शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

लघुकथा:वस्तुस्थिति/बलराम अग्रवाल



चार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक साहित्य का साथी में लिखा है कि …उपन्यास और कहानी दोनों एक ही जाति के साहित्य हैं, परन्तु उनकी उपजातियाँ इसलिए भिन्न हो जाती हैं कि उपन्यास में जहाँ पूरे जीवन की नाप-जोख होती है, वहाँ कहानी में उसकी एक झाँकी मिल पाती है।(पृष्ठ 69) ­ तथा मानव चरित्र के किसी एक पहलू पर या उसमें घटित किसी एक घटना पर प्रकाश डालने के लिए छोटी कहानी लिखी जाती है।(पृष्ठ 70) स्पष्ट है कि चार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के काल तक हिन्दी-क्षेत्र में कहानी अथवा छोटी कहानी, अंग्रेजी में जिसे शॉर्ट स्टोरी कहा जाता है, जीवन की एक झाँकी दिखाने वाली अथवा मानव चरित्र के एक पहलू पर प्रकाश डालने वाली कथा-रचना के अर्थ को ध्वनित करने वाली गद्यात्मक रचना थी। सिद्धान्त और अध्ययन नामक पुस्तक में बाबू गुलाबराय भी लगभग ऐसा ही विचार व्यक्त करते हैं—‘छोटी कहानी एक स्वत:पूर्ण रचना है जिसमें एक तथ्य या प्रभाव को अग्रसर करने वाली व्यक्ति-केन्द्रित घटना या घटनाओं के आवश्यक उत्थान-पतन और मोड़ के साथ पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डालने वाला वर्णन हो।
प्रारम्भिक समय के उपन्यास या कहानियाँ कोई दुर्लभ रचनाएँ नहीं हैं। जिज्ञासु पाठक आसानी से उन्हें प्राप्त कर सकते हैं। उन्हें देखने पर पता चलता है कि अंग्रेजी की ही नहीं, हिन्दी की भी प्रारम्भिक कहानियों का रूप-आकार आज के लघु-उपन्यास जितना विस्तृत हुआ करता था और तुलनात्मक दृष्टि से वह आकार उन दिनों के उपन्यास की तुलना में इतना छोटा हुआ करता था जितना कि लम्बी कहानी की तुलना में आज लघुकथा का आकार होता है। उन दिनों के आलोचक उपहासपूर्ण उलाहना दिया करते थे कि जो कथाकार अपनी कथा को यथेष्ट विस्तार देने में अक्षम रहता है, वह अपनी उस रचना को कहानी(शॉर्ट स्टोरी) कहकर प्रचारित करने लगता है। यह बिल्कुल वैसी ही आशंका से युक्त बयान होता था जैसी आशंका से युक्त बयान लघुकथा के बारे में एक बार नरेन्द्र कोहली ने दिया था। जो भी हो शॉर्ट स्टोरी ने अन्तत: अपनी स्वतन्त्र पहचान बनाई जो आज तक सम्मानपूर्वक कायम है। यहाँ यह बता देना आवश्यक ही है कि अपनी स्वतन्त्र-पहचान कहानी को (उपन्यास की तुलना में) मात्र अपने लघु-आकार के कारण ही नहीं मिली थी, बल्कि उसकी अपनी प्रभावपूर्ण क्षमताएँ, मौलिक विशेषताएँ तथा सामयिक पत्र-पत्रिकाओं द्वारा उसका प्रचारित होना आदि अन्य अनेकानेक कारण भी थे। सबसे बड़ी बात यह थी कि उपन्यास में पात्रों और घटनाओं की न सिर्फ भरमार बल्कि प्रधानता रहती थी जबकि कहानी में ऐसा नहीं था। कहानीकार एक लक्ष्य तय करता था और उस लक्ष्य की प्राप्ति अथवा पूर्ति के लिए वह पात्रों और घटनाओं को एक योजनाबद्ध तरीके से प्रस्तुत करता था। इसप्रकार पात्र अथवा घटनाएँ, जो कथा का आवश्यक हिस्सा होने के नाम पर तत्कालीन उपन्यास में बोझिलता का कारण बनने लगे थे, कहानी का धरातल पाकर अनुशासनबद्ध होने लगे। यह कहना भी गलत न होगा कि तत्कालीन आलोचकों द्वारा लगभग सिरे से उपेक्षित कहानी ने पात्रों व घटनाओं को अनुशासनबद्ध कर पाने की अपनी गु्णात्मक क्षमता के कारण ही आम पाठकों के बीच अपनी उपस्थिति को लगातार दर्ज करने व किए रखने में सफलता प्राप्त की और उपन्यास को पीछे छोड़कर लम्बे समय तक रचनात्मक-साहित्य में केन्द्रीय-विधा की भूमिका निभाई।
इस तथ्य की लेशमात्र भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि काल अथवा परिस्थितियों के जिन दबावों ने पूर्वकालीन कथाकारों को उपन्यास से कहानी की ओर उन्मुख किया था, लगभग उन जैसे दबावों के चलते ही बीसवीं सदी में आठवें दशक के कथाकारों और कुछेक कथातत्वदर्शियों को कहानी के प्रचलित ढाँचे में परिवर्तन की आवश्यकता महसूस हुई। उन्होंने महसूस किया कि …गल्प अथवा छोटी कहानी केवल एक प्रसंग को लेकर उसकी एक मार्मिक झलक दिखा देने का ही उद्देश्य रखने लगी है। वह जीवन का समय-सापेक्ष चतुर्दिक चित्र न अंकित कर केवल एक क्षण में घनीभूत जीवन-दृश्य दिखाने लगी है।(साहित्यालोचन)
मेरी प्रिय कहानियाँ की भूमिका-स्वरूप प्रतिवेदन में अज्ञेय जी द्वारा मार्च 1975 में लिखित ये पंक्तियाँ देखें—‘बिना कहानी की सम्यक परिभाषा के कहा जा सकता है कि कहानी एक क्षण का चित्र प्रस्तुत करती है। क्षण का अर्थ आप चाहे एक छोटा कालखण्ड लगा लें, चाहे एक अल्पकालिक स्थिति, एक घटना, डायलॉग, एक मनोदशा, एक दृष्टि, एक(बाह्य या आभ्यंतर) झांकी, संत्रास, तनाव, प्रतिक्रिया, प्रक्रिया…इसीप्रकार चित्र का अर्थ आप वर्णन, निरूपण, संकेतन, सम्पुंजन, रेखांकन, अभिव्यंजन, रंजन, प्रतीकन, द्योतन, आलोकनजो चाहें लगा लें, या इनके जो भी जोड़-मेल। बल्कि और-भी महीन-मुंशी तबीयत के हों तो प्रस्तुत करना को लेकर भी काफी छानबीन कर सकते हैं। इस सबके लिए न अटककर कहूँ कि कहानी क्षण का चित्र है और क्षण क्या है, इसी की हमारी पहचान निरन्तर गड़बड़ा रही है या संदिग्ध होती जा रही है। और इसी के साथ नयी कहानी के उन्नायकों में से एक कथाकार-आलोचक-संपादक राजेन्द्र यादव की यह टिप्पणी भी दृष्टव्य है—‘सड़े आदर्शों और विघटित मूल्यों की दुर्गंधि से भागने की छटपटाहट बौद्धिक मुक्ति का प्रारम्भ थी। वैयक्तिकता की खोज और प्रामाणिक अनुभूतियों का चित्रण, आरोपित लक्ष्यों, नकली परिवेश और हवाईपने से ऊबा हुआ कथाकार अपने और अपने परिवेश के प्रति ईमानदार रहना चाहता है इसलिए उसने अनदेखे अतीत और अनभोगे भविष्य से नाता तोड़कर अपने को यहाँ और इसी क्षण पर केन्द्रित कर दिया, उसका अपना यही क्षण, जो उसका कथ्य है, तथ्य है और उसका अपना जीवन-मूल्य है।
इन दोनों ही वक्तव्यों में कहानी के परम्परागत कथ्य, रूप-स्वरूप, प्रस्तुति और परिभाषा में बदलाव के संकेत हैं; और इस तरह के संकेत उस काल के लगभग हर कहानी-विचारक के वक्तव्य में देखने को मिलते हैं। यह अनायास नहीं था कि जिस काल में अज्ञेय, राजेन्द्र यादव और उनकी समूची कथा-पीढ़ी यहाँ और इसी क्षण पर केन्द्रित एक क्षण के चित्र को कहानी कह रही थी, नई पीढ़ी के कतिपय कथाकार उसी एक क्षण के चित्र को निहायत ईमानदारी, श्रम और कथात्मक बुद्धिमत्ता के साथ लघुकथा के रूप में प्रस्तुत करने का कौशल दिखा रहे थे। कहानी के कभी इस तो कभी उस आन्दोलन में दशकों तक पलटियाँ मारकर थक चुकी तत्कालीन कथा-पीढ़ी उसके परम्परागत स्वरूप के बारे में अपनी आभ्यन्तर अस्वीकृति को वक्तव्यों से आगे यदा-कदा ही कथात्मक अभिव्यक्ति दे पा रही थी(अपने पार और हनीमून’—राजेन्द्र यादव) और टॉप-ऑर्डर आलोचकों की अस्वीकृति व उदासीनता से आहत हो उस दिशा में सार्थकत: आगे नहीं बढ़ पा रही थी। लघुकथा से जुड़े कथाकारों ने ऐसी प्रत्येक अस्वीकृति और उदासीनता का सामना बेहद धैर्यशीलता के साथ रचनात्मकता से जुड़े रहकर किया और विधा को सँवारने, सर्वमान्य-सामान्य बनाने व पूर्व पीढ़ी को इस धारा से जोड़े रखने में सफल रहे। इस संदर्भ में विशेष उल्लेखनीय यह भी है कि लघुकथा को उच्च-स्तर पर प्रचारित करने का श्रेय, हिन्दी कहानी के कथ्यों को प्रेमचंदपरक कथ्यों से आगे सरकाने की साहसपूर्ण, सक्रिय और सकारात्मक पहल करने वाले कथाकारों में से एककमलेश्वर को जाता है। कहानी के तत्कालीन जड़-फॉर्म को तोड़ने की पहल करते हुए सारिका के कई अंकों को उन्होंने लघुकथा-बहुल अंक के रूप में प्रकाशित किया। यह एकदम अलग बात है कि कुछेक रचनाओं को छोड़कर अधिकांशत: उनकी वह पहल व्यंग्यपरकता के नाम पर छिछली चुटकुलेबाजी और पैरोडीपन में ही उलझी रही। नि:संदेह यह भी लघुकथा से गंभीरतापूर्वक जुड़े तत्कालीन कथाकारों का ही बूता था कि हास्यास्पद लघुकथाएँ लिखकर सारिका में छपने या छपते रहने के मोह में वे नहीं फँसे और गुणात्मक व गंभीर लेखन से नहीं डिगे।
समकालीन उपन्यास और कहानी दोनों के बारे में एक बात अक्सर कही जाती रही है कि व्यक्ति-जीवन में आज इतनी विविधताएँ घर कर गई हैं कि जीवन को उसकी सम्पूर्णता में जीने की बजाय मनुष्य उसके खण्डों में जीने को अभिशप्त है। अर्थात जीवनचर्या ने आज मानव-व्यक्तित्व को खण्ड-खण्ड करके रख दिया है। आम आदमी आज अनैतिक, अवैधानिक या असामाजिक कार्यों से अपनी सम्बद्धता को जीवनयापन सम्बन्धी विवशताओं के कारण ही स्वीकार करता है, सहज और सामान्य रूप में नहीं। अब, लघुकथा भी चूँकि जीवन और व्यक्तित्व दोनों को यथार्थत: अभिव्यक्त करने वाली विधा है इसलिए उसमें खण्डित व्यक्ति-जीवन और खण्डित-व्यक्तित्व का चित्रण सर्वथा स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन यहाँ ध्यान देने और सावधानी बरतने की बात यह है खण्डित-व्यक्तित्व के चित्रण की यह अवधारणा एक कथाकार के रूप में हम पर इतनी अधिक हावी न हो जाए कि हमारी लघुकथाओं में हर तरफ अराजक चरित्र ही नजर आते रहें तथा सहज और सम्पूर्ण मनुष्य की छवि उनमें से पूरी तरह गायब ही हो जाए। बेशक, बिखर चुके जीवन-मूल्यों के बीच रह रहा कथाकार अपने भोगे हुए अनुभव और देखे हुए सत्य को ही अभिव्यक्त करेगा, लेकिन उसकी यथार्थपरक अन्तर्दृष्टि, अन्तश्चेतना, विवेकशीलता और जीवन-मूल्यों के प्रति उसकी निष्ठा की परीक्षा भी इसी बिन्दु पर आकर होगी।
अपने दीर्घकालीन अनुभवों से मनुष्य ने जाना कि यह प्रकृति स्वयं तो परिवर्तनशील है ही, वह खुद भी उसे बदल सकता है। उसने यह भी जाना कि उसके चारों ओर फैली यह सृष्टि जैसी आज नजर आती है, सदा वैसी ही नहीं थी। मनुष्य के इस अध्ययन और आकलन ने विज्ञान को जन्म दिया, उसे कर्मठता प्रदान की और इसी के बल पर उसने प्रकृति के अनेक स्रोतों को अपने अनुरूप ढालने की पहल की। प्रकृति-प्रदत्त विपरीत परिस्थितियों से हार मान लेने की बजाय उसने उनसे जूझने और उन पर विजय प्राप्त करने की हिम्मत स्वयं में पैदा की। इस प्रकार उसने यथार्थ को नया अर्थ प्रदान किया और उससे एक सक्रिय संपर्क स्थापित करने में सफल रहा। यहीं पर उसने प्रकृति से अपने भेद की नींव रखी और इसी कारण उसमें काल-चेतना समाविष्ट हुई। इस प्रकार वह वास्तविक यथार्थ के सक्रिय संपर्क में आया और प्रकृति, समाज और उसके स्वयं के बीच के संबंध इसी यथार्थ के अंग बन गए। रूप-कथा, परी-कथा और पौराणिक आख्यानों से उपन्यास, कहानी और समकलीन लघुकथा इसी बिन्दु पर प्रथक होते हैं। पूर्वकालीन लघुकथाओं में किसी सार्वकालिक, सामान्य और चिरन्तन सत्य की अभिवयक्ति होती थी, जबकि समकालीन लघुकथा में विशेष और युगीन ही नहीं, वैयक्तिक सत्य की भी अभिवयक्ति होती है। समकालीन लघुकथा में व्यंजित यथार्थ एक गतिशील और परिवर्तनशील यथार्थ है। इसमें मानव के सुख-दुख, आशा-आकांक्षाएँ विशिष्ट काल और संदर्भ में अंकित होते हैं।
राजेन्द्र यादव लघुकथा को कहानी का बीज बताते हैं। अब, बीज को अगर स्थूल अर्थ में ग्रहण करें तो इसे नासमझी ही माना जाएगा; क्योंकि उन जैसे पके और पघे विचारक के प्रत्येक शब्द या वाक्य को स्थूल अर्थ में ग्रहण नहीं किया जाना चाहिए। हम यों भी तो सोच सकते हैं कि यह सिर्फ कहानी का नहीं, बल्कि समूची कथा-विधा का बीज है और इसको सिद्ध किए बिना कथा के परमतत्व की सिद्धि सम्भव नहीं है। दरअसल हर कथा-रचना के अन्तर में कम से कम एक लघुकथा विद्युत-तरंग की तरह विद्यमान है और पैंसठोत्तर-काल की तो अनगिनत कहानियाँ ऐसी हैं जो अन्यान्य प्रसंगों के सहारे विस्तार पाई हुई लघुकथा ही प्रतीत होती हैं। इस दृष्टि से देखें तो लघुकथा को कहानी का बीज क्या, सीधे-सीधे उसकी शक्ति कहना भी न्यायसंगत है।
ऊपर उद्धृत वाक्यांशों विशेषत: अज्ञेयजी और यादवजी के कथनांशों को कथा के प्रांगण में लघुकथा के कदमों की स्पष्ट आहट के रूप में पहचाना और रेखांकित किया जाना चाहिए था, लेकिन आलोचकीय दायित्वहीनता का निर्वाह करते हुए इन्हें न सिर्फ पहचाना नहीं गया बल्कि तिरस्कृत भी रखा गया।
यह तो मानना ही पड़ेगा कि आज का लेखक अपनी रचना के सूत्र यथार्थ जीवन की बेहद पथरीली और ऊबड़-खाबड़ जमीन से खींचकर लाता है। प्रत्येक रचनाकार अपनी रचना के लिए अपनी परम्परा से और अपने परिवेश से प्रेरणा पाता है; और समाज में जो वृत्तियाँ उसे अपने अनुशीलन से अथवा अपने वातावरण से थोड़ी-बहुत उपलब्ध होती हैं, उनका सृजन पर थोड़ा-बहुत कॉन्शस-अनकॉन्शस, उलटा या सीधा असर पड़ता ही है। यह असर उसके निजी व्यक्तित्व के वैशिष्ट्य से नियमित और रूपान्तरित भी होता है और उसके कृतित्व को सम्पन्नता भी दे सकता है या उसे हानि भी पहुँचा सकता है। यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि यह जरूरी नहीं है कि इस प्रकार का स्वाध्याय उसकी अपनी विधा की रचनाओं तक ही सीमित रहे और न ही यह जरूरी है कि वह किसी विधा-विशेष की सभी उपलब्ध कृतियों का अनुशीलन करे। इस सब का नियमन तो रचनाकार की रुचि द्वारा ही होगा। इस प्रकार प्रत्येक रचनाकार का सृजन एक अत्यन्त जटिल रूप ग्रहण कर लेता है जिसमें कितनी ही धाराओं से आकर विभिन्न प्रभाव संश्लिष्ट हो जाते हैं।
आज का कथानायक मधुर कल्पनाओं के बीच कुछेक आदर्शों की रक्षा या स्थापना हेतु पाठक का मनोरंजन मात्र नहीं करता, बल्कि व्यवस्थाजन्य विकृतियों के खिलाफ आमजन के अन्तर्मन में दबी पड़ी हर स्तर की प्रतिहिंसा को खुले रूप में संसार के सामने रखता है। आज के कथाकार ने यह जान लिया है कि भ्रष्ट और आततायी चरित्र वाले लोगों पर भावुकतापूर्ण करुणा बरसाने वाले शब्द अब बेअसर हैं। ऐसे शब्द याचना के हों या धिक्कार के, न तो उनकी सोई हुई चेतना को जगा सकते हैं और न ही उनकी आत्मा का परिमार्जन कर सकते हैं। समाज का कल्याण किसी भी प्रकार अब याचना-भरे शब्द नहीं कर सकते हैं। इसलिए भ्रष्ट चरित्रों के सुधार का एकमात्र उपाय यही बचा है कि इनके भीतर जमा हो चुके मल और उसकी दुर्गन्ध को ऐन इनकी आँखों और नथुनों के आगे सरका दिया जाए, ताकि ये अपनी ही गन्दगी और दुर्गन्ध से बचकर भागे फिरें लेकिन भागने न पाएँ। यही आज का यथार्थ है यही यथार्थवादी दृष्टि। अत: अन्य अनेक कारणों के साथ-साथ यह भी एक कारण है कि हिन्दी की पहली लघुकथा की दौड़ में एक टोकरी भर मिट्टी(माधवराव सप्रे, 1901) दोयम ठहरती है और अंगहीन धनी(भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, 1876) अव्वल। जो आलोचक मित्र परिहासिनी को चुटकुलों और हास-परिहास की पुस्तक कहकर विवेचन से खारिज कर देना चाहते हैं उनके पुनर्विचार हेतु यहाँ अंगहीन धनी को इस दृष्टि से उद्धृत कर रहा हूँ कि वे कृपया बताएँ कि यह रचना चुटकुला या हास-परिहास की रचना किस कोण से है:
अंगहीन धनी
एक धनिक के घर उसके बहुत-से प्रतिष्ठित मित्र बैठे थे। नौकर बुलाने को घंटी बजी। मोहना भीतर दौड़ा, पर हँसता हुआ लौटा।
और नौकरों ने पूछा,“क्यों बे, हँसता क्यों है?”
तो उसने जवाब दिया,“भाई, सोलह हट्टे-कट्टे जवान थे। उन सभों से एक बत्ती न बुझे। जब हम गए, तब बुझे।
मोहना का यह जवाब शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर दासत्व में डूबे देश के तत्कालीन धनिकों और प्रतिष्ठितों के सामन्तवादी चरित्र का खुला चिट्ठा है। यह हँसने या हँसाने वाला नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार कराने वाला सांकेतिक वाक्य है। इस रचना का वैशिष्ट्य भी यही है कि इसे सपाट उद्बोधक रचना के तौर पर लिखने की बजाय भारतेंदुजी ने गहन सांकेतिक शैली प्रदान की है। संकेत यह है कि सोलह हट्टे-कट्टे जवान जब कमरे में जल रही एक बत्ती तक स्वयं बुझाने की जेहमत नहीं उठा सकते तब ब्रिटिश-दासता से मुक्ति के लिए लड़ना तो दूर उसके बारे में वे आखिर सोच भी कैसे सकते हैं!
किसी भी रचना का विवेचन स्थूलत: नहीं बल्कि उसके रचनाकार व रचनाकाल दोनों की विविध परिस्थितियों की विवेचना के मद्देनजर किया जाना चाहिए।

शनिवार, 24 जनवरी 2009

पहली हिन्दी लघुकथा/बलराम अग्रवाल


हिन्दी कहानी के विधिवत् जन्म लेने से काफी पहले पाश्चात्य विद्वान एडगर एलन पो (1809 ई.-1849 ई.), ओ. हेनरी (1862 ई.-1910 ई.), गाइ द मोपांसा(1850 ई.-1893 ई.) तथा एन्टन पाब्लोविच चेखव (1860 ई.-1904 ई.) के माध्यम से कहानी अपने उत्कृष्टतम स्वरूप को प्राप्त कर चुकी थी। भारतीय भाषाओं में बंगला कहानी भी खुली हवा में अपना परचम लहरा चुकी थी। हिन्दी में परिमार्जित कहानी के रूप में जो रचनाएँ प्रकाश में आई हैं, आमतौर पर सन् 1900 ई. के आसपास प्रकाशित हुईं। अलग-अलग कारणों से, पहली हिन्दी कहानी की दौड़ में जो कहानियाँ शामिल हैं, उन्हें उनके प्रकाशन-काल के क्रम में निम्नवत् प्रस्तुत किया जा सकता है :
1. प्रणयिनी परिचय(1887) किशोरीलाल गोस्वामी
2. छली अरब की कथा(1893) संभवतः लोककथा
3. सुभाषित रत्न(1900) माधवराव सप्रे
4. इन्दुमती (1900) किशोरीलाल गोस्वामी
5. मन की चंचलता(1900) माधवप्रसाद मिश्र
6. एक टोकरी भर मिट्टी(1901) माधवराव सप्रे
7. ग्यारह वर्ष का समय(1903) रामचंद्र शुक्ल
8. लड़की की कहानी(1904) माधवप्रसाद मिश्र
9. दुलाई वाली(1907) राजेन्द्र बाला उर्फ बंग महिला
10. राखीबंद भाई(1907) वृंदावन लाल वर्मा
11. ग्राम(1911) जयशंकर प्रसाद
12. सुखमय जीवन(1911) चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’
13. रक्षा बंधन(1913) विश्वम्भर नाथ शर्मा ‘कौशिक’
14. उसने कहा था(1915) चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’
डॉ. अजय तिवारी ने इस क्रम में सन् 1871 ई. में प्रकाशित रेवरेंड जे. न्यूटन की कहानी ‘एक जमींदार का दृष्टांत’ को भी जोड़ा है। ‘वर्तमान साहित्य’ के शताब्दी कथा विषेशांक(जनवरी-फरवरी 2000) में उन्होंने उसका पाठ भी प्रस्तुत किया है। तिवारी जी द्वारा प्रस्तुत उक्त कहानी की भाषा आज जितनी परिमार्जित है जो कि निश्चित रूप से 1871 ई. में प्रचलित नहीं थी। अतः यह प्रयास एक दुष्प्रयास ही अधिक प्रतीत होता है। खैर, यहाँ पर हमारा उद्देश्य मात्र इतना बताना है कि ‘पहली’ हिन्दी कहानी की पंक्ति में इस समय तक सन 1871 ई. से लेकर सन 1915 ई. तक प्रकाशित विभिन्न कथाकारों की 15 कहानियाँ उपलब्ध हैं। हरेक के बारे में उसके प्रस्तोता का ठोस साक्ष्य अथवा तर्क उपस्थित है। परन्तु हिन्दी लघुकथा की स्थिति इससे एकदम भिन्न है। ‘पहली’ हिन्दी लघुकथा के बारे में अब तक जो भी नाम सुझाए गए हैं, उनमें किसी दृष्टि-विशेष का ध्यान नहीं रखा गया। इस मामले में सिर्फ दो बातों को आधार बनाकर चला गया लगता हैएक, रचना का कहानी के फार्म में होना; तथा दो, उसका लघ्वाकारीय होना। कोई सार्थक दृष्टि इस बारे में नहीं अपनाई गई।
पहली हिन्दी लघुकथा’ की प्रस्तुति की शुरुआत सरस्वती(1916 ई.) में प्रकाशित पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की कथा-रचना ‘झलमला’ की गाजियाबाद से प्रकाशित पत्रिका ‘सर्वोदय विश्ववाणी’ में इसके पुनर्प्रकाशन से हुई। बाद में, इसके कुछ अंशों को तराशकर प्रो. कृष्ण कमलेश ने इसे ‘पहली हिन्दी लघुकथा’ शीर्ष तले ही ‘कथाबिंब’ के लघुकथा-विशेषांक में प्रकाशित किया। उन दिनों निश्चित रूप से आज जितना शोध हिन्दी लघुकथा में नहीं हुआ था। आज की स्थिति यह है कि ‘सरस्वती’ में प्रकाशित उक्त ‘झलमला’ के पाठ से अलग किंचित् लम्बी कहानी जितना विस्तृत पाठ भी बख्शी जी ने तैयार किया था। उस पाठ को उन्होंने अपने कहानी संग्रह ‘झलमला’ में दिया। इसलिए, ‘झलमला’ के बारे में लघुकथा के शोधार्थियों को नए सिरे से सोचने की जरूरत है। यद्यपि यथेष्ट शोध तो अभी भी वांछित है और आगे भी हमेशा रहेगा तथापि पहले की तुलना में आज हम स्वयं को कुछ अधिक स्पष्ट ढंग से व्यक्त कर पाने में सक्षम अवश्य पाते हैं। अब तक जिन लघ्वाकारीय गद्य कथा-रचनाओं को पहली लघुकथा होने की दौड़ में गिना जाना चाहिए, वे प्रमुखतः निम्नप्रकार हो सकती हैं :
1. अंगहीन धनी (परिहासिनी, 1876) भारतेंदु हरिश्चन्द्र
2. अद्भुत संवाद (परिहासिनी, 1876) भारतेंदु हरिश्चन्द्र
3. बिल्ली और बुखार (प्रामाणिकता अप्राप्य) माखनलाल चतुर्वेदी
4. एक टोकरीभर मिट्टी (छत्तीसगढ़ मित्र, 1901) माधवराव सप्रे
5. विमाता (सरस्वती, 1915) छबीलेलाल गोस्वामी
6. झलमला (सरस्वती, 1916) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
7. बूढ़ा व्यापारी (1919) जगदीशचन्द्र मिश्र
8. प्रसाद (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
9. गूदड़ साईं (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
10. गुदड़ी में लाल (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
11. पत्थर की पुकार (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
12. उस पार का योगी (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
13. करुणा की विजय (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
14. खण्डहर की लिपि (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
15. कलावती की शिक्षा (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
16. चक्रवर्ती का स्तम्भ (प्रतिध्वनि, 1926) जयशंकर प्रसाद
17. बाबाजी का भोग (प्रेम प्रतिमा, 1926) प्रेमचंद
18. वैरागी (आकाशदीप, 1929) जयशंकर प्रसाद
19. सेठजी (1929) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
अगर इनमें प्रेमचंद की उन लघ्वाकारीय कहानियों को भी विचारार्थ स्वीकार करना चाहें जो मूलतः उर्दू में काफी पहले प्रकाशित हो चुकी थीं, परन्तु उनका रूपांतर/लिप्यांतर काफी बाद में, यहाँ तक कि उनकी मृत्यु के भी वर्षों बाद प्रकाश में आया, तो वे निम्नप्रकार हैं :
1. बाँसुरी (उर्दू कहकशाँ, जनवरी 1920, हिन्दी रूपान्तर गुप्तधन-1, 1962 में)
2. राष्ट्र का सेवक (उर्दू पत्रिका ‘अलनाजिर’ के जनवरी 1917 अंक में तथा उर्दू शीर्षक ‘कौम का खदिम’ से प्रेम चालीसी, 1930 में, हिन्दी रूपान्तर गुप्तधन-2, 1962 में)
3. बंद दरवाजा (उर्दू प्रेम चालीसी, 1930 में)
4. दरवाजा(उर्दू पत्रिका ‘अलनाजिर’ के जनवरी 1930 अंक में, हिन्दी लिप्यान्तर ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’, 1988 में)
पहली हिन्दी कहानी’ के आकलन का आधार अभी तक तय नहीं हुआ है। शायद इसीलिए सर्वमान्य रूप से कोई एक कहानी भी अभी तक ‘पहली हिन्दी कहानी’ होने का खिताब नहीं पा सकी है, अनेक कहानियाँ इस दौड़ में शामिल हैं। आगे कुछ और नाम इस सूची में जुड़ सकते हैं, इंकार नहीं किया जा सकता। कथा और कथाकार की साहित्यिक-स्थिति के आकलन के आधार के बारे में ‘एक दुनिया समानान्तर’ की भूमिका ‘यह संकलन’ में राजेन्द्र यादव यों कहते हैंप्रतिभा अपने विस्फोट से नहीं, नैरन्तर्य से अपने-आपको प्रमाणित करती है और कहानीकार का स्थान एक कहानी से नहीं, अनेक कहानियों से विकसित होती उसकी जीवन-दृष्टि से निर्धारित होता है, अपनी विधा के प्रति आत्मीय लगाव से निश्चित होता है। इसी भूमिका में वह आगे लिखते हैं...कुछ ने इस नैरन्तर्य को प्रमाणित करना आवश्यक नहीं समझा तो कुछ ने प्रमाणित नहीं किया।

अगर ऊपर उद्धृत अंश के प्रकाश में देखा जाए तो आकलन हेतु विचारणीय कथाकार में इन गुणों का होना आवश्यक है(1) प्रतिभा-स्फोट (2) नैरन्तर्य तथा (3) जीवन-दृष्टि। यद्यपि यह तो तय है कि नैरन्तर्य की शर्त उन लेखकों पर लागू नहीं होनी चाहिए जिन्हें दुर्भाग्यवश दीर्घ-जीवन प्राप्त नहीं हुआ। उदहरणार्थ, ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ में संकलित कैलाश जायसवाल अपनी लघुकथा ‘पुल बोलते हैं’ की रचना के बाद संभवतः कुछ और नहीं लिख सके और दिवंगत हो गए।

इधर, जैसे-जैसे हिन्दी लघुकथा का विधापरक स्वरूप स्पष्ट और मान्य होता जा रहा है, वैसे-वैसे ‘पहली हिन्दी लघुकथा’ की चिंता भी उत्पन्न होने लगी है। यह स्वाभाविक ही है। समाज द्वारा स्वीकृत विधा का अकादमी में प्रवेश निश्चित है और अकादमी में उसके पठन-पाठन, शोध और अध्ययन आदि के अपने कुछ निश्चित तौर-तरीके, कुछ निश्चित अनुशासन हैं। ‘प्रथमतः’ की खोज भी उन तौर-तरीकों और अनुशासनों के अन्तर्गत अपनी पैठ बनाए हुए है।
सर्वोदय विश्ववाणी’ में पहली हिन्दी लघुकथा के तौर पर ‘झलमला’ की प्रस्तुति के उपरान्त दूसरा सद्प्रयास बलराम ने कियामाखनलाल चतुर्वेदी की लघुकथा ‘बिल्ली और बुखार’ को पहली हिन्दी लघुकथा घोषित करके। परन्तु यह रचना प्रस्तुतिकरण के समय से ही विवादों के घेरे में रही और आज तक भी है। इसको प्रथमतः प्रकाशित करने वाले पत्र-पत्रिका-पुस्तक की प्रति तथा इसका ठीक-ठीक प्रकाशन-काल अभी तक निश्चित नहीं है। तीसरे स्थान पर माधवराव सप्रे की, उन्हीं के द्वारा सम्पादित पत्र ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ के वर्ष 2, अंक 4, वर्ष 1901 ई. में प्रकाशित दो पृष्ठीय कहानी ‘एक टोकरीभर मिट्टी’ का नाम आता है। इसके प्रस्तोता डॉ. कमल किशोर गोयनका रहे। बाद में ‘बिल्ली और बुखार’ से अपग्रेड होकर बलराम ने भी इनका अनुसरण प्रारम्भ किया और डॉ. अशोक भाटिया ने भी। हिन्दी में लघुकथा-आन्दोलन, लघुकथा-आलोचना, शिक्षण, शोध और पत्रकारिता आदि से जुड़े तीन-तीन दिग्गज जब एक ही बात कह रहे हों तो संदेह की गुंजाइश बचनी नहीं चाहिए। लेकिन कुछ सवाल हैं जो ‘पहली हिन्दी लघुकथा’ को तय या घोषित करते हुए स्वाभाविक रूप से उभरते हैं, उभरने चाहिएँ। यह कि, किसी कथा-रचना को ‘पहली हिन्दी लघुकथा’ घोषित करने का आधार क्या माना गया है? उसका लघ्वाकारीय होना मात्र ही पर्याप्त माना गया है या उसमें उन आधारभूत गुण-तत्वों का होना भी आवश्यक माना गया है जिनके कारण कोई कथा-रचना ‘कहानी’ न होकर ‘लघुकथा’ होती है? दूसरे, उस रचना का (अ) मौलिक (आ) तत्कालीन पत्र-पत्रिका-पुस्तक में प्रामाणिक रूप से प्रकाशित तथा (इ) देश व काल सापेक्ष जीवन-दृष्टि से युक्त होना आवश्यक माना गया है या नहीं? तीसरे, रचनाकार के लेखकीय इतिवृत्त की समीक्षा करने को उपयुक्त माना गया है या नहीं?

पारंपरिक लघुकथा से समकालीन लघुकथा के अलगाव के आधार के बारे में पहला तथ्य यह है कि, डॉ. कमल किशोर गोयनका के अनुसार, लघुकथा एक लेखकविहीन विधा है अर्थात् रचना में पाठक को लेखक की उपस्थिति का आभास नहीं होना चाहिए। दूसरा सर्वमान्य तथ्य यह है कि लघुकथा एक निदानात्मक रचना है, उपचारात्मक नहीं। ‘एक टोकरीभर मिट्टी’ का अंत यों होता हैजमींदार साहब धन-मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गये थे, पर विधवा के उपरोक्त वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गईं। कृतकर्म का पश्चाताप कर उन्होंने विधवा से क्षमा माँगी और उसकी झोपड़ी वापस कर दी।
स्पष्टतः यह एक उपचारात्मक (ट्रीटमेंट प्रस्तुत करने वाला) दृष्टान्तपरक कथा-रचना बनकर रह गई है। विधवा के एक पंच (प्रहारपूर्ण वक्रवाक्य) से जमींदार साहब (न कि सिर्फ जमींदार) का हृदय-परिवर्तन हो जाता है। शायद यही इसका हेतु भी है कि जमींदार (साहबों) के हृदय में व्याप्त कोमल मानवीय भावनाओं से भी आमजन का परिचय कराया जाए। बताया जाए कि जमींदार (साहब) मात्रा शोषक व पाषाण-हृदय नहीं होते। निर्बलों और दीनों से वे सिर्फ छीनते ही नहीं हैं, बल्कि उन पर दया भी दिखा सकते हैं। उनके हृदय की कोमलता को कोई जगाने वाला होना चाहिए, बस। निर्बल को हमेशा के लिए दबा देना का एक सूत्रा चालाक आततायी हमेशा अपनाते हैं। वो यह कि ‘जुल्म के बाद किया गया अहसान स्थाई प्रभाव बनाने वाला होता है’। कुछ सुधी आलोचक यह भी कह सकते हैं कि इस रचना में जमींदार के साथ ‘श्रीमान’ या ‘साहब’ विशेषण व्यंजनापरक हैं, सम्मानसूचक नहीं। चलो, मान लेते हैं। परन्तु, प्रेमचंद की कहानी ‘घासवाली’(1929) में भी जमींदार हैचैनसिंह। उसका भी हृदय-परिवर्तन होता है, परन्तु दलित, दमित और शोषित पात्र मुलिया के ‘शठे शाठ्यं समाचरेत’ व्यवहार के द्वारा, दीनता के द्वारा या उसे परलोक का डर दिखाकर नहीं। जमींदार के लिए किसी व्यंजनापरक विशेषण की आवश्यकता प्रेमचंद ने महसूस नहीं की। वह बेहद गरीबी में पले थे, उनका या उनके किसी पूर्वज का कोई सम्बन्ध किसी राजा, राजकुमार या राज-परिवार से नहीं रहा। उल्टे अंग्रेज-अधिकारी के द्वारा उन्हें अपमान झेलना पड़ा था। शायद इसीलिए उच्च तबके के लिए उनके लेखन में कोई सोफ्ट-कोर्नर नहीं था।

हम जानते हैं कि दृष्टांतपरक, बोधपरक, नीतिपरक आदि गद्यात्मक व पद्यात्मक दोनों प्रकार की लघु-कथाओं की सुदीर्घ परम्परा हिन्दी को संस्कृत वाङमय(वांग्मय) और अन्य विश्व कथा-साहित्य से प्राप्त है। परन्तु आज, ‘लघुकथा’ से हमारा तात्पर्य आधुनिक यथार्थ-बोध की लघ्वाकारीय गद्य कथा-रचना से होता है, पारम्परिक दृष्टांतपरक, बोधपरक, नीतिपरक लघु-कथा रचना से नहीं। अगर किसी दृष्टांतपरक कथा-रचना को ‘पहली हिन्दी लघुकथा’ कहा जा सकता है तो फिर ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ ही क्यों? कोई और क्यों नहीं? क्या सिर्फ इसलिए कि इसे हिन्दी साहित्य में पैठ रखने वाले पं. माधवराव सप्रे ने लिपिबद्ध किया है? या फिर इसलिए कि इसका प्रकाशन-काल (सन् 1901.) लघुकथा के विद्यार्थियों, शिक्षकों और शोधार्थियों को याद रखने-रखाने की दृष्टि से सुविधाजनक है?
मैं समझता हूँ कि ‘पहली हिन्दी लघुकथा’ के मामले में भारतेंदु हरिश्चन्द्र की ‘परिहासिनी’(1876) को बहुत ही हल्के अंदाज में लिया गया है। यह तो स्पष्ट है कि ‘परिहासिनी’ पर बातचीत का अभी तक का आधार ‘भारतेंदु समग्र’ में प्रकाशित उसकी प्रतिकृति ही है। मूल-प्रति का हम में से किसी ने भी अभी तक अवलोकन-निरीक्षण नहीं किया है। दुःख की बात यह है कि स्वयं ‘भारतेंदु समग्र’ के सम्पादक हेमंत मिश्र ने उसका मूल्यांकन गंभीरता से नहीं किया। उन्होंने अपने सम्पादकीय ‘भारतेंदु को पढ़ने के बाद’ में लिखा हैपरिहासिनी’ उनके व्यंग्य और चुटकुले का संग्रह है(पृष्ठ पेंतीस)। पुस्तक का कवर-पृष्ठ इस प्रकार हैपरिहासिनी अर्थात् हँसी, दिल्लगी, पंच, चीज की बातें और चुटकिले।’ बहुत सम्भव है कि मूल पुस्तक में पूरी सामग्री को उपर्युक्त पाँच उपशीर्षों में विभक्त करके छापा गया हो। ‘भारतेंदु समग्र’ में प्रकाशित ‘परिहासिनी’ का पहला उपशीर्ष ‘चीज की बातें’ है जिसके अन्तर्गत 7 गद्य की तथा एक लम्बी पद्य की रचना है। दूसरा व तीसरा उपशीर्ष ‘दिल्लगी की बातें’ है जिसके अन्तर्गत क्रमशः 1915 या 16 गद्य रचनाएँ हैं। ‘ज्ञान चरचा’ व ‘दुआ माँगना’ उपशीर्ष भी बनाए गए हैं, जिनके अन्तर्गत क्रमशः 34 गद्य रचनाएँ हैं। अंतिम उपशीर्ष ‘चुटकिले’ है, परन्तु उसके अन्तर्गत मात्र एक गद्य रचना है जबकि उपशीर्ष को बहुवचन रखा गया है। इससे इसके मूल-पुस्तक से भिन्न होने का संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। प्रकाशन में प्रूफ की अनेक गलतियाँ तो इस संस्करण में हैं ही।

भारतेंदु ने ‘परिहासिनी’ को ‘कथा-कहानी’ की पुस्तक नहीं कहा है; परन्तु इसके प्रथम उपशीर्ष ‘चीज की बातें’ में ‘चीज’ क्या है?यह विचारणीय है। दूसरे, ‘पंच’ क्या है?यह भी विचारणीय है। ‘चीज’ यानी ‘वस्तु’ अर्थात् वह जिसे उपयोग हेतु ग्रहण किया जा सके। ‘चीज की बातें’ अपने आप में एक अनोखा शब्द-प्रयोग है। रचना के, वह भी कथात्मक रचना के संदर्भ में ‘वस्तु’ का क्या महत्व है, इसे स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं है। मुक्के के एक ही वार में दीवार फोड़ देने के लिए अंग्रेजी में ‘पंच’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसीलिए मुक्केबाजी का यह तकनीकी शब्द है। साहित्य में इसका निहित-अर्थ व्यक्ति को तिलमिलाकर रख देने वाला प्रहारपूर्ण वक्र वाक्य-प्रयोग है। निश्चय ही यह ‘आइरनी’ से भिन्न प्रकृति रखता है। यही कारण है कि ‘परिहासिनी’ में ‘चीज की बातें’ उपशीर्ष के अन्तर्गत संकलित गद्य रचनाएँ मात्र चुटकुला नहीं हैं। वे ‘चीज’ और ‘पंच’ दोनों प्रकार की रचनाएँ हैं। कल्पना करिए कि आप ‘भेद’ के कृष्ण प्रसाद हैं। तब दामोदर जैसे कुपच प्रकृति के मित्रा को पाकर आप कैसा महसूस करेंगे? बात को तीसरी जगह पहुँचा देने के उसके तर्क को सुनकर अपना सिर नहीं पीट लेंगे? ‘जादूगरनी’ बड़े सहज ढंग से दो कुमारियों से एक रुपया ठग लेती है, वह भी मन की परतों में दबी अकाट्य सच्चाई बताकर। ‘खुशामद’ के उस आशिक की हालत का अनुमान लगाइए, जो स्वयं अपनी ही अति का शिकार है। ‘मुँहतोड़ जवाब’ व ‘लाला साहब का रामचेरा’ हाजिर-जवाबी (विट) का तथा ‘अद्भुत संवाद’ प्रहारपूर्ण वक्रवाक्य (पंच) का अनुपम उदाहरण है। परन्तु ‘अंगहीन धनी’ एक असाधारण गद्य-कथा है। वस्तुतः ‘अद्भुत संवाद’ और ‘अंगहीन धनी’, ये दोनों ही रचनाएँ भारतेंदु की प्रतिभा और देश-काल सापेक्ष जीवन-दृष्टि को गहराई के साथ प्रस्तुत करती हैं। इनमें ‘अंगहीन धनी’ में परिस्थितियों को गंभीरता के साथ और ‘अद्भुत संवाद’ में मसखरेपन के साथ पाठकों के समक्ष रखा गया है। गहन-गंभीर प्रकृति के कारण ‘अंगहीन धनी’ का प्रभाव स्थाई बना रहता है, जबकि मसखरेपन के कारण वही बात ‘अद्भुत संवाद’ मात्र बनकर रह जाती है, भुला दी जाती है। तथापि संदेश दोनों रचनाओं में लगभग एक ही है। पाठकों के चिंतन-मनन-विश्लेषण हेतु यहाँ प्रस्तुत हैं दोनों रचनाएँ :


अंगहीन धनी
एक धनिक के घर उसके बहुत-से प्रतिष्ठित मित्र बैठे थे। नौकर बुलाने को घंटी बजी। मोहना भीतर दौड़ा, पर हँसता हुआ लौटा।

और नौकरों ने पूछा, क्यों बे, हँसता क्यों है?

तो उसने जवाब दिया, भाई, सोलह हट्टे-कट्टे जवान थे। उन सभों से एक बत्ती न बुझे। जब हम गए, तब बुझे।
अद्भुत संवाद
, जरा हमारा घोड़ा तो पकड़े रहो।

यह कूदेगा तो नहीं?

कूदेगा! भला कूदेगा क्यों? लो सँभालो।

यह काटता है?

नहीं काटेगा, लगाम पकड़े रहो।

क्या इसे दो आदमी पकड़ते हैं, तब सम्हलता है?

नहीं।

फिर हमें क्यों तकलीफ देते हैं? आप तो हई हैं।
अद्भुत संवाद’ संवाद-शैली की लघुकथा है। वस्तु-संप्रेषण के लिए इसमें एक मसखरे का प्रयोग किया गया है। व्यवस्थाजन्य खतरों से बचने के लिए लेखक को ऐसे प्रयोग अक्सर ही करने पड़ जाते हैं। ईसप ने अपने अमीर मालिकों और राजाओं की कोपदृष्टि से बचने के लिए अपनी कहानियों में सदा ही मानवेतर पात्रों का प्रयोग किया, ऐसा माना जाता है। निराला जी ने भी वस्तु-प्रेषण हेतु अपनी एक कहानी में एक नारी पात्र को ‘पगली’ दिखाया। ‘अद्भुत संवाद’ में पारसीकल टोन है। भारतेंदु नाट्य विधा के गहरे विद्वान थे। हिन्दी रंगमंच और नाट्य-लेखन, दोनों को ही उनका अभूतपूर्व योगदान है। वस्तु-संप्रेषण की उनमें अद्भुत और अनुपम क्षमता थी। ‘अद्भुत संवाद’ का स्थूल कथानक यह है कि कोई रईसजादा अपना घोड़ा पकड़े रखने के लिए पास खड़े गरीब दिख रहे एक व्यक्ति पर रौब जमाकर उससे बेगार लेना चाहता है। लेकिन वह व्यक्ति उसके रौब में न आकर बड़े मसखरे अन्दाज में उसे बेगार देने से मना कर देता है। कल्पना करिए कि उस काल में, जब कि ब्रिटिश-व्यवस्था ने रईसों, जमींदारों और नवाबों को असीम अधिकार दिए हुए थे, किसी आदमी का उन्हें बेगार देने से मना करना उसके लिए कितना घातक सिद्ध हो सकता था। और उस लेखक के हाल की भी कल्पना करना मुश्किल नहीं है जो अपनी रचनाओं के माध्यम से आमजन को बेगार न देने के लिए भड़का रहा हो। अतः भारतेंदु को यह काम मसखरे के माध्यम से करना पड़ा।
अंगहीन धनी’ का प्रत्यक्ष कथानक बताने की आवश्यकता नहीं है। उसके संदेश को समझने की आवश्यकता है। यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जन्म से कई वर्ष पूर्व की रचना है। गुलाम-देश के कुछ रईस और नवाबजादे ऐशगाह में मौज-मस्ती कर रहे हैं। बाहर आदेशपूर्ति के लिए नौकरों की भीड़ तैनात है। भीतर से बुलावे की घंटी बजती है; और काम सिर्फ इतना है कि ऐशगाह में जलती एक बत्ती को बुझाना है। ये लोग, जो अपने ही कमरे या हाल में जलती एक बत्ती को बुझाने का श्रम नहीं कर सकते, क्या खाकर देश की आजादी के लिए लड़ेंगे? यह उस काल की शाश्वत-चिंता है जिसे भारतेंदु गंभीरतापूर्वक स्वर देते हैं। लघुकथा के आधारभूत गुण-तत्वों पर भी यह रचना पूरी तरह खरी उतरती है :
(अ) लाघवयह भाषा-विज्ञान की एक टर्म है जिसका अर्थ होता है किसी रचना को विषय से इतर यानी उससे भटकाने वाले विचारों व शब्दों से मुक्त रखना। बिल्कुल उस तरह जैसे कि विज्ञान का कोई विद्यार्थी प्रयोगशाला में आक्सीजन गैस बनाते समय अपनी मेज पर सिर्फ सम्बन्धित सामग्री को ही रखाता है, शेष सब को वहाँ से हटा देता है। इस रचना में भी असंगत कथ्य को स्थान नहीं मिला है। मात्र वस्तु-प्रेषण हेतु आवश्यक सामग्री का ही चयन किया गया है।
(आ) नेपथ्यइस रचना का नेपथ्य सहज, स्पष्ट और सार्थक है। देश-काल से इसका तारतम्य आसानी से जुड़ता है। उदाहरणार्थ, लघुकथा में यद्यपि यह प्रत्यक्ष नहीं है, परन्तु परोक्षतः लगता है कि अनेक नौकर बाहर बैठे अलाव ताप रहे हैं और बन्द दरवाजे के भीतर से बुलावे की घंटी के स्वर के प्रति सचेत हैं।
(इ) सम्पूर्णतासम्पूर्णता से तात्पर्य रचना का सौन्दर्यावयवों सहित समस्त प्रभावकारी अवयवों से युक्त होना। ‘अंगहीन धनी’ का भाषिक-गठन, शैली, सम्प्रेषण और प्रभाव प्रशंसनीय है। यह एक सम्पूर्ण लघुकथा है।
इसप्रकार, ‘अंगहीन धनी’ गुरु-गंभीर चेतन-दृष्टि से युक्त सकारात्मक यथार्थ वाली ऐसी लघुकथा है जो अपने समय के सरोकारों से पाठक को जोड़ने का दायित्व सफलतापूर्वक निभाती है। यहां इस भ्रम का, कि भारतेंदु हरिश्चंद्र इसके लेखक नहीं हैं और, ‘इनके लेखक नई शोध होने तक अज्ञात हैं’ निवारण आवश्यक है। शोध एक तथ्यपरक विधा है। आधे-अधूरे तथ्यों की प्रस्तुति और पूर्वाग्रहग्रस्तता इसे भ्रष्ट करते हैं। 
भारतेंदु समग्र’ के पृष्ठ 1066 पर ‘परिहासिनी’ को प्रस्तुत करने के क्रम में इसके संपादक ने अपनी ओर से एक टिप्पणी लिखी है, ‘अपने मित्रों के लिए ‘हंसी’, ‘चीज की बातें’ और ‘चुटकुले’ भारतेंदु ने लिखे थे, बाद में जिसका संग्रह ‘परिहासिनी’ उन्होंने स्वयं प्रकाशित कराया था। इसका रचना काल 1875 से सन् 1880 के बीच है।’
दूसरी बात, उक्त पुस्तक पर टिप्पणीनिज मित्रागण ठाकुर कविराज श्यामलदासजी, राजा गिरिप्रसाद सिंह, बाबू बदरीनारायण चौधरी, बाबू बालेश्वर प्रसाद और बाबू दुर्गा प्रसाद के चित्त विनोद के अर्थ हरिश्चंद्र ने संग्रहीत किया।’
पर हेमंत शर्मा ने लिखा है, ‘भारतेंदु ने लिखे’ और नीचे मुद्रक की ओर से अथवा स्वयं भारतेंदुजी की ओर से घोषणा है ‘हरिश्चंद्र ने संग्रहीत किया।’ तो क्या भारतेंदु के समय में ‘संग्रह’ और ‘संकलन’ के बीच कोई अंतर नहीं माना जाता था? या फिर यह कि उन्होंने दूसरों के लिखे (अथवा पूर्व प्रचलित) चुटकुले यहां-वहां से संकलित कर जान-बूझकर अपने नाम से प्रकाशित करा लिए!  अगर आप ऐसा मानते हैं तो निःसंदेह, भारतेंदु को जानते ही नहीं हैं। वह कितनी हंसोड़ तबियत के व्यक्ति थे और उनमें कितना साहसपूर्ण ‘विट’ भरा था, उसके अनेक उदाहरण हेमंत शर्मा ने भी ‘भारतेंदु समग्र’ में दिए हैं।
तीसरी और अंतिम बात, प्रचलित कथाएँ जब किसी समर्थ कथाकार द्वारा विशिष्ट उद्देश्य से विशिष्ट शिल्प और शैली में रच दी जाती हैं तो उनकी जन-स्वीकृति उसी के अनुरूप बनती है। उदाहरण के लिए, तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ के प्रारम्भ में ही स्वीकार किया, नाना पुराण निगमागम सम्मतं यद्रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि... यानी विभिन्न पुराणों में, शास्त्रों में, वाल्मीकि रामायण में वर्णित तथा कुछ अन्य स्थानों से भी यह सामग्री मैंने जुटाई है।
जैसाकि लिखा गया है कि ‘परिहासिनी’ में संकलित करने से पहले भारतेंदु ने इसे तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित कराया था। तब इस रचना का प्रकाशनकाल ‘परिहासिनी’ के प्रकाशनकाल से पहले का नियत होगा। न भी प्रकाशित कराया हो तो हम इसका प्रकाशनकाल 1876 ई. तो मान ही सकते हैं। देश व काल सापेक्ष जीवन-दृष्टि ही नहीं, इसमें तत्कालीन दासता से मुक्ति हेतु संघर्ष की जमीन की ओर भी संकेत मिलता है। रचनाकार के तौर पर भारतेंदु हरिश्चन्द्र का नैरन्तर्य, प्रतिभा-स्फोट और जीवन-दृष्टि सब कुछ स्वयंसिद्ध है। इन समस्त व्याख्याओं और तर्कों के आधार पर निश्चित रूप से ‘अंगहीन धनी’ हिन्दी की पहली लघुकथा सिद्ध होती है और ‘अद्भुत संवाद’ दूसरी।
अंगहीन धनी’ और अद्भुत संवाद’, ‘परिहासिनी’ में इन दो रचनाओं की स्थिति वस्तुतः कटोरा-भर अनार के दानों में समरूप मोतियों जैसी है। तदनुरूप पहचान के अभाव में ऐसे न जाने कितने ही और मोती अनारदानों के साथ चबाए जाकर नष्ट हो रहे होंगे। इन्हें पहचाने और बचाए जाने की आवश्यकता है। एक बात और, यह आकलन अभी तक ज्ञात लघुकथाओं के विवेचन पर आधारित है। लघुकथा अभी भी निरंतर विकासशील विधा है। भविष्य में, हो सकता है कि इनसे इतर कोई अन्य लघुकथा प्रकाश में आ जाए जो ‘पहली हिन्दी लघुकथा’ के पूर्व-घोषित सभी दावों पर भारी पड़े। तब, निश्चय ही, वही हिन्दी की पहली लघुकथा होगी।
संदर्भ:समांतर(लघुकथा अंक), जुलाई-सितम्बर 2001: (संशोधित रूप 'साहित्य अमृत' लघुकथा विशेषांक, जनवरी 2017 में)