सोमवार, 26 दिसंबर 2016

लघुकथा : परम्परा और विकास-10 / बलराम अग्रवाल




इस अध्याय की दसवीं यानी समापन किस्त


दिनांक 19-12-2016 से आगे


आठवें दशक के प्रारंभ से ही ‘लघुकथा’ चूँकि अपने नए परिवेश के अन्तर्गत नए कथ्य, शिल्प, प्रभाव के साथ प्रस्तुत हुई थी; इसीलिए अन्य रचनाओं के मध्य यह विशेष प्रभावोत्पादक रही और इसी प्रभावोत्पादकता ने पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। बढ़ती पाठकीय रुचि ने न केवल संपादकों, बल्कि लेखकों को भी आकृष्ट किया। इसकी क्षमता से अनभिज्ञ जो संपादक अपनी पत्रिकाओं में इसका उपयोग मात्रा विविध रचनाओं को स्थान देने एवं रिक्त रहे स्थान की पूर्ति हेतु ही जाने-अनजाने या विवशतावश कर रहे थे, इसके बढ़ते जा रहे महत्त्व से सजग होकर इस नवीन विधा के स्थापन या प्रस्तुतिकरण का सेहरा अपनी-अपनी पत्रिका के सिर बँधवाने के लिए सही-गलत सभी तरह का प्रचार करने लगे। फलस्वरूप, इन सब क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं ने ‘लघुकथा’ को चर्चा देकर इसे एक आन्दोलन का रूप दे दिया और इस लघुकथा-आन्दोलन के सिंचन ने (समकालीन) लघुकथा को पल्लवित किया।
       इस पल्लवन के परिणामस्वरूप ही ‘लघुकथा’ पर अनेक ऐसे स्वतन्त्र साहित्य-विचारकों ने भी अपना मत प्रकट किया जिनके लिए साहित्य निरन्तर शोध का पर्याय है। डाॅ. महेश चन्द्र शर्मा ने ‘लघुकथा’ विषयक एक लेख में अपने विचार यों प्रकट किये हैं—‘...कुछ और विशेषताएँ भी हैं जो इसे एक ‘स्वतंत्र साहित्यिक विधा’ के आसन पर अधिष्ठित करने में समर्थ हैं। ये विशेषताएँ निम्नस्थ हैं :
       (1) लघुकथा जीवन से उस प्रकार सम्प्रक्त नहीं होती, जिस प्रकार एक कहानी होती है। उसका लक्ष्य जीवन के किसी मार्मिक सत्य को प्रकाशित करना होता है जो बहुधा बिजली की कौंध की भाँति अभिव्यक्त होता है।
      (2) लघुकथा में अत्यल्प साधनों से ही जीवन के चरम सत्य को उजागर करने की चेष्टा की जाती है। ये जीवन की मार्ग निर्देशिकाएँ हैं।
      (3) लघुकथाएँ प्रकृति को एक अभिन्न सहचरी के रूप में लेकर चलती हैं। जड़ और चेतन प्रकृति इनके लिए सक्रिय और संवेदनशील सत्ता है। इनमें प्रकृति की मौन वाणी मुखर हो उठती है।
     (4) लघुकथाएँ संकेतात्मकता और बोधकता (बोधगम्यता) पर कहानी की अपेक्षा अधिक ध्यान देती हैं। ये वातावरण निर्माण के लिए बहुत सचेष्ट नहीं रहतीं। इनका वातावरण इनकी अपनी संक्षिप्त और संकेतात्मक योजनाओं में से स्वतः अभिव्यक्त होता रहता है।
      (5) लघुकथाएँ प्राचीन बोधकथाओं के बहुत निकट हैं। इनमें अति-कल्पनाओं का बहुत खुलकर प्रयोग होता है।
       (6) शिल्प की दृष्टि से लघुकथाएँ गद्य-काव्य और रेखाचित्र के बहुत निकट हैं। इनमें दृष्टांतों का अधिक उपयोग होता है। संलापों की भाँति इनमें भी एकाधिक पात्रों का परस्पर कथन-प्रति-कथन चलता है।’
    डा. शर्मा के उपर्युक्त विचार-बिन्दुओं में पाँचवें को छोड़कर शेष सभी बिन्दु ‘लघुकथा’ के साथ-साथ ‘समकालीन लघुकथा’ की विशेषताओं को भी व्यक्त करते हैं। इसकी प्रसंगिकता, संक्षिप्तता एवं सम्प्रेषणीयता व प्रभावोत्पादकताइन तिहरी-चौहरी विशेषताओं ने इसे तीव्र गतिशील बन दिया। साथ ही इन लघु पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकों को यह लघुकथात्मक रचना-सहयोग, बिना अतिरिक्त मूल्य या अति श्रमसाध्य प्रयत्नों के सुलभ होता रहा, क्योंकि बड़े-बड़े प्रतिष्ठित नामों की अपेक्षा इसे नए युवा हस्ताक्षरों ने ही समर्पित भाव से समृद्ध किया। इसके तराश, इसके प्रस्तुतिकरण में सूत्रधार की भूमिका निभाई। अतः युवा हस्ताक्षरों ने लघु पत्र-पत्रिकाओं को न केवल अपना रचनात्मक सहयोग ही दिया, बल्कि इससे सन्दर्भित अन्य सम्भव सहयोग व साधन भी उन्हें उपलब्ध करवा सकने के प्रयास किए तथा सम्बन्धित सुझाव भी दिए। फलस्वरूप लघुकथा की यात्रा, तीव्र से तीव्रतर गतिशील होती चली गई।
       समकालीन हिन्दी लघुकथा के उदय को सन् 1970 के बाद हुआ स्वीकारते हुए बलराम का मत है कि—‘‘मई, 1971 की ‘सारिका’ में विवेकराय की ‘मकड़जाल’ हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। इसके बाद शुरू होता हैलघुकथा का नवोन्मेष... एक पूरा आन्दोलन...।’' 1965 के बाद से हिन्दी लघुकथा लेखन में एक निरन्तरता का आभास मिलता है। परन्तु अधिकांशतः इसका स्वरूप परम्परागत हाशिए की रचना जैसा ही होता था। 1970 के पश्चात् इसने आन्दोलन का रूप लेना प्रारम्भ किया और आठवें दशक के पूर्वार्द्ध में ही इसने अपनी एक स्पष्ट तस्वीर कथा-आलोचकों के समक्ष प्रस्तुत कर दी।
       शंकर पुणताम्बेकर,  सतीश दुबे, मोहन राजेश,  कृष्ण कमलेश, सत्यशुचि, भगीरथ, सिमर सदोष, महावीर प्रसाद जैन, मधुदीप, अशोक भाटिया, कमल चोपड़ा, श्याम सुन्दर अग्रवाल, श्याम सुन्दर दीप्ति आदि अनेक रचनाकार भी आधुनिक (समकालीन) हिन्दी लघुकथा को आठवें दशक की उपज मानते हैं।
      आठवें दशक में लघुकथा-लेखन दो धाराओं में बह रहा था। व्यावसायिक पत्रिकाओंखास तौर पर ‘सारिका’ में प्रकाशित लेखन, शिल्प के स्तर पर पैरोडी-कथाओं एवं व्यंग्य-कथाओं तक ही सीमित था। ‘नवनीत’ और ‘कादम्बिनी’ में लघुकथाएँ बोध और नीति कथाओं का पर्याय थीं। ‘कहानीकार’ में पंचदेव, सुदर्शन एवं विनायक रूप के स्तर पर फैंटेसी के प्रयोग कर रहे थे, लेकिन कथ्य आदर्शपरक ही था।
       पैरोडी एवं व्यंग्य लघुकथाओं में पौराणिक कथाओं, पंचतंत्र की कथाओं, लोक कथाओं को आज की स्थितियों/पात्रों के सन्दर्भ में उठाकर व्यंग्य और हास ही प्रस्तुत किया जाता था। वस्तु के स्तर पर वे आधुनिक भाव-बोध की वाहक थीं। ऐसी रचनाओं को खासी लोकप्रियता भी हासिल हुई। एकबारगी ऐसा लगा कि ‘लघुकथा’ व्यंग्य के बिना अपंग है। ऐसी लघुकथा लिखने वालों में प्रमुख थेसर्वश्री श्रीकांत चौधरी, शंकर पुणताम्बेकर, दुर्गेश, मनीषराय, सनत मिश्र, श्रीराम ठाकुर ‘दादा’, यशवंत कोठारी आदि।  आठवें दशक में परसाई जी ने  लघुकथाएँ ही अधिक लिखीं, इस तथ्य को स्वयं उन्होंने अपनी पुस्तक ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ की ‘कैफियत’ शीर्षक से लिखी भूमिका में स्वीकार किया है। उस भूमिका से पेशे-नजर हैं ये पंक्तियाँ—‘कुछ चुनी हुई रचनाएँ इस संग्रह में हैं। ये 1975 से 1979 तक की अवधि में लिखी गई हैं। 2-4 पहले की भी हो सकती हैं। पिछले सालों में मैंने लघुकथाएँ अधिक लिखी हैं। वे इस संग्रह में हैं।’ इस संग्रह की भूमिका एक ओर जहाँ परसाई के लेखकीय व्यक्तित्व और मानवीय सरोकारों को हमारे सामने रखती है, वहीं उस पूरे दौर के चरित्र को भी सामने रखती है—‘इस दौर में चरित्रहीन भी बहुत हुआ। वास्तव में यह दौर राजनीति में मूल्यों की गिरावट का था। इतना झूठ, फरेब, छल पहले कभी नहीं देखा था। दगाबाजी संस्कृति हो गई थी। दोमुँहापन नीति। बहुत बड़े-बड़े व्यक्तित्व बौने हो गए। श्रद्धा सब कहीं से टूट गई। इन सब स्थितियों पर मैंने जहाँ-तहाँ लिखा। इनके सन्दर्भ भी कई रचनाओं में प्रसंगवश आ गए हैं।
       आत्म-पवित्रता के दंभ के इस राजनीतिक दौर में देश के सामयिक जीवन में सब-कुछ टूट-सा गया। भ्रष्ट राजनीतिक संस्कृति ने अपना असर सब-कहीं डाला। किसी का किसी पर विश्वास नहीं रह गया थान व्यक्ति पर न संस्था पर। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका का नंगापन प्रकट हो गया। श्रद्धा कहीं नहीं रह गई। यह विकलांग श्रद्धा का भी दौर था। अभी भी सरकार बदलने के बाद स्थितियाँ सुधरी नहीं। गिरावट बढ़ रही है। किसी दल का बहुत अधिक सीटें जीतना और सरकार बना लेना, लोकतंत्र की कोई गारंटी नहीं है। लोकतांत्रिक स्पिरिट गिरावट पर है।’
       रामनारायण उपाध्याय का संकलन ‘नया पंचतंत्र’ पैरोडी शैली की लघुकथाओं का बेहतरीन उदाहरण है।  डाॅ. शंकर पुणताम्बेकर के संपादन में प्रकाशित ‘श्रेष्ठ लघुकथाएँ’ तथा नरेन्द्र मौर्य व नर्मदाप्रसाद उपाध्याय के संपादन में ‘समानांतर लघुकथाएँ’ ने इसे और पुष्ट किया। एक बार तो यह फाॅर्म ही लघुकथा का पर्याय बना रहा। ऐसा नहीं था कि अव्यवसायिक स्तर पर इस तरह का लेखन नहीं होता था लेकिन इसके साथ ही अन्य प्रयोगों की ओर भी समुचित ध्यान दिया जाता था। यह ठीक था कि विरोधाभासों, पाखंडों और चालाकियों को उघाड़ने में व्यंग्य का हथियार काफी कारगर सिद्ध हुआ है, किन्तु संवेदना के कई और स्तर भी थे जहाँ व्यक्ति अपने गुस्से की करुणा को अभिव्यक्त कर सके।
        ‘अन्तर्यात्रा’, ‘अतिरिक्त’, ‘मिनीयुग’, ‘दीपशिखा’, ‘तारिका’, ‘साहित्य निर्झर’ कुछ ऐसी पत्रिकाएँ थीं जो प्रयोगों को प्रमुखता देती थीं और ‘लघुकथा’ के पूरे परिदृश्य को रेखांकित करती थीं।...कुछ ऐसी महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुईं कि ‘लघुकथा’ का पूरा परिदृश्य ही बदल गया। पुरानी मान्यताएँ ढह गयीं और ‘लघुकथा’ का वह सार्वभौमिक रूप उभरकर सामने आया जिसमें सभी तरह के प्रयोगों के लिए समान अवसर और आदर है तथा कन्फ्यूजन की स्थिति से कमोबेश ‘लघुकथा’ ने निजात पा ली है।
       ‘लघुकथा’ ने इस तरह प्रयोगों से गुजरते हुए नीति-कथा, दृष्टान्त-कथा, उपदेश-कथा, लोककथा, काव्यगन्धी गद्य, गद्यगीत, चुटकुले, व्यंग्य एवं कहानी से अलग पहचान बना ली है। इसके विकास की प्रक्रिया में पीढ़ियों के बीच विशेषतः दो कथाकार पुल का निर्माण करते मिलते हैं। पुराने कथाकारों में विष्णु प्रभाकर परम्परावादी भाव-बोध और आधुनिक यथार्थ-बोध के बीच खाई को पाटने की अनवरत कोशिश करते हैं; उनसे न परम्परा का मोह छूटता है, न आधुनिकता का; लेकिन हरिशंकर परसाई निर्द्वन्द्व रहकर पुल के आधुनिक यथार्थ-बोध वाले सिरे पर आ डटते हैं। ये दोनों कथाकार अपने अन्तिम समय तक यह कार्य अपनी-अपनी तरह से करते रहे।
        हिन्दी लघुकथा ने आज के मनुष्य के समकालीन यथार्थ के साथ तनावपूर्ण व द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों की प्रस्तुति बहुत सजीव व मार्मिक रूप में की है।... 20वीं शताब्दी की हिन्दी लघुकथा जहाँ समकालीन सामाजिक परिवेश में मनुष्य की हो रही दुर्गति का सजीव वृत्तांत पेश करती है, वहीं पर ऐसी असंगत व्यवस्था के विरुद्ध पाठकीय मानसिक संक्षिप्तता, तीव्रता और सांकेतिकता लघुकथा को कहानी से अलगाते हैं। डाॅ. शकर पुणताम्बेकर के शब्दों में—‘कहानी को जिस भाँति उपन्यास का लघुरूप नहीं माना जाता, उसी तरह लघुकथा को हम कहानी का लघुरूप नहीं कह सकते। उपन्यास की अपेक्षा कहानी में अनुभूति कहीं अधिक होती है और कहानी की अपेक्षा लघुकथा में और भी अधिक। आकार में अत्यन्त संक्षिप्त होने के कारण लघुकथा में अनुभूति की तीव्रता इतनी घनीभूत होती है कि वह हमें बिजली के तार की भाँति झटका दे जाती है। हमारी चेतना को एकदम झकझोर देती है।’
        बहरहाल, हिन्दी लघुकथा का यथावत् विकास आधुनिक युग में होने का प्रधान कारण यही है कि यह न केवल हमारे समकालीन यथार्थ की, बल्कि भोगे हुए यथार्थ की अभिव्यक्ति है। यद्यपि लघुकथा के रूप में कथा के नवीन विकास से अनभिज्ञ तथा कुछेक दुराग्रही लोगों के व्यवहार में ‘लघुकथा’ को अभी तक भी ‘लघु-कथा’, ‘लघु कथा’ एवं ‘छोटी कहानी’ लिखा-पढ़ा-समझा-प्रचारित किया जा रहा है, तथापि अधिकतर प्रबुद्ध आलोचकों ने इस नव्य कथा-विधा का सकारात्मक स्वागत किया है। सम्प्रति, हिन्दी कथा साहित्य के क्षेत्र में ‘लघुकथा’ शब्द का अर्थ कथा के एक विशिष्ट प्रकार के रूप का बोध कराता है जो अपने कथ्य, तथ्य, शिल्प, प्रभाव, उद्देश्य आदि में अपने प्राचीन स्वरूप से भिन्न है; और कथा के इस विशिष्ट रूप का, जो हिन्दी में ‘लघुकथा’ नाम से अभिहीत है, विकास कहानी की तरह ही भारतेन्दु-युग से जोड़कर देखते हुए रूपसिंह चन्देल ने लिखा है—‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से चलकर जयशंकर प्रसाद, माखनलाल चतुर्वेदी, प्रेमचन्द, आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’, छबीलेलाल गोस्वामी, बालकृष्ण बलदुआ, रावी, विष्णु प्रभाकर, सुदर्शन आदि की रचनात्मकता द्वारा सिंचित और रमाकांत, यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’, शंकर पुणताम्बेकर, सतीश दुबे, विक्रम सोनी, भगीरथ, रमेश बतरा, बलराम, पृथ्वीराज अरोड़ा, बलराम अग्रवाल, सुकेश साहनी, अशोक भाटिया आदि कथाकारों की सूक्ष्म पर्यवेक्षण दृष्टि द्वारा पोषित और विकसित हिन्दी लघुकथा आज विश्व की तमाम भाषाओं की लघुकथाओं के समकक्ष उपस्थित है।’

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

लघुकथा : परम्परा और विकास-9 / बलराम अग्रवाल



नौवीं किस्त

दिनांक 09-12-2016 से आगे…

डॉ॰ शकुन्तला किरण इस समूचे काल की लघुकथाओं के अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष प्रस्तुत करती हैंयद्यपि माधवराव सप्रे (1901), माखनलाल चतुर्वेदी (1911), पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी (1916), आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र (1920), शिवपूजन सहाय (1924), जयशंकर प्रसाद (1926), तिलकसिंह परमार, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, उपेन्द्रनाथ अश्क (1929), भृंग तुपकरी (1940), रामनारायण उपाध्याय (1944), डाॅ. श्याम सुन्दर व्यास, माहेश्वर (1945), रावी (1947) सुदर्शन (1948), रामवृक्ष बेनीपुरी (1950) आदि द्वारा लिखी गई छिटपुट लघुकथाएँ एवं बाद में प्रकाशित इनके संग्रह उपलब्ध होते हैं, किन्तु इनमें, अपवादस्वरूप कुछ लघुकथाओं को छोड़कर आमजन के त्रास को व्यक्त करते एवं समकालीन तेवर का अभाव मिलता है। साथ ही, कथ्य एवं शिल्प की दृष्टि से ये आधुनिक हिन्दी लघुकथाओं से नितान्त दूर हैं, तथा ये बोध-नीति-आदर्श-उपदेशपरक ही अधिक हैं। आनन्द मोहन अवस्थी (1950), अयोध्याप्रसाद गोयलीय (1951), शरद कुमार मिश्र ‘शरद’ (1957), डाॅ. ब्रजभूषण सिंह ‘आदर्श’ (1961), श्यामनन्दन शास्त्री (1962), बैकुण्ठनाथ मेहरोत्रा आदि के लघुकथा संग्रहों की लघुकथाओं में, आधुनिक हिन्दी लघुकथाओं की भावभूमि को स्पर्श करती कई लघुकथाएँ मिल जाती हैं; किन्तु वे सामाजिक परिवर्तन में क्रान्तिकारी भूमिका निभाने में असमर्थ लगती हैं। न ही उनके महत्त्व एवं उपयोगिता से प्रभावित होकर वे लिखी गई प्रतीत होती हैं। उनमें भावात्मक, दार्शनिक, बोधपरक, मनोरंजनात्मक आदर्शपरक आदि लघुकथाएँ भी दृष्टिगत होती हैं।
       डॉ॰ शमीम शर्मा ने समकालीन लघुकथा का प्रारम्भ सन् 1950 से माना है। उनके अनुसार—‘आधुनिक लघुकथाओं का प्रारम्भ सन् 1950 से माना जाना चाहिए। सन् 1950 के आसपास लघुकथा में अपने स्वरूप को पिछले स्वरूप से अलगाने का साग्रह प्रयत्न दिखाई देता है।’
        लेकिन उपर्युक्त वक्तव्य के साथ ही उनका यह भी मानना है कि—‘प्राचीन काल से लेकर प्रायः छठे, सातवें दशक तक प्रत्येक लघु-आकारीय कथा/प्रसंगादि के लिए ‘लघुकथा’ शब्द ही प्रयुक्त होता रहा। उदाहरणार्थअब तक ‘लघुकथा’ शीर्षान्तर्गत ही लोकोक्तियाँ, सूक्तियाँ, चुटकुले, पौराणिक सन्दर्भ, नीतिकथाएँ, बोधकथाएँ, संस्मरण, परीकथाएँ, किस्सागोई, लघु-कहानी, प्रेरक प्रसंग, व्यंग्य आदि प्रकाशित होते रहे हैं; जैसे ‘श्रेष्ठ लघुकथाएँ’ में श्याम बिल्लौरे की ‘वक्तव्य : हारे हुए खरगोश का’ (पृष्ठ 40), ‘प्रतिनिधि लघुकथाएँ’ में रामनारायण उपाध्याय की ‘पुराणपंथी कछुआ और प्रगतिशील खरगोश’ (पृष्ठ 11) आदि लघुकथाओं को नीतिकथाओं पर राजनीतिक अथवा सामाजिक सन्दर्भों का मुलम्मा चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया है। चुटकुलानुमा लघुकथाओं के तो अनेक उदाहरण लभ्य हैं; जैसे अप्रैल 72 की ‘सारिका’ के पृष्ठ 71 पर ‘आलस का घर’, ‘सारिका’ में ही (अप्रैल 73, पृष्ठ 5567) घनश्याम अग्रवाल की ‘मजबूती का रहस्य’ तथा श्रीकांत चौधरी की ‘भिक्षादान’ एवं ‘पहुँच’ पत्रिका के लघुकथा-विशेषांक में संकलित ब्रजबिहारी राम की लघुकथा ‘पाँच रुपये और...’ आदि चुटकुलों से अधिक कुछ नहीं हैं। चुटकुलों पर लघुकथा की मोहर-मात्रा लगा देने से वे लघुकथा तो नहीं बन जाते।
        सन् 1950 से लघुकथा लेखन की धारा क्योंकि स्वयं उनके अनुसार ही अनवरत नहीं रही, इसलिए वहाँ से आधुनिक काल को स्वीकार करना तर्क-सम्मत नहीं है।
आधुनिक काल (सन् 1970 के बाद) की लघुकथाएँ
आचार्य रामचंद शुक्ल ने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में काल-विभाजन की अपनी नीति को स्पष्ट करने की दृष्टि से लिखा है—‘जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है।’
        ‘समकालीन लघुकथा’ वस्तुतः समय और समाज की वृत्ति में राजनीतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुरूप स्वाभाविक रूप से आने वाले परिवर्तनों का कथात्मक प्रतिरूप है।
       लघुकथा के स्वरूप में यह परिवर्तन मुख्यतः सन् 1970 के बाद ही दृष्टिगोचर होता है। सन् 1974-75 तक लघुकथा का रूप और वृत्ति भावपरकता, बोधपरकता एवं दृष्टान्तपरकता से आगे बढ़कर गलित रूढ़ियों, अंधविश्वासों, अतिविश्वासों और छद्म नैतिकता आदि पर कटाक्ष प्रस्तुत करती पैरोडीपरक लघ्वाकारीय रचना में बदल जाती हैं। तत्पश्चात् 1975-76 से उसमें परिवर्तन के उद्वेलनकारी गम्भीर चिंतन बिन्दु दिखाई देने लगते हैं जो शनैः शनैः विकसित होकर अपने समय और समाज की समकालीन प्रगतिशील आकांक्षाओं का यथार्थ प्रतिनिधित्व करने लगते हैं। अतः हिन्दी में ‘समकालीन लघुकथा’ का उदय उसके परिवर्तन की ओर अग्रसर होने के प्रस्थान बिन्दु अर्थात् आठवें दशक के सन् 1971 से ही माना जाता है जो अनेक विद्वानों की सम्मति व सहमति के आधार पर उचित भी है और तर्कसंगत भी।
        लघुकथा के अलग-अलग समय में अलग-अलग रूप रहे हैं; किन्तु इनका वर्तमान स्वरूप, इस आठवें दशक की देन है और अपने कथ्य एवं तथ्यगत परिवेश से यह प्राचीन स्वरूप से सर्वथा भिन्न है। बलराम अग्रवाल का यह कथन दृष्टव्य है कि—‘लघुकथा-साहित्य के अभ्युदय ने इस विचार को कि वैज्ञानिक विकास के आगामी युग में हर आदमी अपना इतिहास स्वयं लिखेगा, सत्य कर दिया है। सूक्ष्म जीवनानुभवों को तीक्ष्ण, संप्रेषणीय और प्रभावकारी ढंग से प्रस्तुत करने की आकारगत लघु कथा-शैली नयी न सही, प्रासंगिक एवं सामयिक अवश्य है। लघ्वाकारीय कथा-रचनाएँ अब से पूर्व विशेष-नीतिपरक, विशेष-उद्देश्यपरक अथवा विशेष-विचारपरक ही हुआ करती थीं अतः कथा की समग्र आधुनिक-प्रवृत्ति के पैमाने पर वे अक्सर खरी नहीं उतरती थीं। आठवें दशक और उसके बाद की पीढ़ी के लघुकथा-लेखकों ने उन्हें समग्रता, व्यापकता और गहन अर्थवत्ता प्रदान करने के प्रयास किए हैं।’
        परिवर्तित युगीन परिस्थितियों के प्रभावों में न केवल इसका स्वरूप ही बदला, बल्कि इसकी भूमिका भी बदल गई और इस बदलाव ने इसे एक नवीन रूप में प्रस्तुत किया और नवीन रूप इसे बीसवीं सदी के सातवें दशक के उत्तरार्द्ध में मिलना प्रारम्भ हुआ तथापि उक्त नवीनता का स्पष्ट रूप हमें सन् 1970 के बाद ही देखने को मिलता है।
        नवम्बर 1977 में नर्मदाप्रसाद उपाध्याय और नरेन्द्र मौर्य के संयुक्त सम्पादन में ‘समान्तर लघुकथाएँ’ नाम से एक लघुकथा संकलन आया जिसकी भूमिका ‘प्रस्तुतिकरण’ शीर्षक से कमलेश्वर ने लिखी थी। यद्यपि इस भूमिका से कहानी के ‘समान्तर’ आन्दोलन की पैरवी करने का आभास मिलता है; तथापि उक्त ‘काल’ की तीक्ष्णता को समझने, आम आदमी की उक्त काल की उहा-पोह से उसके समूचेपन में परिचित होने के लिए इसका ज्यों का त्यों पढ़ा जाना आवश्यक है। कमलेश्वर के  अनुसार—‘नई कहानी के तत्काल बाद की कहानी मध्यमवर्गीय चेतना के ह्रास और उस मरणासन्न वर्ग की आखरी चीख है। इसे ही यदि सौन्दर्यशास्त्राीय मुहावरे में रखा जाए तो ‘नई कहानी’ ‘यथार्थ की अभिव्यक्ति’ के माध्यम खोज रही थी और नई कहानी के तत्काल बाद की कहानी ‘अभिव्यक्ति के यथार्थ’ को ही सब-कुछ मान रही थी। इसमें लेखकों का उतना दोष नहीं जितना उन भयानक स्थितियों का, जो भारतीय मध्यम वर्ग को चेहरा बदलने के लिए पीस रही थीं। अर्थात् 1960 के आसपास का वह समय था, जब मध्यम वर्ग बेशर्मी से अपना चेहरा बदल रहा था। यह मध्यम वर्ग इतिहास के उस यथार्थ चक्र के प्रति सजग नहीं था, जो उसकी नियति का निर्णय कर रहा था।
        बाद में यह मध्यम वर्ग सामाजिक स्तर-भेद के आधार पर बँट गया और उसे साफ-साफ दो रूपों में देखा गयाऔसत जीवन-स्तर के ऊपर वाला भाग और औसत जीवन-स्तर के नीचे वाला भाग। औसत-रेखा पर जीने वाले लोग या तो औसत से ऊपर वाले तबके में समाहित होते जा रहे थे या विकट संघर्ष के दौरान हारकर औसत के नीचे वाले हिस्से में आते जा रहे थे। आर्थिक और सामाजिक रूप से ही नहीं, मानसिक रूप से भी यह विभाजन हो रहा था। और अब ये विभाजन बिल्कुल साफ है। सामाजिक संतुलन और आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा के इस संकुल दौर से गुजरते हुए भारतीय मानस ने जो अनुभव प्राप्त किया है, वह बहुत ही कड़ुवा और तीखा है। कारण भी थे इसकेविभाजन के बाद संघर्ष एक अनिवार्य प्रक्रिया थी। सन् 67 के बाद यह संघर्ष खुलकर सामने आया।
        नई कहानी के कुछ लेखकों को छोड़कर, जो नई कहानी को निरन्तर परिवर्तित होती प्रक्रिया के रूप में नहीं स्वीकार कर सके, सभी परिवर्तनकामी लेखकों ने मध्यम वर्ग की इस आखरी चीख को महसूसा। बाद में, उसके विभाजन और संघर्ष को नजदीक से देखा और उसे अभिव्यक्ति दी। इस संघर्ष की कहानी अपनी समयगत सच्चाइयों से जुड़ी हुई थी। इसमें आम आदमी के संघर्ष, महत्वाकांक्षा और ‘वर्तमान’ के विकल्प की बात उठाई गयी थी। स्थितियों का ईमानदारी से पोस्टमार्टम हुआ था। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक भ्रष्टाचार को सामने रखकर तथाकथित सुधारवादियों के मुखौटे उतारे गये थे। आम आदमी की नियति और सोच की वर्षों पुरानी परिभाषा का विरोध कर नये प्रतिमानों का निर्धारण किया गया था।
            सन् 70 तक स्थितियाँ और बदलीं। आम आदमी का संघर्ष और जीवन की शर्तें अधिक कठोर हो गयीं। लेखकीय दायित्व में संघर्षोन्मुख मानसिकता, परिवर्तन की इच्छुक पीढ़ी के दिशा-बोध भी जुड़े और इस संधिकाल में निष्ठावान लेखकों ने समय की साँसों को अभिव्यक्ति दी और इन्हें अपनी कहानियों में ज्यों का त्यों उतारा। इसलिए इन कहानियों ने आम आदमी की कहानी के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई और इसी पहचान को कायम रखने के लिए एक नाम चुनना अनिवार्य जान पड़ा। समयगत सच्चाइयों के समान्तर चलने वाली इन कहानियों ने अपने लिए ‘समान्तर’ नाम चुना जो आज के सम्पूर्ण प्रतिबद्ध भारतीय साहित्य को इंगित करने का सबसे संक्षिप्त एवं सुविधापूर्ण ढंग है।
        किन्तु स्थितियाँ और बदतर होती चली गयीं। लेखकीय दायित्व बढ़ते चले गये, और अब केवल आम आदमी के प्रति प्रतिबद्धता ही नहीं, वरन् उसकी स्थितियों के साथ सम्बद्धता भी अनिवार्य हो गयी।’
        परिवर्तित युगीन परिस्थितियों से सामंजस्य स्थापित न रख पाना भी एक कारण है कि कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, मोहनलाल काक, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, रमेशचन्द्र श्रीवास्तव, शिवपूजन सहाय, जगदीश चन्द्र मिश्र, सुदर्शन, विनोद शंकर व्यास, माखनलाल चतुर्वेदी, ‘रावी’, जगदीश पाण्डेय, राधाकृष्ण, भवभूति मिश्र, रामेश्वरनाथ तिवारी, भृंग तुपकरी, कालीचरण चटर्जी एम. ए., रामवृक्ष बेनीपुरी, आनन्द मोहन अवस्थी, शान्ति मेहरोत्रा, बैकुण्ठनाथ महरोत्रा, अयोध्या प्रसाद गोयलीय, श्यामनन्दन शास्त्राी, कामता प्रसाद सिंह ‘काम’, शिवनारायण उपाध्याय, महेश शरण जौहरी ‘ललित’, रामनिवास शर्मा ‘मयंक’, रामनारायण उपाध्याय, महेन्द्र भटनागर, डाॅ. त्रिलोकी नाथ ब्रजवाल, मधुकर गंगाधर, रामेश्वर प्रसाद वर्मा, आचार्य शशिकर, नन्द किशोर तिवारी, प्रफुल्लचन्द्र ओझा ‘मुक्त’, नागेन्द्र वर्मा यहाँ तक कि महेश चन्द्र सोती, हिमांशु श्रीवास्तव, तनसुखराम गुप्त, प्रभाकर माचवे, जहूरबख्श, दिवाकर प्रसाद विद्यार्थी, सुबोध कुमार जैन, तिलक सिंह परमार, ब्रजलाल बियाणी, ब्रजभूषण सिंह आदर्श, डा. शशांक आदर्श, शरद कुमार मिश्र ‘शरद’, नारायण प्रसाद जैन, राकेश भारती, अवधेश, निमेष शुक्ल, इन्द्र व्यास, ठाकुर दत्त शर्मा ‘पथिक’, मोहन राजेन्द्र सिंह, रामेश्वर नाथ तिवारी, मधुकर गंगाधर, श्यामनन्दन शास्त्राी सरीखे सन् 1975 या उसके बाद तक भी लेखनरत ऐसे अधिकतर कथाकारों का लघुकथा-लेखन समकालीन चिंतन से जुड़े पाठकों द्वारा नकार दिया गया।
        सन् 1970 के बाद से ही देश की पतनशील राजनीतिक, सामाजिक, पारिवारिक स्थितियों ने जन-मानस को प्रभावित किया। प्रतिक्रियास्वरूप उनके सोच की दिशा बदली, जीवन-मूल्य बदले और उनका दृष्टिकोण ‘त्यागवादी’ से बदलता हुआ ‘भोगवादी’ व ‘उपयोगितावादी’ होता चला गया। शासकों के छल-छद्म व शोषणकारी नीतियों, सामाजिक बाह्य आडम्बरों, विघटित परिवारों एवं खोखले सम्बन्धों, आर्थिक दमन-चक्र के अन्दर पिसती भावनाओं-महत्त्वकांक्षाओं, टूटते विश्वासों आदि संघर्षों में जन-सामान्य उलझता चला गया। उसका जीवन खण्ड-खण्ड हो टुकड़ों में बँट गया। निरुपमा सेवती के शब्दों में—‘...खण्डित होते-होते आज जीवन के इतने खण्ड हो चुके हैं कि किसी खण्ड-अनुभूति को पूरी तेजी से व्यक्त करने के लिए लघुकथा अच्छा माध्यम है।’
        लगभग चार दशकों तक हिन्दी कहानी बुरी तरह आन्दोलनों और खेमाबंदियों में उलझी रही। नई कहानी से लेकर अकहानी, सचेतन कहानी, आम आदमी की कहानी, समान्तर कहानी, जनवादी कहानी, सक्रिय कहानी आदि न जाने कितने भेद कहानी के किए गए। होता यह रहा कि किसी लेखक ने अपने दो-चार मित्रों के सहयोग से किसी पत्रिका के माध्यम से एक नया आन्दोलन खड़ा किया और उसके द्वारा स्वयं को स्थापित करने या लेखकों में अग्रणी बनने का प्रयास किया।
        हिन्दी कहानी में लंबे समय तक छायी रही इस अराजक स्थिति और अनेक बाहरी संकटों ने तत्कालीन युवा कथाकारों को लघुकथा की विधा को अपनाने को प्रेरित किया।
        डाॅ. नामवर सिंह ने ‘कथा भारती’ के पृष्ठ 14 में ‘हिन्दी कहानी का विकास’ शीर्षक आलेख में स्वीकार किया है कि ‘सातवें दशक में कहानी ने एक और मोड़ लिया है। वह नया मोड़ अन्य गुणों के अतिरिक्त प्रयत्न-लाघव का था। इस प्रयत्न-लाघव को लघुकथा को पहले स्थापित करने की प्रयत्नावस्था में लघुकथा के गर्भाधान का प्रयत्न कहना ही ठीक होगा।’
          ‘लघुकथा के गर्भाधान का प्रयत्न’! यह एक दूरदर्शी विचार है जो गहन चिंतन-जनित अनुभव की देन है। अपरिपक्व लघुकथा-अभिव्यक्ति के उस दौर को कुछ-और कहा भी क्या जा सकता था। इसमें वस्तुतः विधा के प्रति उपेक्षा का नहीं, उसके प्रति पीड़ा का भाव सन्निहित है। यह कहकर आशा व्यक्त की जा रही है कि गर्भ में आ चुका यह भ्रूण भविष्य में पनपेगा और जन्म लेकर लोक-कल्याण का दायित्व निर्वाह भी अवश्य करेगा।
आगामी अंक में जारी………