाद, कुशल-क्षेम, मानव धर्म या पशुता को कुछ सशक्त लघुकथाएँ कहा जा सकता है।
           ‘सन् 1954 के आसपास रांची के प्रो. भवभूति मिश्र ने अपनी ‘बची-खुची सम्पत्ति’ का प्रकाशन किया था। यह सोलह कहानियों का संकलन था।... भवभूति जी ने स्वयं इन कहानियों को ‘अपने दिल का काँटा’ कहा और इनके लिए ‘लघुकथा’ शब्द का प्रयोग किया। इनके शब्दों मेंएक लघुकथा ‘एक खींची हुई साँस’ होती है। इस संग्रह में बची-खुची सम्पत्ति, मूर्ति और प्रतिमूर्ति, भेद की बात, दरद न जाने कोय, कला की कीमत, विज्ञान के प्रयोग सचमुच लघुकथाएँ हैंदो-तीन मिनटों में साँस रोककर पढ़वा लेने की अनिवार्य विवशता उत्पन्न करने की शक्ति से सम्पन्न।’
       सन् 1954 में रावी का कहानी संग्रह ‘पहला कहानीकार’ प्रकाशित हुआ। ‘मेरी इस नव उपार्जित लघुकथा की शैली और रूप का आभास अधिक स्पष्ट मात्रा में झलक आया है’इसकी भूमिका में यह लिखकर रावी इसे लघुकथा-संग्रह घोषित करते हैं, किन्तु यह लम्बी कहानियों का संग्रह ही है। सन् 1955 में शिवनारायण उपाध्याय की 40 लघुकथाओं का संग्रह ‘रोज की कहानी’ प्रकाशित हुआ। इसमें ‘भीतरी सत्य’, ‘प्रतिक्रिया’ आदि को छोड़कर शेष के कथ्य बहुत सामान्य हैं। इसी वर्ष अयोध्या प्रसाद गोयलीय का संग्रह ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ’ भी आया। इस संग्रह को लघुकथा के इतिहास का अंग स्वीकारते हुए भी मनोज श्रीवास्तव लिखते हैं—‘...प्रस्तुत रचना संस्मरणात्मक लघुकथा के रूप में ही देखी जानी चाहिए... अनेक वाक्य इसके विभिन्न घटनात्मक संस्मरणों में मिलेंगे जो वर्तमान लघुकथा के स्वरूप को देखते हुए इसे एक प्रारम्भिक और विकासशील कृति ही सिद्ध करते हैं। ये लघुकथाएँ उद्वेलित और व्यग्र नहीं करतीं अपितु हमारे सामने आदर्श-जीवन का पथ प्रशस्त करती हैं। इनमें मानवीयता की सहज-संवेद कारुणिक अनुभूतियाँ हैं, लेकिन आर्थिक और सामाजिक विद्रूपों का विशिष्ट परिवेशगत वैराट्य न मिलने के कारण ऐसा लगता है कि गोयलीय जी और आज के पाठक की संवेदना तथा माँगों में एक गहरी फाँक पड़ गई है। हमें विचलित और उग्र बनाने की चेष्टा इनमें नहीं है।’
       सन् 1956 में भृंग तुपकरी की कथाओं का संग्रह ‘पंखुड़ियाँ’ प्रकाशित हुआ, जिसकी भूमिका उदयशंकर भट्ट ने लिखी। इसमें 28 लघुकथाएँ व एक लेख हैं। सन् 1956 में ही अयोध्याप्रसाद गोयलीय का कथा-संग्रह ‘कुछ मोती कुछ सीप’ प्रकाशित हुआ, इसमें बड़ी-छोटी दोनों प्रकार की रचनाएँ हैं। छोटी कथाओं में हास्य भी है, संस्मरण भी है तथा कुछ रचनाएँ प्रतीकात्मक हैं। सन् 1956 में ही रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की लघुकथाओं का संग्रह ‘उजली आग’ आया। इसकी भूमिका स्वरूप दिनकर जी ने एक लघुकथा को ही प्रस्तुत किया है जो एक मकड़ी और एक मधुमक्खी के संवाद के रूप में है।
आगामी अंक में जारी………