शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

क्या लघुकथा अपना सर्वोत्तम समय देख चुकी--उमेश महादोषी



 'अविराम साहित्यिकी' के संपादक डॉ॰ उमेश महादोषी और बलराम अग्रवाल के बीच हुई इस लम्बी बातचीत की पहली किस्त 'लघुकथा-वार्ता' के 21 जून 2014 अंक में तथा दूसरी किस्त 21 अगस्त 2014 अंक में पोस्ट की गई थी। आज प्रस्तुत है उक्त बातचीत की तीसरी किस्त…
चित्र:बलराम अग्रवाल
उमेश महादोषी: नयी पीढ़ी के लघुकथाकार अलग-अलग कुछ अच्छी लघुकथाएं
देते रहे हैं। परन्तु अपने समग्र लघुकथा लेखन से उस तरह प्रभावित कर पाने
में सफल नहीं दिखते, जैसा उन्हें होना चाहिए या फिर जैसा आठवें दशक में
उभरे लघुकथाकार सफल हुए। प्रमुख कारण आप क्या मानते हैं?
बलराम अग्रवाल : यह कमी पुरानी पीढ़ी के भी एक-दो लघुकथाकारों में दिखाई देती है। उनके समग्र लघुकथा लेखन में विषय वैविध्य नदारद है। कोई साम्प्रदायिक दंगो के, कोई राजनेताओं की कथनी-करनी के तो कोई घर-परिवार के दुखांत कथानकों में ही उलझकर रह गया है। इस सब का प्रमुख कारण तो मात्र एक ही है—जीवनानुभवों की सीमा।

उमेश महादोषी: नयी पीढ़ी के अधिकांश लघुकथाकार लघुकथा-लेखन से तो
जुड़े हैं, किन्तु विमर्श और अच्छी लघुकथाओं को रेखांकित करने के अन्य
प्रयासों में कोई सार्थक भूमिका निभाते दिखाई नहीं देते। आप क्या कहेंगे?
बलराम अग्रवाल : लेखन अलग कर्म है और समीक्षण अलग। विमर्श में उतरने के लिए प्रत्येक कथाकार को जिस अध्ययन, गाम्भीर्य और शब्द-कौशल की आवश्यकता होती है, वह धीरे-धीरे ही आता है; एकदम से नहीं।

उमेश महादोषी: क्या आपको नहीं लगता कि आज भी लघुकथा प्रमुखतः
आठवें-नौवें दशक के स्थापित लघुकथाकारों के इर्द-गिर्द ही घूम रही है?
यदि ऐसा है तो इस स्थिति से लघुकथा को निकालने के लिए किस तरह के प्रयास
होने चाहिए? पुरानी और नयी पीढ़ी के लघुकथाकारों की अपनी-अपनी भूमिकाएं
क्या हो सकती हैं?
बलराम अग्रवाल : आठवें-नौंवें दशक के लघुकथाकार उस काल में स्थापित कथाकार नहीं थे; नवोदित थे सब के सब। उन्हें अगर आज स्थापित माना जा रहा है तो उनका लेखकीय श्रम और मेधा ही उसके पीछे हैं। लघुकथा लघुकथाकारों के इर्द-गिर्द घूम रही है, यह कथन ऐसा ही है जैसे कोई यह कहे कि लेखन की बागडोर लेखक के हाथ से खिसककर रचना के हाथ में चली गई है। और अगर आपका तात्पर्य यह है कि स्थापित लघुकथाकार नये कथाकारों को आगे नहीं आने दे रहे तो यह भी सच नहीं है। चैतन्य त्रिवेदी, शोभा रस्तोगी, दीपक मशाल आदि अनेक लोग लघुकथा को नई सदी के पहले दशक की देन माने जा सकते हैं। भूमिका इसमें रचनाशीलता ही निभाती है, गोड-फादरशिप नहीं।
उमेश महादोषी: आपकी बात नि:सन्देह ठीक है। पर मैं किसी अवरोध या गॉड फादरशिप की बात नहीं कर रहा हूँ। मुझे लगता है कि लघुकथा में आप लोगों के बाद की पीढ़ी को जिस तरह और जिस स्तर पर लघुकथा को आगे ले जाने के लिए, विशेषतः समीक्षा-समालोचना की प्रक्रिया में, आगे आना चाहिए था, वह अपेक्षा से बहुत कम है। इस प्रश्न को मैं उठा रहा हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि आज हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-राजनीतिक स्थितियाँ और हालात जैसे हैं, उन्हें कथा क्षेत्र में लघुकथा (और काव्य क्षेत्र में क्षणिका) जैसी विधाओं में नई पीढ़ी के कथाकार कहीं अधिक प्रभावपूर्ण और सार्थक ढंग से अभिव्यक्ति दे सकते हैं, नया चिन्तन और विचार ला सकते हैं। दूसरे कई अन्य विधाओं में देखें तो वहाँ बाद की पीढ़ियों के रचनाकार भी समस्तर पर सक्रिय रहे हैं। क्या कहेंगे?
            बलराम अग्रवाल : लघुकथा लेखकों में सामयिक चिंतन से जुड़ी अभिव्यक्ति देने का संकट तो अक्सर नजर आता है, नि:संदेह; लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। मुझे लगता है कि …लगता ही नहीं है बल्कि कभी-कभी उसका सामना भी करना पड़ जाता है;  वो यह कि हम आज भी लघुकथा के पारम्परिक रूप-आकार पर ही रूढ़ रवैया अपनाए हुए हैं। इस ‘हम’ में लेखक, पाठक, संपादक, आलोचक सब शामिल हैं। रचना ने ‘हमारे’ पैमाने वाले आकार का अतिक्रमण किया नहीं कि उसे लघुकथा कहने में हमें संकोच होने लगता है। उसने बिम्ब का, प्रतीक का सहारा लिया नहीं कि हम उसे आम पाठक की समझ से बाहर की रचना मानने लगते हैं। ‘आम आदमी के लिए साहित्य’ के नाम पर बड़े से बड़ा आलोचक ऐसा साहित्यिक भोजन चाहने लगा है जो उसके मुँह में जाते ही घुल जाये, जिसे चबाने को लेशमात्र मशक्कत उसे न करनी पड़े। शब्द से जो अर्थ स्वत: फूटता है, उसे रिसीव करने वाले इनके ट्रांसमीटर्स आउट-डेटेड हो चुके हैं। इन्हें अब बस शब्द ही दीखता है, उसका नेपथ्य नहीं। मैं सब की नहीं, अधिकतर की बात कह रहा हूँ। इन अधिकतर के कारण नये कलेवर और सोच की रचनाएँ चर्चा पाने से वंचित रह जाती हैं।

उमेश महादोषी: क्या लघुकथा अपना सर्वोत्तम समय देख चुकी? यदि नहीं,
तो उसके लक्षित समयकी कल्पना आप किस तरह करते हैं? क्या उस समयके
आने की आशा है आपको? वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए क्या आपको लगता है कि
अगले पचास वर्ष के बाद लघुकथा साहित्य में अपनी सार्थक भूमिका के साथ
खड़ी होगी?
बलराम अग्रवाल : उमेश जी, कला व साहित्य के रचनात्मक क्षेत्रों में ‘सर्वोत्तम समय’ वह नहीं होता जिसे सामान्य लोग सर्वोत्तम समय कहते या मानते हैं। इनमें सर्वोत्तम समय वह होता है जब उससे जुड़े लोग पूरी निष्ठा के साथ निष्पक्ष रूप से सृजनात्मक व परिवीक्ष्णात्मक दायित्वों को निभाते हैं। मैं समझता हूँ कि कुछेक अपवादों को छोड़कर अधिकतर समकालीन लघुकथाकारों ने अपने इस दायित्व का निर्वाह किया है और उनमें से कुछ अभी तक भी कर रहे हैं। दूसरी बात यह है कि पूर्व प्रचलित विधाओं के चलते नवीन विधाओं का अपनी जगह बना लेना बहुत आसान कभी भी नहीं रहा। समय लगता है; लेकिन इसके लिए आप कोई निश्चित समय-रेखा नहीं खींच सकते। कारण यह है कि यह मात्र आपकी यानी लेखक और आलोचक की इच्छा पर निर्भर नहीं है। इस बारे में, जिसके बीच जगह बनानी है, उस ‘जन’ को आप दोयम पायदान पर नहीं रख सकते। तीसरी बात यह है कि लघुकथा यदि आज साहित्य में अपनी सार्थक भूमिका के साथ नहीं खड़ी है तो यह निश्चित मानिए कि पचास क्या दस साल बाद भी वह अपनी सार्थक भूमिका में खड़ी दिखाई नहीं देगी। हमें सबसे पहले अपने ‘आज’ को देखना है, भावी समय को नहीं। अगर हम आज समय के साथ नहीं खड़े हैं तो आने वाला समय हमारे साथ क्यों खड़ा होगा?
उमेश महादोषी: आपकी बात बिल्कुल ठीक है। लेकिन यहाँ मेरी जिज्ञासासमयके यथार्थ को दिशा देने में साहित्य (लघुकथा) की भूमिका के सन्दर्भ में है। आपका भी मानना रहा है कि समय कभी अचानक नहीं बदलता, धीरे-धीरे बदलता है। इस बदलाव को पहचानकर भविष्य के लिए साहित्य से मार्गदर्शन की अपेक्षा गलत तो नहीं होगी? यदि आज के कुछ हालात बिना किसी अवरोध के (नकारात्मक बदलावों की प्रकृति की पहचान और अभिव्यक्ति के माध्यम से साहित्य ऐसा अवरोध बन सकता है) चलते हुए पचास वर्ष बाद किसी विस्फोटक स्थिति में बदल जाते हैं, तो क्या हमारा दायित्व यह नहीं होना चाहिए कि हम उसकी कल्पना करें और उसे रोकने के लिए अपनी भूमिका निभायें या निभाने के लिए तैयार रहें? चूंकि अब लघुकथा अपने रूप-स्वरूप और दिशा आदि की स्थापना के प्रयासों से आगे आ रही है, अतः उसकी पिछली सामाजिक भूमिका से अलग एक अनुकूल विधा के रूप में भावी भूमिका को लेकर अधिक अपेक्षा करना क्या उचित नहीं होगा? पिछली पीढ़ी ने हमें जो प्रभावशाली अस्त्र तैयार करके दिया है, अगली पीढ़ी अपने और भावी पीढ़ियों के हित में उसका प्रभावी उपयोग करे, उसकी धार को और तेज करे, क्या ऐसी अपेक्षा नहीं होनी चाहिए?

            बलराम अग्रवाल : उमेशजी, मैं पुन: दोहराऊँगा कि यदि हम ‘आज’ को साध लेते हैं, ‘आज’ के साथ ईमानदार बर्ताव करते हैं तो ‘भावी’ को साधने की चिंता में हमें अधिक घुलना नहीं पड़ेगा। हमें पचास साल बाद वाली विस्फोटक स्थिति की कल्पना में जाने की जरूरत नहीं है; क्योंकि पचास साल बाद वाली समूची स्थिति का पूर्वाभास आज की स्थिति दे रही होती है। उस पूर्वाभास को भी कथाकार लघुकथा की ‘वस्तु’ बना सकता है, बनाना चाहिए; क्योंकि उस रचना में भी कहीं न कहीं ‘आज’ ही अभिव्यक्त हो रहा होगा। हाँ, वर्तमान पीढ़ी के लघुकथाकारों से अपने ‘आज’ को अपनी रचना का सच बनाने की आपकी अपेक्षा का मैं सम्मान करता हूँ क्योंकि इस अपेक्षा के दायरे में कहीं न कहीं स्वयं मैं भी अपने आप को खड़ा देखता हूँ।   
('अविराम साहित्यिकी' अप्रैल-जून 2014 से साभार)

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

कई वरिष्ठ कथाकार लघुकथा लेखन के प्रति अनासक्त क्यों हो गए : उमेश महादोषी



उमेश महादोषी की बलराम अग्रवाल से बातचीत की दूसरी कड़ी 
…गतांक से जार
                                                                    चित्र:बलराम अग्रवाल
उमेश महदोषी: समूचे विमर्श को दलित विमर्शऔर स्त्री विमर्शके इर्द-गिर्द संकुचित कर देने की बात महत्वपूर्ण है, बावजूद कि ये दोनों बड़े मुद्दे हैं। और नि:संदेह इसके पीछे पूँजी और सत्ता की चालाकी खड़ी है। लेकिन इतना मान लेना क्या पर्याप्त होगा? क्या इसमें कहीं साहित्य और साहित्य से जुड़े, लोगों बल्कि तमाम बुद्धिजीवी वर्ग की असफलता समाहित नहीं है? यह वर्ग सत्ता और पूंजी को प्रभावित करने की बजाय उससे क्यों प्रभावित हो जाता है? क्या आप इसे सामयिक चिन्तन के सन्दर्भ में मौलिकता के पथ, जो नई विधाओं की प्रासंगिकता की ओर इंगित करता है, से विचलन नहीं मानेंगे?
बलराम अग्रवाल : पूँजी, सत्ता और अभिजात्य—ये तीनों ही उस शतरंज के माहिर खिलाड़ी हैं जिसमें पैदल, हाथी, घोड़ा, वज़ीर, रानी और राजा नामक मोहरों की जगह आम आदमी को इस्तेमाल किया जाता है। ये कुछ ऐसे तर्क और योजनाएँ लेकर उपस्थित होते हैं कि पूँजीहीन, सत्ताहीन और शक्तिहीन सामाजिक कभी आसानी से तो कभी कुछेक समझौतों के साथ इनके चंगुल में फँस ही जाते हैं। इस कार्य में धनाकांक्षी, पदाकांक्षी और महत्वाकांक्षी लोग इनके सहायक बनते हैं। पूँजी और सत्ता ऐसे लोलुपों को मुख्यत: धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक गलियारों में तलाशती और नियुक्त करती हैं। ये चालाक लोग आम आदमी को चारों ओर से घेरकर ऐसा बिगुल फूँकना शुरू करते हैं कि वह उसी की धुन को समय की धुन मानकर उसकी लय पर झूमने लगता है। जो आदमी इनके बिगुल की लय पर नहीं झूमता उसे ये दकियानूस, प्रतिक्रियावादी, पुनरुत्थानवादी या जो इनके मन में आये वह सिद्ध करके किनारे सरका देते हैं। वक्त का पहिया तो कभी रुकता नहीं है, चलता रहता है। अवसरवादी लोग उसकी अरनियों को पकड़कर लटक जाते हैं। पहिए की गति के साथ अरनि ऊपर आई तो वे ऊपर आ जाते हैं और नीचे गई तो नीचे पहुँच जाते हैं। अवसरवादी आदमी मान-अपमान और मानवीयता-अमानवीयता जैसी भावुकताओं से परे रहता है तथा सब काल में समान बना रहता है।
उमेश महदोषी: आठवें दशक के लघुकथा के कई प्रमुख नायक नवें दशक के बाद  निष्क्रिय होते गये। इसके पीछे आपको कौन-कौन से कारण जिम्मेदार लगते हैं? इन कारणों को आप साहित्य या लघुकथा लेखन से जनित निराशा से सम्बद्ध मानते हैं या फिर इसमें सामाजिक एवं लेखन से इतर अन्य कारकों की कोई भूमिका है?
बलराम अग्रवाल : देखिए, समान ‘वस्तु’ को कुछेक अवान्तर प्रसंगों के सहारे विस्तार देकर कुछ कथाकार कहानी बनाकर प्रस्तुत करने के अभ्यस्त हैं तो कुछ अवांतर प्रसंगों की घुसपैठ को अनावश्यक मानते हैं। सामान्यत: पाठक को भी अवान्तर प्रसंगों में घुसना रोचक नहीं लगता है; लेकिन उसके मनोमस्तिष्क पर कहानी का पारम्परिक प्रारूप इतना हावी है कि अवान्तर प्रसंगों से हटना उसे भयभीत करता है। यह स्थिति किसी समय अंग्रेजी कहानीकारी की रह चुकी है जिनकी रचना (कहानी यानी शॉर्ट स्टोरी) को उपन्यास के पाठकों और समालोचकों द्वारा वर्षों यह कहकर नकारा जाता रहा कि इतने कम शब्दों में जीवन की घटनाओं को व्यक्त नहीं किया जा सकता; और यह कि कहानी लेखन में केवल वे ही महत्वाकांक्षी उतर रहे हैं जो उपन्यास लिखने में अक्षम हैं। ये दोनों ही नकार आखिरकार निराधार भय ही साबित हुए और ‘शॉर्ट स्टोरी’ ने अपनी जगह आम पाठकों के बीच बना ही ली। कथा-लेखन में अक्षम होने संबंधी आरोपों का जो दंश पूर्ववर्ती अंग्रेजी कहानीकारों ने झेला था, वही दंश हिन्दी लघुकथाकार भी झेल रहे हैं। मुझे विश्वास है कि जो सूरज उन्होंने देखा था, वही लघुकथाकार भी अवश्य देखेंगे।
उमेश महादोषी: एक तरफ नवें दशक के बाद कई वरिष्ठ कथाकार लघुकथा लेखन के प्रति अनासक्त हो गए, वहीं अनेक नए लेखक लघुकथा लेखन के प्रति आकर्षित हुए। रचनात्मकता के कारणों और परिस्थितियों के सन्दर्भ में इस परिदृश्य को आप किस तरह देखते हैं?
बलराम अग्रवाल : जब आप ‘सकाम’ लेखन करते हैं तो निश्चय ही आपकी नजर लेखन की बजाय कहीं और टिकी होती है। उस उद्देश्य की प्राप्ति में देरी आप में लेखन के प्रति उकताहट पैदा करती है और आपको वहाँ से हट जाने को विवश कर देती है। लघुकथा के जिन वरिष्ठों की ओर आप लघुकथा-लेखन से अनासक्त या विरक्त होने का संकेत कर रहे हैं उनमें से कुछ ने केवल लघुकथा-लेखन ही छोड़ा है, लेखन नहीं; यानी कि आकांक्षाओं की पूर्ति के उन्होंने अन्यान्य क्षितिज तलाश लिए हैं जहाँ परिणाम तत्काल नहीं तो बहुत जल्द मिलने की उम्मीद हो।
उमेश महादोषी: नयी पीढ़ी के रचनाकारों में लघुकथा लेखन के प्रति आकर्षण को आप कितना वास्तविक और सार्थक मानते हैं? क्या ये रचनाकार लघुकथा में लेखन का कोई विजनदेते दिखाई देते हैं?
बलराम अग्रवाल : नयी पीढ़ी के रचनाकारों में लघुकथा लेखन के प्रति आकर्षण पर शक करने का कोई कारण मुझे नजर नहीं आता है। अगर कोई कथाकार सार्थक लघुकथाएँ दे पाने में सफल रहता तो उसके आगमन को वास्तविक ही माना जायेगा। सभी में न सही, नये आने वाले कथाकारों में से कुछ में ‘विज़न’ है।
उमेश महादोषी: लघुकथा में कथ्य और शिल्प की नकारात्मकता से जुड़ी चीजें, लेखकों की भीड़ के साथ आई। एक समय इन चीजों से पीछा छुड़ाने की कोशिशें भी दिखने लगी थीं। परन्तु आज के समूचे लघुकथा-परिदृश्य पर दृष्टि डालने पर वे सब चीजें फिर से दिखाई देती हैं। ऐसा क्यों? कहीं न कहीं इसमें नयी पीढ़ी के लघुकथाकारों की लापरवाह छवि ध्वनित नहीं होती है? इसमें पुरानी पीढ़ी की भूमिका पर आप क्या कहेंगे?
बलराम अग्रवाल : नया लेखक पूर्ववर्ती लेखन का अनुगमन करता है। इस अनुगमन से कोई जल्दी पीछा छुड़ाकर अपना रास्ता बना लेता है, कोई देर से छुड़ा पाता है; और कोई ऐसा भी होता है जो ताउम्र अनुगामी ही बना रहता है, अपनी कोई धारा स्वतंत्रत: नहीं बना पाता। जहाँ तक लघुकथा की बात है, सभी जानते हैं कि यह लघुकाय कथा-विधा है। सब बस इतना ही जानते हैं, यह नहीं जानते कि ‘लघुकाय’ में छिपा क्या-क्या है, उसमें साहित्यिक गुणों का समावेश कथाकार ने किस खूबी के साथ कर दिया है और यह भी कि प्रचलित कथा-रचनाओं की प्रभावान्विति से अलग और विलक्षण उसने कुछ ऐसा पाठक को दे दिया है कि वह अचम्भित है। अचम्भित चौंकाने वाले अर्थ में नहीं; बल्कि इस अर्थ में कि जो बात इस लघुकथाकार ने कह दी है, वह साधारण होते हुए भी स्वयं उसके जेहन से दूर क्यों थी?
('अविराम साहित्यिकी' अप्रैल-जून 2014 से साभार)

शनिवार, 21 जून 2014

साहित्य को दलित व स्त्री विमर्श में संकुचित कर दिया गया है--बलराम अग्रवाल


चित्र:बलराम अग्रवाल
उमेश महादोषी:  किसी विधा के आरम्भिक और विकास काल में नियोजित लेखन को
क्या आप ठीक मानते हैं? यदि हाँ, तो उस तरह के सन्दर्भ में नियोजित लेखन
के प्रमुख चरण क्या होने चाहिए?
बलराम अग्रवाल : हिन्दी हानी प्रेमचंद से पहले भी थी लेकिन उसके सरोकार रोमांच और रंजन से अधिक नहीं थे। प्रेमचंद ने उसको जनमानस की तत्कालीन पीड़ाओं से जोड़ा। इसलिए कहानी का विकास यदि हम प्रेमचंद से मानें तो मुझे नहीं लगता कि उन्होंने या उनकी पीढ़ी के किसी अन्य कथाकार (प्रमुखत: प्रसादजी आदि) ने कभी नियोजित लेखन के बारे में सोचा भी होगा। विधा का विकास दृष्टि की नवीनता और कालानुरूप दिशाबोध पर निर्भर करता है, नियोजित लेखन उसके बाद की चीज़ है। प्रेमचंद के बाद, नई कहानी के दौर में जिस तरह कहानी-लेखन हुआ या किया गया; और उसके जो सरोकार बताए-गिनाए गये, उसे आप नियोजित लेखन मान सकते हैं। लेकिन समाज और साहित्य के बीच जो जगह नई कहानी ने बनाई उसकी वजह यही थी कि उस दौर के कथाकारों ने कहानी के कथ्य और उसकी प्रस्तुति को प्रेमचंद के काल से आगे पहुँचाने की जरूरत महसूस की। उन्होंने प्रेमचंद की अवहेलना नहीं की; लेकिन उनके कथ्यों का अनुसरण भी नहीं किया। यह भी कह सकते हैं कि बदली हुई परिस्थितियों में वे वहाँ भी पहुँचे जहाँ प्रेमचंद की पहुँच नहीं बन पाई थी। इस कार्य के लिए उनमें यथार्थ ललक और अपने काल की प्रवृत्तियों और मनोवृत्तियों को पहचानने व अभिव्यक्ति देने की अद्भुत कथा क्षमता थी।
उमेश महदोषी: 1970 के बाद 15-20 वर्षों तक समकालीन लघुकथा को एक फोकस
के तहत लिखा गया और उस पर विमर्श की मुहिम को चलाया गया। क्या इस तरह के
तमाम प्रयासों को एक नवीन विधा के सन्दर्भ में लघुकथा में नियोजित लेखन
मानना उचित होगा?
बलराम अग्रवाल : नहीं। 1970 के बाद ‘लघुकथा’ को फोकस का मिलना उस काल की महती आवश्यकता थी। 1980 में प्रकाशित अपने संग्रह ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ की भूमिका में अपने समय का, प्रमुखत: 1970 के बाद का जिक्र परसाईजी ने जिस तरह किया था, उसे मैं ज्यों का त्यों उद्धृत करना चाहूँगा—“इस दौर में चरित्रहीन भी बहुत हुआ। वास्तव में यह दौर राजनीति में मूल्यों की गिरावट का था। इतना झूठ, फरेब, छल पहले कभी नहीं देखा था।  दग़ाबाजी संस्कृति हो गई थी। दोमुँहापन नीति। बहुत बड़े-बड़े व्यक्तित्व बौने हो गए। श्रद्धा सब कहीं से टूट गई। इन सब स्थितियों पर मैंने जहाँ-तहाँ लिखा। इनके संदर्भ भी कई रचनाओं में प्रसंगवश आ गए हैं।
आत्म-पवित्रता के दंभ के इस राजनीतिक दौर में देश के सामयिक जीवन में सबकुछ टूट-सा गया। भ्रष्ट राजनीतिक संस्कृति ने अपना असर सब कहीं डाला। किसी का किसी पर विश्वास नहीं रह गया था-न व्यक्ति पर न संस्था पर। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका का नंगापन प्रकट हो गया। श्रद्धा कहीं नहीं रह गई। यह विकलांग श्रद्धा का भी दौर था। अभी भी सरकार बदलने के बाद स्थितियाँ सुधरी नहीं। गिरावट बढ़ रही है। किसी दल का बहुत अधिक सीटें जीतना और सरकार बना लेना, लोकतंत्र की कोई गारंटी नहीं है। लोकतांत्रिक स्परिट गिरावट पर है।
  ये सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियाँ थीं जो 1967 के आसपास से ही उभरकर सामने आने लगी थीं। ऐसे में अनेक कथाकार कहानी कहने की उस शैली को जो उक्त काल में बोझिल-सी हो चुकी थी, त्यागकर कथाभिव्यक्ति की छापामार शैली की ओर उन्मुख हुए। आप देखेंगे की उस काल की अधिकतर लघुकथाएँ अपने शिल्प और शैलीगत अधकचरेपन के बावजूद सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक दोगलेपन के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलन्द करती हैं। इस कथा-शैली को ‘तारिका’, ‘कात्यायनी’ जैसी तब की अनेक लघु-पत्रिकाओं ने अपने पन्नों पर जगह देनी शुरू की। कुछ नई पत्रिकाएँ भी शुरू हुईं जिनमें ‘अतिरिक्त’, ‘मिनियुग’, ‘अन्तर्यात्रा’, ‘दीपशिखा’ आदि का नाम आसानी से लिया जा सकता है। इन लघु-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाली लघुकथाओं का नोटिस कथाकार-संपादक कमलेश्वर ने लिया और उन्होंने ‘सारिका’ में लघुकथाओं को जगह देनी शुरू की। ‘सारिका’ के जुलाई 1973 अंक को उन्होंने ‘लघुकथा बहुल अंक’ बनाकर प्रकाशित किया। किसी व्यावसायिक कथा-पत्रिका का द्वारा लघुकथा को स्वीकारने की यह महत्वपूर्ण पहल थी। हमें नहीं भूलना चाहिए कि अपने संपादन में लघुकथा को बढ़ावा देने की शुरुआत करने वाले कमलेश्वर नयी कहानी आंदोलन के स्तम्भ कथाकार थे। आखिर कोई तो बात उन्होंने ‘लघुकथा’ में देखी ही होगी कि वे इस विधा को प्रमुखता देने की ओर उन्मुख हुए। …तो जिस नियोजन की बात आप कर रहे हैं, उसका निर्धारण समय और परिस्थितियाँ करते हैं, कोई व्यक्ति या व्यक्ति-समूह नहीं। समय और परिस्थितियों से विलग हर नियोजन व्यर्थ जायेगा।
 उमेश महादोषी: क्या आपको लगता है कि पिछली शताब्दी के आठवें और नौवें
दशक में लघुकथा लेखन के लिए किए गये नियोजित प्रयास पूर्ण थे? या फिर अब
इतने वर्षों बाद पीछे मुड़कर देखने पर आपको कोई गैपनजर आता है?
अथवा-
क्या आपको लगता है कि पिछली शताब्दी के आठवें और नौवें दशक में लघुकथा को
प्रतिष्ठित करने के लिए किए गए प्रयास अपने आप में पूर्ण थे? या कुछ ऐसी
चीजें दिखाई देती हैं, जिन्हें किया जा सकता था, लेकिन नहीं किया गया?
बलराम अग्रवाल : अगर समुचित अध्ययन के द्वारा आपने विवेकशील होने के गुण को साधा है। अगर समाज को देखने-परखने की आपकी दृष्टि में पारदर्शिता है। अगर आप अपने उद्देश्य के निर्धारण में किसी भ्रम या उहापोह के शिकार नहीं हैं। अगर आप ईमानदारी, निष्ठा और सम्पूर्ण शारीरिक-मानसिक क्षमता के साथ अपने उद्देश्य की ओर बढ़ने का दायित्व निभा रहे हैं तो इतर कारणों से अनचीन्हे भले ही रह जाएँ, मेरी नजर में आपके प्रयास में ‘पूर्णता’ है। उमेश जी, व्यक्ति के सम्बन्ध में भी और विधा के सम्बन्ध में भी, मुझे लगता है कि ‘प्रतिष्ठा’ एक सापेक्षिक शब्द है। काल-विशेष या स्थान-विशेष में जैसी प्रतिष्ठा इन्हें मिली हो, वैसी प्रत्येक काल या प्रत्येक स्थान में मिलती रहेगी, आवश्यक नहीं है। वे चीजें, जिन्हें किया जा सकता था और नहीं किया गया के साथ-साथ एक सवाल यह भी बनता है कि क्या कुछ ऐसी चीजें दिखाई देती हैं जिन्हें किया गया लेकिन नहीं करना चाहिए था। खैर, जिन्हें किया जा सकता था और नहीं किया गया के बारे में मैं यही कह सकता हूँ कि लघुकथा-संकलनों के संपादन-प्रकाशन का जैसा काम बलराम ने किया वैसा व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े अन्य लघुकथा-हितैषियों को भी करना चाहिए था। दूसरी ओर, बलराम को कोशों के संपादन के साथ-साथ लघुकथा-लेखन पर भी बने रहना चाहिए था। महेश दर्पण अपने लेखन की शुरुआत में लघुकथा से जुड़े थे। ‘मिट्टी की औलाद’ नाम से उनका लघुकथा-संग्रह भी आया था। उन्होंने कहानी पर बहुत बड़ा काम कर दिखाया; लेकिन लघुकथा पर काम के लिए किसी प्रकाशक को तैयार न कर सके। रमेश बतरा तो लघुकथा के हित-चिंतक, विचारक और लेखक सभी कुछ थे। वे ‘सारिका’, ‘नवभारत टाइम्स’ या ‘सण्डे मेल’ जहाँ भी रहे, लघुकथा को जगह देते रहे। जब तक जिये, लघुकथा पर संवाद में बने रहे। उनके दो कहानी संग्रह तो आये; लेकिन अपनी लघुकथाओं का संग्रह प्रकाशित करने की ओर वे क्यों नीरस रहे समझ में नहीं आता है। ये मैं लघुकथा की उन सशक्त संभावनाओं के नाम गिना रहा हूँ जो संयोग से व्यावसायिक प्रकाशन संस्थाओं की साहित्यिक पत्रिकाओं से जुड़ी थीं। लघुकथा के चयन और उसकी आलोचना के एक काम को 2013 से मधुदीप ने ‘पड़ाव और पड़ताल’ के रूप में आगे बढ़ाने की शुरुआत की है। उम्मीद है कि उसके माध्यम से स्थिति कुछ साफ अवश्य होगी।
चित्र:बलराम अग्रवाल

 
उमेश महादोषी: आठवां और नौवां दशक समकालीन लघुकथा के लिए सबसे उर्वर
समय रहा। क्या उसके बाद के समय में वह लय किसी सीमा तक बनी रह पाई है? या
किसी बिन्दु पर जाकर लघुकथा का समय ठहर गया-सा लगता है?
बलराम अग्रवाल : मेरा मानना है कि लघुकथा लेखन के लिए समय की उर्वरता सातवें दशक के उत्तरार्द्ध में शुरू हो चुकी थी। अनेक लोगों ने उस दौर में कथाभिव्यक्ति की इस शैली को अपनाने की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया था। उस जमीन को पकने में करीब एक दशक लगा और आठवें दशक के मध्य तक आते-आते यह पूरी तरह तैयार हो चुकी थी। हमें स्वीकार कर लेना चाहिए कि भारतवासियों के जीवन में वह राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक—सभी मोर्चों पर नये-नये शोषक झंडाबरदारों के पैदा हो जाने और उनके द्वारा निर्द्वंद्व ठगे जाने के कड़ुवे और त्रासद अनुभवों का काल था। शोषण और अत्याचार के खिलाफ नीचे से ऊपर तक कहीं कोई सुनवाई नहीं। सभी प्रकार के नेतृत्व के खिलाफ जितना उग्र स्वर उस काल के भारतीय साहित्य में मिलता है, उतना उसके बाद वाले काल में नहीं। इसलिए लघुकथा में भी विरोध की वह लय नवें दशक के बाद टूटती-सी नजर आती है। यहाँ एक और बात की ओर भी ध्यान दिलाना अप्रासंगिक नहीं होगा। नवें दशक के बाद समूचे साहित्य को दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श में संकुचित कर दिया गया। इससे जनसंघर्ष के अनेक मुहानों पर सूनापन छा गया, लूटखोरों के लिए वे निर्द्वंद्व हो गये। माना, कि ये दोनों विमर्श भारतीय समाज की बड़ी आवश्यकताएँ थीं; लेकिन इनके जरिए समूचे असंतोष को संकुचित कर देने की अभिजात्य चालाकी पर किसी का ध्यान नहीं गया। अशिक्षा, बेरोजगारी, किसान-उत्पीड़न और भुखमरी से आज का भारत सातवें-आठवें-नवें दशक के भारत से कम त्रस्त नहीं है, लेकिन उस ओर आज के साहित्य का रुझान बेमानी बना दिया गया है। यही वह बिन्दु है जहाँ लघुकथाकार भी भ्रमित है, कहानीकार भी और कवि भी। शाश्वत संघर्ष की धार को पूँजी और सत्ता किस चालाकी से कुंद करती हैं, यह उसका सजीव उदाहरण है।
(‘अविराम साहित्यिकी’, अप्रैल-जून 2014 अंक से साभार)
आगामी अंक में जारी…