शुक्रवार, 26 मार्च 2021

समकालीन लघुकथा और ‘अतिरिक्त’ के अंक-2 / बलराम अग्रवाल

 दिनांक 20-3-2021 से आगे… समापन किस्त

अंक छ:नवम्बर 1972। इसमें किशोर काबरा  की ‘ईसा और मैं’बृजेन्द्र नाथ वैद्य की

‘बिल्कुल हो जायगा’, कृष्ण कमलेश की ‘चेहरा दर चेहरा’,जगदीश कश्यप की ‘मुखौटा प्रिय’ तथा भगीरथ की ‘प्रतिबद्धता’ लघुकथाएँ प्रकाशित हुई हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ‘अतिरिक्त’ ने अबोधतावश पहन रखा ‘लघु कहानी’ का चोला अंक छ: में पूरी तरह उतार फेंका था। अंक-6 में प्रकाशित सभी लघुकथाएँ क्रमश: निम्न प्रकार हैं:

ईसा और मैं / डॉ॰ किशोर काबरा

ड्राइंग रूम की शोभा बढाता सूली पर लटका ईसा का खिलौना बड़ा सलौना. पर खिलौना आखिर खिलौना. बच्चे आखिर बच्चे. बच्चों ने ईसा को सूली से उतार दिया. पूछा तो बोले-बेचारे को तकलीफ होती होगी. मैं भभक उठाये क्या जाने कल के छोकरे बड़ों की इज्जत करना? अरे ! ईसा तकलीफ सहेगा या नहीं, पर यहाँ कोई देखेगा तो क्या कहेगा ? और मैंने ईसा को पुनः सूली पर लटका दिया. ड्राइंगरूम फिर चमक उठा.

बिल्कुल हो जायगा / बृजेन्द्रनाथ वैद्य

नेताजी की शिकायत सुनने गया था. आपके विभाग में बड़े घपले हो रहे हैं, सीनियर तो पड़े हुए हैं और नए प्रमोट होते जा रहे हैं. आखिर सिफारिश का बोलबाला कब तक चलेगा ? जनतंत्र में ऐसा नहीं होना चाहिए .... उनकी शिकायत रजिस्टर में दर्ज कर दी गई... फिर वे कुर्सी से सर टिकाते हुए बोलेआपके यहाँ बांकेबिहारी है न ; उनका प्रमोशन केस ....जी साब, कल ही हो जायगा ...बिल्कुल हो जायगा साब।

तभी, घडी का बड़ा सूचक तेजी से आगे बढ़ गया था, दूसरा कुछ धीरे से। दोनोंएक और न्याय-अन्याय की पुकार पर समझौता कर लेते हैं।

चेहरा दर चेहरा / कृष्ण कमलेश

इस बार जो आदमी अन्दर आया, बेहद पिए हुए था। एकबारगी वह उस पर झपट पड़ा।

पहले पैसे। उसकी पपड़ाई हथेली पर एक तुड़ा-मुड़ा नोट आ गया। ...उसे बेहद तकलीफ हो रही थी, पर वह चुपचाप पड़ी रही। ....साली हरामजादी में दम ही नहीं है। मुफ्त के पैसे लेती है। लड़खड़ाते हुए वह बाहर निकल गया। पेंट के बटन ठीक करने का भी उसे होश नहीं था।

एक कराह के साथ वह उठ बैठी। अंगिया से तुड़ा-मुड़ा नोट निकालकर देखा। उजाले में अच्छी तरह देखा। नकली था। उसने अंगिया उतार फेंकी। कपड़े की दो गेंदें लुढ़ककर कोने में चली गईं, टकराई और ठहर गईं।

मुखौटा प्रिय / जगदीश चन्द्र कश्यप

एक दिन उसने प्रसिद्धि का मुखौटा कहीं से प्राप्त कर लिया। मेरी और उसकी दोस्ती की रेखाएँ तब बिल्कुल समानांतर हो गई थीं।

वह किसी कॉलेज में प्रोफ़ेसर था। उसके संपर्क में कितनी ही लड़कियाँ आई—शिष्याओं के रूप में। जैसे-जैसे वे उसका मुखौटारहित चेहरा देखतीं–किनारा करती जातीं। कहीं मुखौटे का औचित्य ही खत्म न हो जाय—उसने निहायत ही खानदानी, प्रखर व सर्विस में लगी एक लड़की से विद्रोह कराया और धर्मपत्नी के रूप में प्रतिष्ठापित किया।

एक दिन एक लड़की वही मुखौटा लिए उसके घर पर उपस्थित हुई। तबसे वही लड़की उसकी सब कुछ है। उसकी धर्मपत्नी के अधिकार उसने छीन लिए हैं—ऐसी मुझे खबर मिली है।

प्रतिबद्धता / भगीरथ

उसने जीवन के सपने संजोये थे। पर वे चटखते रहे, टूटते रहे। ठीक उस शीशे की तरह, जिसमें उसकी असली शक्ल कई खानों में विभक्त होकर टूटने का एहसास दे जाती है। पर बुद्ध जीवन [इच्छाविहीन] कैसे कर कल्पना होगी !

बेकारी के दिन व्यतीत करते हुए कितना फ्रस्ट्रेशन हुआ था उसे। सब सम्बन्ध अर्थहीन और निरर्थक हो गए थे। ये दिन मानसिक तौर पर बहुत ही यातनाजनक होते हैं। वह करीब-करीब विक्षिप्त-सा हो गया था।

वह पूर्ण विक्षिप्त होने से बच गया। उसे नौकरी मिल गई। पैसा पास में आया। उसकी कद्र हुई। यहाँ तक कि उसने खुद अपनी कद्र की।

वह सरकारी नौकरी में है, इसलिए वह सरकारी विचार से प्रतिबद्ध है। उसकी अपनी किसी मूल्य के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं है; क्योंकि उसका मूल्य उसकी भूख है, उसकी असुरक्षा है। इसीलिए उसकी प्रतिबद्धता भी शायद उनसे ही है।

जीवन परिधि में बँध गया। परिधि सुनहरे प्रकाश वाली। उसके अन्दर एक भयंकर घुटनभरा अंधकार और वह प्रकाश की चकाचौंध में अंधकार में ही डूबा रहा।

[भगीरथ जी के अनुसार, ‘प्रतिबद्धता’ शीर्षक यह लघुकथा ‘आत्महंता’ शीर्षक से ‘पेट सबके हैं’ (1996) में प्रकाशित हुई लेकिन कुछ परिवर्तित रूप में]

अंक सात, दिसंबर 1972 में शशि कमलेश का एक लेख ‘आठवाँ दशक और लघुकथा का रचना औचित्य’ प्रकाशित हुआ। इस लेख में वर्णित चिंताएँ कुछेक बदलावों के अथवा सुधारों के बावजूद आज भी ज्यों की त्यों हैं। शशि कमलेश के लेख के अतिरिक्त इस अंक में मात्र एक ही रचना समा सकी, वह है—रमेश जैन  की लघुकथा ‘कुतिया’। प्रस्तुत हैं शशि कमलेश का लेख तत्पश्चात् रमेश जैन की लघुकथा :

आठवाँ दशक और लघुकथा का रचना औचित्य / शशि कमलेश

ये उपेक्षित लघुकथाएँ

हर काल खण्ड समाज के विकास क्रम में कुछ न कुछ अलग होता ही है तो फिर साहित्य की विधा उस अलगपने से , उस बदलाव से अछूती कैसे रह सकती है. मिनी नवगीत मिनी कविता लघुकथा मिनी रूपक आदि के आंदोलनों से जिनमे पर्याप्त अर्थवत्ता भी है. लघुकथा का अभियान ज्यादा पुराना और एक हद तक ज्यादा सही भी लगता है.

संस्कृत के पंचतंत्र और हितोपदेश, फिर खलील जिब्रान और हिंदी साहित्य में रावी, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, हरिशंकर परसाई, हंसराज अरोड़ा, डॉ श्रीनिवासन,कमलेश भारतीय,मोहन राजेश,सुशीलेंदु, रमेश यादव, लक्षमेंद्र चोपड़ा,रमेश बतरा कृष्णा अग्निहोत्री भगीरथ कृष्ण कमलेश बृजभूषणसिंह मधुप मगध शाही लक्ष्मीकांत वैष्णव पुरुषोत्तम चक्रवर्ती अवधेश अमन शशि राजेश विष्णु सक्सेना आभा जोशी सुषमा सिंह तक में यह सिलसिला चला आ रहा है.शताधिक लघुकथाएँ इसी दशक में इधर उधर छपी है लेकिन सामायिक लेखन के नाम पर की गई किसी भी टिपण्णी में उनका जिक्र क्यों नहीं है? यह मेरी समझ के बाहर है.शायद लघुकथाओं का कोई सुरक्षित शिविर न हो या क्या पता अधिकांश लघुकथा को अपनी केन्द्रीय विधा मानकर न चल प् रहे हों और इसे महज पास टाइम मानते हों.

सारिका, कात्यायनी, अमिता, अंतर्यात्रा, रूपाम्बरा, कहानीकार, सप्तांशु, शताब्दी, सौर चक्र, जनसंसार, भास्कर,मिलाप, स्वदेश,अतिरिक्त आदि पत्र पत्रिकाएं जहाँ लघुकथाएँ निरंतर छपती रहती है वहां मरुगंधा,कहानी,नै कहानियां निहारिका आदि लघुकथाएँ छपने से परहेज करती है. व्यवसायिकता के कारण आम तौर पर सोलह या सत्रह फुलस्केप साइज़ के पृष्ठों की कहानी ही छपती है. लम्बी कहानी नारा भी शायद इसी लिए शुरू हुआ. फिर लम्बी कहानी को लेकर सारिका ने काफी हाय तौबा भी मचाया, क्या लघुकथा के खिलाफ साजिश नहीं है ?लोग चुटकले छाप सकते हैं, रंग-व्यंग्य छाप सकते हैं लेकिन लघुकथाओं के साथ अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं का यह सौतेला व्यवहार गंभीर चिंता और खेद की वास्तु है.

गलत आरोपों की शिकार लघुकथाएँ

लघुकथा एक सुगठित विधा है. सामान्यत: यह पैनी, सीधी और कंडेंस्ड होती है. कुछ इतनी कि किसी एक क्षण को जीती लगे, घेरती लगे.शायद यह किसी फॉर्म की तलाश है. कितनी ही चीजों से लघुकथा को अलग होना पड़ा है. गुलिस्ता-बोस्ता की उद्देश्य परकता, नीति कथाओं का केन्द्रीयपन, गद्यगीत की भावुकता आदि आदि. इसीलिए संत्रास [श्री हर्ष ], मांस [हंसराज अरोड़ा], अलगाव [रूपकिशोर मिश्र], प्रतीक्षा [रमेश यादव], चेहरा दर चेहरा [कृष्ण कमलेश] में गजब की बेववता है. और ये लघुकथाएँ अपने में सधी हुई है. प्रतीक्षा में अस्वीकृत और बाद में अवसरवादी बनजाने वाले लेखकों से अधिक लेखकीय और प्रकाशकीय व्यवस्था पर तीव्र व्यंग्य है.

कहने वाले कुछ भी कह सकते हैं. यह भी कि अधिकांश लघुकथाएँ जो आज छपती है, बड़ी कथाओं का छोटा रूप है या ये छोटी कथाओं में तबदील हो सकती है. दोनों ही बातें यह प्रमाण देती हैं कि विधा की उस हैसियत तक ये कथाएँ नहीं पहुंची है. जब तक ट्रांसफर संभव न हो, लघुकथा हार जाती है.

ऐसे लोग जो बाल की खाल निकालने के आदी हैं उन्हें एंटीकरप्शन [मोहन राजेश], वह [शशि कमलेश], शक [राजकुमार कपूर], गिनती [श्याम नारायण बैजल]सिर दर्द का इलाज [विनोद प्रिय] आदि लघुकथाएँ पढ़नी चाहिए. जहाँ तक मैं जानती हूँ, कोई भी लघुकथा ऐसी नहीं है जो बड़ी कथा में तबदील नहीं की जा सके और कोई भी कहानी ऐसी नहीं जिसका लघुकथा में रूपायन संभव न हो.आरोप लगाने वाले कुछ भी आरोप लगा सकते हैं लेकिन कथाओं का रिवाज उनके इल्जामों से सवालिया कटघरे में नहीं आयगा.

गोष्ठियों के निष्कर्ष

मथुरा, भोपाल, पिंजोर, नसीराबाद, हैदराबाद, ग्वालियर, ब्यावर, आदि विभिन्न शहरों में लघुकथा के रचना औचित्य को लेकर विचार गोष्ठियां आयोजित की गई. गोष्ठियों में प्रायः सभी इस बात पर सहमत प्रतीत हुए कि लघुकथाएँ आधुनिक युगबोध को लेकर बड़ी ईमानदारी से चल रही है. संत्रास [श्री हर्ष ], जहाँ एक क्षेत्र, एक दायरे विशेष की मानसिकता उभारती है वहां भीड़ [ लक्षमेंद्र चोपड़ा] किसी दायरे में यकीन नहीं रखते. युगधर्म [लक्ष्मीकांत वैष्णव] बाहरी और भीतरी दोनों स्तर पर चलती है, स्थितियों और आक्रोश की उनमे बड़ी गहरी पकड़ है. संतोष, कृपा, दया [विष्णु सक्सेना] एक सूक्ति कथा या बोधकथा जैसी प्रतीत होती है लेकिन उसका रूपक विधान रेखांकन योग्य है. लघुकथा के लिए रूपक [एलीगेरी] आउट ऑफ़ डेट हो गया है या नहीं, यह कह सकना खतरे से खली नहीं है.क्योंकि समकालीन हिंदी कहानी के नाम पर भी रूपकों, प्रतीकों, बिम्बों के सहारे रचना तंत्र बुना गया है.

अन्य लघुकथाओं में : एक युवक सिफारिश, रिश्वतखोरी और अन्य स्थानीय मुद्दों से समझौता न करने के कारण ओवर एज हो जाता है [ओवर एज-आभा जोशी]. एक व्यक्ति जो फ़ौज में भारती होने जाता है उसे छाती के बदले पेट का माप पहले दिखाई देता है [पेट का माप-सुशी लेंदु]. एक व्यक्ति जो भीड़ भाड़ की समस्या से त्रस्त है महानगर बोध उसे आहत किए हुए है सडक पार करना चाहता है और सडक पार नहीं कर पाता [वह शशि कमलेश]. आदमी आज जानवरों से भी गया बीता है और उसकी लड़ाई गधों की लड़ाई से भी गई गुजारी है [गंदर्भ युद्ध- प्रताप अपराजित], ज्योतिष और हस्तरेखा का ढोंग करने वालों की कलई खुलती जा रही है [पामिस्ट- मोहन राजेश], लबादा ओढ़े हुए ईमानदारी भीतर से कितनी नंगी है [व्यक्तित्व-मधुप मगधशाही ].सामाजिकता के नाम पर बाराती कितना शोषण करते हैं [बाराती-श्रीकांत चौधरी], आदमी किसी की सहानुभूति का पात्र बनना नहीं चाहता [कछुए –भगीरथ] आदि ऐसी दर्जनों लघुकथाएँ हैं जो समाज के ऊपरी और भीतरी तौर पर चलने वाले कयास को ध्वनित करती है. [कांच का घेरा-अवधेश कुमार अमन ]इकाई के टूटने की ऐसी ही छन्न सी आवाज है.

प्रश्न-प्रतिप्रश्न

बहरहाल, लघुकथाएँ लिखी जा रही है और लिखी जाती रहेंगी. सिलसिला सदियों पुराना है लेकिन सिलसिले को देखने वाली आँख [आँखें] कुछ और साजिशों में लगी है. कुछ सवाल अनायास उभरते हैं क्या नई लिखी जानेवाली हर कथा बासी नहीं लगती है ? शायद फार्मूलाबाजी के कारण जो अब लघुकथाओं में भी आ गई है. यदि कोई रचनाकार लघुकथा के लिए ही विशुद्ध रूप से समर्पित रहे तो बात कुछ बन सकती है जैसे रावी लेकिन जो लोग हर विधा में अपनी टांगअड़ाए रखना चाहते हैं जैसे प्रभाकर माचवे वे लोग सामायिक लेखन का न तो सही प्रतिनिधित्व करते हैं और न कर सकते हैं. समय तो उस फ़िल्टर पेपर की तरह है जिसमें काम की चीज छन कर रह जाती है.

कुतिया / रमेश जैन

मैली चादर पर पड़ी सलवटें धुआँ खाई छत तक रही है. वह नि:शब्द कमरे के एक कोने में खड़ी बिस्तर देख रही है.शायद उसे बाहर से आते शोरगुल की तनिक भी चिन्ता नहीं है. पर वह अधिक देर तक वैसा नहीं कर पाई. बाहर का शोर तेजी से अन्दर घुसाने लगा. दोपहर बासी मुर्दे की तरह सड़ने लगी. बच्चे भी बाहर आपस में गाली गलौज करने लगे.

पिछले वर्ष इसी बिस्तर पर मरते समय उसके पति से कहा था कि वह उसके बच्चे को पढ़ा लिखाकर होशियार बनाएगी. पर कुछ दिनों से वह मुन्ने को होशियार बनाने के चक्कर में स्वयं असुरक्षित रहने लगी है . कभी वह तो कभी वह. अब तक पता नहीं किस किस को अपने शरीर पर चढ़ा चुकी है.

वक्त कोड़े लगाता रहा, वह खाती रही.

बिस्तर से ध्यान हटाकर वह सोचने लगी –जल्दी ही रुपयों की व्यवस्था न हो पाई तो मुन्ने को किसी अच्छे स्कूल में दाखिला नहीं मिल पाएगा. वह नहीं चाहती –मुन्नू इन गंदे बच्चों की सोहबत में किसी मामूली स्कूल में अपनी जिंदगी सड़ने दे.

वह दृढ निश्चय में खो गई.

उसने तय किया –वह शाम को रामू गाड़ीवान से मिलेगी. पन्द्रह बीस मिनट की तो बात है. फिर वह निश्चिन्त हो गई.

अंक आठजनवरी 1973 इसमें मात्र दो लघुकथाएँ हैं—कृष्णा अग्निहोत्री की ‘न्याय’ तथा श्रीहर्ष की ‘आदेश’। ‘रचना बोध’ स्तम्भ के अंतर्गत अन्य पत्रिकाओं के बारे में चर्चा प्रस्तुत की गयी है। अंक-8 की दोनों लघुकथाएँ निम्न प्रकार हैं:

न्याय / कृष्णा अग्निहोत्री

उसका पिता शहर का नामी वकील....वह एक योग्य होनहार, एम ए एल एल बी लड़का, पिता ने बेटे से स्वतन्त्र रहकर कार्य करने का अनुरोध किया, परन्तु वह शासक बनकर सबके साथ न्याय करने को आतुर था.

बुद्धिमान बेटे का चयन सिविल जज के लिए हुआ. वह बहुत अच्छे ढंग से कार्य करता रहा लेकिन नई पीढ़ी का महत्वाकांक्षी युवक और आगे बढ़ने लगा, भाग्य से आइ ए एस की लिखित परीक्षा में वह मेरिट लिस्ट में आ गया, इंटरव्यू कार्ड पाते ही पिता कि वे उसके लिए भागा दौड़ी करेंगे, बेटे को अपमान का अनुभव हुआ.

-नहीं पिताजी, चाहे मैं इंटरव्यू में किसी भी नंबर सिलेक्ट हूँ, आप यह सब मत करिए, जो लड़का मेरिट में है वह सिलेक्ट तो होगा ही.

इंटरव्यू संपन्न हुआ बुद्धू साथियों का सिलेक्शन हुआ,रोष एवं ताव में आकर लड़के ने सेन्ट्रल गवर्नमेंट को इंटरव्यू में हुए अन्याय के प्रतिरोध में एक आवेदन भेजा.

उन्होंने उसके विभाग को लिख कि फैसला करें, कुछ दिनों बाद न्याय विभाग से एक लिफाफा मिला कि तुम्हारी सेवाओं की अब शासन को आवश्यकता नहीं.

लड़के अब समझ में नहीं आ रहा था कि न्याय मांगने कहाँ जाए? .

आदेश / श्रीहर्ष

प्रधानमंत्री अपने शयन कक्ष में आदमकद शीशे के सामने खड़े होकर चहरे को पौंछ रहे थे और शीशे में ही किसी नए मुहावरे को खोज रहे हैं .रजत जयंती तक तो गाड़ी चल गई आगे क्या होगा? आराम हराम से लेकर गरीबी हटाओ समाजवाद लाओ तक की यात्रा में बहुत कुछ बना बिगाड़ा लेकिन अब कैसे चलेगा ? पसीने की बूँदें ललाट पर उभर आई-शीशा हंसने लगा ! एयर कंडीशन कमरे में भी पसीना ! शीशा ही बोलने लगा –मुहावरा झुनझुने की तरह जनता में बजता है और फिर अपनी आवाज खोकर जनता के सिर से टकराने लगता है, तब चरों ओर खलबली मचती है, एक के बाद एक परेशानी.

निजी सचिव का प्रवेश- सर ! फिर सब प्रान्तों में लोग एक साथ्मिलकर नारे लगाने लगे हैं-क्या सारी चलें उल्टी पड़ने लगी है ? ...यस सर ... चीजों के दाम .... ठीक है ...ठीक है, मैं अख़बार पढता हूँ, यह सब दिखावटी चीखना चिल्लाना है.देश का स्तर जब उठेगा, चीजों के दाम भी बढ़ेंगे, जिन्हें यह देश महंगा लगे वे किसी दूसरे देश में चले जाएं , कौन कहता है गरीबी नहीं मिट रही है ? मैं कल ही हवाई जहाज से गाँवों को देख रहा था मुझे छोटे छोटे बच्चों की आँखों में मुस्कान की चमक दिखाई दी.मुझे विश्वास हो गया कि देश से गरीबी मिट रही है.

दूसरा सचिव- कुछ संसद सदस्य देश की महंगाई के बाबत आपसे मिलाने आए हैं...—उन्हें कह दो कि अभी इस समस्या पर विचार करने का समय नहीं आया है, हमें अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं पर सोचना-विचारना चाहिए.

बाहर-जनता एक स्वर में चीजों के बढे दामों के प्रतिवाद में नारे लगा रही है, भीतर प्रधानमंत्री पांडिचेरी की माताजी द्वारा भेजे गए लाल फूलों को सिरहाने रखकर पलंग में धंस रहे हैं.उनके आदेशानुसार पुलिस गोली चला रही है.

अंक नौ। इस पर महीना अंकित नहीं है, मात्र 1973 अंकित है। यह अंक ‘नारी अंक’ था। इसमें प्रभा सिंह की ‘सत्याग्रही’कमलेश धवन की ‘चश्मा दर चश्मा’कृष्णा अग्निहोत्री की ‘मातम’ लघुकथाएँ थीं। इनके अलावा कृष्ण कुमार भट्ट पथिक की ‘अतिरिक्त विचार’ शीर्षक से एक सामान्य टिप्पणी प्रकाशित है।

यहाँ एक तथ्य की ओर सभी का ध्यान दिलाना जरूरी समझता हूँ। यह कि ‘कमलेश धवन’ जगदीश कश्यप का ही छद्म नाम है। बेशक, इस नाम की लड़की उनके परिचय में थी, लेकिन वह लेखिका नहीं थी। जगदीश ने प्रेम के वशीभूत हो उस नाम के साथ संयुक्त रूप से, सह-लेखक का प्रयोग करते हुए भी कुछ रचनाएँ लिखीं। बाद में, जैसा कि उस काल में होता ही था, झगड़ा हुआ। बात थाने तक पहुँची और उन्हें ‘सरस्वती पुत्र’ भी लिखनी पड़ी।

सत्याग्रही / प्रभासिंह

वे सत्याग्रह करने आई थी। भूखमरी, बेरोजगारी, पिछड़ापन दूर करने और शिक्षा व्यवस्था को नया मोड़ देने के लिए।

वे राजनीति नहीं समझती थीं फिर इन सारी समस्याओं से ग्रस्त थी। जाड़े की हड्डी कंपा देने वाली सर्द रातों के लिए, एक कम्बल तक उनके पास नहीं था। और शरीर पर चिथड़े ही चिथड़े थे।

दल की ओर से सत्याग्रह और फिर गिरफता्री में, महिलाओं का नाम आ जाने से सत्याग्रह का रिकार्ड कायम हो जाता। बस इसी आधार पर वे सत्याग्रही दल के नेताओं द्वारा फुसलाकर लाई गई थी।

तीन दिनों के निरंतर प्रयास के बाद भी वे जेल नहीं ले जाई गई तो नेताओं के लिए वे बेकार साबित होने लगी और वे लोग उन्हें टरका देने के उपाय सोचने लगे।

चौथे दिन दल के नेताओं ने सुबह में कार्यालय खाली पाया। वे चली गई थी पर कार्यकर्ताओं के धोती, लोटा और कुछ कम्बलों के साथ ही।

वे अपने अभियान में सफल रही थी, जबकि नेताओं का सत्याग्रह विफल गया था।

चश्मा दर चश्मा / कमलेश धवन

उसने पिता को बताया कि वह उससे प्रेम करती है और उसीसे विवाह करेगी. पिता उत्तेजित नहीं हुए उन्होंने उसे एक चश्मा दिया.

उस चश्मे से जब उसने अपने प्रेमी को देखा तो वह एक वहशी, गन्दा और नीच आदमी लग रहा था. अपनी माँ को गन्दी गन्दी गालियाँ देता हुआ पीट रहा था. बुढ़िया चिल्ला रही थी. वह लेखक के स्थान पर गुंडा था.

उसने घबरा कर चश्मा उतार दिया. जब उसने प्रेमी का दिया चश्मा लगाया –वह उसमें एक खानदानी महान लेखक व प्रतिष्ठित व्यक्ति को देख रही थी. जिसकी आगोश में उसने कितनी ही हसीं रातें बिताई थीं. चारों ओर रंगीनी थी-चांदनी रात और मौन प्रेमालाप में दोनों घंटों डूबे रहते.

उसने तत्काल ही पिता द्वारा दिया गया चश्मा जमीन पर दे मारा, जिसके छोटे छोटे कण उसकी अँखियाँ चुंधिया रहे थे.

मातम / कृष्णा अग्निहोत्री

मिनी बस की बीस-पच्चीस सीटें. लगभग चालीस सवारी. कुछ सीट मोढों पर और कुछ खड़ी हुई.

वे थे पांच, शीघ्रता से चढ़े. कुछ परेशान, त्रस्त और घबराए हुए.

हाय री बहना धक् से रह गई. भाभी बेचारी शादी के लिए पहनावा लेकर गई रही और रास्ते में हार्ट फेल हो गया.

हाथ में तार देखकर मैं तो सिटपिटा गई, छोटे-छोटे बच्चे, परीक्षा का समय और घर में काऊ नाहीं! जैसे-तैसे इन्तजाम करके आई हूँ. न जावे तोऊ बदनामी. एक ठो भाभी रही. वैसे अपन बहन की पहचान रही तो कीमती कपडे ले गई रहे, मोर तो बच्चों को एक कमीज का कपड़ा भी मुश्किल से देत रही.

यही बात तो कहने को आती है, कभी सुख में उसने नन्द समझकर याद नहीं किया. अब कहाँ तो मंदसौर और कहाँ बरहानपुर. सौ रुपये टूट जाएंगे! समझ लो पानी में गए.

हाँ री मरनेवाली ने जीते जी तो बांधकर रखा नहीं और मरकर भी कष्ट दे रही है जाड़े में.

बडवाहा आ रहा है, तुम लोग वहां उतरना. उनके साथ के आदमी ने कहा.

क्यों?

अरे अभी तो खण्डवा फिर बरहानपुर पूरे छ घंटे में पहुचेंगे. रातभर जगे हैं. वहां जाने से तो मातम करना ही पड़ेगा, यहीं डटकर नाश्ता पानी कर लो. जैसे-तैसे नींद की झपकी लेकर वहां के रोने धोने को ताकत जुटा लो.

‘अतिरक्त विचार’ / कृष्ण कुमार भट्ट पथिक

प्रिय भाई,

दिसंबर अंक. शशि कमलेश का लेख ऊपरी सतही बात कहता है. उपलब्धि के नाम कमलेश ने अपने लोगों के नाम ही गिनाए हैं. यह बात आम पाठक के लिए नासमझी की बात है कि लघुकथा की महत्ता बताने के लिए लम्बी कहानी को क्यों कोसा गया है? लघुकथा की रचना प्रक्रिया लेख से गायब है और लेख के उदाहरण बताते हैं कि लेखक केवल लघुकथा लिख रहा है. एक अच्छी बात यह है कि ‘अतिरिक्त’ लघुकथा को समर्पित है और उसके पिछले अंक प्रमाण हैं कि ‘अतिरिक्त’ की लघुकथाएँ नपुंसक नहीं है. आदमी के चेहरे के आसपास घूमती है. यह तो आपके भावी प्रयास ही बताएँगे कि ‘अतिरिक्त’ आज के आदमी को कितना पकड़ सका है, हाँ, ‘अतिरिक्त’ कुछ करने का आश्वासन जरुर दे रहा है.

अंक दस  महीना  इस पर भी अंकित नहीं। वर्ष 1973। इसमें अनूप कुमार जैन की ‘समाजवाद का मुखौटा’मधुप मगधशाही की ‘सॉरी’ और जगदीश किंजल्क की ‘नियुक्ति’ लघुकथाएँ प्रकाशित हैं। 

समाजवाद का मुखौटा –अनूपकुमार जैन

जनप्रिय नेता विशाल जनसमूह के आगे आह्वान कर रहा था—भाइयों हमें समाजवाद लाना है और उसके लिए सभी को तैयार रहना है. अब कोई भूखा नहीं रहेगा –सबको रोटी, कपडा, मकान मिलेगा. जिनके पास फालतू पैसा है, उससे छीनकर जरूरतमंद लोगों में बांटा जायगा. इस पर तालियों की गडगडाहट हुई.

सुना नहीं, मैंने कहा बाहर निकल जाओ,सुबह सुबह आ जाते हैं साले.’ मैं ठिठक गया. जनप्रिय नेता लॉन में टहल रहा था. उस आदमी की गोद में कुम्हलाया बच्चा आतंकित सा इधर-उधर देख रहा था. सेठजी, मेरी बीबी की हालत खराब है, दवा दारू के लिए पच्चीस रुपये और दे दो.

हूँ’ एक तो चार दिन से काम पर नहीं आ रहा है और उल्टा तुझे पच्चीस और दूँ. पचास रुपये महीना लेता है और अब तक सत्तर रुपये ले चुका है. जाओ मैंने दूसरा नौकर रख लिया है. मेरे जितने रुपये निकलते हैं,जाओ माफ़ किए.

सेठजी, मेरी गरीबी का ख्याल करके ऐसा जुल्म न ढाओ और फूट-फूट कर रोने लगा.

हूँ’ गरीबी मिटने का ठेका मैंने ही लिया है क्या? देश में और लोग मर गए. अपने नेताओं के पास जाओ जो गरीबी मिटा रहे हैं, मांगो उन्हीं से पैसा. भाइयों, फालतू पैसा जरूरतमंद लोगों में बांटा जायेगा आदि शब्द मेरे कानों में पिघले शीशे की तरह खौलने लगे.

सॉरी –‘मधुप’ मगधशाही

गोया क़यामत के बाद उसका नंबर आया, ‘मे आई कम इन सर’ उसने [आया राम –गया राम] पल्ले के बाहर खड़े होकर कहा.

कम इन’ भीतर से आवाज आई. वह अन्दर आ गया. सामने लम्बी सी मेज के पीछे दबे आदमी ने उल्लू की तरह आँखे मिचमिचाकर पूछा- नाम ? ‘जी, गौतम.’कुछ पढ़े लिखे ?’ ‘जी, मैं ग्रेजुएट हूँ.’तो आप जा सकते हैं,’ और कुर्सी पर के आदमी की नजर उसके सिर से ऊपर फोकस लाईट की तरह उठ गई.

मगर मैं तो नौकरी के लिए...’’ उसने फोकस को अपनी सीध में उतारने की गरज से कहा.

ठीक है, लेकिन हमें लेबर के लिए मामूली पढ़े लिखे या अपढ़ आदमी की जरूरत है; ग्रेजुएट की नहीं.

उसने साहस से काम लिया, कहा, ‘क्लेरिकल जॉब भी कहाँ मिलता है सर! उधर तो सारी सीटें पहले ही से भरी है, इधर भी नहीं मिला तो ...’

मज़बूरी है.’ उस व्यक्ति ने सहानुभूति में चेहरे को सिकोड़ लिया , ‘एक ग्रेजुएट लेबर का काम करे, यह अपमान होगा मुझको पसंद नहीं. सॉरी

उसने सोचा –सामनेवाले ने साफ-साफ यह नहीं कहा कि एक ग्रेजुएट से लेबर का काम होगा नहीं. वह लौट पड़ा.

नियुक्ति – जगदीश किंजल्क

सरकार ने तीन सदस्यों की एक इंटरव्यू कमिटी नियुक्त की. कमेटी ने चार सौ उम्मीदवारों का साक्षात्कार लिया. कुल सोलह स्थान भरे जाने थे. साक्षात्कार के मध्य एक एम् ए बी एड लड़की आई और साक्षात्कार देकर चली गई.

बड़ी इंटेलीजेंट लड़की है.’ खन्ना ने आँखे मटकाकर कहा.

माना लड़की इंटेलिजेंट है. इस पद के लिए सर्वथा उपयुक्त है पर कैंडिडेट किसकी है?’ तिवारीजी ने गंभीरता से पूछा,पर उनका प्रश्न अनुत्तरित रहा.

किसी मंत्री का फोन है इसके लिए? चड्ढा ने उत्सुकता से पूछा. तिवारी ने कमिटी के हेड के नाते सिर हिला दिया.

थैली वाली भी नहीं यह?’ खन्ना के चेहरे पर आशा की लहरें दौड़ रही थीं.

नहीं यार, यह मात्र कैंडिडेट है.’ तिवारी जी ने उदास होकर कहा. इस पर चड्ढा ने घूरते हुए कहा, ‘तब क्या राय है इसके बारे में?’

ख़ामोशी में कुछ पल बीते पर तभी खन्ना ने कमेन्ट किया, ‘हटाओ यार जाने दो. ऐसे सूटेबल कैंडिडेट तो न जाने कितने मिलेंगे. पर हम किस किस को लेंगे? फिर इसके लिए तो...’

इस बीच तिवारी जी ने आवाज लगा दी, ‘नेक्स्ट कैंडिडेट.’

 अंक ग्यारह  पर भी महीना  अंकित नहीं। अनुमानत: माना जा सकता है कि यह नवम्बर माह रहा होगा। वर्ष 1973  में प्रकाशित इस अंक में धनराज चौधरी की  ‘आधुनिक’बलराम ‘रवि रश्मि’ [बलराम अग्रवाल पहले इसी नाम से लिखते थे—भगीरथ की टिप्पणी] की ‘अपने पाँव’, कृष्ण कमलेश की ‘अपरिभाषित’ लघुकथाएँ प्रकाशित हैं। अंत में नौवें अंक की लघुकथाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए मधुप मगधशाही और हंसराज अरोड़ा के पत्रांश छपे हैं।

आधुनिक –धनराज चौधरी

द्युमत्सेन पुत्र सत्यवान क्लब से थका हारा रात बारह बजे घर पहुँचता है. पीक थूक, ताला खोल, सुवेगा अन्दर ली. अश्वपति पुत्री सावित्री निद्रामग्न है. वह पास आ प्यार से पुकारता है, ‘सावित्री!’ सुप्त पत्नी अविचलित रहती है. सर्द हाथ प्यार से सावित्री के चेहरे पर फेरता है. निद्रा में विघ्न पड़ने पर नेत्र बंद किए ही वह गुस्से में पूछती है, ‘क्या है?’

खाना डालो प्रिये!’ सत्यवान के स्वर में मिठास है. पर वह अनसुना कर देती है. अपमान सा महसूस करते हुए वह दोहराता है, ‘खाना लगाओ भई!’मुझे नींद आ रही है, खुद ही ले लो.’ और रजाई मुंह पर खींच लेती है. लाचार सत्यवान मुड़ते हुए बडबडाता है, ‘कलयुग तेरी दुहाई! यह जन्म-जन्म की साथिन कथित पतिव्रता, मेरे लिए आरामदेह रजाई तक नहीं छोड़ सकती. क्या आशा करूँ क्लब में कट करते समय शापवश यदि मृत्यु हो जाय तो मेरी प्राण भिक्षा के लिए यमराज का पीछा करेगी.’

अपने पाँव- बलराम ‘रवि रश्मि’

दो साल पहले ही डायरी में लिखा था आत्म सम्मान की रक्षा के लिए मैं सब कुछ बलि चढ़ा दूंगा. उन दिनों पिता के हाथ मेरे आधार थे.

कुछ दिनों पूर्व अपने पांवों पर खड़ा होना निश्चित किया. सर्विस के लिए अनचाही पटरियों के समानांतर दौड़ना पड़ा. सम्मान समाप्त! अनजाने लोगों के सामने याचनाएं की आत्म सम्मान समाप्त!! सभी समझाते- भई सर्विस में सभी का भला बुरा सुनना पड़ता है.

जी, मैं स्वीकारता.

सोर्स लगाकर एब्जोर्ब हो जाना आसान है-काम करना नहीं, फाइल को ट्रे में पटक कर बॉस कहता है- यह ऑफिस है बाप का घर नहीं.

‘......’ मैं सॉरी भी नहीं कह पाता हूँ.

गेट आउट!’ तुरंत आज्ञा पालन करता हूँ. अपने पांवों की बजाय पिता के हाथों पर खड़ा होता –तो अभी इसकी मक्खी झाडे देता.

अपरिभाषित –कृष्ण कमलेश

सुखी दाम्पत्य जीवन को परिभाषित करना इतना आसान होता तो वह बड़े मजे में कह देता ......वह सुखी है, क्योंकि ....

लेकिन वह दुखी भी नहीं था. क्या नहीं था उसके पास, दहेज़ में मिली नई कार, पुश्तैनी बंगला, नौकर-चाकर, दोस्तों के बेफिक्र ठहाके ....क्लबों की रंगीनियां.

वह इस सब में सरोबार डूब चुका था. इन सारी रंगीनियों में ....लेकिन..... ! कुछ था ऐसा, जो कभी भी कचोट जाता उसे. पीने को बढ़िया शराब और पिलाने को नाजनीन साकी. शराब उसे अब खुमार नहीं देती –महज एक आदत या जरुरत जो भी कह लें.

जिस्म बदलते हैं, बिस्तरों पर बिछानेवाली चादरों की तरह. कोई हम बिस्तर उसे स्वर्गीय सुख नहीं देता.

बदले बैडशीट, बदले हम बिस्तर. बदले सन्दर्भों में वही ऊब पाए. लड़की ठंडी हो या गर्म उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. लड़की चाहे पेशेवर हो या ठेठ गृहस्तिन...

-और उसे लगता कोठे की औरत और कोठी की औरत में कोई फर्क नहीं है.

अतिरिक्त विचार

अंक -९ की तीनों ही लघुकथाएँ काफी सुन्दर है, सत्याग्रही [प्रभा सिंह] भीतर के नंगेपन को बड़े चमत्कारी ढंग से सामने लाती है. ’चश्मा-दर-चश्मा [कमलेश धवन] बदलते हुए विचार-मान्यताओं का सबूत है और मातम [कृष्णा अग्निहोत्री] खोखली परम्पराओं के बीच हमारी सही स्थिति [तस्वीर] . –‘मधुप’ मगधशाही

जहाँ प्रभासिंह ने आज के सत्याग्रह कर्ताओं के असल विवेक तथा नेताओं की तिकड़म को जाहिर किया वहीँ उन्होंने आन्दोलन को असफल भी करवा दिया जबकि आमतौर पर ऐसा होता नहीं. कुमारी कमलेश धवन को चाहिए कि वे न तो पिता का न प्रेमी का वरना अपना चश्मा ही व्यवहार करें कृष्णा जी ने आज के रिसते संबंधों को उभरा है. -हंसराज अरोड़ा

 अंक बारह  महीना इस पर भी अंकित नहीं है। 1973 में प्रकाशित इस अंक को ‘बंगला मिनी गल्प अंक’ कहा गया है। इसमें रमानाथ राय की ‘जगह’शिवशंकर दत्त की ‘समय’ और आशापूर्णा देवी की ‘रिस्क’ रचनाएँ प्रकाशित हैं।

अतिरिक्त [लघुकथा से प्रतिबद्ध] 

बंगला मिनी गल्प- एक परिचय 

महानगर बोध को लिए इस बार तीन बंगला लघुकथाएँ. ‘अतिरिक्त’ के लिए इन कथाओं का अनुवाद सुपरिचित कवी कार्तिकनाथ गौरीनाथ ठाकुर ने. 

जगह- रमानाथ राय 

बस रुकते न रुकते दस आदमी  घुसे. तेरह आदमी भी हो सकते हैं. उसके बाद एक लड़की ने ज्योंही चढ़ने की कोशिश की, बस स्टार्ट हो गई  

-भीतर जाइये. अन्दर गया.

-पाँव हटाइये. पांव हटाया.

-हाथ हटाइये. हाथ हटाया.

-घूमकर खड़ा रहिए. घूम कर खड़ा हुआ.

-सीधा होकर रहें. सीधा होकर खड़ा हुआ.

-किसी को कहीं धक्का लगा. आँख नहीं है क्या?

डंडा पकड़कर खड़ा रहा. पीछे से किसी ने ठेल दिया. झुकाते ही सामने से किसी ने धक्का दे मारा. इसके बाद संभल कर खड़ा होते ही एक आदमी ने बायीं ओर से धक्का दिया. साथ ही साथ और एक आदमी ने दायीं ओर से धक्का दिया. मेरा पांव किसी के पैर पर पड़ा.

-ओह! देखकर खड़ा रहें.

देखकर खड़ा होते ही और एक आदमी के पांव के ऊपर लात पड गई. असभ्य.

फिर पांव रखे जाने पर किसी की देह पर पांव लग गया.

-पक्का पूरा जानवर है तो ! 

फिर पांव रखने की जगह खोजने लगा.

-हुआ क्या आपको?

-बस से उतार दें इन्हें. एकदम देहाती है.

-ये सारे लोग क्यों जो.....

खूब बिगड़ गया. डंडे से हाथ हटा लिया. इच्छा हुई घूंसा मारू. हाथ अटक गए. इच्छा हुई लाठी मारूं. पांव फंस गए. इच्छा हुई....इच्छा हुई...फिर दुरस्त होकर खड़ा होने की कोशिश की. 

किन्तु दोनों पांव कहाँ रखूँगा? हाथ दोनों ?

[मिनी पत्रिका ‘बिंदु’ अप्रेल 70 ]        

समय- शिवशंकर दत्त 

दो बजे दोपहर में मेरा इंटरव्यू था. नौकरी की गारंटी. निकल पड़ा रास्ते में. काठ फोड़ धूप, जलती-भुनती दोपहर. घडी की बेल्ट का रिंग टूट गया. झुंझला गया मन. पास ही जूते का मोची. दीवार से उठंग कर ऊंघ रहा है. देखकर ही गुस्से से दहक उठा. पुकारा, इस रिंग को देखो तो. वह आँख मूंदे ही बोला-यह झंझट झमेले का काम है, सवा रूपया लगेगा.

सवा रूपया क्यों जो इच्छा हो ले लो, मगर झटपट कर डालो, देर हो रही है.

ऍन वक्त उसके नाम टेलीग्राम आया. वह बोला, ‘बाबू पढ़ दीजिए तो. मैंने पढ़ कर कहा, ‘तुम घर जाओ तुम्हारी बहू –

बात छीन कर वह बोला, ‘बची हुई तो है? मैंने घडी हाथ में लेकर हंसते हुए कहा, ‘बर्खुरदार बचा लिया. कितना लोगे? वह रोनी सी सूरत बनाकर घडी की सुई की तरफ ताकता हुआ बोला, ‘ओह, सत्यानाश, अब ट्रेन और मिलेगी नहीं-जो इच्छा हो दीजिए. जल्दी कीजिए देर हो रही है. [मिनी एक्स अप्रेल 70 से ]

   रिस्क- आशापूर्णा देवी 

‘टूर में जाने के समय बहू की रखवाली करने का भार दोस्त पर देकर जा रहे हो तुम? उस पर भी बैचलर दोस्त,’ 

जमाई बाबू हा-हा कर हंसने लगे,

‘यह तो देख रहा हूँ कि बिल्ली को मछली अघोरने के लिए रख छोड़ना.’

‘बात क्या बेहद सटीक नहीं हुई जमाई बाबू?

‘दुनिया भी तो अव्वल सभ्य नहीं हुई है, भाई. क्या आपकी ऐसी ही धारणा है कि इन सात दिनों के दरम्यान मेरा दोस्त मेरी औरत को लेकर भाग जाएगा ?’

‘भागकर हो सकता है, नहीं जाएगा –

जमाई बाबू ने बुजुर्गों जैसी हंसी हंसी, स्त्रियाँ तुरंत ही पैर के नीचे की जमीन नहीं छोड़ती है. लेकिन मन के फिसलने में कितने क्षण लगेंगे? जमाई बाबू जोर-जोर से हंसने लगे.

‘तो मन का.’  निखिल सेन भी जोर-जोर से हंसने लगे.’ जो मन सात दिनों के सुयोग में ही भाग जा सकता है, उस मन के रहने पर ही क्या और चले जाने पर ही क्या?’

‘बात ही बात में तो कहा जाता है, घी और आग की रिस्क लेने की जरुरत ही क्यों, बाबा?’

‘निश्चय ही, पहले तो सोचा नहीं –अभी सोचता हूँ वैसा ही यदि हो; क्योंकि आवश्यकता खूब तीव्र और प्रबल हो सकती है.’

[‘उस पार से ]

भगीरथ जी ने अनुसार—‘इसके बाद वह ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ संकलन की तैयारी में लग गये थे। वह कहते हैं, कि—बाद में ‘अतिरिक्त’ के जो अंक छपे, वे कविता को लेकर थे।’ उनके अनुसार—‘लघुकथा को लेकर ‘अतिरिक्त’ की इतनी-सी गाथा है।’ लेकिन हम जानते हैं कि लघुकथा को लेकर ‘अतिरिक्त’ की यह  गाथा ‘इतनी-सी’ न होकर ‘बहुत-बड़ी’ है, अपने आप में एक इतिहास है।

संपर्क : एम-70, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032 / मोबाइल:8826499115

शनिवार, 20 मार्च 2021

समकालीन लघुकथा और ‘अतिरिक्त’ के अंक-1 / बलराम अग्रवाल

भाई भगीरथ के सौजन्य से ‘अतिरिक्त’ के अंक चार से अंक बारह तक की स्कैंड प्रतियाँ  मेल पर मिली हैं। उनका आभार। उनके अनुसार—‘अतिरिक्त का पहला अंक जनवरी 1972 में प्रकाशित हुआ था।’

उन्होंने प्रथम तीन अंकों की स्कैंड प्रतियाँ क्यों नहीं भेजीं? यह प्रश्न मन में उत्पन्न होना स्वाभाविक था। मैंने अपनी लाइब्रेरी खखोड़ी। ‘अतिरिक्त’ के पहले अंक की एक फोटोप्रति डॉ॰ शकुन्तला किरण के पुस्तक संग्रह से मुझे मिली थी। उक्त अंक में रमेश (यह निश्चित ही रमेश जैन रहे होंगे जो ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ में भी भगीरथ जी के सहयोगी थे), रघुवीर, हेमंत और भगीरथ की कविताएँ थीं। आकार की दृष्टि से उक्त कविताओं को ‘क्षणिकाएँ’ भी कहा जा सकता है।

भगीरथ जी के अनुसार—‘अंक दो मार्च 1972 में व अंक तीन अप्रैल 1972 में छपा।’ उनका स्पष्ट कहना है कि ‘प्रारंभिक अंकों में लघुकथा को लेकर कोई खास सामग्री नहीं थी।’

अतिरिक्त के अंक 2 की फोटोप्रति भी डॉ॰ शकुन्तला किरण के संग्रह से मिल चुकी थी। उक्त अंक भी कविता-केन्द्रित ही था। कोई अन्य सामग्री उसमें नहीं है। उक्त अंक में जगदीश मंडलोई, गिरीश, गोविंद गौड़, रमेश, ओमप्रकाश चतुर्वेदी, रघुवीर बिन्द्रा तथा वी॰ रमा की एक अंग्रेजी कविता का भगीरथ द्वारा हिन्दी अनुवाद प्रकाशित है।

अंक 3 की प्रति न तो भगीरथ जी से मिल पाई, न शकुन्तला जी से। अनुमान है कि वह अंक भी कविता-केन्द्रित ही रहा होगा अथवा कविता-बहुल अंक। इसलिए यह कहना कि (अंक 4 से पहले के) प्रारम्भिक अंकों में लघुकथा को लेकर कोई खास सामग्री नहीं थी, गलत है। उन्हें स्वीकारना चाहिए कि प्रथम तीन अंकों में वस्तुत: लघुकथा को लेकर कोई सामग्री थी ही नहीं।

‘अंक चार,’ जैसाकि भगीरथ जी ने लिखा है—‘मई 1972 में आया। उसमें भगीरथ की ‘एक भयानक ख़ामोशी’ और ‘कछुए’अंसार अनंग  की निरोधरमेश जैन की जंतुप्रोटोन इलेक्ट्रोन न्यूट्रोन  लघुकथाएँ छपी थीं।’   बेशक, आज भगीरथ जी ने इन्हें ‘लघुकथा’ कहा है, लेकिन उनके द्वारा उपलब्ध कराई गई फोटोप्रति में पत्रिका के मुखपृष्ठ पर ‘लघुकथा मासिक’ के स्थान पर ‘लघु कहानी मासिक’ छपा है। 25-5-1972 को रावटभाटा से छपे इस अंक में उसके पाठ पर, जिसे ‘सम्पादकीय’ भी कहा जा सकता है, एक नजर डालिए—

‘प्रिय भाई,

प्रत्येक विचारशील व्यक्ति वर्तमान समय में विचारों की भीड़ से कुछ शब्द चाहता है जो उसे थोड़े समय में काफी-कुछ दे सकें।

वर्तमान तेवर का लघु कहानी के माध्यम से अभिव्यक्तिकरण ‘अतिरिक्त’ का उद्देश्य है। कहानी 750 शब्दों से अधिक न हो तथा स्पष्ट लिखी हो।’

इस नयी घोषणा के साथ अंक 4 ‘अतिरिक्त’ का सम्भवत: पहला अंक था। इस अंक में ‘अतिरिक्त’ के प्रकाशन एवं सम्पादन जुड़े लोग ‘लघु कहानी’ के ही समर्थक थे; नव्य विधा के रूप में उन्हें ‘लघुकथा’ की जानकारी रही अवश्य होगी, लेकिन उसकी स्वीकृति का स्पष्ट प्रमाण इस अंक तक नहीं मिलता है। फिर भी, इसमें प्रकाशित रचनाओं को ‘लघुकथा’ की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसमें प्रकाशित रचनाएँ निम्नप्रकार थीं:

एक भयानक ख़ामोशी / भगीरथ

दवाई खरीदने मुझे गाँव से कसबे जाना पड़ा। रास्ते में दो गाँव पड़ते हैं। इन गाँवों में अधिकतर नीची जाति के लोग ही रहते हैं। जिन्हें गाँव में भी शिड्यूल कास्ट कहते हैं। ऊंची जाति के घर हैं लेकिन बहुत ही कम। उनका प्रभुत्व आज भी पुजारी [मठाधीश ब्राह्मण] जमींदार व बनिए के रूप में जरुरत से ज्यादा है। उनकी यह ज्यादती निचे तबकेवालों के लिए सिर्फ अनादर और अपमानपूर्ण जिंदगी के अतिरिक्त कुछ नहीं देती। वे भी गोबर कर के कीड़ों की तरह सड़ते बास मारते वातावरण को अपने बिल्कुल अनुकूल पाते हैं- सरकारी जोंकें उस वातावरण में शोषण की प्रक्रिया दृढ करती हैं।

मैंने साइकिल से अभी एक गाँव ही पार किया था कि अँधेरा हो गया। पगडण्डी पर साइकिल तेजी से भाग रही है। इतनी तो पी डब्लू डी की सड़कों पर नहीं भागती। जमीन समतल और कड़क थी। अँधेरा वह भी सुनसान बियावान का- भय अवश्य लगता है।साइकिल और तेज करता हूँ शरीर पसीने पसीने हो जाता है। दिनभर की गर्माहट अभी तक वातावरण में फैली हुई थी। मैं बिल्कुल हांफ जाता हूँ।मैं अतिशीघ्र अगले गाँव तक पहुँचना चाहता हूँ। वहां सुस्ताकर प्यास बुझा सकूँ।

मैं बिल्कुल गाँव के पास पहुँच जाता हूँ। दो-तीन नीम के पेड़ों के नीचे जाजम पर बैठे कुछ लोग पंचायती कर रहे थे। अवश्य कोई सामाजिक मसला रहा होगा। कुछ बूढों को उत्तेजक अवस्था में देख रहा था। शायद पंचों का किसी ने परोक्ष अथवा अपरोक्ष विरोध किया होगा। मुझे इन सबसे इसलिए मतलब नहीं है कि इस समय बहुत प्यास लग रही है। मैं केवल पानी पीना चाहता हूँ।

उन तीन पेड़ों में से एक पेड़ के सहारे दो-एक मटके रखे हुए थे। मैंने वहां पहुंचकर एक व्यक्ति से पानी पिलाने का आग्रह किया।उसने मेरी तरफ देखकर कुछ अनुमान लगाया फिर बोला –‘थे कूण हाक में हो।’ ‘म्हू बामण हूँ।’ मैं बोला पर मुझे तकलीफ हुई। वह स्तब्ध सा हाथ में लोटा उठाए रहा। न मटके का ढक्कन खोला- न लोटा भरा न पानी पिलाया। ‘म्हें लोग मेगावर हौ, बामणों ने पोणी पावे नै कांई नरक में जाणों है। उसने नरक और पाप के भय से पानी नहीं पिलाया। मैं झुंझला उठा। मुझे इस समय पानी से मतलब है –चमार भंगी से नहीं। मैं कहना चाहता हूँ –प्रिय भाई यह सब दकियानूसी परम्पराएं है हम सब बराबर है। यह भेदभाव स्वार्थों का मुखौटा है। प्रजातंत्र और समाजवाद पर एक लेक्चर झाड़ने की इच्छा तीव्र हुई। किन्तु प्यास और इच्छा के बावजूद बिना बोले वहां से चल दिया। गला इतना सूख चुका था कि मुझे तकलीफ होने लगी। रात के सन्नाटे में अवाले [जानवरों के पानी पीने का हौद] पर जाकर प्यास बुझाई–चोरों की तरह। सन-सन की आवाज से हवा चल रही थी। पेड़ चन्द्रमा की परछाईं में विभिन्न आकारों में भूत-प्रेत की तरह लग रहे थे। एक भयानक ख़ामोशी मुझे अपने में लपेटने को आतुर थी।पांव तेजी से ऊपर-नीचे आ जा रहे थे।

[नोट:भगीरथ जी के अनुसार, कुछ परिवर्तन के साथ 'ख़ामोशी' शीर्षक से यह रचना उनके पहले लघुकथा संग्रह 'पेट सबके हैं' (1996) में छपी]

कछुए / भगीरथ

संबधो का सौंदर्य सामाजिकता एवं नैतिकता पर निर्भर करता है, लेकिन उनकी ठोस नींव आर्थिक आधारों पर टिकी होती है। यह एहसास अनुभव के आधार पर परिपक्व होता गया । स्वार्थो को नैतिकता का जामा पहनाकर मुझ पर ओढा दिया गया था। मैं उस लबादे से मुक्ति चाहता था। मगर वह मुझे और दबोच लेता ।

संबधों के निर्वाह में , सामाजिक जिम्मेदारियों और नेतिक मान्यताओं को ढोने में मेरी समस्त शक्ति खप जाती है , फिर भी संबधों के फोडे रिसने लगे, क्योंकि अर्थोपार्जन की मेरी अपनी सीमाएं थी और उनकी आकांक्षाएं सीमाहीन।

मैनें कछुए की तरह अपने पॉंव अंदर समेटने आरम्भ कर दिए। चारों तरफ चारदीवारी , जिसकी खिडकियॉं भी नहीं खुलती थी। नितांत एकाकी जीवन ! एकाकीपन की ऊब । झुंझलाहट । क्रोध की एक तीव्र अनुभूति , जो केवल लिखे हुए कागज फाड ने तक सीमित है।

सुनसान सडक पर रात गए घूमना। चौकन्ना बना देखा करता हूँ कि कहीं लोगों की ऑंखे मुझ पर न टिकी हों। लोग यह न समझें कि मैं अकेला हू।, रात में भटके जल पक्षी की तरह बेचारा!

मैं लोगों की सहानुभूति का पात्र नहीं बनना चाहता। मैं हमेशा डरा करता हॅं कि कहीं कोई सहृदय (?) व्यक्ति मेरे पास पहुचंकर मेरे अंतरतम को छू न ले, क्योंकि मैं रोना नहीं चाहता।

निरोध /अंसार अनंग

आज रामूजी को नहलाया गया है।उनके कपडे बदल दिए गए हैं। हर माह यही होता है ठीक पांचवीं तारीख पर। रामूजी जो कभी राम बाबू रह चुके हैं सब कुछ स्वीकार सा कर लेते हैं। वैसे उनके स्वीकार-अस्वीकार का अब अर्थ भी क्या रह गया है। उन्होंने कई बार सोचा –वे क्यों है? किन्तु इसका उत्तर उन्हें कभी नहीं मिल पाया। उन्होंने उत्तरहीनता को ही उत्तर की तरह स्वीकार कर अथवा प्रश्नोत्तर की उलझन से बचने के लिए इस विषय पर सोचना बंद कर दिया है। किसे मालूम –वे ही जीते हैं या एक आकार उन्हें जीता है। जिसके विषय में कहा जाता है-वे रामबाबू हैं। वे इसे भी चुपचाप मान लेते हैं।

आज वे जिला कोषालय जाएँगे नहीं।सच तो यह है-वे आज ट्रेजरी ले जाए जाएँगे आज पांच तारीख जो है। पेंशन प्राप्ति की नियत तिथि। पहले वे पहली से चक्कर काटा करते थे।किन्तु जब से पेंशन बाबू ने उन्हें झिड़का, समझाया –तब से उन्होंने हर माह की पांचवीं को प्राप्ति का निश्चित दिन मान लिया है।

अभी कल ही सत्तू ने कितने प्यार से उन्हें समझाया था- अब तो जूते बदल ही डालो व ढंग के कपडे भी आ जाय तो क्या हर्ज है, पर वे जानते हैं कपडे और जूते भूमिका है-पेंशन प्राप्ति का वातावरण बनाने की आज सत्तू ने उन्हें नए चमरौंधे पहना दिए,प्रकाश कैसी उत्कंठता से उनकी जरूरतें पूछ रहा है, लगता है नियमित ही ऐसा होता है बिलकुल बनावटीपन नहीं लगता। चार बजे वे पेंशन प्राप्त करेंगे, तांगे से उन्हें घर लौटाया जायगा। पुनः वाही, वे पानी के लिए बार बार चीखकर कहेंगे तब कहीं कसैला मुंह बनाता प्रकाश उन्हें पानी का गिलास देगा।

प्रकाश जैसा बच्चा भी उन्हें आज के बाद महत्वहीन समझता है।वे हिल उठाते हैं।उनकी आँखें बंद हो जाती हैं, कहीं पढ़ी कविता का भाव उनमें गूँजता है।सम्बन्ध और निरोध दोनों उपयोग के पश्चात् भुला दिए जाते हैं। उन्हें लगता है वे निरोध है।

जंतु / रमेश जैन

अंतराल बाद स्थिति बोध हुआ तो जीवन को अद्भुत जंतु की तरह घनेरे जंगल की गहरी खाई में फंसा पाया।

नरभक्षी समझने की प्रवृति का शिकार बन जिस उबड़-खाबड़ रास्ते पर चल रहा हूँ—न तो खतरे से खाली है—न निश्चित।

तीखे नाखूनों से शरीर खुजलाता—जख्म गहराता अनिश्चित क्षेत्रफल को प्रभावग्रस्त करता रहा।

जिस खाज को दूर करना था-चलती- रुकती रही-पर जख्म जो धीरे-धीरे सेप्टिक बनता जा रहा है—नहीं सहा जाता।

मुंह से रिसते रक्त को पंजे से पौंछता व संचित द्रव को विषाक्त बनाता अनचाही व्यथा में घुल रहा हूँ।

पता नहीं—पतझड़ से और पत्ते हैं भी या नहीं ?

खुजली का भ्रम देकर खटमल की तरह रेंगता किसी के जीवन में जहर घोल रहा हूँ व सारा शरीर नीला बना रहा हूँ।

दोषारोपण के बावजूद सारा दोष हितैषी अथवा सुरक्षा कवच बनकर किसी अन्य प्रभाव ग्रस्त जंतु के मत्थे मढ़ रहा हूँ।

टर्र टर्र करते मेंढक, हू हू करते सियार, चिकी मिकी बोलते झींगुर झिंगुर, प्रकश का भ्रम देते जुगनु के बीच एक आवाज बनकर चीख रहा हूँ।

नीचे बहुत नीचे–सुख की तलाश करता व दुःख प्रजन्य बियावान में भटकता मकड़ी के जले की तरह वातावरण से घिरा अब तक जीवित हूँ।

प्रोटोन-इलेक्ट्रोन-न्युट्रोन / रमेश जैन

प्रोटोन- रेलगाड़ी चल रही है।शरीर-शरीर में घर्षण है। विक्षिप्त-सा अपने स्थान पर खड़ा हूँ। विद्याणु का प्रहार मुझे आतंकित कर रहा है। मई क्लिवाणु की तरह क्रिया में रत हूँ।

इलेक्ट्रोन- रेलगाड़ी चल रही है। अजीब हलचल मच रही है।नेपथ्य का प्रभाव गुरुत्वाकर्षण की तरह चुम्बकीय बना रहा है। प्रतिक्रियाहीन अवहेलना कर चुपचाप स्थिति भोग रही हूँ।

न्युट्रोन- रेलगाड़ी चल रही है। लहरें आलिंगन में दूब रही है-उफ़ ! कभी मैं भी किनारा था।

भगीरथ जी के अनुसार—‘अंक पाँच अगस्त 1972 में प्रकाशित हुआ।’ देखने पर पता चलता है कि ‘अतिरिक्त’ का यह पहला अंक है जिसमें ‘लघुकथा’ शब्द का स्पष्ट दृष्टि के साथ समावेश हुआ। श्री त्रिलोकीनाथ ब्रजवाल की टिप्पणी ‘अतिरिक्त विचार’ के साथ उक्त अंक में निम्न  लघुकथाएँ  प्रकाशित हुई—सुदर्शी के॰ सोंधी की ‘चीख’कीर्ति कुमार पंड्या की ‘कीचड़ की मछली’शशि कमलेश की ‘निष्कृति’, एल आर कुमावत की ‘तलाश’, सुशीलेंदु की ‘पेट का माप’ तथा मोहन राजेश की ‘एंटी करप्शन’!

पाठकों द्वारा आकलन के लिए वे सभी लघुकथाएँ क्रमश: यहाँ उद्धृत है :

‘लघु-कहानी मासिक’ अतिरिक्त

वर्ष 1 अंक 5 अगस्त 1972

अतिरिक्त विचार –

हम लघुकथा की ऐसी और किसी हद तक खोई हुई विधा को फिर से जगाना चाहते हैं. आज औसत आदमी के पास फुर्सत कम से कम रह गई है. इसलिए मिनी कविता, मिनी नवगीत आदि के नए- नए और सही- सही आन्दोलन चल पड़े हैं. ये आन्दोलन कपड़ों के फैशन की तरह बदलनेवाले या कुछ अरसे में ख़तम हो जाने वाले नहीं है. ये हमारे समसामयिक परिप्रेक्ष्य की अनिवार्यता से फूटे हैं. लेकिन लघुकथा इस तरह का चौकानेवाला या नया आन्दोलन नहीं है. संस्कृत साहित्य के हितोपदेश, पंचतंत्र और उधर खलील जिब्रान फिर इसी शती के रावी, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, हंसराज अरोड़ा और डॉ श्रीनिवासन की किंचित कथाओं से गुजरता हुआ लघुकथाओं का यह काफिला आज अपने मूल्याङ्कन का दावा करता है, यह दावा उसे बहुत पहले करना चाहिए था, समीक्षकों को बहुत पहले इस तरफ ध्यान देना चाहिए था लेकिन अब लघुकथाएँ स्वयम चीख-चीखकर, चिल्ला-चिल्लाकर यह बात कह रही हैं ...आठवें दशक के नवलेखन में लघुकथा प्रत्यावर्तन हो सकती है. किन्तु यह युगबोध की अनिवार्यता है. साहित्य की सभी विधाओं की अपेक्षा लघुकथा सर्वाधिक सशक्त विधा बनने की संभावना और सामर्थ्य अपने भीतर समेटे हुए हैं.

 त्रिलोकीनाथ ब्रजवाल

 

चीख / सुदर्शी सौन्धी

मार्च की मस्त सुबह । चार बजे नामालूम सी धुंध । बादलों के पार से झांकता उजाला । उसने शाल कसकर अपने चारों तरफ लपेट लिया। पापा के कमरे की खिड़की खुल गयी है , थोडी ही देर बाद वे ओवरकोट पहनेंगे, फिर सिगार मुहॅं में दबाये सीढियों से नीचे उतर आयेंगे रोज की तरह वह मुस्करा देगी ठीक वैसे ही झुके -झुके जैसे अर्दली मुस्कराता है । क्या नहीं है उसके पास, एक आलीशान कोठी, दो दो इम्पाला , एक पापा की , एक उसकी । दो - दो टेलिविजन सेट, हिन्दी, पंजाबी अंग्रेजी, संस्कृत की सारी पुस्तकें सारे संदर्भ ग्रंथ .... । जरा घंटी दबाने पर नौकर हाजिर हो जाता है । पास ही पानी रखा हो तो भी वह खुद होकर तो पानी ले ही नहीं सकती। डनलप के गद्‌दों पर लेटे रहो या विलायती धुन पर घूमते रहो ... । या कामू काफ्‌का की किताबें पढते रहो ! एक सही अहसास । पूरी कालोनी में सबसे ऊंची और सबसे आलीशान कोठी है उसकी ... । होली है आज पर किसके साथ खेलें...पिछलें इक्कीस साल से यह दर्द उसे कुरेदता रहता है....किसी पडोसी बच्चे या समवयसा से गुलाल ही लगवा ले, पर पापा मानेंगे, उनकी नजर में तो सारे पडोसी बौने है , और पापा बौनों का साथ एक पल भी गवारा नहीं करते, उसे लगता है , वह चीख पडेगी वैसे ही , बेमतलब , फिजूल मे।

कीचड़ की मछली / कीर्ति कुमार पंड्या

अस्पताल में दाखिल होने के दूसरे ही दिनसे अनिरुद्ध उस मछली के लिए चिंतित हो गया था. वह आया तो था अपनी बीमारी का इलाज कराने, लेकिन उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह भी उसी की भांति अस्तित्व की रक्षा के लिए तडप रहा है. ....आखिर वह मछली कितने दिन जीवित रहती? बार-बारअनिरुद्ध के मन में यही खयाल जागता... हाँ वह उस मछली को जिन्दा रखेगा ....क्योंकि उसे अपने अस्तित्व की रक्षा, अपनी जिजीविषा का भी ख्याल आ जाता, लेकिन उसे तो जीने के लिए पत्नी अनुपमा और पुत्री नीता का संबल प्राप्त है. किन्तु बेचारी उस मछली को सहारा कौन देगा और कैसे ? उसे लगा, वह झूठ है, वह तड़पती हुई मछली सच है और बस....

निष्कृति / शशि कमलेश

दृष्टि और मन...कार्डिगन के फंदे युनगिन रहे थे. समानांतर सूत्रों से काम नहीं चलता, कुछ सूत्र आड़े भी पड़ने चाहिए.

कसन. ची ची की पुकार ने ध्यान आकृष्ट किया. भयभीत कातर सी प्रास[फेंकना फेंकी जाने वाली वास्तु की क्षैतिज दूरी, मार] प्रीसा संगिनी को चिड़ा चोंच मार मारकर सुरक्षित शिविर से बाहर निकाल रहा था थी....सहने भर को सहती रही चिड़िया. आहत मन लिए अनजानी दूरियों में खो गई ....किस्मना खत्म हुआ, मैंने निष्कृति की सांस ली.

ची ची ची ची और अधिक कारण –आहत स्वर नजरें उठीं. चिड़ा अपनी तिरस्कृता संगिनी को ढूँढ रहा था, पुकार रहा था, पागल सा सर पटक रहा था. आहत विस्मित चेतना खुद में प्रतिबिम्ब उफेरने लगी. क्या तुम भी ऐसे ही .....

तलाश / एल. आर. कुमावत ‘राज’

रात गहरा रही थी. काली तहें चम्बल के किनारे पार पहाड़ों और चम्बल के जल के आदित्य को पी रही थी. झोंपड़ियों से हल्का प्रकाश अज्ञान में छिपे ज्ञान की भांति चमक रहा था.कृशान्गिनी चम्बल निर्वसन बह रही थी.धांय रुकी हुई आवाज ने जमी हुई बर्फ के सन्नाटे व रात्रि की नीरवता को भंग कर दिया.खेडा नांगल में चीख पुकार के साथ भगदड़ मच गई. गाँव की बीच हवेली में सेठ नरौबीलाल व उसका परिवार डाकू सरदार हरमुख के सामने काँप रहा था. डाकू सरदार ने हवाई फायर करते हुए फडकती आवाज में कहा-सेठ हम डाकू हैं.और तब तक डाकू रहेंगे जब तक इस दुनिया में यह हालत रहेगी कि कुछ लोग सिर्फ हुक्म देते हैं और कुछ लोग सिर्फ काम करते हैं. हम उस समाज के खिलाफ हैं जिसके हितों की रक्षा करने के लिए तुम जैसे लोगों को ठेके पर आज्ञा दी गई है , हम बन्दुक की नोंक पर डाका डालते हैं. तुम कागज और कलम की नोक पर इन्सान की इज्जत,धन,जमीं,धर्मौर जिस्म पर डाका डालते हो. उस सेठ की समझ में नहीं आ रहा था , वह समर्पण करे या मरण कबूल कर ले. ठोकरें खाने पर मजबूर कर देती है. फिर वे जीवन के अँधेरे की ओर ढकेलता हुआ बीहड़ों के अन्धकार में खो जाता है. सरदार एक आवाज सस्थ चीख पड़ा...दस वर्ष पहले मेरा बाप इस हवेली से रोता चीखता सब कुछ लुटाकर बाहर निकला था . आज मैं तुम्हें इस हवेली से बाहर धकेलने आय हूँ. फिर वही धायं धायँ ... चम्बल का कुछ नहीं बिगाड़ा वह अब भी ...निर्वसना बह रही है. लेकिन यह प्रतिशोध की ज्वाला कब तक दहकती रहेगी ? क्या कभी औसत आदमी की तलाश पूरी हो सकेगी? और क्या सफेदपोश डाकू बराबर सर उठाते रहेंगे ?

पेट का माप / सुशीलेन्दु

अफसर बोलता जा रहा था....हाइट पांच फीट छः इंच ....चैस्ट चौतींस छत्तीस.....वेट एक सौ पैतालींस पौंड ....क्वाइट फिट तुम इधर आ जाओ जवान।

युवक किनारे खिसक गया और चारों तरफ देख कर झिझकता हुआ बोला....सर।

यस बोलो क्या बात है ?

युवक सहमता हुआ बोला....सर आपने मेरी लम्बाई सीना वजन आदि को मापा परंतु .... परंतु आप शायद मेरे पेट का माप लेना भूल गये, सर मैं तो केवल पेट भरने के लिए ही......वह आगे नहीं बोल पाया।

ऑफीसर ने युवक को बड़े ध्यान से देखा और फिर हो - हो कर हॅंसते हुए बोला ....यहॉं सीना का माप लिया जाता है जवान पेट का नहीं और सच तो यह है यंगमेन आज की दुनिया में कम से कम अपना पेट हो भी तो उन्हें मापा जाय आज तो हरेक इन्सान का पेट टुकड़ो - टुकड़ो में बट कर बिखर चुका है ....उन्हें हम कहॉं ढूढते फिरें.....उन्हें कहॉं कहॉं खोज कर मापा जाय, युवक हक्का -बक्का सा ऑफिसर को देखता रहा जो अब दूसरे जवान के सीने पर टेप रख रहा था!

ऐन्टीकरेप्शन / मोहन राजेश

होटल के सभी कोनो पर रात गदरा गयी थी। ग्राहकों को खाने के साथ पीने को देशी_ विदेशी भी 'सर्व' की जा रही थी, एक कोने में जरा सी फुसफुसाहट हुई ।

वह आबकारी इन्सपेक्टर कह रहा था......यार कोई माल......वाल हो तो ......मैनेजर इधर -उधर कनखियों से देखते हुए फुसफुसाया, सर मिल तो सकता था, पर आज कल 'ऐन्टीकरेइशन' में नये ऑफीसर आये हैं, थोड़े दिन देखना पडेगा,

........दोनों का मुंह एक बारगी उतर सा गया,

थोडी ही दूर दूसरी सीट पर बैठा 'दूसरा' पैग खाली करते हुए गुर्राया, देखना क्या है ? अरेन्ज करो न । 'एन्टीकरेप्शन तो यहॉं बैठा है ।

........इन्सेपक्टर और मैनेजर के चेहरे खिल गये........ वे ही नए ऑफीसर थे, .....कुछ देर बाद वहॉं गंगा बही फिर बहती गंगा में हाथ धो लिये,

पाँचवें अंक को भी यद्यपि ‘लघु कहानी मासिक’ बताया गया है; तथापि त्रिलोकीनाथ ब्रजवाल  और शशि कमलेश की संयुक्त टिप्पणी (शशि कमलेश का नाम सम्भवत: भूलवश छपाई में छूट गया था, जिस कारण त्रिलोकीनाथ ब्रजवाल के नीचे उसे पेन से लिखा गया है) में ‘लघुकथा’, ‘लघु-कथा’ तथा ‘लघु कथा’ लघुकथा के लिए प्रयुक्त तीनों ही शब्द-रूपों का प्रयोग हुआ है। यह इस बात का द्योतक है कि उस समय तक ‘अतिरिक्त’ ‘लघुकथा’ संज्ञा पर स्वयं को स्थिर नहीं कर पाया था। मैं समझता हूँ कि इस दिशा में त्रिलोकीनाथ ब्रजवाल और शशि कमलेश की प्रेरणा का उल्लेख अवश्य किया जाना चाहिए। उनकी टिप्पणी का प्रथम वाक्य ही लघुकथा के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण का द्योतक बनकर सामने आता है। लिखा है—‘हम लघुकथा को ऐसी और किसी हद तक खोई हुई विधा को फिर से जगाना चाहते हैं।’

‘अतिरिक्त’ के अंकों की एक विशेषता तो यह थी कि डाक पते को छोड़कर लगभग सभी जगह देवनागरी अंकों का प्रयोग किया गया था। दूसरी यह है कि—इसके किसी भी अंक पर संपादक का नामोल्लेख नहीं है। किसी का भी नाम लिखे बिना केवल ‘संपर्क—सी3-बी/59, फेज़ 2, रावतभाटा(राजस्थान)’ लिखा है। निश्चित ही यह उक्त काल में भगीरथ जी का डाकपता था। हो सकता है कि नौकरी करते हुए किसी भी अन्य अर्थात् राजनीतिक, गैर-राजनीतिक, यहाँ तक कि साहित्यिक अथवा सांस्कृतिक गतिविधि में भाग लेने से पूर्व सक्षम अधिकारी की अनुमति प्राप्त करने के ‘हौवा’ बने नियम ने यह रुकावट पैदा की हो। अंक नौ से ‘संपादन’ के स्थान पर ‘सहयोग’ शब्द का उपयोग करते हुए उसके नीचे दो नामों (रमेश जैन व भगीरथ परिहार) को एक करके ‘रमेश भगीरथ’ छापा गया है। निश्चय ही यह युक्ति भी अपने आप को विभागीय नियमों के क्रूर-पंजों से दूर रखने के लिए ही अपनायी गयी थी।

शेष आगामी अंक में…


रविवार, 14 मार्च 2021

लघुकथा का उत्स : एक अवलोकन / बलराम अग्रवाल


समकालीन कथा-साहित्य के मध्य हिन्दी लघुकथा ने एक सम्मानजनक स्थान बना लिया है। देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में इस पर शोध हो चुके हैं और लगातार जारी हैं। इस स्तर पर आकर इसके उत्स का अनुसंधान अति-आवश्यक हो गया है। अनेक समकालीन कथा-आलोचक मित्रों का मानना है कि—

1-   लघुकथा एक नव्य कथा विधा है जिसका प्रादुर्भाव बीसवीं सदी के सन् 1971 से सर्व-विदित है। सन् 1971 से पहले संगठित रूप में लघुकथा का विकास नहीं हुआ था, इसलिए उससे पहले की लघु-आकारीय कथाओं को लघुकथा मानना तर्कसंगत नहीं है।

2-   लघुकथा का इतिहास सन् 1971 से ही लिखा जाए। पहली लघुकथा सन् 1971 में प्रकाशित लघुकथा को माना जाए।

यदि पीछे ही जाने की बाध्यता हो, तो पं॰ माधवराव सप्रे की कथा ‘एक टोकरीभर मिट्टी’ को आधार लघुकथा मानकर सन् 1901 से ही इसका इतिहास लिखा जाए। उससे पहले ‘लघुकथा’ को खोजना निरर्थक है। वह सब पौराणिक और धार्मिक साहित्य है। आमजन से उसका कुछ लेना-देना नहीं है।

मेरा मानना है कि सन् 1901(माधवराव सप्रे की ‘एक टोकरीभर मिट्टी’), सन् 1876-1880 (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की पुस्तक ‘परिहासिनी’), सन् 1874 (‘बिहार बन्धु’ के पृष्ठों पर अंकित ‘नीतिकथा’ आदि शीर्षक तले छपने वाली लघु-आकारीय कथाएँ) अथवा सन् 1826 (‘उदंत मार्तंड’ में प्रकाशित ‘ठट्ठे की बात’) आदि ‘लघुकथा’ के ऐसे पड़ाव हैं,  जिनपर सकारात्मक दृष्टि डालना अति आवश्यक है। फिर, जैसे-जैसे हम अतीत के गहरे सागर में उतरते हैं, वैसे-वैसे ‘लघुकथा’ के अद्भुत माणिकों से हमारा सामना होता है।  इस लेख को पत्रिका की सीमा में ही रखने की सावधानी बरतते हुए बीच के अनेक सोपानों का जिक्र न करते हुए मैं सीधे ॠग्वेद की कुछ ऐसी ॠचाओं की चर्चा कर रहा हूँ जो प्रामाणिक रूप से लिखित साहित्य के प्रथम कथा-संकेत अथवा प्रथम कथा-सूत्र हैं। इनमें सबसे पहला है—‘हे इन्द्र! तुमने गायों का अपहरण करने वाले ‘बल’ नाम के असुर की गुफा का पता लगाया था।’ ( ॠग्वेद 1-6-5)। ‘बल’ नामक असुर कौन था? उसने किसकी गायों को चुराया और क्यों चुराया? ‘इन्द्र’ कौन था और उसने कैसे ‘बल’ की गुफा का पता लगाया? किस चतुराई और संघर्ष के द्वारा गायों को मुक्त कराया? आदि अनेक जिज्ञासाएँ इस एक मंत्र में छिपी हैं। इस एक संकेत के आधार पर ब्राह्मण, उपनिषद और पुराण आदि में छोटी-बड़ी अनेक कथाओं का प्रणयन हुआ है।

ॠग्वेद में वर्णित मंत्रों की विभिन्न घटनाओं को यदि कथा अथवा कथा-संकेत मानें, जोकि सामान्य व्यक्ति के लिए वे हैं भी, तो उन सबके केन्द्र में ‘इन्द्र’ है। वह इन्द्र ही अग्नि है, जल है, सूर्य है, उषा है, पूषा है, अश्विद्वय, मित्र और वरुण आदि है।  इस कथन के प्रमाणस्वरूप अनगिनत मंत्र हैं। ये मंत्र अथवा ॠचाएँ कलात्मक अभिव्यक्ति के अन्यतम उदाहरण आज भी हैं।

अनेक विद्वानों का मत है कि वेद में जो कुछ भी लिखा है, वह ईश्वरीय वाणी है, उनमें कथा देखना मूर्खता है। वे कहते हैं कि वेद-मंत्रों के निहित अर्थ साधारण मनुष्य की समझ से परे हैं। तर्क यह कि उसे समझने के लिए उसी स्तर तक बुद्धि का उन्नत होना आवश्यक है। ध्यान से देखें तो सभी विषय ऐसे हैं जिन्हें गहराई से समझने के लिए बुद्धि का उनके स्तर तक उन्नत होना आवश्यक है। उन्नत अध्ययन से हीन एमबीबीएस डिग्रीधारी व्यक्ति उक्त डिग्री से विहीन अनुभवी चिकित्सक से कमतर सिद्ध होता देखा जा सकता है। नि:संदेह वेद के सभी कथन गूढ़ार्थ लिए हैं, तथापि कथा की दृष्टि से भी उनमें असीम सत्य और संभावनाएँ निहित हैं। न होतीं तो ‘ब्राह्मण ग्रंथों’ में, ‘उपनिषदों’ और ‘पुराणों’ में, तत्पश्चात् जैन एवं बौद्ध कथा-ग्रंथों में वर्णित कथाएँ आकार न ले पातीं। एक बड़ा सत्य यह भी है कि लगभग समूचा ॠग्वेद ‘संबोधन शैली’ में है तो अनेक स्थल कथोपकथन शैली में भी प्राप्त हैं। ॠग्वेद में मुख्यत: निम्न प्रकार की कथाएँ अथवा कथा-संकेत समाहित हैं—

1-           व्यापक नेपथ्य वाली मात्र संकेतात्मक सूत्र-कथाएँ

2-           स्पष्ट अभिमत वाली पूर्ण कथाएँ

ब्राह्मण, उपनिषद और बृहद्देवता आदि ग्रंथों में जो कथाएँ विस्तार से मिलती हैं, वे सब की सब किसी न किसी संकेत रूप में ऋग्वेद संहिता में मिलती हैं। ऋग्वेद में ऐसे बहुत से कथा-संकेत उपलब्ध हैं जिनमें दो या तीन पात्रों का परस्पर संवाद है। अनेक विद्वानों ने इन्हें संवाद-सूक्त भी कहा है। भारतीय साहित्य में अनेक कथाओं का उद्गम इन संवादों से ही हुआ है। इनके अलावा सामान्य स्तुतिपरक मंत्रों में भी अलग-अलग देवताओं के बारे में अनेक मनोरंजक और शिक्षाप्रद कथाएँ मिलती हैं। संहिता में जिन कथाओं का केवल संकेत मात्र है, उनका विस्तृत वर्णन बृहद्देवता तथा षड्गुरुशिष्य की कात्यायन-सर्वानुक्रमणी वेदार्थदीपिका टीका में किया गया बताया जाता है। निरुक्त में भी आचार्य यास्क ने तथा सायण ने अपने वेदभाष्य में उन कथाओं के रूप तथा प्राचीन आधार को बताया, ऐसा कहा जाता है।

हृदय से  निकली आर्त पुकार सुनकर वह अवश्य आएँगे, हजारों रक्षा शक्तियों के साथ प्रकट होंगे।(ॠग्वेद 1-30-8)। इस विश्वास को ‘विष्णुपुराण’ के अन्तर्गत प्रह्लाद की प्रार्थना सुनकर नरसिंह अवतार की कथा के रूप में विस्तार दिया गया है। इन प्रह्लाद के पौत्र असुरों के राजा बलि हुए हैं जिनके नाम पर भारतीय संस्कृति में 'बलिदान' शब्द गौरव के साथ प्रचलित है और हमेशा रहेगा।

‘भागवतपुराण’ और ‘वामनपुराण’ में विष्णु के वामन अवतार की कथा आती है। बताया गया है कि बलि इतना बलशाली था कि उसने अपने राज्य का विस्तार करने की नीयत से एक बार इन्द्रलोक पर ही चढ़ाई कर दी और उसे जीत लिया। वह दानशील प्रकृति का था इसलिए जीतने के बाद इन्द्रलोक की एक-एक वस्तु को दान में देना शुरू कर दिया। उसने इन्द्र का ऐरावत हाथी और नन्दनकानन भी दान कर दिया। हारे हुए सारे देवताओं को साथ लेकर त्रस्त इन्द्र विष्णु की शरण में चले गये। उन्होंने बलि से छुटकारा दिलाने की गुहार उनसे की। बहुत छोटे कद के गरीब ब्राह्मण का रूप बनाकर विष्णु दान माँगने के लिए बलि के यहाँ पहुँच गये। कहा—‘मेरा नाम वामन है। गरीब ब्राह्मण हूँ। कुछ माँगने आया हूँ ताकि आराम से रह सकूँ।’ बलि के गुरु शुक्राचार्य उस समय उसी के पास बैठे हुए थे। उन्होंने देखते ही पहचान लिया कि यह कौन है। उन्होंने बलि के कान में कहा—‘यह विष्णु है। छल करने को आया है। मुझसे पूछे बिना तुम इसे कोई भी वस्तु दान मत करना।’

लेकिन बलि ने शुक्राचार्य से कहा—‘गुरुदेव, यह जो कोई भी हो, दान देने का अपना नियम मैं नहीं तोड़ सकता।’ फिर वामन के रूप में सामने खड़े विष्णु से बोला—‘बिना संकोच के कहिए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?’ वामन ने कहा—‘महाराज, अपने राज्य में मुझे मेरे तीन पग के बराबर जमीन दे दें ताकि मैं सुख से रह सकूँ।’ बलि ने हथेली पर जल लेकर दान देने का संकल्प लिया और वामन से कहा—‘महाराज, आप जिधर चाहें उधर तीन पग धरती नाप लें।’ यह सुनते ही विष्णु ने वामन वाला रूप छोड़कर बलि को अपना विराट रूप दिखा दिया। पहले पग में उन्होंने इस भूमंडल को नापा और दूसरे पग में द्युलोक को जिसे आम बोलचाल में हम स्वर्ग कह देते हैं। तीसरे पग के लिए विष्णु जी ने स्वयं बलि से ही पूछा—‘बताओ, तीसरा पग कहाँ रखूँ?’ बलि ने कहा—‘अब तो मेरा सिर ही बाकी बचा है। यहीं रख दो।’ बस, तीसरा पग विष्णु ने उसके सिर पर रखकर उसे पाताल में पहुँचा दिया और कलियुग के अंत तक उसे वहीं का राजा बने रहना का वरदान भी दे दिया।’

‘वामन अवतार’ शीर्षक से यह एक पुराण-कथा है जो भिन्न-भिन्न पुराणों में भिन्न-भिन्न तरह से मिलती है। लेकिन इसका मूल ॠग्वेद की ॠचाओं में ही मिलता है। जिन ॠचाओं को केन्द्र में रखकर वामन के तीन पग की कथा रची गयी, वे और उनके संभावित गूढ़ तात्पर्य यों हैं—वेद के अनेक सूक्तों में शरीर को पृथ्वी माना गया है। शरीर में रस, रुधिर, मांस, अस्थि, मज्जा, मेदस और वीर्य इन सात धातुओं को सात धाम की संज्ञा दी गई है। (ॠग्वेद 1-22-16)।  सात धाम यात्रा से तात्पर्य भी शरीरगत इन सात धातुओं के बीच परिभ्रमण करना, इनकी रक्षा में तत्पर रहना है।

विष्णु ने विशेष पुरुषार्थ किया है कि कदम को तीन प्रकार से रखा है। (ॠग्वेद 1-22-17)। तीन पग से तात्पर्य है कि विकासशील मनुष्य ने केवल शरीर, केवल मन और केवल मस्तिष्क की उन्नति न करके तीनों की ही उन्नति की है। शरीर को निरोग बनाया है, मन को निर्मल और मस्तिष्क को तीव्र बुद्धि वाला बनाया है। यह देह पार्थिव है इसलिए विष्णु के कदमों को धूल में सना बताया है। इसी धूल से बनी पृथ्वी जाना है।

विष्णु ने तीन कदमों को विशेष रूप से रखा है। (ॠग्वेद 1-22-18)। तीन भावनाओं को यज्ञ कहा गया है—बड़ों का आदर, बराबर वालों से प्रेम तथा छोटों को दयापूर्वक कुछ देना। मन की व्यापकता (विष्णु), इंद्रियों की आत्मवश्यता (गोपा) और शरीर की नीरोगता (अदाभ्यः) के बिना किसी भी धर्म का पालन संभव नहीं है।

विष्णु के (ऊपर कहे) कर्मों को देखो। क्योंकि वह अपने कर्मों को (पस्पशे) बारीकी से देखता है अर्थात् उनका स्वयं आकलन करता हुआ दोषों को दूर करता है। इंद्र के सदा साथ रहनेवाला सखा बनता है। (ॠग्वेद 1-22-19)।

महर्षि दध्यंग आथर्वण की कथा के संकेत ऋग्वेद संहिता के प्रथम मंडल के सूक्त 116 की 12वीं ऋचा, सूक्त 117 की 22वीं ऋचा तथा 10वें मंडल के 48वें सूक्त की दूसरी ऋचा में एवं शतपथ ब्राह्मण (14-4-5-13) और बृहद्देवता (3-18-14) में मिलते है। वैदिक महर्षि दध्यंग ही पौराणिक दधीचि नाम से प्रसिद्ध हैं। वेद में दध्यंग के अश्व सिर से वज्र बनने का उल्लेख है तो पुराण में उनकी देह की हड्डियों से बने वज्र के द्वारा वृत्र के वध का वर्णन है। मूल कथा में कोई विशेष अंतर नहीं है। महर्षि दधीचि के आदर्श चरित्र का चित्रण दोनों में समान है। दध्यंग के अश्व सिर की कथा भी अत्यंत रोचक है। इसी सिर से उन्होंने अश्विनीकुमारों को मधुविद्या सिखाई थी। इस मिथक का उपयोग कर गिरीश कर्नाड ने ‘हयवदन’ नाटक लिखा था जो बहुमंचित हुआ और बहुचर्चित भी रहा। इस तरह वेद में वर्णित कथा-सूत्रों ने आज के कथाकार और नाटककार तक भी अपनी पहुँच बनाई है। कथाकारों-विचारकों को प्रभावित करने का यह क्रम अनन्त काल तक चलते रहना है।  

ऋग्वेद के 10वें मंडल के 108वें सूक्त की 11वीं ऋचा सरमा-पणि संवाद है। इनके अलावा भी ‘पुरुरवा-उर्वशी संवाद’, ‘अपाला-इंद्र संवाद’, ‘लोपामुद्रा-अगस्त्य संवाद’ अनेक संवाद ॠग्वेद में हैं। देवासुर संग्राम की लगभग 12 घटनाएँ संकेत-कथा के रूप में ॠग्वेद के विभिन्न सूक्तों की ॠचाओं में विद्यमान हैं।

वेद में वर्णित कथाओं ने हजारों वर्ष की यात्रा की है। इन हजारों वर्षों में अपने अस्तित्व को काल और आवश्यकता के अनुरूप उन्होंने आख्यान, उपाख्यान, गाथा, बात, ख्यात, लोककथा, धर्मकथा (दृष्टांत, उपदेश, बोध आदि), किंवदंती, कहावत, मुहावरे, चुटकुले,  आदि कथा के लघु से लघु और दीर्घ से दीर्घ अनेक रूपों में बचाकर रखा है। ऐसा भी समय आया, जब वे लिखित साहित्य से अन्तर्धान होकर वे लोककंठी हो गयीं और पीढ़ी दर पीढ़ी लोकगायकी और लोककथावाचकी के रूप में स्वयं को जीवित रखा। एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक की यात्रा में मौखिक बातों के रूप में अनचाहा, अनजाना परिवर्तन हो जाता है, यह एक मनोवैज्ञानिक और प्रामाणिक तथ्य है। वेद से चले हुए कथा-सूत्रों और कथा-संकेतों में परिवर्तन नहीं आया होगा, हम दावा नहीं कर सकते। आज जिसे हम समकालीन लघुकथा कह रहे हैं, उसका विकास नि:संदेह ‘चुटकुले’ जैसे तीक्ष्ण और मारक रूप के साथ हुआ है। भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने इसकी शुरुआत  अंग्रेजों और अंग्रेजीदांओं के विरुद्ध ‘व्यंग्यपरक’ साहसिक अभियान चलाकर की। नि:संदेह, समकालीन लघुकथा आज मनुष्य के हितार्थ सभी विषयों को प्रस्तुत करने में समर्थ एक चुटीली और गम्भीर कथा-विधा है। सामान्य जन की हर पीड़ा को अभिव्यक्ति देने की सामर्थ्य इसमें है; लेकिन ‘व्यंग्य’ की तीक्ष्णता और ‘संकेतपरकता’ आज भी इसके अकाट्य अस्त्र हैं। माधवराव सप्रे की ‘एक टोकरीभर मिट्टी’ भी व्यंग्य की धार का ही प्रमाण प्रस्तुत करती है। भारतेंदु हरिश्चन्द्र जिस उद्वेलन को संकेतात्मक रखते हैं, उसी को सप्रे जी ने आध्यात्मिक चेतना के दर्शन से जोड़ने का यत्न किया है। भारतेंदु कचोट उत्पन्न करते हैं और सप्रे जी द्वंद्व की जमीन तैयार करते हैं। आज का लघुकथाकार उस द्वंद्व को उद्वेलन में परिवर्तित करने की दिशा में यत्नशील है। अपने उत्स से लेकर अब तक ‘लघुकथा’ की इन विभिन्न भावभूमियों की पड़ताल और आकलन भी आवश्यक रूप से शोध का विषय है।

(शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ‘लघुकथा का वैदिक युग’ से एक अंश)

साभार : वेब पत्रिका 'लेखनी' (सं॰ शैल अग्रवाल, लघुकथा विशेषांक, मार्च-अप्रैल 2021)

संपर्क:एम-70, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032

मोबाइल:8826499115

ई-मेल:2611ableram@gmail.com

  लेख के मध्य में आये संदर्भित श्लोक :

1-   आ घा गमद्यदि श्रवत्सहस्त्रिणीभिरूतिभिः। वाजेभिरुप नो हवम्।। ॠ. 1-30-8।।

2-   अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे। प्रथिव्या सप्त धामभिः।। ऋ. 1-22-16।।

3-   इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा निदधे पदम्।समूढ़्हमस्य पांसुरे।। ऋ. 1-22-17।।

4-   त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः। अतो धमींणि धारयन्।।ऋ. 1-22-18।।

5-   विष्णोः कमींणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे। इंद्रस्य युज्यः सखा।। ऋ. 1-22-19।। 

गुरुवार, 14 जनवरी 2021

रचना और शास्त्र का अन्तर्संबंध/ बलराम अग्रवाल

अच्छी और उत्साहवर्धक बात है कि गत कुछ दिनों से हिंदी लघुकथा में शैलियों की विशेष पड़ताल की जाने लगी है। इस पड़ताल के दो लाभ होंगे। एक तो यह, कि अब तक अपनाई जा चुकी विभिन्न शैलियों को रेखांकित किया जा सकेगा। दूसरी यह, कि पूर्व कथाकारों द्वारा अपनाई जा चुकी कथा शैलियों के मध्य छूट रही शैलियों में भी लघुकथा लेखन को बढ़ावा दिया जा सकेगा।  वर्तमान पड़ताल के अंतर्गत मृणाल आशुतोष की एक पोस्ट में 'विज्ञापन शैली' का जिक्र भी हुआ है। यह टिप्पणी मुख्य रूप से उसी पर केंद्रित है। 

2008 में कमल चोपड़ा द्वारा संपादित 'संरचना' के लिए लिखे अपने आलेख में मैंने भारतेतर संसार की कुछ संस्थाओं द्वारा निश्चित शब्द-संख्या में लघुकथा लेखन को बढ़ावा देने के प्रयासों का उल्लेख किया था। उनमें 59 लाइनर्स, 69 लाइनर्स, 100 लाइनर्स के साथ-साथ अर्नेस्ट हेमिंग्वे की 6 शब्दों वाली रचना 'फाॅर सेल बेबी शूज नेवर वोर्न' को भी उद्धृत किया था। इस रचना के दो पाठ मिलते हैं। एक में अंतिम शब्द 'वोर्न' है और दूसरी में 'बोर्न' है। दोनों ही शब्दों के साथ रचना व्यापक अर्थ ध्वनित करती है। पहले शब्द के साथ रचना का अर्थ, 'बिकाऊ हैं शिशु जूते अन-पहने' बनता है और दूसरे शब्द के साथ इसका अर्थ, 'बिकाऊ हैं अनजन्मे शिशु के जूते' बनता है।

गहराई से देखें, तो रचना के दोनों ही पाठ अर्थ और संवेदना की व्याप्ति से भरे हैं। हेमिंग्वे ने  प्रथम विश्वयुद्ध में सक्रिय भाग लिया था और दूसरे विश्वयुद्ध तक भी उनका रचनाकाल फैला है। उस अवधि में अनेक युद्धों के वह प्रत्यक्षदर्शी रहे। नि:संदेह किसी युद्ध के दौरान उन्होंने  'अन-पहने शिशु जूते' मलबे में तब्दील हो चुके किसी आवास पर अवश्य देखे होंगे। किसी अन्य जगह किसी अन्य ने किसी गर्भवती युवती के शव को 'शिशु जूते' मुट्ठी में दबाए पड़ा देखा होगा। और यहीं से हेमिंग्वे की रचना के दूसरे पाठ का जन्म हुआ होगा। यद्यपि यह रचना मुख्यतः युद्धकाल में और विदेश में रची गई है इसलिए इसके संदर्भ भारत में 'कन्या भ्रूण हत्या' से जोड़ना तथ्यपरक सच्चाई नहीं है तथापि, कथापरक और संवेदनापरक सच्चाई अवश्य है। भारत में, गर्भस्थ शिशु के लिए माताओं द्वारा जूते और स्वेटर आदि बुनने का चलन पुरातन समय से रहा है। कामायनी में श्रद्धा गर्भस्थ शिशु के लिए स्वयं कपड़े बुनती दिखाई देती है। मातृत्व और वात्सल्य शाश्वत संस्कार बनकर धरती की उत्पत्ति के समय से ही महिलाओं के रक्त में दौड़ रहे हैं। क्या बीतती होगी उस माँ पर, जिसकी गर्भस्थ कन्या की जबरन हत्या कर दी गई हो और जिसके नन्हें पाँवों के लिए रात-रात भर जागकर बुने-अधबुने जूते उसके हाथ की सलाइयों में ही अटके रह गए हों।

गत कुछ दिनों से, अंतरजाल पर 6 शब्दों की उक्त रचना को संसार का सबसे छोटा उपन्यास तक बताया जाने लगा है। उससे पहले इसे संसार की सबसे छोटी कहानी कहा जाता था। इससे सिद्ध होता है कि संवेदना यदि अपनी संपूर्णता और गहनता में व्यक्त हो तो उसे किसी एक विधा में बाँधकर रख पाना शास्त्रकारों के लिए सर्वथा असंभव रहता है। मात्र 3 शब्दों की अज्ञेय की रचना 'मेंढक/पानी/छप्' भी अनंत तक जाने वाली कथा और कविता दोनों है। अशोक भाटिया की अनेक लघुकथाओं में कविता जीवित हो उठती है। सातवें दशक (1966) में आई 'स्वाति बूँद' (सुगनचंद 'मुक्तेश') की अनेक कथाएँ कविता को छूती हैं।  ऐसी रचनाएं शास्त्रीय नियमों से 'बगावत' करने वाली सिद्ध होती हैं। हास-परिहास और चुटकुले के पान में लपेटकर आत्माभिमान को जगाने की जो गोली भारतेंदु अपने समय के नव धनाढ्यों को खिलाते हैं, वह अभूतपूर्व है। तब के नव धनाढ्य कमरे की बत्ती बुझाने के लिए 'मोहना' को बुलाते थे, अब के नव धनाढ्य 'रिमोट' ढूँढ़ते हैं।  (आगे जारी रह सकता है)