गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

बलराम अग्रवाल से सुरेश जाँगिड़ ‘उदय’ की बातचीत


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सूक्ष्म एवं समग्र कथात्मक प्रस्तुति का नाम लघुकथा है

सुरेश जाँगिउदयआपकी दृष्टि में लघुकथा क्या है? लघुकथा के आवश्यक तत्व कौन-कौन से हैं?
बलराम अग्रवालमनुष्य के समसामयिक संवेदन-तंतुओं को प्रभावित करने वाली वस्तु विशेष की सूक्ष्म एवं समग्र कथात्मक प्रस्तुति का नाम लघुकथा है। पाठक को मानवीय सरोकारों से जोड़ने, छल-छद्म और कपटपूर्ण आचारों के प्रति आगाह करते रहने का दायित्व निभाने में यह पूर्णता के साथ सक्षम है। जहाँ तक आवश्यक तत्वों का मामला है, लघुकथा में मैं शास्त्रीय नियमों का जड़-पक्षधर नहीं हूँ। जिन्हें तत्व कहा जाता है, मैं उन्हें मात्र अवयव मानता हूँ। तत्व तो वह है जिसे कथाकार कथानक के माध्यम से पाठक तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा होता है। किसी वस्तु विशेष की कथात्मक-प्रस्तुति के लिए कथाकार जिन अवयवों को उस समय-विशेष में आवश्यक समझता है, उस लघुकथा के वे ही आवश्यक अवयव होंगे। इस प्रकार अपनी-अपनी शैली, शिल्प और कौशल के अनुरूप एक ही कथाकार अलग-अलग रचना में अलग-अलग कथा-अवयवों का प्रयोग करता है।
सुरेश जाँगिड़ उदयआज भी लघुकथा की सर्वमान्य परिभाषा क्यों नहीं उभरकर आ रही है?
बलराम अग्रवालपहली बात तो यह है कि एक ईमानदार रचनाकार को कभी भी परिभाषाओं के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। दूसरी बात यह कि जिस तरह एक रचना ही मानक नहीं हो सकती, उसी तरह सिर्फ एक ही परिभाषा भी अन्तिम नहीं हो सकती। मेरा मानना है कि लघुकथा अभी भी एक विकासमान कथा-विधा है; और विकास का नियम यह है कि मील के पत्थर को लगातार पीछे छोड़ते जाना पड़ता है। क्या आप चाहेंगे कि उत्तरोत्तर विकास को प्राप्त लघुकथा का प्रवाह रुक जाए; वह भी मात्र एक अन्तिम और सर्वमान्य परिभाषा को पा लेने की खातिर?
सुरेश जाँगिड़ उदयक्या लघुकथा को शब्दों की सीमा में बाँधना उचित है? यदि हाँ, तो अधिकतम कितने शब्द एक लघुकथा में होने चाहिएँ?
बलराम अग्रवाललघुकथा रचना और तत्संबंधी आलोचना से जुड़े लोगों के बीच विमर्श से यह निश्चित हो चुका है कि शब्दों की सीमा नहीं, उनकी अर्थवत्ता ही महत्वपूर्ण है। आकार में बड़ी अब तक जितनी भी देशी-विदेशी लघुकथाएँ मैंने पढ़ी हैं, वे डिमाई आकार की पुस्तक के दो पृष्ठों तक की भी हैं तथापि महत्वपूर्ण यही अधिक है कि आकार में छोटी रहकर भी कथा-रचना लघुकथा का फार्म कायम रख पाई है अथवा नहीं।
सुरेश जाँगिड़ उदयलघुकथा और लघु-कहानी में मूलत: क्या अन्तर है?
बलराम अग्रवालअंग्रेजी की शॉर्ट स्टोरी ही हिन्दी में कहानी कहलाती है। उसी को कुछ विद्वानों ने शब्दानुवाद के द्वारा लघु कहानी नाम दिया है। कुछ इस भ्रम में भी हैं कि लघुकथा शब्द शॉर्ट स्टोरी का शब्दानुवाद है; जबकि तथ्य यह है कि लघुकथा अनेक अर्थों में शॉर्ट स्टोरी यानी लघु-कहानी से भिन्न कथा-रचना है।
सुरेश जाँगिड़ उदयआज की लघुकथा और पुरानी जातक कथा, नीति कथा तथा प्रेरक प्रसंग में क्या अन्तर है?
बलराम अग्रवालकिसी विशेष भाव, नीति, शिक्षा या बोध को सम्प्रेषित करने के उद्देश्य से गढ़े गए कथानक वाली रचना को कथा-अवयवों से युक्त और लघु-आकारीय होने के बावजूद लघुकथा नहीं माना जा सकता। यह सिर्फ इसलिए कि समकालीन लघुकथा मनुष्य के इहलौकिक-जीवन से जुड़ी समसामयिक सुखद अथवा भयावह, उत्थानशील अथवा पतनशील स्थितियों-परिस्थितियों, घटनाओं-दुर्घटनाओं के कथापरक चित्रण की विधा है। इसमें नैतिक आदर्श का, नीति का, बोधपरकता का समावेश ही न हो ऐसा नहीं है; लेकिन इन सब की स्थापना-मात्र इसकी रचना का उद्देश्य नहीं होता…ये गौण रहती हैं। उदाहरण के लिए रामेश्वर काम्बोज हिमांशु की लघुकथा ऊँचाई, रघुवीर सहाय की लघुकथा ‘’ तथा रामनिवास मानव की लघुकथा झिलमिलाहट आदि कुछ लघुकथाओं के नाम गिनाए जा सकते हैं।
सुरेश जाँगिड़ उदय’—आपकी दृष्टि में हिन्दी की प्रथम लघुकथा कौन-सी है?
बलराम अग्रवालकिसी भी छोटे आकार की कथा-रचना को किसी पूर्व पत्र-पत्रिका या पुस्तक में छपे पाए जाने भर को मैं पहली लघुकथा हो जाने का आधार नहीं मानता। इसके और-भी अनेक आधार होने चाहिएँ…हैं। मेरी दृष्टि में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की पुस्तक परिहासिनी(1876) में प्रकाशित उनकी रचना अंगहीन धनी हिन्दी की पहली लघुकथा है। यह रचना पहली लघुकथा होने के प्रत्येक निकष पर खरी उतरती है।
सुरेश जाँगिड़ उदयलघुकथा में वैचारिकता का क्या स्थान है?
बलराम अग्रवालइस बारे में अन्तिम रूप से यह जान लेना जरूरी है कि लघुकथा निबंध नहीं है, कथा-रचना है। दूसरे, विचार एक स्फुलिंग का नाम है, बोरा-भर पोथियों का नहीं।
सुरेश जाँगिड़ उदयआज की लघुकथा का केन्द्रीय-स्वर क्या है?
बलराम अग्रवालसमसामयिक जीवन-स्थितियों से उपजे सवाल और उन सवालों से कथाकार के टकराव से उत्पन्न तिक्त और तीक्ष्ण ध्वनि ही आज की लघुकथा का केन्द्रीय-स्वर है।…और अगर नहीं है, तो होना चाहिए।
सुरेश जाँगिड़ उदयक्या आप लघुकथा के वर्तमान स्वरूप से सन्तुष्ट है?
बलराम अग्रवालबेशक।
सुरेश जाँगिड़ उदयआपको आजकल प्रकाशित हो रही लघुकथाओं में क्या और कौन-कौन सी कमियाँ दिखाई देती हैं?
बलराम अग्रवालसिर्फ एक। वो ये कि छोटे आकार में कुछ-भी, कैसा-भी लिख और छाप डालने की प्रवृत्ति जोर पकड़ती जा रही है। स्थितियों या घटनाओं को लिख देना भर ही तो लघुकथा नहीं है।
संदर्भ: लघुकथा-संकलन छोटी-सी हलचल(संपादक: सुरेश जाँगिड़ उदय, 1997)
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मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

बलराम अग्रवाल से डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति की बातचीत

 

दुनियाभर के लघुकथाकारों के चिन्तन का केन्द्र-बिन्दु मानवीयता है…

 
डॉ दीप्तिआप लघुकथा के अलावा अन्य विधाओं में भी लिखते हो। वह कौन-सा केन्द्र-बिन्दु है जो आपको किसी घटना के लिए लघुकथा लिखने को प्रेरित करता है?
बलराम अग्रवाललघुकथा लिखने के लिए किसी घटना का घटित होना आवश्यक है, ऐसा मैं नहीं मानता। कोई रचनाशील व्यक्ति जब विचार और चिन्तन के दौर से गुजर रहा होता है, तब क्या चीज उसे लिखने या रचने के लिए प्रेरित कर देगी, कहा नहीं जा सकता। आप स्वयं रचनाकार हैं, मेरी बात को आसानी से समझ सकते हैं कि धरती पर कोई ऐसा चेतनशील मनुष्य नहीं, जिसमें विचार न उत्पन्न होता हो और जिसका अन्तर अभिव्यक्त होने के लिए उसे लगातार उकसाता न हो। परन्तु बहुत कम लोग हैं जो अपने अन्तर की इस प्रेरणा के अनुरूप कार्यरत हो पाते हैं। लेखक होने के नाते आप यह भी समझ सकते हैं कि लिखने के लिए प्रेरित करने वाला हर विचार कागज पर नहीं उतर पाता, कभी किसी कारण से तो कभी किसी कारण से। जब लेखक कहलाने वाले लोगों का यह हाल है तो उन आमजनों के हाल का अन्दाजा आसानी से लगाया जा सकता है जो लेखक नहीं हैं। जहाँ तक केन्द्र बिन्दु का सवाल है, मेरी अपनी बात यह है कि आदमी को आदमीयत से दूर ले जाने वाले कृत्य और विचार मुझे तकलीफ देते हैं और आदमीयत से जोड़ने वाले विचार और कृत्य शक्ति। इस ओर किसी भी प्रकार के संघर्ष को मैं बनाए रखना चाहता हूँ। मैं भावुक और आँसू-टपकाऊ कथानकों को पसन्द नहीं करता। बचाव के प्रति जागरूक रहना हर व्यक्ति का पहला कर्तव्य है। मैं काँस की जड़ें खोदने की बजाय उनमें मठा डालने और डालते रहने की चाणक्य-नीति का समर्थक हूँ।
डॉ दीप्तिआप अपनी पहली लघुकथा के बारे में लिखो कि इसे लिखने का विचार आपको कैसे आया?
बलराम अग्रवालमेरी पहली लघुकथा लौकी की बेल है। यह लघुकथा 1972 में लखनऊ से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका कात्यायनी के जून अंक में प्रकाशित हुई थी। इस रचना को पढ़कर आप आसानी से जान सकते हैं कि यह लगभग दृष्टांत-शैली की लघुकथा है। अपने शुरुआती दौर में लघुकथा-आंदोलन खलील जिब्रान के भाववादी कथ्यों और भारतीय पुरातन साहित्य के दृष्टान्तवादी कथ्यों से बेहद प्रभावित था। हालत यह थी कि उन दिनों लघुकथात्मक व्यंग्य तक पौराणिक पात्रों और घटनाओं की पैरोडी-रचना के रूप में लिखे जा रहे थे। मैं ग्रामीण-संस्कार का व्यक्ति हूँ। अपनी जमीन से कटकर ऊँचा उठने की अन्धाकांक्षा मुझमें प्रारंभ से ही नहीं रही। अपनी इसी भावना को मैंने लौकी की बेल में व्यक्त किया था। हालाँकि इसी कथ्य की यों भी व्याख्या की जा सकती है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने जातीय-अस्तित्व को बचाए व बनाए रखने के लिए हममें से किसी को भी एक विशेष प्रकार का बलिदान आवश्यक हो जाता है; बिल्कुल उसी तरह जिस तरह कि अगली फसल हेतु बीज बनने-बनाने वाले लौकी आदि के फलों को करना पड़ता है।
डॉ दीप्तिलघुकथा लिखते हुए आप विचारों को किस तरह नियोजित करते हैं? कितनी बार रचना का सुधार करते हैं या उसे लिखते हैं?
बलराम अग्रवालमेरे कथा-लेखन की बुनियाद विचार है। वह मस्तिष्क में कहीं पक जाता है, तभी कथा का कलेवर पाता है। इसे अलग से नियोजित करने की जरूरत अक्सर नहीं पड़ती। हाँ, रचना को लिख लेने के बाद सुधारना अवश्य पड़ता है। एक ही बार में उसे अन्तिम रूप से लिख डालूँइतना कुशल मैं नहीं हूँ। इतना जरूर है कि रचना को मैं तुरन्त नहीं सुधारता, कुछ समय रख देने के उपरान्त एक पाठक की हैसियत से पढ़ते हुए उसमें सुधार करता हूँ।
डॉ दीप्तिलघुकथा को लिखते हुए आप सबसे अधिक महत्व किस बात को देते होशीर्षक को, शुरुआत को, अंत को, वार्तालाप को या पेश किए जा रहे विचार को?
बलराम अग्रवालमेरे अन्दर विचार ही पहले आता है। यों अलग-अलग मानसिक-अवस्था में अलग-अलग तरह से इसे सुनिश्चित किया जा सकता है। विचार किसी वार्तालाप को सुनकर भी उत्पन्न हो सकता है, कहीं पर कुछ लिखा देखकर भी उत्पन्न हो सकता है और कहीं पर कुछ घटित होता देखकर भी। शीर्षक, शुरुआत, अंत अथवा समापनये सब मैं रचना को लिख लेने के दौरान या उसके बाद ही तय करता हूँ।
डॉ दीप्तिलघुकथा की कितनी पुसतकें आपने पढ़ी हैं? कौन-सी पुस्तक ने आपको प्रभावित किया है? कोई खास रचना सुनाएँ/लिखें जो आज तक आपको याद हो और आपको मापदंड लगती हो।
बलराम अग्रवालयह बता पाना कि कितनी पुस्तकें पढ़ी हैं, बहुत मुश्किल है। बहुत-सी गैर-जरूरी पुस्तकें पढ़ डाली हैं और बहुत-सी जरूरी पुस्तकें अभी पढ़नी बाकी हैं। अनेक रचनाएँ हैं जो अलग-अलग कारणों से याद रहती हैं या प्रभावित करती हैं। कुछ अपने कथ्य के कारण, कुछ शैली और शिल्प के कारण तो कुछ किन्हीं-और कारणों से। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की लघुकथा अंगहीन धनी मुझे बहुत प्रभावित करती है। उनकी इसी रचना को मैं हिन्दी की पहली लघुकथा मानता हूँ। यह रचना यद्यपि उनके काल में प्रकाशित उनकी किसी पत्रिका में अवश्य छपी होगी, और उसके पश्चात 1876 में उन्होंने इसे परिहासिनी नामक अपनी पुस्तक में संग्रहीत किया। अब, चूँकि पत्रिका का कोई अंक उपलब्ध नहीं है, अधिक विस्तृत होना है। किसी लघुकथा के अच्छा होने का मापदण्ड भी यही होना चाहिए कि पाठक को वह अपने भीतर कितना गहरा उतार पाती है, बमुकाबले इसके कि पाठक के भीतर वह कितना उतर पाती है। आठवें दशक से लेकर अब तक जो रचनाएँ मुझे मुख्यत: याद हैं, उनमेंसुशीलेन्दु की पेट का माप, कैलाश जायसवाल की पुल बोलते है, श्यामसुन्दर दीप्ति की सीमागुब्बारे, श्यामसुन्दर अग्रवाल की सन्तू, अशोक भाटिया की रंग, रिश्ता, कपों की कहानी, भगीरथ की तुम्हारे लिए, दाल-रोटी, सुकेश साहनी की गोश्त की गंध, बैल, ठंडी रजाई, बलराम की बहू का सवाल, अशोक मिश्र की आँखें, पृथ्वीराज अरोड़ा की कथा नहीं, सुभाष नीरव की मकड़ी, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु की ऊँचाई, विष्णु प्रभाकर की शैशव, कमल चोपड़ा की मैं सोनू, असगर वजाहत की आलमशाह कैंप की रूहें, राजेन्द्र यादव की अपने पार, प्रेमपाल शर्मा की वैदिक धर्म, सुशान्त सुप्रिय की बदबू आदि सैकड़ों नाम गिनाए जा सकते हैं। जहाँ तक मापदण्ड का सवाल हैयह किसी एक रचना के लिए नहीं होता, इसलिए किसी एक रचना को मापदण्ड नहीं कहा जा सकता। लघुकथाएँ रची जाती हैं, गढ़ी नहीं जातीं। तात्पर्य यह कि इसका कोई साँचा तय नहीं किया जा सकता।
डॉ दीप्तिदूसरी भाषाओं में लिखी जा रही लघुकथाओं से आप किस तरह का अनुभव करते हैं?
बलराम अग्रवालदूसरी भाषा से आपका तात्पर्य नि:संदेह हिन्दीतर अन्य भारतीय भाषाओं से (तथा विदेशी भाषा की लघुकथाओं से) है। भारतीय भाषाओं में मुख्यत: तीन भाषाओंपंजाबी, मलयालम और तेलुगुकी लघुकथाओं से मेरा सामना गहराई के साथ हुआ है। पजाबी और मलयालम लघुकथा के मैंने अपनी पत्रिका वर्तमान जनगाथा के विशेषांक भी संपादित/प्रकाशित किए थे और तेलुगु लघुकथाओं पर कार्यरत हूँ। तेलुगु में ये 'नेटि कथा' अर्थात् आज की कथा के नाम से लोकप्रिय है और तेलुगु-भाषी दैनिक पत्रों में नियमित कॉलम के रूप में स्थान पा रही है। परन्तु मैंने वस्तु के स्तर पर इसे हिन्दी, पंजाबी, उर्दू या मलयालम जितना समृद्ध नहीं पाया। इसका कारण यह भी हो सकता है कि मेरे प्रयास ही उस समृद्धि तक पहुँच पाने में असफल रहे हों।
              पंजाबी में, उर्दू की तर्ज़ पर, इसे 'मिन्नी कहानी' नाम से पुकारा जाता है। उर्दू में यद्यपि इसके लिए 'अफसांचा' शब्द भी है; लेकिन इस अर्थ में कि अन्य भाषाओं की तुलना में उर्दू दूसरी भाषा के शब्दों को बड़ी सहजता से अपनाती और आत्मसात् करती है, मैं एक महान भाषा के रूप उसका सम्मान करता हूँ। मेरा मानना है कि हर भाषा में यह लचीलापन या कि विशाल-हृदयता होनी ही चाहिए कि अभिव्यक्ति के अधिक-से-अधिक निकट पहुँच पाने वाले शब्द वह बेहिचक दूसरी भाषा से ले ले। इस बात को मैं यहाँ पंजाबी-परिप्रेक्ष्य के उदाहरण द्वारा ही स्पष्ट करने का प्रयास करूँगा। 'भंगड़ा' और 'गिद्दा' विशुद्ध पंजाबी शब्द हैं। शब्दकोश में इनके अर्थ क्या होंगे, यह बताने की आवश्यकता नहीं है; और न ही यह कि सिर्फ 'पंजाबी मर्दाना नाच' और 'पंजाबी जनाना नाच' कह देने भर से इन नृत्यों के उल्लास, उमंग और संस्कार को किसी भी तरह सम्प्रेषित नहीं किया जा सकता। अत: भंगड़ा और गिद्दा को ज्यों का त्यों ही प्रयोग करना श्रेयस्कर होगा। क्षेत्रीय शब्दों का अपना अलग ही वज़न, तेवर और लोच होता है। कोई अन्य शब्द आसानी से उनका स्थान नहीं ले पाता। बात मिन्नी कहानी की चल रही थी। मिन्नी कहानी में वह सब-कुछ पूरी शिद्दत के साथ है, जो उर्दू  और पंजाबी की किसी भी अन्य कथा-विधा में है। पंजाब की मिट्टी और यहाँ की हवा जिस साहस, बलिदान-वृत्ति, मौजमस्ती और खिलंदड़ेपन के लिए दुनियाभर में विख्यात है, यहाँ के कथाकारों ने उस सब को पूरी गहराई के साथ मिन्नी कहानी में उतार पाने में सफलता पायी है। इसलिए, जब मैं यह कहता हूँ कि पंजाब में श्याम सुन्दर दीप्त, श्याम सुन्दर अग्रवाल और उनकी टीम ने 'लघुकथा' को नहीं, 'मिन्नी कहानी' को आगे बढ़ाया है तो इसका यही विशिष्ट तात्पर्य होता है। मलयालम में लघुकथा को 'पाम स्टोरी' के रूप में जाना जाता है। केरल में इसकी स्पष्ट और गहरी परम्परा है। वहाँ पर यद्यपि पंजाबी अथवा हिन्दी की तरह एक आन्दोलन के तहत इसे नहीं लिखा जा रहा; तथापि कुछ उल्लेखनीय लघुकथा-संग्रह मलयालम में अवश्य प्रकाशित और चर्चित हुए हैं। इससे भी अधिक गर्व की बात यह है कि मलयालम के विशिष्ट से लेकर लगभग अपरिचित तक हर कथाकार ने लघुकथाएँ लिखी हैं। मेरे द्वारा सम्पादित 'मलयालम की चर्चित लघुकथाएँ' पढ़कर केरल में हो रहे समृद्ध लघुकथा-लेखन को आसानी से रेखांकित किया जा सकता है।  
               इनके अतिरिक्त चीनी-लघुकथाओं से भी मेरा परिचय हुआ है। यह जानकर अतीव प्रसन्न्ता और आश्चर्य होता है कि चीन में भी नई पीढ़ी के कथाकारों ने लघुकथा को गई सदी के नवें दशक से एक आन्दोलन के रूप में अपनाया है। चीनी-भाषा में लघुकथाओं के अनेक महत्वपूर्ण संकलन प्रकाशित हो चुके हैं जिन्होंने राष्ट्रीय ही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की है। अनुवाद की दृष्टि से देखा जाए तो मेरा वास्ता अमरीकी, कनाडाई, अरबी, रूसी, जर्मनी, पाकिस्तानी आदि विभिन्न देशों की लघुकथाओं से पड़ा है, लेकिन उन सबके मैंने अंग्रेजी अनुवाद ही पढ़े हैं, मूल नहीं। हर देश की लघुकथा में एक चीज लगभग कॉमन है; वो ये कि दुनियाभर के लघुकथाकारों के चिन्तन का केन्द्र-बिन्दु मानवीयता है…सिर्फ मानवीयता।
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संदर्भ: मिन्नी द्वारा अक्टूबर 1997 में रेल कोच फैक्ट्री, कपूरथला(पंजाब) में आयोजित लघुकथा सम्मेलन व माता शरबती देवी लघुकथा सम्मान से पूर्व सम्भवत: सितम्बर 1997 में डॉ दीप्ति द्वारा प्रेषित सवालों के जवाब

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

लघुकथा में नेपथ्य/बलराम अग्रवाल

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घुकथा, कहानी और उपन्यास की प्रकृति और चरित्र में इनके नेपथ्य के कारण भी आकारगत अन्तर आता है। उपन्यासकार स्थितियों-परिस्थितियों और घटनाओं को यथासम्भव विस्तार देता है तथा पाठक के समक्ष पात्रों की मन:स्थिति, चरित्र, परिस्थितियाँ, गतिविधियाँ एवं तज्जनित परिणाम तक का ब्यौरा देने को उत्सुक रहता है; इस तरह उपन्यास अत्यल्प या कहें कि नगण्य नेपथ्य वाली कथा-रचना है। कहानीकार जीवन के विस्तृत पक्ष को रचना का आधार नहीं बनाता। इसके अतिरिक्त, जीवनखण्ड से जुड़ी अनेक घटनाओं को विस्तार से लिखने की बजाय उनको वह आभासित करा देना ही यथेष्ट समझता है, क्योंकि गति की दृष्टि से उपन्यास की तुलना में कहानी को एक त्वरित रचना होना चाहिए। अत: उपन्यास की तुलना में कहानी का नेपथ्य कुछ अधिक गहरा और विस्तृत हो सकता है। बावजूद इसके, कहानी का नेपथ्य उपन्यास की प्रकृति और चरित्र से को-रिलेटेड और को-लिंक्ड रहता है, अत: कहानी ने सहज ही उपन्यास जैसी पूर्णता का आभास अपने पाठक को दिया और प्रतिष्ठित उपन्यासकारों व जड़-आलोचकों के घोर विरोध के बावजूद व्यापक जनसमूह के बीच अपनी जगह बना ली। लघुकथा आकार की दृष्टि से क्योंकि कहानी की तुलना में अपेक्षाकृत बहुत छोटी कथा-रचना है, अत: जाहिर है कि उसका नेपथ्य कहानी की तुलना में बहुत अधिक विस्तृत और गहरा होगा; लेकिन उसे कहानी के नेपथ्य से उसी प्रकार को-रिलेटेड और को-लिंक्ड रहना चाहिए जिस प्रकार कहानी का नेपथ्य उपन्यास के नेपथ्य के साथ रहता आया है। लघुकथा-लेखक इस तथ्य से अक्सर ही अनभिज्ञ और लापरवाह रहे हैं। उन्होंने अधिकांशत: ऐसी रचनाएँ लघुकथा के नाम पर लिखी हैं जिनमें प्रस्तुत रचना तथा उसके नेपथ्य में एक और सौ का अनुपात नजर आता है जो किसी भी रचना के लिए स्वस्थ स्थिति नहीं है। कोई भी पाठक किसी रचना के अन्धकूप सरीखे नेपथ्य में भला क्यों उतरना चाहेगा? इसी के समानान्तर एक सोच यह भी है कि लेखक पाठक-विशेष या रचना-विधा के सिद्धान्त-विशेष को ध्यान में रखकर रचना क्यों करे? अपने आप को अभिव्यक्ति के धरातल पर उन्मुक्त क्यों न रखे? वस्तुत: अभिव्यक्ति के धरातल पर उन्मुक्तरहने का अर्थ उच्छृंखल अथवा अनुशासनहीन हो जाना नहीं माना जाना चाहिए। इंटरनेट के माध्यम से ५ शब्दों से लेकर ५०० या ज्यादा शब्दों तक की ‘Flash Story’ लिखना सिखाने वाली व्यावसायिक साइटें कथा-विधा का भला कर रही हैं, कथा-लेखकों का भला कर रही हैं या स्वयं अपनायह तो समय ही तय करेगा; फिलहाल यहाँ हिन्दी की कुछ कौंध-कथाएँ यानी Flash Stories साभार प्रस्तुत हैं:-
एक
राजपथ से गुजरती हुई सैनिक टुकड़ी क्विक मार्च करते हुए गा रही थी-हम सब एक हैं। फुटपाथ पर खड़े पुलिस के अफसर, सेठ रामलाल और प्रसिद्ध जुआरी गोवर्द्धन एक दूसरे की आँखों में हँसते हुए न जाने क्यों गाने लगे- हम सब एक हैं।
दो
शेर गुर्राया, हिरण को खूँखार दृष्टि से देखा और फिर हिरण को कुछ किए बगैर गुफा के अँधेरे में चला गया। दोनों एक ही कश्ती के सवार थे।...
बाहर आदमी घात लगाए बैठा था।
इनके साथ ही मैं Wits अर्थात विलक्षण-वाक्यकथा की ओर भी लेखकों/पाठकों और संपादकों का ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा। इन्होंने भी लघुकथा में हो रहे गंभीर प्रयासों को काफी धक्का पहुँचाया है। हिन्दी में लघुकथा के नाम पर प्रचलित Wits के कुछ नमूने निम्न प्रकार हैं-
एक
इंपालाकी पिछली सीट पर बैठे अल्सेशियन को देखकर अंगभंग भिखारी बच्चों ने ठंडी साँस लेकर कहा, “काश! हम भी ऐसे होते!
दो
डियर इतिहास’,
तुम्हारे अध्याय अब कलमें नहीं, मैं लिखूँगी...
मैं हूँ
बन्दूक
तीन
मैंने जब भी डुबकी लगानी चाही
सारा मानसरोवर
चुल्लू हो गया!
चार
सामान्य-ज्ञान की परीक्षा में एक परिक्षार्थी एक सरल से प्रश्न पर अटक गया। प्रश्न था-भारत का प्रधानमन्त्री कौन है?’ उत्तर परीक्षार्थी को पता था, इस पर भी वह परेशान था। अन्तत: उसने लिख ही दिया,पर उसमें एक वाक्य और बढ़ा दिया। उसने लिखा-आज भारत के प्रधानमन्त्री श्री...हैं, परचा जाँचते समय कौन होगा, मालूम नहीं। इन विलक्षण-वाक्यकथाओं के लेखकों की हिन्दी-लघुकथा के क्षेत्र में लम्बी कतार है; और इन सब की प्रेरणा के मूल में सम्भवत: सुप्रसिद्ध कथाकार रमेश बतरा की बहुचर्चित लघुकथा कहूँ कहानीरही है, जो निम्नप्रकार है-
रफीक भाई! सुनो...उत्पादन के सुख से भरपूर थकान की खुमारी लिए, रात मैं घर पहुँचा तो मेरी बेटी ने एक कहानी कही, ”एक लाजा है, वो बो...S...त गलीब है।" यहाँ हमारा हेतु क्योंकि लघुकथा की रचनात्मक प्रकृति और चारित्रिक तीक्ष्णता तथा उसके सही स्वरूप एवं स्तर को रेखांकित करना भर है, अत:कौंधकथाऔर विलक्षण-वाक्यकथा समझी जाने वाली ऊपर उद्धृत हिन्दी रचनाओं के साथ उनके लेखक और संदर्भित पत्र-पत्रिका, संग्रह-संकलन अथवा संपादक के नाम का आदि का उल्लेख नहीं किया गया है। यह ठीक है कि कोई अकेला आदमी लघुकथा का नियन्ता नहीं हैं, और यह भी कि किसी भी दृष्टि से हमारे द्वारा हेय तथा त्याज्य समझी जाने वाली, लघुकथा शीर्ष तले छपने वाली Flash Stories Wits अन्य आलोचकों-समीक्षकों अथवा संपादकों को प्रभावशाली महसूस हो सकती हैं; तथा हमारे द्वारा स्वीकार्य रचनाएँ त्याज्य। इस बारे में विवाद की गुंजाइश हमेशा बनी रहेगी, परंतु लघुकथा को कौंधकथाऔरविलक्षण-वाक्यकथासे अलग रखना ही होगा।
मैं पुन: अपने नेपथ्य बिंदु पर आना चाहूँगा। वस्तुत: नेपथ्य वह वातायन है जिसे लेखक अपनी रचना में तैयार करता है और पाठक को विवश करता है कि वह उसमें झाँके तथा रचना के भीतर के व्यापक और गहरे संसार को जाने। कई बार मुख्य-कथा के एक या अनेक पात्र भी लघुकथा के नेपथ्य में रहते हैं। लघुकथा में उनका सिर्फ आभास मिलता है, वे स्वयं उसमें साकार नहीं होते। दरअसल, घटनाओं और स्थितियों का यह प्रस्फुटन लघुकथा के नेपथ्य में उतरे उसके पाठक के मन-मस्तिष्क में होने वाली निरन्तर प्रक्रिया है। अगर कोई रचना, जो इस प्रक्रिया को जन्म देने में अक्षम है, वह नि:संदेह अच्छी रचना नहीं हो सकती। अपने इसी गुण के कारण लघुकथा गंभीर प्रकृति के पाठक को जिज्ञासु बनाए रखने में सफल रह सकी है। इसी बात को मैं यों भी कहना चाहूँगा कि अपने समापन के साथ ही जो लघुकथा पाठक के भीतर विचार की एक श्रॄंखला जाग्रत कर देने की क्षमता रखती है, वह एक सफल लघुकथा है।
लघुकथा में नेपथ्य की उपस्थिति को जानने के बाद यह अवधारणा पूर्णत: निर्मूल सिद्ध हो जाती है कि कोई कथाकार लघुकथा लिखता है क्योंकि वह कथा को कहानी जितना विस्तार दे पाने में अक्षम है। सही बात यह है कि लघुकथाकार कथा के मात्र संदर्भित बिंदुओं पर कलम चलाता है और शेष को नेपथ्य में बनाए रखता है। यही उसका कथा-कौशल है और यही लघुकथा की प्रभावकारी क्षमता।

बुधवार, 25 मार्च 2009

समकालीन लघुकथा--कुछ सैद्धांतिक सवाल/बलराम अग्रवाल

क्या लघुकथा कहानी में अपनी जगह न बना पा रहे कुछ कुण्ठित लोगों द्वारा अलापा गया कोई बेहूदा राग है?
या फिर इस परिश्रम के पीछे देश के पास कागज का और पाठक के पास समय का अभाव मात्र ही कोई कारण है? कथा के शाब्दिक अर्थ—‘कथ धातु से इसकी व्युत्पत्ति और सीधे अर्थों में—‘वह जो कहा जाए जैसे अकादमिक वाक्यों को हम कहाँ-कहाँ नहीं दोहराते। लघुकथा कथा-साहित्य की विधा है तो कथा के अर्थ तो बेशक, हमें जानने ही होंगे। कथा के जिन प्रचलित और पुराण-शास्त्रीय अर्थों को हमने कहानी(यानी वह जो कहा जाए) तथा उपन्यास के सन्दर्भ में चाटा है, लघुकथा के सन्दर्भ में भी अगर ज्यों-का-त्यों उन्हें ही चाटना होगा तो कथा-साहित्य की विधा के तौर पर लघुकथा में नवीनता क्या है? और, कोई नवीनता अगर उसमें है तो यकीन मानिये, कथा की प्रचलित परिभाषायें कहानी व उपन्यास के सन्दर्भ में चाहे जितनी मान्य और स्वीकार्य हों, लघुकथा के सन्दर्भ में वे आधी-अधूरी व भ्रामक ही कही जायेंगी। अगर लघुकथा को भी कथा की पारम्परिक और शास्त्रीय परिभाषा से ही नपना था तो बोधकथा, नीतिकथा, दृष्टान्तकथा, भावकथा आदि से अलग इसका प्रादुर्भाव समकालीन लघुकथा के रूप में क्यों हुआ?
किसी नयी विधा को जन्म देने के लिए, या फिर उसके पुनर्प्रादुर्भाव के लिए ही सही, उससे जुड़े लोगों का संवेदनशील होना ही पर्याप्त नहीं रहता। धर्म, राजनीति और अर्थ का जब पतन होना प्रारम्भ होता है तो वह प्रत्येक सामाजिक की संवेदना को प्रभावित करता है। सारा समाज अपनी-अपनी रुचि और प्रकृति के अनुरूप विभिन्न गुटों में बँट जाता है। धार्मिक प्रकृति के लोग राजनीतिक और आर्थिक पतन को, आर्थिक प्रकृति के लोग धार्मिक और राजनीतिक पतन को तथा राजनीतिक प्रकृति के लोग धार्मिक व आर्थिक पतन को सारे पतन का कारण बताने व सिद्ध करने में जुट जाते हैं। चौपाल हो या घर-बाज़ार, जहाँ चार लोग जुड़े, अपना और देश-समाज का रोना शुरू। यह रोना-धोना शनैः शनैः रोचक व रंजक बनाया जाने लगता है और इस प्रक्रिया में सच के साथ कुछ कल्पना(आम बोलचाल की भाषा में झूठ) भी आ जुड़ती है। किस्से और अफवाहें इसी तरह जन्मते हैं। कथा की व्यापक परिभाषा में रोचक, रंजक या विषादपूर्ण शैली में रोना-धोना कहने वाले ये सारे सामाजिक कथाकार हैं। संवेदनशीलता इससे अलग किसी अन्य आयाम को प्रकट नहीं करती। समाज के चप्पे-चप्पे, रेशे-रेशे और अच्छी-बुरी हर हरकत पर नजर रखने वाले ये कथाकार सब-के-सब लेखक तो नहीं बन जाते। इसलिए ऐसा मानना कि जो कथाकार जितना अधिक संवेदनशील होगा, वह समाज से उतने ही अधिक कथानक अपनी लघुकथाओं के लिए चुन सकता है, तर्कसंगत नहीं है। संवेदनशील होना किसी कथाकार को लघुकथाकार बना देगा, ऐसा नहीं है। समाज के जो-जो अन्तर्विरोध किसी सामाजिक की संवेदना को प्रभावित करके उसकी चेतना को आन्दोलित करते हैं, आधिकारिक रूप से केवल उन-उन पर ही वह बोल या लिख सकता है। अतः लघुकथा लिखने के लिए कथाकार को कथानक के चुनाव हेतु संवेदनाओं की चिमटी लेकर अखबारों, जंगलों और बाजारों की खाक छानने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता हैचेतना को आन्दोलित, जागृत रखने की। चेतना जितनी अधिक प्रखर होगी, लेखनी उतनी ही मुखर होगी। संवेदनशीलता वैचारिकता को जन्म देती है, जबकि आन्दोलन विचारपूर्ण क्रियाशीलता को। समकालीन लघुकथा विचारपूर्ण क्रियाशीलता की उपज है, न कि वैचारिकता की। अपने संदर्भ में, इसका यह गुण कथा की इसी व्याख्या की माँग करता है। उपन्यास और कहानी की भले ही ये अपेक्षाएँ न हों। इन दोनों कथा-विधाओं से लघुकथा के अलगाव का यह एक बिन्दु है।
कथानक और शैली लघुकथा के आवश्यक अवयव तो हो सकते हैं, तत्व नहीं। तत्व अपनी चेतना में एक पूर्ण इकाई है। मूलत्व इसका गुण (प्रोपर्टी) है। लघुकथा का मूल-तत्व है—‘वस्तु, जो कि प्रत्येक कथा-विधा का है। वस्तु को जनहितार्थ सरल, रोचक, रंजक और संप्रेष्य बनाकर प्रस्तुत करने के लिए कथाकार कथानक की रचना कर उसको माध्यम बनाता है। जैसे, पुराण-कथाओं के पीछे वस्तुरूप में वेद-ॠचाएँ अथवा वैदिक-सूत्र ही हैं। किसी भी कथा-विधा की तरह ही लघुकथा की भी वस्तु आत्मा है, कथानक हृदय, शिल्प शरीर और शैली आचरण, जिसके माध्यम से पाठक को वह अपनी ग्राह्यता के प्रति आकर्षित करती है। तात्पर्य यह कि लघुकथा में कथानक, शिल्प और शैली वस्तु को सम्प्रेष्य और प्रभावी बनाने वाले अवयव हैं, तत्व नहीं।
जहाँ तक शैली का प्रश्न है, वह सिर्फ स्टाइल नहीं, मैनर भी है। मैनर यानी शिष्टता। लघुकथा में, शब्दों को उनकी प्रभपणता के अनुरूप प्रयोग करने की शिष्टता का लेखक में विद्यमान रहना उतना ही आवश्यक है जितना किसी जिम्मेदार नागरिक में आचरण की शिष्टता का होना आवश्यक होता है। भाषा को उसकी सहज प्रवहमण्यता और लयबद्धता के साथ प्रस्तुत करने की शिष्टता व ज्ञान का लघुकथाकार में होना अपेक्षित है। यही नहीं, बल्कि यह भी कि लघुकथा का पात्र अपने स्तर, स्थिति और परिवेश से अलग भाषा तो नहीं बोल रहा है; कि उसका आचरण लघुकथा में उसके चरित्र से भिन्न किसी अन्य दिशा में तो अग्रसर नहीं है; कि पात्र के मुख से लेखक स्वयं तो नहीं बोलने लगा है(अर्थात् मानवोत्थानिक सन्देश तो नहीं देने लगा है!); तथा यह भी कि पात्र और कथा दोनों को पीछे धकेलकर अपनी लेखकीय हैसियत/उपस्थिति, अपने अस्तित्व की याद दिलाने के लिए(अर्थात् वही मानवोत्थानिक सन्देश या फिर जनवाद/प्रगतिवाद का आरोपण करने के लिए) वह स्वयं तो नहीं आ धमका है। बहुत-सी बातें हैं, जो शैली के मैनर वाले अर्थ की ओर इंगित करती हैं। लघुकथा के संदर्भ में स्टाइल की तुलना में शैली का यही तात्पर्य श्रेयस्कर है। स्टाइल बघारने का जमाना उपन्यास, कहानी और काव्यादि लेखन का वह जमाना था जब रचना का आम बोलचाल से अलग भारी-भरकम शब्दों/शब्द-युग्मों, अलंकारों व मुहावरों से लदा होना ही उसकी स्तरीयता का प्रमाण हुआ करता था। रचनात्मक हिन्दी-साहित्य ने उस जमाने को काव्य में मुख्यतः गोस्वामी तुलसीदास(रामचरित मानस) तथा कहानी-उपन्यास में प्रेमचंद की रचनाओं के द्वारा तोड़-मरोड़ कर साहित्येतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया है। साहित्य का समकालीन दौर सहजता और (ऊपर बताई गई) शिष्टता का दौर है, स्टाइल बघारने का नहीं।
यह कहना कि उपन्यास और कहानी से लघुकथा की भिन्नता कथानक के स्तर पर होती हैसरासर भ्रामक हो तब भी प्रशंसनीय ही माना जाएगा क्योंकि इसमें भिन्नता के सूत्र को पकड़ लेने का प्रयास परिलक्षित होता है। परन्तु, यह भिन्नता के मूल से भटका हुआ वक्तव्य है। पहली बात तो यह कि उपन्यास से लघुकथा की भिन्नता के बिन्दु तलाश करने की चेष्टा ही अपने आप में विडम्बनापूर्ण मूर्खता है, क्योंकि उपन्यास में कथा के विस्तार का फलक, कहानी और लघुकथा दोनों में, कथा के विस्तार-फलक से पूरी तरह भिन्न होता है। दूसरी बात यह कि कथा-साहित्य की विधाओं में (आकार की दृष्टि से भी) जितना भ्रम कहानी और लघुकथा के बीच उत्पन्न होता है, उतना उपन्यास और लघुकथा या उपन्यास और (सामान्य लम्बाई की) कहानी के बीच नहीं। उपन्यास और कहानी के बीच भ्रम की स्थिति लम्बी-कहानी तथा उपन्यासिका को लेकर तो गाहे-बगाहे उत्पन्न होती रहती है, सामान्यतः नहीं। बिल्कुल वैसे, जैसे छोटी कहानी और (अपेक्षाकृत लम्बे आकार की) लघुकथा के बीच वर्तमान में बनी हुई है। हालाँकि प्रस्तुतिकरण के कुछ बिन्दुओं पर कड़ी नजर डालें तो यह भ्रम ज्यादा टिकता नहीं है। एक मुख्य बात, जो अब तक देखने में आई है, वह हैलघुकथा और कहानी, दोनों के कथानकों का अपने समापन अथवा अन्त की ओर भिन्न गति से बढ़ना। कहानी का कथानक अक्सर किसी उपालम्ब के सहारे समापन की ओर बढ़ता है, जबकि लघुकथा का कथानक बिना किसी अवलम्ब या उपालम्ब के। लघुकथा का कथानक स्वयं ही अपना अवलम्ब होता है तथा कहानी की तुलना में अधिक त्वरण वाला होता है। कह सकते हैं कि समापन की ओर बढ़ते कथानक के मामले में गतिज-ऊर्जा की दृष्टि से कहानी की तुलना में लघुकथा अधिक स्वाबलम्बी कथा-रचना है। कहानी से लघुकथा की भिन्नता का इसे एक-और बिन्दु माना जा सकता है।
आज, जिस समाज में हम रहते हैं, उसमें सूचनाओं को प्राप्त और प्रदान करने के माध्यम और साधन सभी के पास लगभग समान हैंपुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएँ, रेडियो, टीवी, टेलीफोन, इंटरनेट, बाजार और संगति। इसलिए यह अवश्य माना जा सकता है कि लघुकथा में दो या अधिक लेखक एक ही घटना को अपने लेखन का आधार बना सकते हैं। परन्तु, उन सबकी संवेदनाएँ भी उस घटना से समान रूप में ही प्रभावित होंगी और निष्कर्षतः भी वे समान रचनाएँ ही लिखेंगेयह असंभव है। कथानक की बात हम छोड़ भी दें तो वस्तु और निष्कर्ष के स्तर पर समान लघुकथाएँ भिन्न शीर्षकों के रहते भी अमौलिक तथा किसी पूर्व-प्रकाशित रचना से प्रभावित ही कही जायेंगी।
किसी भी माध्यम से प्राप्त समाचार मनुष्य के बाह्य-जगत का लेखा है, अन्तःजगत का नहीं। इसलिए अनेक बार कथात्मक प्रस्तुति के रहते भी, समाचार-लेखक समाचार ही प्रस्तुत कर पाता है, लघुकथा नहीं। समाचारों के माध्यम से अगर अपनी संवेदनाओं को कथारूप दिया जा सकता होता तो प्रभावशाली लघुकथा-लेखकों की कम-से-कम एक ऐसी जमात जरूर हमारे पास होती जिसने(अखबारी समाचारों के आधार पर) बहुत-सी देशी-विदेशी समस्याओं के सर्वमान्य समाधान प्रस्तुत करती या आदमी के संवेदन-तन्तुओं को जगाती कितनी ही लघुकथाएँ लिख मारी होतीं। समाचार ही अगर संवेदनाओं के मानक वाहक होते तो टीवी, अखबार आदि लघुकथा के मुकाबले कम-से-कम इस अर्थ में तो प्रभावशाली माने ही जाते कि समाचार को इनमें से कुछ में हम एक घटना को रूप में जीवन्त घटित होते देखते-सुनते हैं। लेकिन हमारी सुप्त या कहें कि मृत संवेदन-ग्रंथियों का यह हाल है बताने की शायद जरूरत नहीं है कि भोपाल गैस काण्ड में मारे गए और पीड़ित लोगों के बारे में टीवी रिव्यू हो या किसी और काण्ड में सताए-मारे गए लोगों के बारे में, टीवी रिव्यू देखते समय हमारे हँसी-ठट्ठों और खान-पान में कोई बदलाव दृष्टिगोचर नहीं होता। उधर खून-खराबा, लाशें और रोते-बिलखते स्त्री-पुरुष-बच्चे दिखाई दे रहे हैं; इधर डाइनिंग-टेबल पर फ्रूट-क्रीम के कप से उठकर चम्मच हमारे मुँह की ओर घूम रही होती है। समाचारों और संवेदनाओं के बीच वर्तमान में यह रिश्ता हमारे सामने है। जब तक कोई लेखक समाज से रू-ब-रू नहीं होगा, संवाद का कोई भी माध्यम उसकी संवेदना को जगाए नहीं रख सकता। साहित्य अगर समाज का दर्पण है तो सिर्फ इसलिए कि उसका रचयिता समाज के अन्तर्विरोधों को उसके बीच अपनी उपस्थिति बनाकर झेलता-महसूसता है, न कि समाचार माध्यमों द्वारा फेंके गये टुकड़ों को लपक-लपक कर संवेदनाओं की जुगाली करता फिरता है।
लेखक का धर्म है कि वह अन्त:जगत से जुड़े। जितना गहरा वह पैठेगा, उतना ही गहरा वह प्रस्तुत करेगा। अन्त:जगत से जुड़े बिना बाहर की हर यात्रा व्यर्थ और निरर्थक है। अन्त:जगत से जुड़ाव ही आदमी को सामान्य की तुलना में विशेष बनाता और सिद्ध करता है। यही वह विशेष कारण है जिसके चलते लेखक विशेषणधारी व्यक्ति केवल सुन या देखकर अन्य की संवेदनाओं के साथ अपनी संवेदनाओं को जोड़कर उन्हें उनकी सम्पूर्णता में पा लेता है। लेकिन इसको साधना न तो इतना आसान है और न ही आम। इसलिए जब तक यह सध न जाए, तब तक समाज से सीधे संवाद निर्विवादित है। हाँ, लेखक के तौर पर किसी को अल्पायु एवं रुग्ण जीवन भी स्वीकार्य हो तो समाचारों को माध्यम बनाकर कुछ काल तक बाह्यजगत में विचरण का सुख भोग लेना कोई बुरी बात नहीं है।
लघुकथा का उद्देश्य पाठक को किसी उथली और सतही कहानी की तरह सिर्फ रंजित, रोमांचित या प्रभावित कर देना मात्र नहीं है। पारम्परिक बोधकथा, नीतिकथा, भावकथा की तरह पाठक के हृदय को पिघलाना या उसकी आत्मा को झकझोरना भी इसका उद्देश्य नहीं है...और हास-परिहास या चुटकुला तो यह है ही नहीं। इसका लेखक सामान्यत: संवेदित/भावविभोर होकर…जौली मूड(Jolly mood)में आकर नहीं, बल्कि परिस्थितियों से आन्दोलित होकर कथा-लेखन में प्रवृत्त होता है। इसलिए लघुकथा-लेखन के माध्यम से उसका उद्देश्य पाठक की चेतना को आन्दोलित करना है। न सिर्फ कहानी से, बल्कि बोधकथा, नीतिकथा, भावकथा, चुटकुला आदि से लघुकथा की भिन्नता का यह तीसरा बिन्दु है।
परन्तु, पाठक की चेतना को आन्दोलित करने से भी आगे कोई लघुकथा-लेखक यदि पाठक को दिशा-निर्देशित करना लघुकथा का हेतु समझता है तो जरूरी नहीं कि लघुकथा उसे सिर्फ सकारात्मक दिशा ही दे। प्रत्येक सामाजिक अपनी प्रकृति, परिवेश और सामर्थ्य,इन तीन भावों से प्रभावित रहता है औरनकारात्मक या सकारात्मकइन्हीं भावों के अनुरूप दिशा-निर्देश ग्रहण करता है। यों भी, लघुकथा में निदान(डाइग्नोस) किया जाता है, सुझाव(ट्रीटमेंट) नहीं दिया जाता, क्योंकि ट्रीटमेंट दिये जाने के कुछ विशेष खतरे हैं जिनमें से एक हैलघुकथा में लेखक के स्वयं उपस्थित हो जाने/होते रहने का खतरा तथा दूसरा हैलघुकथा का उसके लेखक के किसी सिद्धान्त-विशेष की ओर घूम जाने का खतरा। ये दोनों खतरे ध्यातव्य हैं क्योंकि सिद्धान्त-विशेष के तहत दिए गए ट्रीटमेंट और तज्जनित परिसीमन के कारण ही अनेक लघुकथाएँ शिल्प और शैली की दृष्टि से पुष्ट होने के बावजूद, समसामयिक साहित्य में मान्य नहीं हैं। अत: लघुकथा के लेखक को हेतु-रचना के माध्यम से उन्मुक्त चिन्तन-मनन की दिशा में पाठक की चेतना को आन्दोलित करना होगा।
शिल्प की दृष्टि से लघुकथा किसी गद्य-गीत जैसी सुगठित होनी चाहिए। शाब्दिक अतिरिक्तता या वैचारिक दोहराव उसे कमजोर कर सकते हैं। लघुकथा की वास्तविक शक्ति वास्तव में उसके व्यंग्य-प्रधान या गाम्भीर्य-प्रधान होने में न होकर उसके सांकेतिक होने निहित है। यहाँ यह समझ लेना भी आवश्यक है कि सांकेतिकता लघुकथा का अनिवार्य गुण अवश्य है, परन्तु इसे बहुत क्लिष्ट या गूढ़ न होकर सहज रहना चाहिए। यों भी, लघुकथा में उसका कोई भी गुण, सिद्धान्त या दर्शन बहुत क्लिष्ट या गूढ़ न होकर सहज ही समाविष्ट होना चाहिए। सहज समावेश से तात्पर्य बलात्-आरोपण से लघुकथा को बचाए रखना भी है।
लघुकथा में संवादों की स्थिति क्या हो? उन्हें होना चाहिए या नहीं? होना चाहिए तो किस अनुशासन के साथ और नहीं तो क्यों? ये सवाल वैसे ही अनर्गल हैं जैसे कि इसके आकार या इसकी शब्द-संख्या के निर्धारण को लेकर अक्सर सामने आते रहते हैं। वस्तुत: लघुकथा लिखी या कही जाती प्रतीत न होकर घटित होती प्रतीत होनी चाहिए। लघुकथा की रचना-प्रक्रिया का मैं समझता हूँ कि यह प्रमुख सूत्र है। क्रियाशीलता, कृतित्व, चरित्र, परिस्थिति और परिवेश के साथ स्वयं उसके पात्रों को पाठक के सम्मुख होना चाहिए न कि उसके लेखक को। लघुकथा में लेखकविहीनता की डा0 कमलकिशोर गोयनका इसी रूप में व्याख्या करते हैं। लघुकथा में संवाद और तत्संबंधी अनुशासन के बारे में एक जिज्ञासा को मैं अवश्य यहाँ प्रकट करना चाहूँगा। यह कि लघुकथा में संवादों को कथोपकथन या कथनोपकथन कहने का आधार क्या है? कथोपकथन यानी कथ+उपकथन तथा कथनोपकथन यानी कथन+उपकथन। अगर विवेकपूर्वक विचार किया जाए तो कथन के उत्तर में बोले जाने वाले संवाद को उपकथन नहीं बल्कि प्रतिकथन कहा जाना चाहिए, क्योंकि कथा में उसका आस्तित्व किसी भी दृष्टि से उप नहीं होता। फिर, आवश्यक नहीं कि प्रत्येक कथन का उपकथन हो ही। कोई पात्र परिस्थिति-विशेष में किसी पात्र के कथन का जवाब अपनी उस चुप्पी से दे सकता है जो उसके प्रतिकथन या उपकथन की तुलना में कहीं अधिक स्फोटक सिद्ध हो। इसलिए लघुकथा में संवाद के लिए कथन प्रति कथन तथा कथनाकथनकथाकथ यानी कथन+अकथन व कथ+अकथ शब्द भी बनते हैं। संवाद कैसे हों? इस बारे में मेरी धारणा है कि वे लघुकथा की भाषा में सहजग्राह्य और मन्तव्य को स्पष्ट करने वाले होने चाहिएँ। वे पाठक की चेतना को उद्वेलन और कथानक को अग्रसर गति दे पाने में सक्षम होने चाहिएँ।
अपनी समेकित इकाई में लघुकथा को गद्य-गीत जैसी सुस्पष्ट, सुगठित व भावपूर्ण; कविता जैसी तीक्ष्ण, सांकेतिक, गतिमय और लयबद्ध तथा कथा की ग्राह्य शीर्ष विधाओंकहानी व उपन्यासजैसी सम्प्रेषणीय और प्रभावपूर्ण होना चाहिए।
प्रत्येक कहानी में एक सत्व होता है और हम इसे कहानी की आत्मा कहते हैं। अपनी पुस्तक परिहासिनी के इंट्रो में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इसे चीज कहा है। लघुकथा कहानी की आत्मा है, उसका सत्व है, चीज है। घटना की प्रस्तुति को विस्तार देने की तुलना में कथाकार को जब वस्तु का सम्प्रेषण अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होता है तब रचना का विस्तार उसके लिए गौण हो जाता है। अत: हम कह सकते हैं कि लघुकथा केवल आकारगत, शिल्पगत, शैलीगत और प्रभावगत ही नहीं, शब्दगत और सम्प्रेषणगत भी सौष्ठव को प्राप्त कथा-रचना है। कहानी और लघुकथा के बीच अन्तर को उनके कथानकों के समापन की ओर बढ़ने में दृष्टिगोचर त्वरणों में अन्तर की माप के द्वारा स्पष्ट रूप से जाना जा सकता है।
हम लघुकथा-लेखकों को उन्मुक्तता और उच्छृंखलता के मध्य अंतर को भली-भाँति जान लेना चाहिए। मन के भावों का अनुशासनहीन, उद्दंडतापूर्वक प्रदर्शन उच्छृंखलता कहलाता है। विदेशी शासन से मुक्ति ने हमें उन्मुक्तता दी है, परन्तु आज वाणी व भाव-स्वातंत्र्य के अधिकारों को पाकर हम अक्सर ही उच्छृंखल व्यवहार करते नजर आ जाते हैं। अति आवश्यक है कि वाणी व भाव के प्रकटीकरण पर हम अनुशासन-विशेष का अंकुश रखें। अनुशासन से अग्रसारण का निश्चय होता है।
लघुकथा के अगर कुछ अनुशासन हैं तो उनके प्रति लेखकों की आबद्धता और प्रतिबद्धता भी अपेक्षित है ही। परन्तु, इन सब अनुशासनों को प्रस्तुत कर देने के बाद इसी लेख के इस अन्तिम पैरा में इन आबद्धताओं व प्रतिबद्धताओं को मैं लघुकथा-लेखन की चौहद्दियाँ या गणितीय-सूत्र बताकर इनके नकार का आह्वान करूँ तो निश्चय ही आप मुझे बेहद भ्रमित व्यक्तित्व मानेंगे; परन्तु लघुकथा ने आज तक वाकई इतने सोपान तय कर लिए हैं कि हर सोपान पर वह पिछले सोपान के अनुशासनों को भंग करती प्रतीत होती है। बुद्धिमान, शूर और प्रगतिगामी लोग सदैव ही पुराने अनुशासन को तोड़ते और नये को जोड़ते आये हैं। यही प्रगति की रूपरेखा है। हिंदी लघुकथा ने अब तक यही किया है और यही वह अब भी कर रही है। यही कारण है कि लघुकथा आज मानव-जीवन के किसी क्षण-विशेष का ही नहीं, उसके किसी पक्ष-विशेष का भी चित्रण करने में पूर्ण सक्षम है। वस्तुत: समकालीन हिंदी लघुकथा उद्वेलन और आन्दोलन से जनित भावों की उन्मुक्त, सम्प्रेषणीय एवं प्रभावकारी कथात्मक प्रस्तुति है। यह उत्तरोत्तर विकासशील विधा है। आज, इस लेख में जो अनुशासन इसकी रचना-प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए किखे गये हैं, वे ही कल को पिछले सोपान के अनुशासन कहे जा सकते हैं। बहरहाल, पिछले समस्त अनुशासनों को भंग करके भी विधाएँ अनुशासनबद्ध ही रहती हैं।
एक बात और, नवीन अनुशासनों के निर्माण और प्रस्तुति का अधिकार उसी को मिल सकता है जो विधा के पक्ष में(स्वयं द्वारा प्रस्तुत) पूर्व अनुशासनों को भंग कर सकने की क्षमता रखता हो; लेकिन इसका यह मतलब कदापि नहीं कि वह एक अनुशासन को प्रस्तुत करता और फिर तोड़ता रहकर नित नये भ्रम पैदा करता रहे।
     ('अवध अर्चना' लघुकथा विशेषांक आदि कुछ पत्रिकाओं में यह लेख 'लघुकथा की रचना-प्रक्रिया' शीर्षक से भी छप चुका है--बलराम अग्रवाल)